Monday, September 25, 2017

सफल जीवन का राज

एक औरत ने तीन संतों को अपने घर के सामने  देखा। वह उन्हें जानती नहीं थी। औरत ने कहा –  “कृपया भीतर आइये और भोजन करिए।” संत बोले – “क्या तुम्हारे पति घर पर हैं?” औरत – “नहीं, वे अभी बाहर गए हैं।” संत –“हम तभी भीतर आयेंगे जब वह घर पर  हों।” शाम को उस औरत का पति घर आया और  औरत ने उसे यह सब बताया। पति – “जाओ और उनसे कहो कि मैं घर आ गया हूँ और उनको आदर सहित बुलाओ औरत बाहर गई और उनको भीतर आने के  लिए कहा। संत बोले – “हम सब किसी भी घर में एक साथ नहीं जाते।” “पर क्यों?” – औरत ने पूछा। उनमें से एक संत ने कहा – “मेरा नाम धन है”  फ़िर दूसरे संतों की ओर इशारा कर के कहा  “इन दोनों के नाम सफलता और प्रेम हैं।  हममें से कोई एक ही भीतर आ सकता है।  आप घर के अन्य सदस्यों से मिलकर तय कर  लें कि भीतर किसे निमंत्रित करना है।” औरत ने भीतर जाकर अपने पति को यह सब  बताया।  उसका पति बहुत प्रसन्न हो गया और  बोला –“यदि ऐसा है तो हमें धन को आमंत्रित
करना चाहिए।  हमारा घर खुशियों से भर जाएगा।” पत्नी – “मुझे लगता है कि हमें सफलता को  आमंत्रित करना चाहिए।” उनकी बेटी दूसरे कमरे से यह सब सुन रही थी।  वह उनके पास आई और बोली –  “मुझे लगता है कि हमें प्रेम को आमंत्रित करना  चाहिए। प्रेम से बढ़कर कुछ भी नहीं हैं।” “तुम ठीक कहती हो, हमें प्रेम
को ही बुलाना चाहिए” – उसके माता-पिता ने कहा। औरत घर के बाहर गई और उसने संतों से पूछा –  “आप में से जिनका नाम प्रेम है वे कृपया घर में  प्रवेश कर भोजन गृहण करें।” प्रेम घर की ओर बढ़ चले।  बाकी के दो संत भी उनके पीछे चलने लगे। औरत ने आश्चर्य से उन दोनों से पूछा –  “मैंने तो सिर्फ़ प्रेम को आमंत्रित किया था। आप लोग भीतर क्यों जा रहे हैं?” उनमें से एक ने कहा – “यदि आपने धन और  सफलता में से किसी एक को आमंत्रित किया होता  तो केवल वही भीतर जाता।  आपने प्रेम को आमंत्रित किया है।  प्रेम कभी अकेला नहीं जाता।  प्रेम जहाँ-जहाँ जाता है, धन और सफलता  उसके पीछे जाते हैं। इस कहानी को एक बार, 2 बार, 3 बार
पढ़ें अच्छा लगे तो प्रेम के साथ रहें,   प्रेम बाटें, प्रेम दें और प्रेम लें  क्यों कि प्रेम ही 
सफल जीवन का राज है।

