Friday, July 3, 2020

अनोखा रिश्ता

पिता पुत्र का अनोखा रिश्ता
भारतीय पिता पुत्र की जोड़ी भी बड़ी कमाल की जोड़ी होती है ।

दुनिया के किसी भी सम्बन्ध में, 
अगर सबसे कम बोल-चाल है, 
तो वो है पिता-पुत्र की जोड़ी में ।

एक समय तक दोनों अंजान होते हैं
एक दूसरे के बढ़ते शरीरों की उम्र से फिर धीरे से अहसास होता है हमेशा के लिए बिछड़ने का ।

जब लड़का,
अपनी जवानी पार कर अगले पड़ाव पर चढ़ता है तो यहाँ इशारों से बाते होने लगती हैं  या फिर इनके बीच मध्यस्थ का दायित्व निभाने वाली माँ के माध्यम से ।

पिता अक्सर उसकी माँ से कहा करते हैं जा "उससे कह देना"
और
पुत्र अक्सर अपनी माँ से कहा करता है "पापा से पूछ लो ना"

इसी दोनों धूरियों के बीच घूमती रहती है माँ । 

जब एक कहीं होता है तो दूसरा नहीं होने की कोशिश करता है,
शायद पिता-पुत्र नज़दीकी से डरते हैं ।
जबकि 
वो डर नज़दीकी का नहीं है, डर है उसके बाद बिछड़ने का । 

भारतीय पिता ने शायद ही किसी बेटे को कहा हो कि बेटा मैं तुमसे बेइंतहा प्यार करता हूँ ।

पिता की अनंत गालियों का उत्तराधिकारी भी वही होता है,
क्योंकि पिता हर पल ज़िन्दगी में अपने बेटे को अभिमन्यु सा पाता है ।

पिता समझता है,
कि इसे सम्भलना होगा, 
इसे मजबूत बनना होगा, ताकि ज़िम्मेदारियो का बोझ इसका वध नहीं कर सके । 
पिता सोंचता है,
जब मैं चला जाऊँगा, 
इसकी माँ भी चली जाएगी, 
बेटियाँ अपने घर चली जायँगी,
रह जाएगा सिर्फ ये, 
इसे हर-दम हर-कदम परिवार के लिए,
आजीविका के लिए,
बहु के लिए,
अपने बच्चों के लिए चुनौतियों से,
सामाजिक जटिलताओं से लड़ना होगा ।

पिता जानता है
हर बात घर पर नहीं बताई जा सकती,
इसलिए इसे खामोशी में ग़म छुपाने सीखने होंगे ।

परिवार के विरुद्ध खड़ी हर विशालकाय मुसीबत को अपने हौंसले से छोटा करना होगा।
ना भी कर सके तो ख़ुद का वध करना होगा । 

इसलिए वो कभी पुत्र-प्रेम प्रदर्शित नहीं करता,
पिता जानता है
प्रेम कमज़ोर बनाता है ।
फिर कई दफ़ा उसका प्रेम झल्लाहट या गुस्सा बनकर निकलता है । 

वो अपने बेटे की
कमियों मात्र के लिए नहीं है,
वो झल्लाहट है जल्द निकलते समय के लिए, 
वो जानता है उसकी मौजूदगी की अनिश्चितताओ को । 

पिता चाहता है कहीं ऐसा ना हो इस अभिमन्यु का वध मेरे द्वारा दी गई कम शिक्षा के कारण हो जाये,

पिता चाहता है कि 
पुत्र जल्द से जल्द सीख ले, 
वो गलतियाँ करना बंद करे,
क्योंकि गलतियां सभी की माफ़ हैं पर मुखिया की गलतियां माफ़ नहीं होती, 

यहाँ मुखिया का वध सबसे पहले होता है । 

फिर
एक समय आता है जबकि
पिता और बेटे दोनों को अपनी बढ़ती उम्र का एहसास होने लगता है, बेटा अब केवल बेटा नहीं, पिता भी बन चुका होता है, 
कड़ी कमज़ोर होने लगती है ।

पिता का सीखा देने की लालसा और बेटे की उस भावना को नहीं समझ पाने के कारण, 
वो सौम्यता भी खो देते हैं
यही वो समय होता है जब
बेटे को लगता है कि उसका पिता ग़लत है, 
बस इसी समय को समझदारी से निकालना होता है, 
वरना होता कुछ नहीं है,
बस बढ़ती झुर्रियां और बूढ़ा होता शरीर जल्द बीमारियों को घेर लेता है । 
फिर
सभी को बेटे का इंतज़ार करते हुए माँ तो दिखी पर पीछे, रात भर से जागा पिता नहीं दिखा, 
पिता की उम्र और झुर्रियां बढ़ती जाती है ।

ये समय चक्र है , 
जो बूढ़ा होता शरीर है बाप के रूप में उसे एक और बूढ़ा शरीर झांक रहा है आसमान से, 
जो इस बूढ़े होते शरीर का बाप है, 
कब समझेंगे बेटे, 
कब समझेंगे बाप, 
कब समझेगी दुनिया,
ये इतने भी मजबूत नहीं, 
पता है क्या होता है उस आख़िरी मुलाकात में, 
जब, 
जिन हाथों की उंगलियां पकड़ पिता ने चलना सिखाया था वही हाथ, 
लकड़ी के ढेर पर पढ़े नग्न पिता को लकड़ियों से ढकते हैं,
उसे तेल से भिगोते हैं, उसे जलाते हैं, 

ये कोई पुरुषवादी समाज की चाल नहीं थी, 
ये सौभाग्य नहीं है, 
यही बेटा होने का सबसे बड़ा अभिशाप भी है ।

ये होता है,
हो रहा है, 
होता चला जाएगा ।

जो नहीं हो रहा,
और जो हो सकता है,
वो ये की हम जल्द से जल्द कह दें,
हम आपस में कितनी प्यार करते हैं.

हे मेरे महान पिता.!
मेरे गौरव
मेरे आदर्श
मेरा संस्कार मेरा स्वाभिमान
मेरा अस्तित्व...

मैं न तो इस क्रूर समय की गति को समझ पाया

और न ही आपको अपने दिल की बात आपको कह पाया.........

Thursday, June 11, 2020

अद्भत चमत्कार

वृंदावन मे बिहार से एक परिवार आकर रहने लगा..
परिवार मे केवल दो सदस्य थे-राजू और उसकी पत्नी।
राजू वृंदावन मे रिक्शा चलाकर अपना जीवन यापन करता था और रोज राधारमण जी की शयन आरती में जाता था...
पर जिंदगी की भागम भाग मे धीरे-धीरे उसे राधा रमण लाल जू के दर्शन का सौभाग्य ना मिलता। 
हरि कृपा से उसके घर एक बेटी हुई लेकिन वो जन्म से ही नेत्रहीन थी.. उसने बड़ी कोशिश की..  पर हर तरफ से निराशा ही हाथ लगी।
बेचारा गरीब करता भी क्या ? इसे ही किस्मत समझ कर खुश रहने की कोशिश करने लगा।
उसकी दिनचर्या बस इतनी थी। वृंदावन में भक्तों को इधर से उधर लेकर जाना।
लोगों से राधा रमण लाल जू के चमत्कार सुनता और सोचता मैं भी राधा रमण लाल जू से जाकर अपनी तकलीफ कह आता हूँ..
फिर ये सोचकर चुप हो जाता राधा रमण लाल जू के पास जाऊं और वो भी कुछ माँगने के लिए ही,नही ये ठीक नही है.. 
पर एक दिन पक्का मन करके राधा रमण लाल जू के मंदिर तक पहुँचा और देखा गोस्वामी जी बाहर आ रहे हैं।
उसने पुजारी से कहा, क्या मैं ठाकुर जी के दर्शन कर सकता हूँ ?
पुजारी जी बोले, मंदिर तो बंद हो गया है।तुम कल आना।
पुजारी जी बोले, क्या तुम मुझे घर तक छोड़ दोगे ?
राजू ने रोती आंखों को छुपाते हुए, हाँ में सिर को हिला दिया।
पुजारी जी रिक्शा पर बैठ गए और राजू से पूछा, ठाकुर जी से क्या कहना था ?
राजू ने कहा, ठाकुर जी से अपनी बेटी के लिए आंँखों की रोशनी माँगनी थी.. वो बचपन से देख नही सकती। 
बातों बातों मे पुजारी जी का घर कब आ गया... पता ही ना चला पर.. 
घर आकर राजू ने जो देखा सुना वो हैरान कर देने वाला था..,!!
घर आकर राजू ने देखा उसकी बेटी दौड़ भाग कर रही है..
उसने अपनी बेटी को उठाकर पूछा ये कैसे हुआ..?
बेटी बोली पिताजी..! आज एक लड़का मेरे पास आया और बोला तुम राजू की बेटी हो...
मैंने जैसे ही हाँ कहा उसने अपने दोनों हाथ मेरी आँखों पर रख दिए.. फिर मुझे सब दिखने लगा.. पर वो लड़का मुझे कहीं नही दिखा।
राजू भागते-भागते पुजारी जी के घर पहुँचा.. 
पर पुजारी जी बोले.. मैं तो दो दिन से बीमार हूँ... मैं तो दो दिन से राधा रमण लाल जू के दर्शन को मंदिर ही नही गया..!!
      जय जय श्री राधे

