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Wednesday, April 8, 2026

खोया हुआ विश्वास



एक छोटे से गाँव सीतापुर में मोहन नाम का एक युवक रहता था। वह स्वभाव सेमिलनसार और मेहनती था, इसलिए गाँव के लोग उस पर बहुत भरोसा करते थे। अगरकिसी को कोई काम कराना होता, तो वे अक्सर मोहन को ही कहते थे।

मोहन भी शुरू-शुरू में हर काम ईमानदारी से करता था। इसी वजह से धीरे-धीरेउसका सम्मान पूरे गाँव में बढ़ने लगा। लेकिन समय के साथ मोहन में एक बुरी आदतआ गई—वह कभी-कभी लोगों से झूठ बोलने लगा और अपने फायदे के लिएछोटी-छोटी चालाकियाँ करने लगा।

शुरुआत में लोगों को इसका पता नहीं चला।

एक दिन गाँव के रामू काका ने मोहन को कुछ पैसे दिए और कहा,
“
बेटा, यह पैसे शहर जाकर बीज खरीद लाना। मुझे खेत में बोने के लिए अच्छे बीजचाहिए।”

मोहन शहर गया, लेकिन रास्ते में उसने सोचा कि अगर वह थोड़े सस्ते बीज खरीद लेऔर बाकी पैसे अपने पास रख ले, तो किसी को पता भी नहीं चलेगा।

उसने ऐसा ही किया।

जब वह वापस आया, तो रामू काका को बीज दे दिए। लेकिन कुछ समय बाद जबफसल उगने लगी, तो पता चला कि बीज अच्छे नहीं थे और फसल कमजोर हो रहीहै।

रामू काका को बहुत दुख हुआ।

धीरे-धीरे लोगों को शक होने लगा कि शायद मोहन ने सही काम नहीं किया।

कुछ दिनों बाद गाँव में एक और घटना हुई। गाँव के मंदिर की मरम्मत के लिए लोगों नेमिलकर कुछ पैसे इकट्ठा किए और वह जिम्मेदारी भी मोहन को दे दी।

लेकिन इस बार भी मोहन ने कुछ पैसे अपने पास रख लिए।

जब काम पूरा हुआ, तो हिसाब में गड़बड़ी दिखाई दी।

अब गाँव के लोगों को पूरा यकीन हो गया कि मोहन ईमानदारी से काम नहीं कर रहाहै।

लोगों ने उससे दूरी बनानी शुरू कर दी।

जो लोग पहले हर काम के लिए मोहन पर भरोसा करते थे, अब उससे बात भी कमकरने लगे।

मोहन को समझ नहीं आ रहा था कि अचानक सब लोग उससे नाराज़ क्यों हैं।

एक दिन गाँव के बुज़ुर्ग हरिदास जी ने उसे बुलाया और शांत स्वर में कहा,
“
मोहन, विश्वास एक ऐसा धन है जो बड़ी मुश्किल से मिलता है, लेकिन एक बार खोजाए तो उसे वापस पाना बहुत कठिन होता है।”

उन्होंने आगे कहा,
“
तुम्हारी छोटी-छोटी गलतियों ने लोगों का भरोसा तोड़ दिया है।”

यह सुनकर मोहन को अपनी गलती का एहसास हुआ।

उसे याद आया कि कैसे उसने लालच में आकर लोगों के विश्वास को ठेस पहुँचाईथी।

उस रात वह बहुत देर तक सोचता रहा।

अगले दिन वह गाँव के चौपाल पर गया और सबके सामने हाथ जोड़कर बोला,
“
मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैंने लालच में आकर आप सबका विश्वास तोड़ाहै। मुझे माफ कर दीजिए। मैं अब से कभी ऐसी गलती नहीं करूँगा।”

गाँव के लोग उसकी बात सुनकर चुप हो गए।

हरिदास जी बोले,
“
गलती मान लेना अच्छी बात है, लेकिन विश्वास वापस पाने के लिए तुम्हें अपने कर्मोंसे साबित करना होगा।”

उस दिन के बाद मोहन ने खुद को बदलने का निश्चय किया।

अब वह हर काम पूरी ईमानदारी से करने लगा।

धीरे-धीरे लोगों को उसका बदलाव दिखाई देने लगा।

कई महीनों की सच्चाई और मेहनत के बाद गाँव के लोगों का भरोसा फिर से लौटनेलगा।

रामू काका ने एक दिन मुस्कुराते हुए कहा,
“
मोहन, अब हमें फिर से तुम पर विश्वास होने लगा है।”

मोहन की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।

उसे समझ में आ गया था कि विश्वास सबसे कीमती चीज़ होती है।

और सच ही कहा गया है—

“विश्वास कमाने में सालों लगते हैं, लेकिन खोने में एक पल भी नहीं लगता।”

सीख:
हमें हमेशा ईमानदारी से काम करना चाहिए, क्योंकि एक बार खोया हुआ विश्वासवापस पाना बहुत कठिन होता है।

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