Saturday, September 23, 2017

माँ की जादू की झप्पी

बर्तनों की आवाज़ देर रात तक आ रही थी...रसोई का नल चल रहा है माँ रसोई में है.... तीनों बहुऐं अपने-अपने कमरे में सोने जा चुकी.... माँ रसोई में है... माँ का काम बकाया रह गया था पर काम तो सबका था पर माँ तो अब भी सबका काम अपना ही मानती है.... दूध गर्म करके ठण्ड़ा करके जावण देना है... ताकि सुबह बेटों को ताजा दही मिल सके... सिंक में रखे बर्तन माँ को कचोटते हैं चाहे तारीख बदल जाये, सिंक साफ होना चाहिये.... बर्तनों की आवाज़ से  बहू-बेटों की नींद खराब हो रही है बड़ी बहू ने बड़े बेटे से कहा  "तुम्हारी माँ को नींद नहीं आती क्या? ना खुद सोती है और ना ही हमें सोने देती है" मंझली ने मंझले बेटे से कहा " अब देखना सुबह चार बजे फिर खटर-पटर चालू हो जायेगी, तुम्हारी माँ को चैन नहीं है क्या?" छोटी ने छोटे बेटे से कहा " प्लीज़ जाकर ये ढ़ोंग बन्द करवाओ कि रात को सिंक खाली रहना चाहिये" माँ अब तक बर्तन माँज चुकी थी । झुकी कमर कठोर हथेलियां लटकी सी त्वचा जोड़ों में तकलीफ आँख में पका मोतियाबिन्द माथे पर टपकता पसीना पैरों में उम्र की लड़खडाहट मगर.... दूध का गर्म पतीला वो आज भी अपने पल्लू  से उठा लेती है और... उसकी अंगुलियां जलती नहीं है, क्यों कि वो माँ है । दूध ठण्ड़ा हो चुका... जावण भी लग चुका... घड़ी की सुईयां थक गई... मगर... माँ ने फ्रिज में से भिण्ड़ी निकाल ली और... काटने लगी उसको नींद नहीं आती है, क्यों कि वो माँ है । कभी-कभी सोचता हूं कि माँ जैसे विषय पर लिखना, बोलना, बनाना, बताना, जताना क़ानूनन  बन्द होना चाहिये....
क्यों कि यह विषय निर्विवाद है क्यों कि यह रिश्ता स्वयं कसौटी है । रात के बारह बजे सुबह की भिण्ड़ी कट गई... अचानक याद आया कि गोली तो ली ही नहीं... बिस्तर पर तकिये के नीचे रखी थैली निकाली.. मूनलाईट की रोशनी में  गोली के रंग के हिसाब से मुंह में रखी और  गटक कर पानी पी लिया... बगल में एक नींद ले चुके बाबूजी ने कहा " आ गई" "हाँ, आज तो कोई काम ही नहीं था"  माँ ने जवाब दिया । और...  लेट गई, कल की चिन्ता में पता नहीं नींद आती होगी या नहीं पर सुबह वो थकान रहित होती हैं, क्यों कि वो माँ है । सुबह का अलार्म बाद में बजता है माँ की नींद पहले खुलती है  याद नहीं कि कभी भरी सर्दियों में भी माँ गर्म पानी से नहायी हो उन्हे सर्दी नहीं लगती, क्यों कि वो माँ है । अखबार पढ़ती नहीं, मगर उठा कर लाती है चाय पीती नहीं, मगर बना कर लाती है जल्दी खाना खाती नहीं, मगर बना देती है.... क्यों कि वो माँ है । माँ पर बात जीवनभर खत्म ना होगी..
 