Saturday, May 23, 2020

प्रारब्ध

 एक व्यक्ति हमेशा ईश्वर के नाम का जाप किया करता था । धीरे धीरे वह काफी बुजुर्ग हो चला था इसीलिए एक कमरे मे ही पड़ा रहता था ।

     जब भी उसे शौच; स्नान आदि के लिये जाना होता था; वह अपने बेटो को आवाज लगाता था और बेटे ले जाते थे ।

    धीरे धीरे कुछ दिन बाद बेटे कई बार आवाज लगाने के बाद भी कभी कभी आते और देर रात तो नहीं भी आते थे।इस दौरान वे कभी-कभी गंदे बिस्तर पर ही रात बिता दिया करते थे

    अब और ज्यादा बुढ़ापा होने के कारण उन्हें कम दिखाई देने लगा था एक दिन रात को निवृत्त होने के लिये जैसे ही उन्होंने आवाज लगायी, तुरन्त एक लड़का आता है और बडे ही कोमल स्पर्श के साथ उनको निवृत्त करवा कर बिस्तर पर लेटा जाता है । अब ये रोज का नियम हो गया ।

    एक रात उनको शक हो जाता है कि, पहले तो बेटों को रात में कई बार आवाज लगाने पर भी नही आते थे। लेकिन ये  तो आवाज लगाते ही दूसरे क्षण आ जाता है और बडे कोमल स्पर्श से सब निवृत्त करवा देता है ।

    एक रात वह व्यक्ति उसका हाथ पकड लेता है और पूछता है कि सच बता तू कौन है ? मेरे बेटे तो ऐसे नही हैं ।

    अभी अंधेरे कमरे में एक अलौकिक उजाला हुआऔर उस लड़के रूपी ईश्वर ने अपना वास्तविक रूप दिखाया।

     वह व्यक्ति रोते हुये कहता है : हे प्रभु आप स्वयं मेरे निवृत्ती के कार्य कर रहे है । यदि मुझसे इतने प्रसन्न हो तो मुक्ति ही दे दो ना ।

     प्रभु कहते है कि जो आप भुगत रहे है वो आपके प्रारब्ध है । आप मेरे सच्चे साधक है; हर समय मेरा नाम जप करते है इसलिये मै आपके प्रारब्ध भी आपकी सच्ची साधना के कारण स्वयं कटवा रहा हूँ ।

     व्यक्ति कहता है कि क्या मेरे प्रारब्ध आपकी कृपा से भी बडे है; क्या आपकी कृपा, मेरे प्रारब्ध नही काट सकती है ।

     प्रभु कहते है कि, मेरी कृपा सर्वोपरि है; ये अवश्य आपके प्रारब्ध काट सकती है; लेकिन फिर अगले जन्म मे आपको ये प्रारब्ध भुगतने फिर से आना होगा । यही कर्म नियम है । इसलिए आपके प्रारब्ध मैं स्वयं अपने हाथो से कटवा कर इस जन्म-मरण से आपको मुक्ति देना चाहता हूँ ।

Friday, May 8, 2020

आदतें

एक दिन
अचानक बुख़ार आता है!
गले में दर्द होता है!
साँस लेने में कष्ट होता है!
Covid टेस्ट की जाती है!
3 दिन तनाव में बीतते हैं...
अब टेस्ट+ve आने पर--
रिपोर्ट नगर पालिका जाती है
रिपोर्ट से हॉस्पिटल तय होता है
फिर एम्बुलेंस कॉलोनी में आती है
कॉलोनी वासी खिड़की से झाँक कर तुम्हें देखते हैं
कुछ एक की सदिच्छा आप के साथ है
कुछ मन ही मन हँस रहे होते हैं
एम्बुलेंस वाले उपयोग के कपड़े रखने का कहते हैं...
बेचारे
घरवाले तुम्हें जीभर कर देखते हैं
तुम्हारी आँखों से आँसू बोल रहे होते हैं...
तभी...
"चलो जल्दी बैठो" आवाज़ दी जाती है,
एम्बुलेंस का दरवाजा बन्द...
सायरन बजाते रवानगी...
फिर कॉलोनी सील कर दी जाती है...
14 दिन पेट के बल सोने को कहा जाता है... 
दो वक्त का जीवन योग्य खाना मिलता है...
Tv, mobile सब अदृश्य हो जाते हैं...
सामने की दीवार पर अतीत, और भविष्य के दृश्य दिखने लगते हैं...
अब
आप ठीक हो गए... तो ठीक... 
वो भी जब 3 टेस्ट रिपोर्ट नेगेटिव आ जाएँ...
तो घर वापसी... 
लेकिन
इलाज के दौरान यदि आपके साथ कोई अनहोनी हो गई
तो... आपके शरीर को प्लास्टिक में रैप करके सीधे शवदाहगृह...

शायद अपनों को अंतिमदर्शन भी नहीं...
कोई अंत्येष्टि क्रिया भी नहीं...
सिर्फ
परिजनों को एक डेथ सर्टिफिकेट
और....खेल खत्म

बेचारा चला गया... अच्छा था

इसीलिए,
बेवजह बाहर मत निकलिए...
घर में सुरक्षित रहिए...
'बाह्यजगत का मोह' और 'हर बात को हल्के, मजाक में लेने' की आदतें त्यागिए...

जीवन अनमोल है...

Wednesday, April 29, 2020

पॉजिटिव

सुबह आठ बजे मेरे पड़ोसी ने मेरी बाइक की चाबी मांगी कहा "मुझे लैब से एक रिपोर्ट लानी है"
मैंने कहा ठीक है भाई ले जा
थोड़ी देर बाद पड़ोसी रिपोर्ट ले कर वापिस आया, 
मुझे चाबी दी और मुझे गले लगाया,
और "बहुत बहुत धन्यवाद" कह कर अपने घर चला गया,
जैसे ही वह अपने घर गया, 
गेट पर ही खड़े हो कर अपनी पत्नी से कहने लगा, 
"रिपोर्ट पॉजिटिव आयी है" 
जब यह बात मेरे कान में पड़ी तो मैं गिरते गिरते बचा,
घबरा कर मेने अपने हाथ सैनिटाइज़र से साफ़ किये, 
फिर बाइक को दो बार सर्फ से धोया, 
फिर याद आया मुझे उसने गले भी लगया था, 
मैंने मन मे सोचा मारा गया तू, तुझे भी अब कोरोना होगा, 
में डेटोल साबुन से रगड़ रगड़ कर नहाया,
और बाथरूम में ही दुखी हो कर एक कोने में बैठ गया,
थोड़ी देर बाद मेने पड़ोसी को फोन करके बोला,
"भाई अगर आपकी रिपोर्ट पॉजिटिव थी"
 तो कम से कम मुझे तो बख्श देते...?
"मैं बेचारा गरीब तो बच जाता" 
पड़ोसी जोर जोर से हंसने लगा, 
और कहने लगा " वो रिपोर्ट..?"
वो रिपोर्ट तो आपकी भाभी की प्रेग्नेंसी की रिपोर्ट थी,
"जो पोजटिव आयी है"   

