Tuesday, January 31, 2017

पापा से गुस्से

बड़े गुस्से से मैं घर से चला आया ..

इतना गुस्सा था की गलती से पापा के ही जूते पहन के निकल गया
मैं आज बस घर छोड़ दूंगा, और तभी लौटूंगा जब बहुत बड़ा आदमी बन जाऊंगा ...

जब मोटर साइकिल नहीं दिलवा सकते थे, तो क्यूँ इंजीनियर बनाने के सपने देखतें है .....
आज मैं पापा का पर्स भी उठा लाया था .... जिसे किसी को हाथ तक न लगाने देते थे ...

मुझे पता है इस पर्स मैं जरुर पैसो के हिसाब की डायरी होगी ....
पता तो चले कितना माल छुपाया है .....
माँ से भी ...

इसीलिए हाथ नहीं लगाने देते किसी को..

जैसे ही मैं कच्चे रास्ते से सड़क पर आया, मुझे लगा जूतों में कुछ चुभ रहा है ....
मैंने जूता निकाल कर देखा .....
मेरी एडी से थोडा सा खून रिस आया था ...
जूते की कोई कील निकली हुयी थी, दर्द तो हुआ पर गुस्सा बहुत था ..

और मुझे जाना ही था घर छोड़कर ...

जैसे ही कुछ दूर चला ....
मुझे पांवो में गिला गिला लगा, सड़क पर पानी बिखरा पड़ा था ....
पाँव उठा के देखा तो जूते का तला टुटा था .....

जैसे तेसे लंगडाकर बस स्टॉप पहुंचा, पता चला एक घंटे तक कोई बस नहीं थी .....

मैंने सोचा क्यों न पर्स की तलाशी Suren....

मैंने पर्स खोला, एक पर्ची दिखाई दी, लिखा था..
लैपटॉप के लिए 40 हजार उधार लिए
पर लैपटॉप तो घर मैं मेरे पास है ?

दूसरा एक मुड़ा हुआ पन्ना देखा, उसमे उनके ऑफिस की किसी हॉबी डे का लिखा था
उन्होंने हॉबी लिखी अच्छे जूते पहनना ......
ओह....अच्छे जुते पहनना ???
पर उनके जुते तो ...........!!!!

माँ पिछले चार महीने से हर पहली को कहती है नए जुते ले लो ...
और वे हर बार कहते "अभी तो 6 महीने जूते और चलेंगे .."
मैं अब समझा कितने चलेंगे

......तीसरी पर्ची ..........
पुराना स्कूटर दीजिये एक्सचेंज में नयी मोटर साइकिल ले जाइये ...
पढ़ते ही दिमाग घूम गया.....
पापा का स्कूटर .............
ओह्ह्ह्ह

मैं घर की और भागा........
अब पांवो में वो कील नही चुभ रही थी ....

मैं घर पहुंचा .....
न पापा थे न स्कूटर ..............
ओह्ह्ह नही
मैं समझ गया कहाँ गए ....

मैं दौड़ा .....
और
एजेंसी पर पहुंचा......
पापा वहीँ थे ...............

मैंने उनको गले से लगा लिया, और आंसुओ से उनका कन्धा भिगो दिया ..

.....नहीं...पापा नहीं........ मुझे नहीं चाहिए मोटर साइकिल...

बस आप नए जुते ले लो और मुझे अब बड़ा आदमी बनना है..

वो भी आपके तरीके से ...।।

"माँ" एक ऐसी बैंक है जहाँ आप हर भावना और दुख जमा कर सकते है...

और

"पापा" एक ऐसा क्रेडिट कार्ड है जिनके पास बैलेंस न होते हुए भी हमारे सपने पूरे करने की कोशिश करते है...
 