Tuesday, September 19, 2017

बुजुर्गों का सम्मान

बूढ़ा पिता अपने IAS बेटे के चेंबर में  जाकर उसके कंधे पर हाथ रख कर खड़ा हो गया ! और प्यार से अपने पुत्र से पूछा..."इस दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान कौन है"?पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए कहा "मेरे अलावा कौन हो सकता है पिताजी "!पिता को इस जवाब की  आशा नहीं थी, उसे विश्वास था कि उसका बेटा गर्व से कहेगा पिताजी इस दुनिया के सब से शक्तिशाली इंसान आप हैैं, जिन्होंने मुझे इतना योग्य बनाया ! उनकी आँखे छलछला आई ! वो चेंबर के गेट को खोल कर बाहर निकलने लगे ! उन्होंने एक बार पीछे मुड़ कर पुनः बेटे से पूछा एक बार फिर बताओ इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान कौन है ???*
             पुत्र ने  इस बार कहा...
              "पिताजी आप हैैं,
             इस दुनिया के सब से
           शक्तिशाली इंसान "!
पिता सुनकर आश्चर्यचकित हो गए उन्होंने कहा "अभी तो तुम अपने आप को इस दुनिया का सब से शक्तिशाली इंसान बता रहे थे अब तुम मुझे बता रहे हो " ??? पुत्र ने हंसते हुए उन्हें अपने सामने बिठाते  हुए कहा .."पिताजी उस समय आप का हाथ मेरे कंधे पर था, जिस पुत्र के कंधे पर या सिर पर पिता का हाथ हो वो पुत्र तो दुनिया का सबसे शक्तिशाली इंसान ही होगा ना,,,,,बोलिए पिताजी"  !पिता की आँखे भर आई उन्होंने अपने पुत्र को कस कर के अपने गले लगा लिया ! तब में चन्द पंक्तिया लिखता हुं"
       जो पिता के पैरों को छूता है वो कभी गरीब नहीं होता। जो मां के पैरों को छूता है  वो कभी बदनसीब नही होता। जो भाई के पैराें को छुता हें वो कभी गमगीन नही होता। जो बहन के पैरों को छूता है वो कभी चरित्रहीन नहीं होता। जो गुरू के पैरों को छूता है  उस जेसा कोई खुशनसीब नहीं होता....... अच्छा दिखने के लिये मत जिओ बल्कि अच्छा बनने के लिए  जिओजो  झुक सकता है वह सारी दुनिया को झुका सकता है  अगर बुरी आदत समय पर न बदली जाये तो बुरी आदत समय बदल देती है चलते रहने से ही सफलता है, रुका हुआ तो पानी भी बेकार हो जाता है  झूठे दिलासे से स्पष्ट इंकार बेहतर है अच्छी सोच, अच्छी भावना, अच्छा विचार मन को हल्का करता है मुसीबत सब प आती है कोई बिखर जाता हे और कोई निखर जाता हें "तेरा मेरा"करते एक दिन चले जाना है...
जो भी कमाया यही रहे जाना हे

Saturday, September 16, 2017

बनिए की बुद्धी

एक गाँव में एक बनिया  रहता था, उसकी ख्याति दूर दूर तक फैली थी।
एक बार वहाँ के राजा ने उसे चर्चा पर बुलाया। काफी देर चर्चा के बाद उसने कहा –
“महाशय, आप बहुत बड़े  सेठ  है, इतना बड़ा कारोबार है पर आपका लडका इतना मूर्ख क्यों है ? उसे भी कुछ सिखायें।
उसे तो सोने चांदी में मूल्यवान क्या है यह भी नही पता॥” यह कहकर वह जोर से हंस पडा.. 
बनिए  को बुरा लगा, वह घर गया व लडके से पूछा “सोना व चांदी में अधिक मूल्यवान क्या है ?”
“सोना”, बिना एकपल भी गंवाए उसके लडके ने कहा।
“तुम्हारा उत्तर तो ठीक है, फिर राजा ने ऐसा क्यूं कहा-? सभी के बीच मेरी खिल्ली भी उठाई।”
लडके के समझ मे आ गया, वह बोला “राजा गाँव के पास एक खुला दरबार लगाते हैं,
जिसमें सभी प्रतिष्ठित व्यक्ति भी शामिल होते हैं। यह दरबार मेरे स्कूल जाने के मार्ग मे ही पडता है। 
मुझे देखते हि बुलवा लेते हैं, अपने एक हाथ मे सोने का व दूसरे मे चांदी का सिक्का रखकर, जो अधिक मूल्यवान है वह ले लेने को कहते हैं...
ओर मैं चांदी का सिक्का ले लेता हूं। सभी ठहाका लगाकर हंसते हैं व मजा लेते हैं। ऐसा तकरीबन हर दूसरे दिन होता है।”
“फिर तुम सोने का सिक्का क्यों नही उठाते, चार लोगों के बीच अपनी फजिहत कराते हो व साथ मे मेरी भी।”
लडका हंसा व हाथ पकडकर पिता  को अंदर ले गया ऒर कपाट से एक पेटी निकालकर दिखाई जो चांदी के सिक्कों से भरी हुई थी।
यह देख बनिया  हतप्रभ रह गया। 
लडका बोला “जिस दिन मैंने सोने का सिक्का उठा लिया उस दिन से यह खेल बंद हो जाएगा।
वो मुझे मूर्ख समझकर मजा लेते हैं तो लेने दें, यदि मैं बुद्धिमानी दिखाउंगा तो कुछ नही मिलेगा।”
बनिए का  बेटा हु अक़्ल से काम लेता हूँ
मूर्ख होना अलग बात है व समझा जाना अलग.. स्वर्णिम मॊके का फायदा उठाने से बेहतर है, हर मॊके को स्वर्ण मे तब्दील करना।
जैसे समुद्र सबके लिए समान होता है, कुछ लोग पानी के अंदर टहलकर आ जाते हैं, कुछ मछलियाँ ढूंढ पकड लाते हैं .. व कुछ मोती चुन कर आते हैं|
बनिए की बुद्धी पे शक मत करना