Friday, April 3, 2020

इक्कीस दिन

एक बार एक राजा के राज्य में महामारी फैल गयी। चारो ओर लोग मरने लगे। राजा ने इसे रोकने के लिये बहुत सारे उपाय करवाये मगर कुछ असर न हुआ और लोग मरते रहे। दुखी राजा ईश्वर से प्रार्थना करने लगा। तभी अचानक आकाशवाणी हुई। आसमान से आवाज़ आयी कि हे राजा तुम्हारी राजधानी के
बीचो बीच जो पुराना सूखा कुंआ है अगर
अमावस्या की रात को राज्य के प्रत्येक
घर से एक – एक बाल्टी दूध उस कुएं में
डाला जाये तो अगली ही सुबह ये महामारी समाप्त हो जायेगी और
लोगों का मरना बन्द हो जायेगा।
राजा ने तुरन्त ही पूरे राज्य में यह
घोषणा करवा दी कि महामारी से बचने के लिए अमावस्या की रात को हर घर से कुएं में एक-एक बाल्टी दूध डाला जाना अनिवार्य है । अमावस्या की रात जब लोगों को कुएं में दूध डालना था उसी रात राज्य में रहने वाली एक चालाक एवं कंजूस बुढ़िया ने सोंचा कि सारे लोग तो कुंए में दूध डालेंगे अगर मै अकेली एक
बाल्टी "पानी" डाल दूं तो किसी को क्या पता चलेगा। इसी विचार से उस कंजूस बुढ़िया ने रात में चुपचाप एक बाल्टी पानी कुंए में डाल दिया। अगले दिन जब सुबह हुई तो लोग वैसे ही मर रहे थे। कुछ
भी नहीं बदला था क्योंकि महामारी समाप्त नहीं हुयी थी। राजा ने जब कुंए
के पास जाकर इसका कारण जानना चाहा तो उसने देखा कि सारा कुंआ पानी से भरा हुआ है।
दूध की एक बूंद भी वहां नहीं थी।
राजा समझ गया कि इसी कारण से
महामारी दूर नहीं हुई और लोग
अभी भी मर रहे हैं।
दरअसल ऐसा इसलिये हुआ
क्योंकि जो विचार उस बुढ़िया के मन में
आया था वही विचार पूरे राज्य के
लोगों के मन में आ गया और किसी ने
भी कुंए में दूध नहीं डाला।
मित्रों , जैसा इस कहानी में हुआ
वैसा ही हमारे जीवन में
भी होता है। जब
भी कोई ऐसा काम आता है जिसे बहुत सारे
लोगों को मिल कर करना होता है
तो अक्सर हम अपनी जिम्मेदारियों से यह
सोच कर पीछे हट जाते हैं कि कोई न कोई तो कर ही देगा और
हमारी इसी सोच की वजह से
स्थितियां वैसी की वैसी बनी रहती हैं।
अगर हम दूसरों की परवाह किये बिना अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने लग जायें तो पूरे देश में भी ऐसा बदलाव ला सकते हैं जिसकी आज हमें ज़रूरत है।  सभी घर में रहकर कोरोना को हराने मे सहयोग करें । *इक्कीस* दिन घर में रहकर हमें अपनेआप को बचाना है किसी ओर को नहीं।  

Saturday, March 21, 2020

जीवन का सार

एक व्यक्ति एक गांव में गया। वहां की श्मशान भूमि से जब वह गुजरा तो उसने एक विचित्र बात देखी। वहां पत्थर की पट्टियों पर मृतक की आयु लिखी थी। किसी पर छह महीने, तो
किसी पर दस वर्ष तो किसी पर इक्कीस वर्ष लिखा था। वह सोचने लगाकि इस गांव के लोग जरूर अल्पायु होते हैं। सबकी अकाल मृत्यु ही होती है।

जब वह गांव के भीतर गया तो लोगों ने उसका खूब स्वागत सत्कार किया। वह वहीं रहने लगा लेकिन उसके भीतर यह डर भी समा गया कि यहां रहने पर उसकी भी जल्दी ही मौत हो जाएगी क्योंकि यहां के लोग कम जीते हैं। इसलिए उसने वहां से जाने का फैसला किया।

जब गांव वालों को पता चला तो वे दुखी हुए। उन्हें लगा कि जरूर उन लोगों से कोई गलती हो गई है। जब उस व्यक्ति ने उन्हें अपने मन की बात बताई तो सब हंस पड़े। उन्होंने कहा- लगता है आपने केवल किताबी ज्ञान पढ़ा है, व्यावहारिक ज्ञान नहीं हासिल किया । आप देख नहीं रहे कि हमारे बीच ही साठ से अस्सी साल तक के लोग हैं, फिर आपने कैसे सोच लिया कि यहां लोग जल्दी मर जाते हैं। तब उस व्यक्ति ने श्मशान भूमि की पट्टियों के बारे में बताया। 

इस पर एक गांव वासी ने कहा, "हमारे गांव में एक नियम है। जब कोई व्यक्ति सोने के लिए जाता है तो सबसे पहले वह हिसाब लगाता है कि उसने कितना समय सत्संग में बिताया । 
उसे वह प्रतिदिन एक डायरी में लिख लेता है। गांव में किसी भी मरने वाले की वह डायरी निकाली जाती है फिर उसके जीवन के उन सभी घंटों को जोड़ा जाता है। उन घंटों के आधार पर ही उसकी उम्र निकाली जाती है और उसे पट्टे पर अंकित किया जाता है। 

व्यक्ति का जितना समय सत्संग में बीता, वही तो उसका सार्थक समय है। 

वही उसकी उम्र है !!

मनुष्य जीवन का सार भगवद्भक्ति है और भक्ति का मूल आधार सत्संग है ।

सत्संग सर्वोच्च चेतना प्रदान करता है ।

Thursday, February 27, 2020

दृष्टि बदली तो दृश्य बदल जाते हैं


एक दिन कॉलेज में प्रोफेसर ने विद्यर्थियों से पूछा कि इस संसार में जो कुछ भी है उसे भगवान ने ही बनाया है न?

सभी ने कहा, “हां भगवान ने ही बनाया है।“

प्रोफेसर ने कहा कि इसका मतलब ये हुआ कि बुराई भी भगवान की बनाई चीज़ ही है।

प्रोफेसर ने इतना कहा तो एक विद्यार्थी उठ खड़ा हुआ और उसने कहा कि इतनी जल्दी इस निष्कर्ष पर मत पहुंचिए सर। 

प्रोफेसर ने कहा, क्यों? अभी तो सबने कहा है कि सबकुछ भगवान का ही बनाया हुआ है फिर तुम ऐसा क्यों कह रहे हो?

विद्यार्थी ने कहा कि सर, मैं आपसे छोटे-छोटे दो सवाल पूछूंगा। फिर उसके बाद आपकी बात भी मान लूंगा।

प्रोफेसर ने कहा, "तुम संजय सिन्हा की तरह सवाल पर सवाल करते हो। खैर पूछो।"

विद्यार्थी ने पूछा , "सर क्या दुनिया में ठंड का कोई वजूद है?"

प्रोफेसर ने कहा, बिल्कुल है। सौ फीसदी है। हम ठंड को महसूस करते हैं।

विद्यार्थी ने कहा, "नहीं सर, ठंड कुछ है ही नहीं। ये असल में गर्मी की अनुपस्थिति का अहसास भर है। जहां गर्मी नहीं होती, वहां हम ठंड को महसूस करते हैं।"

प्रोफेसर चुप रहे।

विद्यार्थी ने फिर पूछा, "सर क्या अंधेरे का कोई अस्तित्व है?"

प्रोफेसर ने कहा, "बिल्कुल है। रात को अंधेरा होता है।"

विद्यार्थी ने कहा, "नहीं सर। अंधेरा कुछ होता ही नहीं। ये तो जहां रोशनी नहीं होती वहां अंधेरा होता है।

प्रोफेसर ने कहा, "तुम अपनी बात आगे बढ़ाओ।"

विद्यार्थी ने फिर कहा, "सर आप हमें सिर्फ लाइट एंड हीट (प्रकाश और ताप) ही पढ़ाते हैं। आप हमें कभी डार्क एंड कोल्ड (अंधेरा और ठंड) नहीं पढ़ाते। फिजिक्स में ऐसा कोई विषय ही नहीं। सर, ठीक इसी तरह ईश्वर ने सिर्फ अच्छा-अच्छा बनाया है। अब जहां अच्छा नहीं होता, वहां हमें बुराई नज़र आती है। पर बुराई को ईश्वर ने नहीं बनाया। ये सिर्फ अच्छाई की अनुपस्थिति भर है।"

दरअसल दुनिया में कहीं बुराई है ही नहीं। ये सिर्फ प्यार, विश्वास और ईश्वर में हमारी आस्था की कमी का नाम है।

ज़िंदगी में जब और जहां मौका मिले अच्छाई बांटिए। अच्छाई बढ़ेगी तो बुराई होगी ही नहीं।
गायत्री मंत्र में अच्छाई और संमार्ग पर चलने के लिए प्रेरणा मागी गई है। गायत्री मंत्र का नित्य साधना और जप करने से हमरी दृष्टि में सर्वत्र अच्छाई ही अच्छाई देखने की शक्ति आ जायेगी।

Saturday, February 22, 2020

अपने माता पिता का सर्वदा सम्मान करें

एक पुत्र अपने वृद्ध पिता को रात्रिभोज के लिये एक अच्छे रेस्टोरेंट में लेकर गया । 

खाने के दौरान वृद्ध पिता ने कई बार भोजन अपने कपड़ों पर गिराया । 

रैस्टोरेंट में बैठे खाना खा रहे लोग वृद्ध को घृणा की नजरों से देख रहे थे लेकिन उसका पुत्र शांत था । 

खाने के बाद पुत्र बिना किसी शर्म के वृद्ध को वॉशरूम ले गया । उनके कपड़े साफ़ किये, चेहरा साफ़ किया, बालों में कंघी की, चश्मा पहनाया और फिर बाहर लाया । सभी लोग खामोशी से उन्हें ही देख रहे थे । 

फ़िर उसने बिल का भुगतान किया और वृद्ध के साथ बाहर जाने लगा । 

तभी डिनर कर रहे एक अन्य वृद्ध ने उसे आवाज दी, और पूछा - क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम यहाँ अपने पीछे कुछ छोड़ कर जा रहे हो ? 

उसने जवाब दिया - नहीं सर, मैं कुछ भी छोड़कर नहीं जा रहा ।  

वृद्ध ने कहा - बेटे, तुम यहाँ प्रत्येक पुत्र के लिए एक शिक्षा, सबक और प्रत्येक पिता के लिए उम्मीद छोड़कर जा रहे हो ।  

आमतौर पर हम लोग अपने बुजुर्ग माता-पिता को अपने साथ बाहर ले जाना पसंद नहीं करते,
और कहते हैं - क्या करोगे, आपसे चला तो जाता नहीं, ठीक से खाया भी नहीं जाता, आप तो घर पर ही रहो, वही अच्छा होगा ।

लेकिन क्या आप भूल गये कि जब आप जब छोटे थे, और आपके माता-पिता आपको अपनी गोद में उठाकर ले जाया करते थे । आप जब ठीक से खा नहीं पाते थे तो माँ आपको अपने हाथ से खाना खिलाती थी, और खाना गिर जाने पर डाँट नहीं प्यार जताती थी ।

फिर वही माँ बाप बुढ़ापे में बोझ क्यों लगने लगते हैं ? 

माँ-बाप भगवान का रूप होते हैं । उनकी सेवा कीजिये, और प्यार दीजिये क्योंकि एक दिन आप भी बूढ़े होंगे ।

Monday, February 10, 2020

माँ मुझे थोड़ा आराम करना है

"माँ मुझे थोड़ा आराम करना है.."

स्कूल जाने वाली बेटी ने स्कूल और पढ़ाई से, थक कर माँ से बोली.

"अरे पढ़ाई अच्छे से करले,फिर आराम करना.."

लड़की उठी, पढ़ाई करने बैठ गई और आराम करना रहगया.
"माँ थोड़ी देर आराम कर लेती हूं, आफिस के काम से बहुत थक गई हूं मैं.."

अरे शादी करके शटल हो जाओ एकबार,फिर आराम कर लेना..

लड़की शादी करने तैयार होगई और आराम करना रह गया.
"अरि इतनी जल्दी क्या है, एकाद साल रुक जा जरा.."

"अरे बच्चे समय पर होगये तो कोई टेंशन नही,फिर आराम करलेना ..."

लड़की माँ बन गई और आराम करना रहगया..
"अरे बच्चे की देखभाल तुमको ही करना पड़ेगा,मुझे आफिस जाना है कल..थोडे दिन बस, बच्चा बड़ा होगया की आराम ही करना है.."

वह बच्चे के लिये रात रात भर जगती रही और आराम करना रह गया.
"अब तो बच्चा स्कूल जाने लगा है, जरा निश्चन्त बैठने तो दो मुझे.."

"बच्चे की तरफ ध्यान दे,उसकी पढ़ाई करादे, फिर आराम ही करना है..."

वह बच्चे का प्रोजेक्ट करने बैठ गई, और आराम करना रह गया उसका..
"अब बच्चा भी अपने पैरों पर खड़ा होगया, अब थोड़ा खाली होगई मैं.."

"अब उसकी विवाह का देखना पड़ेगा,ये एक जबाबदारी पूरी होगई कि आराम ही करना है .."

उसने कमरकस सभी कार्यक्रम निपटाये और आराम करना रह ही गया उसका..
"लड़का सांसारिक जीवन मे लग गया,अब में आराम करूंगी.."

"अरे अपनी सुधा गर्भवती है, मायके में डिलवरी करनी है न उसकी.."

लड़की की डिलवरी आगई, और आराम करना रहगया..
"चलो, ये भी जवाबदारी ख़त्म हुई अब आराम."

"सासू माँ मुझे नॉकरी फिर से जॉईन करनी है.. पोते को संभालेगे क्या?"

पोते के पीछे रहते और आराम करना रहगया ..
"चलो पोता बड़ा होगया,अब सभी जवाबदारी समाप्त होगई.. अब मै आराम करूंगी.."

"अरि सुनती हो क्या, गुठने दर्द हो रहे है मेरे, उठा बैठा भी नही जा रहा है..लगता है bp बढ़ गया है, डायबिटीस भी है..डॉकटर ने समय पर परहेज़ का खाना खाने कहा है सुन रही की नही .."

पति की सेवा में बची खुची जिंदगी चली गई..और आराम करना रह ही गया..

Saturday, February 8, 2020

परंपरा

एक कैम्प में नए कमांडर की पोस्टिंग हुई,
इंस्पेक्शन के दौरान उन्होंने देखा कि, कैम्प एरिया के मैदान में दो सिपाही एक बैंच की पहरेदारी कर रहे हैं, 
तो कमांडर ने सिपाहियों से पूछा कि, वे इस बैंच की पहरेदारी क्यों कर रहे हैं ? 

सिपाही बोले : "हमें पता नहीं सर लेकिन आपसे पहले वाले कमांडर साहब ने इस बैंच की पहरेदारी करने को कहा था। शायद ये इस कैम्प की परंपरा है क्योंकि शिफ्ट के हिसाब से चौबीसों घंटे इस बैंच की पहरेदारी की जाती है। "

पिछले कमांडर को वर्तमान कमांडर ने फोन किया और उस विशेष बैंच की पहरेदारी की वजह पूछी। 

पिछले कमांडर ने बताया : " मुझे नहीं पता लेकिन मुझसे पिछले कमांडर उस बैंच की पहरेदारी करवाते थे अतः मैंने भी परंपरा को कायम रखा। "

नए कमांडर बहुत हैरान हुए। उन्होंने पिछले के और पिछले-पिछले 3 कमांडरों से बात की, सबने उपर्युक्त कमांडर जैसा ही जवाब दिया, 
यूँ ही पीछे जाते-जाते नए कमांडर की बात फाईनली एक रिटायर्ड कमांडेंट से हुई जिनकी उम्र 100 साल थी।

नए कमांडर उनसे फोन पर बोले : " आपको डिस्टर्ब करने के लिए क्षमा चाहता हूँ सर। मैं उस कैम्प का नया कमांडर हूँ जिसके आप, 60 साल पहले कमांडर हुआ करते थे। मैंने यहाँ दो सिपाहियों को एक बैंच की पहरेदारी करते देखा है। क्या आप मुझे इस बैंच के बारे में कुछ जानकारी दे सकते हैं ताकि मैं समझ सकूँ कि, इसकी पहरेदारी क्यों आवश्यक है। "

सामने वाला फ़ोन पर आश्चर्यजनक स्वर में बोला : " क्या ?

उस बैंच का ऑइल पेंट अभी तक नहीं सूखा ?!? "