Monday, September 11, 2017

नर्क के दरवाजे

एक बार एक व्यक्ति मरकर नर्क में पहुँचा, तो वहाँ उसने देखा कि प्रत्येक व्यक्ति को किसी भी देश के नर्क में जाने की छूट है । उसने सोचा, चलो अमेरिका वासियों के नर्क में जाकर देखें, जब वह वहाँ पहुँचा तो द्वार पर पहरेदार से उसने पूछा - क्यों भाई अमेरिकी नर्क में क्या-क्या होता है ? पहरेदार बोला - कुछ खास नहीं, सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एक घंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक दैत्य आकर आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोडे बरसायेगा...  ! यह सुनकरवह व्यक्ति बहुत घबराया और उसने रूस के नर्क की ओर रुख किया, और वहाँ के पहरेदार से
भी वही पूछा, रूस के पहरेदार ने भी लगभग वही वाकया सुनाया जो वह अमेरिका के नर्क में सुनकर आया था । फ़िर वह व्यक्ति एक- एक करके सभी देशों के नर्कों के दरवाजे जाकर आया, सभी जगह उसे  भयानक किस्से सुनने को मिले । अन्त में जब वह एक जगह पहुँचा, देखा तो दरवाजे पर लिखा था "भारतीय नर्क" और उस दरवाजे के बाहर उस नर्क में जाने के लिये लम्बी लाईन लगी थी, लोग भारतीय नर्क में जाने को उतावले हो रहे थे उसने सोचा कि जरूर यहाँ सजा कम मिलती होगी... तत्काल उसने पहरेदार से पूछा कि सजा क्या
है ? पहरेदार ने कहा - कुछ खास नहीं...सबसे पहले आपको एक इलेक्ट्रिक चेयर पर एक घंटा बैठाकर करंट दिया जायेगा, फ़िर एक कीलों के बिस्तर पर आपको एक घंटे लिटाया जायेगा, उसके बाद एक दैत्य आकर
आपकी जख्मी पीठ पर पचास कोडे बरसायेगा...  ! चकराये हुए व्यक्ति ने उससे पूछा - यही सब तो बाकी देशों के नर्क में भी हो रहा है, फ़िर यहाँ इतनी भीड क्यों है ? पहरेदार बोला - इलेक्ट्रिक चेयर तो वही है, लेकिन बिजली नहीं है, कीलों वाले बिस्तर में से कीलें कोई निकाल ले गया है, और कोडे़ मारने वाला दैत्य सरकारी कर्मचारी है, आता है, दस्तखत करता है और चाय-नाश्ता करने चला जाता है...और कभी गलती से जल्दी वापस आ भी गया तो एक-दो कोडे़ मारता है और पचास लिख देता है...चलो आ
जाओ अन्दर

Sunday, September 3, 2017

अच्छाइयों के गवाह

कल की शाम दोस्तों के बीच लँबी चर्चा-परिचर्चा में कब रात के दस बज गए पता ही नहीं चला...!

आखिरकार एक-एक लस्सी पीते हुए घर जाना तय हुआ।

लस्सी का ऑर्डर देकर हम सब आराम से बैठकर एक दूसरे की खिंचाई मे लगे ही थे कि लगभग 70-75 साल की एक माताजी कुछ पैसे माँगते हुए मेरे सामने हाथ फैलाकर खड़ी हो गईं ...