Wednesday, February 5, 2020

भावना और दुख

बड़े गुस्से से मैं घर से चला आया ..
इतना गुस्सा था की गलती से पापा के ही जूते पहन के निकल गया
मैं आज बस घर छोड़ दूंगा, और तभी लौटूंगा जब बहुत बड़ा आदमी बन जाऊंगा ...
जब मोटर साइकिल नहीं दिलवा सकते थे, तो क्यूँ इंजीनियर बनाने के सपने देखतें है .....
आज मैं पापा का पर्स भी उठा लाया था .... जिसे किसी को हाथ तक न लगाने देते थे ...
मुझे पता है इस पर्स मैं जरुर पैसो के हिसाब की डायरी होगी ....
पता तो चले कितना माल छुपाया है .....
माँ से भी ...
इसीलिए हाथ नहीं लगाने देते किसी को..
जैसे ही मैं कच्चे रास्ते से सड़क पर आया, मुझे लगा जूतों में कुछ चुभ रहा है ....
मैंने जूता निकाल कर देखा .....
मेरी एडी से थोडा सा खून रिस आया था ...
जूते की कोई कील निकली हुयी थी, दर्द तो हुआ पर गुस्सा बहुत था ..
और मुझे जाना ही था घर छोड़कर ...
जैसे ही कुछ दूर चला ....
मुझे पांवो में गिला गिला लगा, सड़क पर पानी बिखरा पड़ा था ....
पाँव उठा के देखा तो जूते का तला टुटा था .....
जैसे तेसे लंगडाकर बस स्टॉप पहुंचा, पता चला एक घंटे तक कोई बस नहीं थी .....
मैंने सोचा क्यों न पर्स की तलाशी ली जाये ....
मैंने पर्स खोला, एक पर्ची दिखाई दी, लिखा था..
लैपटॉप के लिए 40 हजार उधार लिए
पर लैपटॉप तो घर मैं मेरे पास है ?
दूसरा एक मुड़ा हुआ पन्ना देखा, उसमे उनके ऑफिस की किसी हॉबी डे का लिखा था
उन्होंने हॉबी लिखी अच्छे जूते पहनना ......
ओह....अच्छे जुते पहनना ???
पर उनके जुते तो ...........!!!!
माँ पिछले चार महीने से हर पहली को कहती है नए जुते ले लो ...
और वे हर बार कहते "अभी तो 6 महीने जूते और चलेंगे .."
मैं अब समझा कितने चलेंगे
......तीसरी पर्ची ..........
पुराना स्कूटर दीजिये एक्सचेंज में नयी मोटर साइकिल ले जाइये ...
पढ़ते ही दिमाग घूम गया.....
पापा का स्कूटर .............
ओह्ह्ह्ह
मैं घर की और भागा........
अब पांवो में वो कील नही चुभ रही थी ....
मैं घर पहुंचा .....
न पापा थे न स्कूटर ..............
ओह्ह्ह नही
मैं समझ गया कहाँ गए ....
मैं दौड़ा .....
और
एजेंसी पर पहुंचा......
पापा वहीँ थे ...............
मैंने उनको गले से लगा लिया, और आंसुओ से उनका कन्धा भिगो दिया ..
.....नहीं...पापा नहीं........ मुझे नहीं चाहिए मोटर साइकिल...
बस आप नए जुते ले लो और मुझे अब बड़ा आदमी बनना है..
वो भी आपके तरीके से ...।।

"माँ" एक ऐसी बैंक है जहाँ आप हर भावना और दुख जमा कर सकते है...
और
"पापा" एक ऐसा क्रेडिट कार्ड है जिनके पास बैलेंस न होते हुए भी हमारे सपने पूरे करने की कोशिश करते है.

Monday, February 3, 2020

दुनिया की रीत

मैं शांति से बैठा अपना इंटरनेट चला रहा था...तभी कुछ मच्छरों ने आकर मेरा खून चूसना शुरू कर दिया तो स्वाभाविक प्रतिक्रिया में मेरा हाथ उठा और चटाक I  हो गया
और एक-दो मच्छर ढेर हो गए... फिर क्या था उन्होंने शोर मचाना शुरू कर दिया कि, मैं असहिष्णु हो गया हूँ..!! 

मैंने पूछा.., "इसमें असहिष्णुता की क्या बात है..?"

वो कहने लगे.., "खून चूसना उनकी आज़ादी है.."

बस "आज़ादी" शब्द सुनते ही कईं बुद्धिजीवी उनके पक्ष में उतर आये और बहस करने लगे.. इसके बाद नारेबाजी शुरू हो गयी..!! 

"तुम कितने मच्छर मारोगे.. हर घर से मच्छर निकलेगा.."

बुद्धिजीवियों ने अख़बार में तपते तर्कों के साथ बड़े-बड़े लेख लिखना शुरू कर दिया।

उनका कहना था कि ..,मच्छर देह पर मौज़ूद तो थे लेकिन खून चूस रहे थे ये कहाँ सिद्ध हुआ है ....
और अगर चूस भी रहे थे तो भी ये गलत तो हो सकता है लेकिन 'देहद्रोह' की श्रेणी में नहीं आता... 

क्योंकि ये "मच्छर" बहुत ही प्रगतिशील रहे है..किसी की भी देह पर बैठ जाना इनका 'सरोकार' रहा है।

मैंने कहा.., "मैं अपना खून नहीं चूसने दूंगा बस।"

तो कहने लगे.., "ये "एक्सट्रीम देहप्रेम" है... तुम कट्टरपंथी हो, डिबेट से भाग रहे हो।"

मैंने कहा..., "तुम्हारा उदारवाद तुम्हें मेरा खून चूसने की इज़ाज़त नहीं दे सकता।"

इस पर उनका तर्क़ था कि..., भले ही यह गलत हो लेकिन फिर भी थोड़ा खून चूसने से तुम्हारी मौत तो नहीं हो जाती, लेकिन तुमने मासूम मच्छरों की ज़िन्दगी छीन ली..
 "फेयर ट्रायल" का मौका भी नहीं दिया। 

इतने में ही कुछ राजनेता भी आ गए और वो उन मच्छरों को अपने बगीचे की 'बहार' का बेटा बताने लगे।

हालात से हैरान और परेशान होकर मैंने कहा कि..., लेकिन ऐसे ही मच्छरों को खून चूसने देने से मलेरिया हो जाता है, और तुरंत न सही बाद में बीमार और कमज़ोर होकर मौत हो जाती है।

इस पर वो कहने लगे कि.., तुम्हारे पास तर्क़ नहीं हैं इसलिए तुम भविष्य की कल्पनाओं के आधार पर अपने 'फासीवादी' फैसले को सही ठहरा रहे हो... 

मैंने कहा, "ये साइंटिफिक तथ्य है कि मच्छरों के काटने से मलेरिया होता है... मुझे इससे पहले अतीत में भी ये झेलना पड़ा है.., साइंटिफिक शब्द उन्हें समझ नहीं आया..!! 

तथ्य के जवाब में वो कहने लगे कि.., मैं इतिहास को मच्छर समाज के प्रति अपनी घृणा का बहाना बना रहा हूँ.. जबकि मुझे वर्तमान में जीना चाहिए।

इतने हंगामें के बाद उन्होंने मेरे ही सिर माहौल बिगाड़ने का आरोप भी मढ़ दिया।

मेरे ख़िलाफ़ मेरे कान में घुसकर सारे मच्छर भिन्नाने लगे कि... " हम लेके रहेंगे आज़ादी..."

मैं बहस और विवाद में पड़कर परेशान हो गया था...उससे ज़्यादा जितना कि, खून चूसे जाने पर हुआ।

आख़िरकार मुझे तुलसी बाबा याद आये.., "सठ सन विनय कुटिल सन प्रीति।"

और फिर मैंने काला हिट उठाया और मंडली से मार्च तक, बगीचे से नाले तक उनके हर सॉफिस्टिकेटेड और सीक्रेट ठिकाने पर दे मारा...

एक बार तेजी से भिन्न-भिन्न हुई और फिर सब शांत....
उसके बाद से न कोई बहस न कोई विवाद, न कोई आज़ादी.. न कोई बर्बादी... न कोई क्रांति.... न कोई सरोकार...!!!!

अब सब कुछ ठीक है बस यही दुनिया की रीत है

Wednesday, January 29, 2020

अच्छाई बांटिए


एक दिन कॉलेज में प्रोफेसर ने विद्यर्थियों से पूछा कि इस संसार में जो कुछ भी है उसे भगवान ने ही बनाया है न? 

सभी ने कहा, “हां भगवान ने ही बनाया है।“

प्रोफेसर ने कहा कि इसका मतलब ये हुआ कि बुराई भी भगवान की बनाई चीज़ ही है।

प्रोफेसर ने इतना कहा तो एक विद्यार्थी उठ खड़ा हुआ और उसने कहा कि इतनी जल्दी इस निष्कर्ष पर मत पहुंचिए सर। 

प्रोफेसर ने कहा, क्यों? अभी तो सबने कहा है कि सबकुछ भगवान का ही बनाया हुआ है फिर तुम ऐसा क्यों कह रहे हो?

विद्यार्थी ने कहा कि सर, मैं आपसे छोटे-छोटे दो सवाल पूछूंगा। फिर उसके बाद आपकी बात भी मान लूंगा।

प्रोफेसर ने कहा, "तुम संजय सिन्हा की तरह सवाल पर सवाल करते हो। खैर पूछो।"

विद्यार्थी ने पूछा , "सर क्या दुनिया में ठंड का कोई वजूद है?"

प्रोफेसर ने कहा, बिल्कुल है। सौ फीसदी है। हम ठंड को महसूस करते हैं।

विद्यार्थी ने कहा, "नहीं सर, ठंड कुछ है ही नहीं। ये असल में गर्मी की अनुपस्थिति का अहसास भर है। जहां गर्मी नहीं होती, वहां हम ठंड को महसूस करते हैं।"

प्रोफेसर चुप रहे।

विद्यार्थी ने फिर पूछा, "सर क्या अंधेरे का कोई अस्तित्व है?"

प्रोफेसर ने कहा, "बिल्कुल है। रात को अंधेरा होता है।"

विद्यार्थी ने कहा, "नहीं सर। अंधेरा कुछ होता ही नहीं। ये तो जहां रोशनी नहीं होती वहां अंधेरा होता है।

प्रोफेसर ने कहा, "तुम अपनी बात आगे बढ़ाओ।"

विद्यार्थी ने फिर कहा, "सर आप हमें सिर्फ लाइट एंड हीट (प्रकाश और ताप) ही पढ़ाते हैं। आप हमें कभी डार्क एंड कोल्ड (अंधेरा और ठंड) नहीं पढ़ाते। फिजिक्स में ऐसा कोई विषय ही नहीं। सर, ठीक इसी तरह ईश्वर ने सिर्फ अच्छा-अच्छा बनाया है। अब जहां अच्छा नहीं होता, वहां हमें बुराई नज़र आती है। पर बुराई को ईश्वर ने नहीं बनाया। ये सिर्फ अच्छाई की अनुपस्थिति भर है।"

दरअसल दुनिया में कहीं बुराई है ही नहीं। ये सिर्फ प्यार, विश्वास और ईश्वर में हमारी आस्था की कमी का नाम है।

ज़िंदगी में जब और जहां मौका मिले अच्छाई बांटिए। अच्छाई बढ़ेगी तो बुराई होगी ही नहीं।

Saturday, January 25, 2020

दुख का कारण

एक महिला ने अपनी किचन से सभी पुराने बर्तन निकाले।
पुराने डिब्बे, प्लास्टिक के डिब्बे, पुराने डोंगे, कटोरियां, प्याले और थालियां आदि।
सब कुछ काफी पुराना हो चुका था।
फिर सभी पुराने बर्तन उसने एक कोने में रख दिए और नए लाए हुए बर्तन करीने से रखकर सजा दिए।
बड़ा ही पॉश लग रहा था अब किचन।
फिर वो सोचने लगी कि अब ये जूनापुराना सामान भंगारवाले‌ को दे दिया तो समझो हो गया काम।

इतने में उस महिला की कामवाली आ गई।
दुपट्टा खोंसकर वो फर्श साफ करने ही वाली थी कि उसकी नजर कोने में पड़े हुए बर्तनों पर गई और बोली- बाप रे! मैडम आज इतने सारे बर्तन घिसने होंगे क्या?
और फिर उसका चेहरा जरा तनावग्रस्त हो गया।

महिला बोली- अरी नहीं! ये सब तो भंगारवाले को देने हैं।

कामवाली ने जब ये सुना तो उसकी आंखें एक आशा से चमक उठीं और फिर बोली- मैडम! अगर आपको ऐतराज ना हो तो ये एक पतीला मैं ले लूं? (साथ ही साथ में उसकी आंखों के सामने घर में पड़ा हुआ उसका तलहटी में पतला हुआ और किनारे से चीर पड़ा हुआ इकलौता पतीला नजर आ रहा था)

महिला बोली- अरी एक क्यों! जितने भी उस कोने में रखे हैं, तू वो सब कुछ ले जा।
उतना ही पसारा कम होगा।

कामवाली की आंखें फैल गईं- क्या! सब कुछ?
उसे तो जैसे आज अलीबाबा की गुफा ही मिल गई थी।
फिर उसने अपना काम फटाफट खतम किया और सभी पतीले, डिब्बे और प्याले वगैरह सब कुछ थैले में भर लिए और बड़े ही उत्साह से अपने घर के ओर निकली।
आज तो जैसे उसे चार पांव लग गए थे।
घर आते ही उसने पानी भी नहीं पिया और सबसे पहले अपना जूना पुराना और टूटने की कगार पर आया हुआ पतीला और टेढ़ा मेढ़ा चमचा वगैरह सब कुछ एक कोने में जमा किया, और फिर अभी लाया हुआ खजाना (बर्तन) ठीक से जमा दिया।
आज उसके एक कमरेवाला किचन का कोना पॉश दिख रहा था।
तभी उसकी नजर अपने जूने पुराने बर्तनों पर पड़ी और फिर खुद से ही बुदबुदाई- अब ये जूना सामान भंगारवाले को दे दिया कि समझो हो गया काम।

तभी दरवाजे पर एक भिखारी पानी मांगता हुआ हाथों की अंजुल करके खड़ा था- मां! पानी दे।

कामवाली उसके हाथों की अंजुल में पानी देने ही जा रही थी कि उसे अपना पुराना पतीला नजर आ गया और फिर उसने वो पतीला भरकर पानी भिखारी को दे दिया।

जब पानी पीकर और तृप्त होकर वो भिखारी बर्तन वापिस करने लगा तो कामवाली बोली- फेंक दो कहीं भी।

वो भिखारी बोला- तुम्हें नहीं चाहिए?
क्या मैं रख लूं मेरे पास?

कामवाली बोली- रख लो, और ये बाकी बचे हुए बर्तन भी ले जाओ।
और फिर उसने जो-जो भी भंगार समझा वो उस भिखारी के झोले में डाल दिया।

वो भिखारी खुश हो गया।
पानी पीने को पतीला और किसी ने खाने को कुछ दिया तो चावल, सब्जी और दाल आदि लेने के लिए अलग-अलग छोटे-बड़े बर्तन, और कभी मन हुआ कि चम्मच से खाये तो एक टेढ़ा मेढ़ा चम्मच भी था।
आज ऊसकी फटी झोली पॉश दिख रही थी।

सुख किसमें माने, ये हर किसी की परिस्थिति पर अवलंबित होता है।

हमें हमेशा अपने से छोटे को देखकर खुश होना चाहिए कि हमारी स्थिति इससे तो अच्छी है।
जबकि हम हमेशा अपनों से बड़ों को देखकर दुखी ही होते हैं।
और यही हमारे दुख का सबसे बड़ा कारण होता है l   

Tuesday, January 21, 2020

जरा सोचिये

क्षीरसागर में भगवान विष्णु शेष शैया पर विश्राम कर रहे हैं और लक्ष्मीजी उनके पैर दबा रही हैं । विष्णुजी के एक पैर  का अंगूठा शैया के बाहर आ गया और लहरें उससे खिलवाड़ करने लगीं । 
.
क्षीरसागर के एक कछुवे ने इस दृश्य को देखा और मन में यह विचार कर कि मैं यदि भगवान विष्णु के अंगूठे को अपनी जिव्ह्या से स्पर्श कर लूँ तो मेरा मोक्ष हो जायेगा,यह सोच कर उनकी ओर बढ़ा । 
.
उसे भगवान विष्णु की ओर आते हुये शेषनाग ने देख लिया और कछुवे को भगाने के लिये जोर से फुँफकारा । फुँफकार सुन कर कछुवा भाग कर छुप गया । 
.
कुछ समय पश्चात् जब शेषजी का ध्यान हट गया तो उसने पुनः प्रयास किया । इस बार लक्ष्मीदेवी की दृष्टि उस पर पड़ गई और उन्होंने उसे भगा दिया । 
.
इस प्रकार उस कछुवे ने अनेकों प्रयास किये पर शेष नाग और लक्ष्मी माता के कारण उसे  सफलता नहीं मिली । यहाँ तक कि सृष्टि की रचना हो गई और सत्युग बीत जाने के बाद त्रेता युग आ गया । 
.
इस मध्य उस कछुवे ने अनेक बार अनेक योनियों में जन्म लिया और प्रत्येक जन्म में भगवान की प्राप्ति का प्रयत्न करता रहा । अपने तपोबल से उसने दिव्य दृष्टि को प्राप्त कर लिया था । 
.
कछुवे को पता था कि त्रेता युग में वही क्षीरसागर में शयन करने वाले विष्णु राम का और वही शेषनाग लक्ष्मण का व वही लक्ष्मीदेवी सीता के रूप में अवतरित होंगे तथा वनवास के समय उन्हें गंगा पार उतरने की आवश्यकता पड़ेगी । इसीलिये वह भी केवट बन कर वहाँ आ गया था ।
.
एक युग से भी अधिक काल तक तपस्या करने के कारण उसने प्रभु के सारे मर्म जान लिये थे, इसीलिये उसने रामजी से कहा था कि मैं आपका मर्म जानता हूँ । 
.
संत श्री तुलसीदासजी भी इस तथ्य को जानते थे, इसलिये अपनी चौपाई में केवट के मुख से कहलवाया है कि 
.
“कहहि तुम्हार मरमु मैं जाना”।
.
केवल इतना ही नहीं, इस बार केवट इस अवसर को किसी भी प्रकार हाथ से जाने नहीं देना चाहता था । उसे याद था कि शेषनाग क्रोध कर के फुँफकारते थे और मैं डर जाता था । 
.
अबकी बार वे लक्ष्मण के रूप में मुझ पर अपना बाण भी चला सकते हैं, पर इस बार उसने अपने भय को त्याग दिया था, लक्ष्मण के तीर से मर जाना उसे स्वीकार था पर इस अवसर को खो देना नहीं । 
.
इसीलिये विद्वान संत श्री तुलसीदासजी ने लिखा है -
.
( हे नाथ ! मैं चरणकमल धोकर आप लोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा; मैं आपसे उतराई भी नहीं चाहता । हे राम ! मुझे आपकी दुहाई और दशरथजी की सौगंध है, मैं आपसे बिल्कुल सच कह रहा हूँ । भले ही लक्ष्मणजी मुझे तीर मार दें, पर जब तक मैं आपके पैरों को पखार नहीं लूँगा, तब तक हे तुलसीदास के नाथ ! हे कृपालु ! मैं पार नहीं उतारूँगा । )
.
तुलसीदासजी आगे और लिखते हैं -
.
केवट के प्रेम से लपेटे हुये अटपटे वचन को सुन कर करुणा के धाम श्री रामचन्द्रजी जानकी और लक्ष्मण की ओर देख कर हँसे । जैसे वे उनसे पूछ रहे हैं- कहो, अब क्या करूँ, उस समय तो केवल अँगूठे को स्पर्श करना चाहता था और तुम लोग इसे भगा देते थे पर अब तो यह दोनों पैर माँग रहा है !
.
केवट बहुत चतुर था । उसने अपने साथ ही साथ अपने परिवार और पितरों को भी मोक्ष प्रदान करवा दिया । तुलसीदासजी लिखते हैं -.