उनकी कमर झुकी हुई थी, धोती बहुत पुरानी थी मगर गन्दी ना थी... चेहरे की झुर्रियों में भूख तैर रही थी... आँखें भीतर को धँसी हुई किन्तु सजल थीं...! 

उनको देखकर मन में ना जाने क्या आया कि मैने जेब में सिक्के निकालने के लिए डाला हुआ हाथ वापस खींचते हुए उनसे पूछ लिया:

"दादी लस्सी पिहौ का?"
मेरी इस बात पर- दादी कम अचँभित हुईं और मेरे मित्र अधिक...! क्योंकि अगर मैं उनको पैसे देता तो बस 2-4-5 रुपए ही देता लेकिन लस्सी तो 35 रुपए की एक है.. 

इसलिए लस्सी पिलाने से "मेरे" गरीब हो जाने की और उन दादी के, मुझे ठगकर, अमीर हो जाने की सँभावना बहुत अधिक बढ़ गई थी !

दादी ने सकुचाते हुए हामी भरी और अपने पास जो माँग कर जमा किए हुए 06-07 ₹ थे वो अपने काँपते हाथों से मेरी ओर बढ़ाए...

मुझे कुछ समझ नहीं आया तो मैंने उनसे पूछा-

"ये काहे के लिए?"

तो दादी बोली:

"इनका मिलाई के पियाइ देओ पूत !"

भावुक तो मैं उनको देखकर ही हो गया था... रही बची कसर उनकी इस बात ने पूरी कर दी !

एकाएक आँखें छलछला आईं और भरभराए हुए गले से मैंने दुकान वाले से एक लस्सी बढ़ाने को कहा... 
उन्होंने अपने पैसे वापस मुट्ठी में बंद कर लिए और पास ही जमीन पर बैठ गईं...

अब मुझे वास्तविकता में अपनी लाचारी का अनुभव हुआ क्योंकि मैं वहाँ पर मौजूद दुकानदार, अपने ही दोस्तों और अन्य कई ग्राहकों की वजह से उनको कुर्सी पर बैठने के लिए ना कह सका !

डर था कि कहीं कोई टोंक ना दे... 

कहीं किसी को एक भीख माँगने वाली बूढ़ी महिला के उनके बराबर में बैठ जाने पर आपत्ति ना हो...! लेकिन वो कुर्सी जिसपर मैं बैठा था मुझे काट रही थी...

लस्सी कुल्लड़ों में भरकर हम लोगों के हाथों में आते ही मैं भी अपना कुल्लड़ पकड़कर दादी के पड़ोस मे ही जमीन पर बैठ गया,
क्योंकि ये करने के लिए मैं स्वतंत्र था...

इससे किसी को आपत्ति नहीं हो सकती... 

हाँ! मेरे दोस्तों ने मुझे एक पल को घूरा... लेकिन वो कुछ कहते उससे पहले ही दुकान के मालिक ने आगे बढ़कर दादी को उठाकर कुर्सी पर बिठाया और मेरी ओर मुस्कुराते हुए हाथ जोड़कर कहा ..

"ऊपर बैठ जाईए साहब !"

अब सबके हाथों में लस्सी के कुल्लड़ और होठों पर मुस्कुराहट थी बस एक वो दादी ही थीं जिनकी आँखों में तृप्ति के आँसू... 
होठों पर मलाई के कुछ अंश और सैकड़ों दुआएँ थीं...।

ना जाने क्यों जब कभी हमें 10-20-50 रुपए किसी भूखे गरीब को देने या उसपर खर्च करने होते हैं तो वो हमें बहुत ज्यादा लगते हैं लेकिन सोचिए कभी कि...

क्या वो चंद रुपए किसी के मन को तृप्त करने से अधिक कीमती हैं ?

क्या उन रुपयों को सिगरेट, रजनीगंधा पर खर्चकर दुआएँ खरीदी जा सकती हैं ?

जब कभी अवसर मिले अच्छे काम करते रहें,
भले ही कोई "अभी" आपका साथ ना दे... लेकिन ऊपर जब अच्छाईयों का हिसाब किया जाएगा तब यही दुआएँ देते होंठ तुम्हारी अच्छाइयों के गवाह बनेंगे