चरणों को धोकर पूरे परिवार सहित उस चरणामृत का पान करके उसी जल से पितरों का तर्पण करके अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्री रामचन्द्र को गंगा के पार ले गया ।
उस समय का प्रसंग है ... जब केवट भगवान् के चरण धो रहे है ।
.
बड़ा प्यारा दृश्य है, भगवान् का एक पैर धोकर उसे निकलकर कठौती से बाहर रख देते है, और जब दूसरा धोने लगते है, 
.
तो पहला वाला पैर गीला होने से जमीन पर रखने से धूल भरा हो जाता है,
.
केवट दूसरा पैर बाहर रखते है, फिर पहले वाले को धोते है, एक-एक पैर को सात-सात बार धोते है ।
.
फिर ये सब देखकर कहते है, 
प्रभु, एक पैर कठौती में रखिये दूसरा मेरे हाथ पर रखिये, ताकि मैला ना हो ।
.
जब भगवान् ऐसा ही करते है । तो जरा सोचिये ... क्या स्थिति होगी , यदि एक पैर कठौती में है और दूसरा केवट के हाथों में, 
.
भगवान् दोनों पैरों से खड़े नहीं हो पाते बोले - केवट मैं गिर जाऊँगा ?
.
केवट बोला - चिंता क्यों करते हो भगवन्  !.
दोनों हाथों को मेरे सिर पर रख कर खड़े हो जाईये, फिर नहीं गिरेंगे ,
.
जैसे कोई छोटा बच्चा है जब उसकी माँ उसे स्नान कराती है तो बच्चा माँ के सिर पर हाथ रखकर खड़ा हो जाता है, भगवान् भी आज वैसे ही खड़े है । 
.
भगवान् केवट से बोले - भईया केवट ! मेरे अंदर का अभिमान आज टूट गया...
.
केवट बोला - प्रभु ! क्या कह रहे है ?.
भगवान् बोले - सच कह रहा हूँ केवट, अभी तक मेरे अंदर अभिमान था, कि .... मैं भक्तों को गिरने से बचाता हूँ पर.. 
.
आज पता चला कि, भक्त भी भगवान् को गिरने से बचाता है ।.           जै राम जी की।।

Saturday, January 18, 2020

हर समस्या का हल

बहुत समय पहले, एक निर्जन गाँव में अपने तीन बेटों के साथ एक बूढ़ा व्यक्ति रहता था, जो एक रेगिस्तान के आस-पास स्थित था।  उसके पास 17 ऊंट थे, और वे उसकी आय का मुख्य स्रोत थे।  वह रेगिस्तान में शिपिंग के साधन के रूप में ऊंटों को किराए पर देता था।  एक दिन उनका निधन हो गया।  उन्होंने अपने तीनों बेटों के लिए अपनी संपत्ति छोड़ दी थी।

 अंतिम संस्कार और अन्य दायित्वों के खत्म होने के बाद, तीनों बेटों ने वसीयत पढ़ी।  जबकि उनके पिता ने सभी संपत्ति को तीन समान भागों में विभाजित किया था, उन्होंने 17 ऊंटों को एक अलग तरीके से विभाजित किया था।  उन्हें तीनों में समान रूप से साझा नहीं किया गया क्योंकि 17 एक विषम संख्या और एक अभाज्य संख्या है, जिसे विभाजित नहीं किया जा सकता है।

 बूढ़े व्यक्ति ने कहा था कि बड़ा बेटा 17 ऊंटों में से आधे का मालिक होगा, बीच वाले को 17 ऊंटों का एक तिहाई हिस्सा मिलेगा, और सबसे कम उम्र के ऊंटों को उसका हिस्सा नौवें के रूप में मिलेगा!

 वसीयत में वर्णित 17 ऊंटों को कैसे विभाजित किया जाए, यह सभी वसीयत को पढ़कर दंग रह गए और एक दूसरे से सवाल किया।  17 ऊंटों को विभाजित करना और 17 ऊंटों में से आधे को सबसे बड़ा देना संभव नहीं है।  अन्य दो बेटों के लिए ऊंटों को विभाजित करना भी संभव नहीं है।

 उन्होंने कई दिनों तक वसीयत में वर्णित ऊंटों को विभाजित करने के तरीकों पर विचार किया, लेकिन किसी को भी इसका जवाब नहीं मिला।

 वे अंत में इस मुद्दे को अपने गांव के बुद्धिमान व्यक्ति के पास ले गए।  बुद्धिमान व्यक्ति ने समस्या सुनी और तुरंत एक समाधान पाया।  उसने उन्हें सभी 17 ऊंटों को अपने पास लाने के लिए कहा।

 बेटों ने ऊंटों को बुद्धिमान व्यक्ति के स्थान पर लाया।  बुद्धिमान व्यक्ति ने अपने स्वामित्व में एक ऊँट जोड़ा और ऊँटों की कुल संख्या 18 कर दी।

 अब, उन्होंने पहले बेटे को वसीयत पढ़ने के लिए कहा।  इच्छा के अनुसार, बड़े बेटे को आधा ऊंट मिला, जो अब 18/2 = 9 ऊंटों में गिना जाता है!  सबसे बड़े को उसके हिस्से के रूप में 9 ऊंट मिले।

 शेष ऊँट 9 थे।

 बुद्धिमान व्यक्ति ने दूसरे बेटे को वसीयत पढ़ने के लिए कहा।  उन्हें कुल ऊंटों का 1/3 सौंपा गया था।

 यह 18/3 = 6 ऊंटों के लिए आया था।  दूसरे बेटे को उसके हिस्से के रूप में 6 ऊंट मिले।

 बड़े बेटों द्वारा साझा किए गए ऊंटों की कुल संख्या - 9 + 6 = 15 ऊंट।

 तीसरे बेटे ने ऊंटों की अपनी हिस्सेदारी पढ़ी: ऊंटों की कुल संख्या का 1/9 वां हिस्सा - 18/9 = 2 ऊंट।

 सबसे कम उम्र के व्यक्ति को उसके हिस्से के रूप में 2 ऊंट मिले।

 पूरी तरह से भाइयों द्वारा साझा किए गए 9 + 6 + 2 ऊंट थे, जिन्हें 17 ऊंटों में गिना जाता था।

 अब, बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा जोड़ा गया एक ऊंट वापस ले लिया गया था।

 बुद्धिमान व्यक्ति ने अपनी बुद्धिमत्ता से इस समस्या को बड़ी चतुराई से हल किया।

 इंटेलिजेंस एक मुद्दे को हल करने के लिए एक सामान्य आधार खोजने के अलावा कुछ भी नहीं है।  संक्षेप में, हर समस्या का हल है।

Wednesday, January 15, 2020

यही ट्रीटमेंट

जानवरों के डॉक्टर के पास एक Lady आई जिनके साथ एक high breed का कुत्ता था।

कहने लगी....

"मेरे कुत्ते के साथ अजीबो गरीब problem हो गई है।

मेरा कुत्ता बड़ा हट्टी (Disobidient) हो गया है.....

इसे अपने पास बुलाती हूँ तो ये दूर भाग जाता है।

Please कुछ करें.. 
I am very attached to him. I can not tolerate his indifference."

 डॉक्टर ने कुत्ते को ग़ौर से देखा।  पन्द्रह मिनट examin करने के बाद मैं  कहा...

ये कुत्ता एक रात के लिए मेरे पास छोड़ दें। मैं इसका observation कर के इलाज करूँगा।

उसने बडी बेदिली से हामी भर ली।

सब चले गए.....

डॉक्टर ने अपने assistant को आवाज़ दी...और कहा कि इसे भैंसों के साथ बांध दो और हर आधे घंटे पर इसे केवल पानी देना और इसको चमड़े के हन्टर से मारना।

डॉक्टर का assistant जट् आदमी था। 

रात भर कुत्ते के साथ हन्टर ट्रीटमेंट करता रहा।

दूसरे दिन लेडी आ धमकीं।

Sir 
what about my pup?

Doctor said__
Hope your pup has missed you too ......

डॉक्टर का assistant कुत्ते को ले आया़. 

ज्यों ही कुत्ता कमरे मे आया..छलांग लगा के madam की गोद मे आ बैठा, 
लगा दुम हिलाने, 
मुंह चाटने!!

Madam कहने लगीँ: 
सर, आपने इसके साथ क्या किया कि अचानक इसका यह हाल है?

डॉक्टर ने कहा: बड़े से एयर कंडीशनर कमरे, रोज़ अति स्वादिष्ट भोजन खा खाके ये अपने को मालिक समझ बैठा था और अपने मालिक की पहचान भूल बैठा था
 बस इसका यही वहम उतारने के लिए थोड़ा
Psychological plus physical treatment की ज़रूरत थी___ 
वह दे दी,----- 
now he is Okay...

सारांश ~~

*"बस यही ट्रीटमेंट अगर देश के अन्दर :

भारत माता को गाली देने वाले, 
भारत के टुकड़े करने वाले, 
आज़ादी का दुरुपयोग करते हुए आजादी मांगने वाले, ,
सीमा के रक्षक जवानों को अपशब्द कहने वाले 
और दुश्मन देश को जिन्दाबाद कहने वालों के साथ हो ,

तो कश्मीर ही नहीं पूरे देश से आतंकवाद और नक्सलवाद समाप्त हो जायेगा.

Sunday, January 12, 2020

हम झूठा व बासी नही खाते

हम झूठा व बासी नही खाते !

अगली बार ये कहने से पहले सोचियेगा

कुछ दिन पहले एक परिचित दावत के लिये उदयपुर के एक मशहूर रेस्टोरेंट में ले गये।

मैं अक़्सर बाहर खाना खाने से कतराता हूँ, किन्तु सामाजिक दबाव तले जाना पड़ा।

आजकल पनीर खाना रईसी की निशानी है, इसलिए उन्होंने कुछ डिश पनीर की ऑर्डर की।

 प्लेट में रखे पनीर के अनियमित टुकड़े मुझे कुछ अजीब से लगे। ऐसा लगा की उन्हें कांट छांट कर पकाया है।

मैंने वेटर से कुक को बुलाने के लिए कहा, कुक के आने पर मैंने उससे पूछा पनीर के टुकड़े अलग अलग आकार के व अलग रंगों के क्यों हैं तो उसने कहा ये स्पेशल डिश है।"

मैंने कहा की मैँ एक और प्लेट पैक करवा कर ले जाना चाहता हूं लेकिन वो मुझे ये डिश बनाकर दिखाये।

सारा रेस्टोरेंट अकबका गया...
बहुत से लोग थे जो खाना रोककर मुझे  देखने लगे...

स्टाफ तरह तरह के बहाने करने लगा। आखिर वेटर ने पुलिस के डर से बताया की अक्सर लोग प्लेटों में खाना,सब्जी सलाद व रोटी इत्यादी छोड़ देते हैं। रसोई में वो फेंका नही जाता। पनीर व सब्जी के बड़े टुकड़ों को इकट्ठा कर दुबारा से सब्जी की शक्ल में परोस दिया जाता है।
 
प्लेटों में बची सलाद के टुकड़े दुबारा से परोस दिए जाते है । प्लेटों में बचे सूखे  चिकन व मांस के टुकड़ों को काटकर करी के रूप में दुबारा पका दिया जाता है। बासी व सड़ी सब्जियाँ भी करी की शक्ल में छुप जाती हैं...

ये बड़े बड़े होटलों का सच है। अगली बार जब प्लेट में खाना बचे तो उसे इकट्ठा कर एक प्लास्टिक की थैली में साथ ले जाएं व बाहर जाकर उसे या तो किसी जानवर को दे दें या स्वयं से कचरेदान में फेंके

वरना क्या पता आपका झूठा खाना कोई और खाये या आप किसी और कि प्लेट का बचा खाना खाएं।

दूसरा क़िस्सा भगवान कृष्ण की भूमि वृंदावन का है. वृंदावन पहुंच कर,मैँ मुग्ध होकर पावन धरा को निहार रहा था। जयपुर से लंबी यात्रा के बाद हम सभी को कड़ाके की भूख लगी थी सो एक साफ से दिखने वाले  रेस्टोरेंट पर रुक गये । समय नष्ठ ना करने के लिए थाली मंगाई गई।

एक साफ से ट्रे में दाल, सब्जी,चावल, रायता व साथ एक टोकरी में रोटियां आई। 

पहले कुछ कौर में ध्यान नही गया फिर मुझे कुछ ठीक नही लगा। मुझे रोटी में खट्टेपन का अहसास हुआ, फिर सब्जी की ओर ध्यान दिया तो देखा सब्जी में हर टुकड़े का रंग अलग अलग सा था। चावल चखा तो वहां भी माजरा गड़बड़ था। सारा खाना छोड़ दिया। फिर काउंटर पर बिल पूछा यो 650 का बिल थमाया।

मैंने कहा 'भैया! पैसे तो दूँगा लेकिन एक बार आपकी रसोई देखना चाहता हूं" वो अटपटा गया और पूछने लगा "क्यों?"

मैंने कहा "जो पैसे देता है उसे देखने का हक़ है कि खाना साफ बनता है या नहीँ?"

इससे पहले की वो कुछ समख पाता मैंने होटल की रसोई की ओर रुख किया।

आश्चर्य की सीमा ना रही जब देखा रसोई में कोई खाना नहीं पक रहा था। एक टोकरी में कुछ रोटियां पड़ी थी। फ्रिज खोल तो खुले डिब्बों में अलग अलग प्रकार की पकी हुई सब्जियां पड़ी हुई थी।कुछ खाने में तो फफूंद भी लगी हुई थी।

फ्रिज से बदबू का भभका आ रहा था।डांटने पर रसोइये ने बताया की सब्जियां करीब एक हफ्ता पुरानी हैं। परोसने के समय वो उन्हें कुछ तेल डालकर कड़ाई में तेज गर्म कर देता है और धनिया टमाटर से सजा देता है। 

रोटी का आटा 2 दिन में एक बार ही गूंधता है।

कई कई घण्टे जब बिजली चली जाती है तो खाना खराब होने लगता है तो वो उसे तेज़ मसालों के पीछे छुपाकर परोस देते हैं। रोटी का आटा खराब हो तो उसे वो नॉन बनाकर परोस देते हैं।

मैंने रेस्टोरेंट मालिक से कहा कि "आप भी कभी यात्रा करते होंगे, इश्वेर करे जब अगली बार आप भूख से बिलबिला रहे हों तो आपको बिल्कुल वैसा ही खाना मिले जैसा आप परोसते हैं"  उसका चेहरा स्याह हो गया....

आज आपको खतरो, धोखों व ठगी से सिर्फ़ जागरूकता ही बचा सकती है। क्यों कि भगवान को भी दुष्टों ने घेर रखा है।

भारत से सही व गलत का भेद खत्म होता जा रहा है....

हर दुकान व प्रतिष्ठान में एक कोने में भगवान का बड़ा या छोटा मंदिर होता है।  व्यापारी सवेरे आते ही उसमें धूप दीप लगाता है, गल्ले को हाथ जोड़ता है और फिर सामान के साथ आत्मा बेचने का कारोबार शुरू हो जाता है!!!

भगवान से मांगते वक़्त ये नही सोचते की वो स्वयं दुनिया को क्या दे रहे हैं!!***

जागरूक बनिये!!
और कोई चारा नही है
 
मेरे पास भी यह मैसेज कहीं और  से आया था,मुझे लगा कि आगे सेंड करना चाहिये। इसलिये कर दिया। हो सकता है आपको सब बातें सही न लगे, लेकिन जागरूक बनने में कोई बुराई नहीं है। 
 हो सकता है कि आपको इन इस्थितियों का सामना नहीं करना पड़ा हो, पर परिस्थितियां कभी भी एक समान नहीं होती ।