Sunday, January 29, 2017

मूर्ख है हम

एक बार एक अजनबी किसी के घरगया। वह अंदर गया और मेहमान कक्ष मे बैठ गया। वह खाली हाथ आया था तो उसने सोचा कि कुछ उपहार देना अच्छा रहेगा। तो उसने वहा टंगी एक पेन्टिंग उतारी और जब घर का मालिक आया, उसने पेन्टिंग देते हुए कहा, यह मै आपके लिए लाया हुँ। घर का मालिक, जिसे पता था कि यह मेरी चीज मुझे ही भेंट दे रहा है, सन्न रह गया !!!!! अब आप ही बताएं कि क्या वह भेंट पा कर, जो कि पहले
से ही उसका है, उस आदमी को खुश होना चाहिए ?? मेरे ख्याल से नहीं.... लेकिन यही चीज हम भगवान के साथ
भी करते है। हम उन्हे रूपया, पैसा चढाते है और हर चीज जो उनकी ही बनाई है, उन्हें भेंट करते हैं! लेकिन मन मे भाव रखते है की ये चीज मै भगवान को दे रहा हूँ! और सोचते हैं कि ईश्वर खुश हो जाएगें। मूर्ख है हम! हम यह नहीं समझते कि उनको इन सब चीजो कि जरुरत नही। अगर आप सच मे उन्हे कुछ देना चाहते हैं तो अपनी श्रद्धा दीजिए, उन्हे अपने हर एक श्वास मे याद कीजिये और विश्वास मानिए प्रभु जरुर खुश होगा !! अजब हैरान हूँ भगवन तुझे कैसे रिझाऊं मैं; कोई वस्तु नहीं ऐसी जिसे तुझ पर चढाऊं मैं । भगवान ने जवाब दिया :" संसार की हर वसतु तुझे मैनें दी है। तेरे पास अपनी चीज सिरफ तेरा अहंकार है, जो मैनें नहीं दिया । उसी को तूं मेरे अरपण कर दे। तेरा
जीवन सफल हो

Friday, January 27, 2017

अंजुलि के फूल

युद्ध में अब तो बताओ संजय आज क्या हुआ रणभूमि में । "
" जी महाराज आज तो पांडव सेना बहुत बहादुरी से लड़ी कौरव सेना के बहुत से सैनिक और कुछ योद्धा भी मारे गये । "
" क्या पांडवो को कोई नुकसान नहीं पहुंचा ? "
" युद्ध में नुकसान तो होता ही है महाराज उनके भी कुछ सैनिक मारे गये । "

 महाराज जूता लेकर संजय पर पिल पड़े " भूतनी के खाता है हमारा और गाता है दुश्मन का । ये खबर तू पहले नहीं बोल सकता था । "
 जैसे तैसे जान छुड़ाकर संजय अलग हुए और प्रार्थना की " हे वासुदेव इस मुसीबत से बचाओ भले मुझे अपने यहां रख लो गाय गोरू के सानी पानी कर दिया करेंगे । "
 केशव मुस्कुराये " बेटा तू तो अच्छा भला टमटम चला रहा था , ये हर्षा भोगले बनने की खुजली तुझे खुद ही हुई थी अब भुगतो । "
 संजय बिलबिला उठे " माधव मजे मत लो इस झंझट से मुक्ति का उपाय बताओ । "
" बहुत आसान उपाय है देशभक्त बनो खबर ऐसे सुनाओ जिसमें कौरव की बड़ाई हो और पांडव की बुराई । "
 शाम को फिर जब महाराज ने युद्ध का हाल पूछा तो संजय ने सुनाआ " महाराज युद्ध की विभीषिका के बीच भी युवराज दुशासन शांत चित्त है उन्होंने भीम से कहा अगर मेरे कलेजे का खून पीने से ही आपको संतुष्टि मिलती है तो लो पिलो भाई । "
 धृतराष्ट प्रसन्न होते हुए बोले " हां वो बड़ा शांत लड़का है भाईयों का बड़ा आदर करता है मैंने देखा है वो दुर्योधन की भी हर बात मानता था । खैर तुम आगे सुनाओ । "
संजय उत्साहित होते हुए बोला " महाराज तब दुशासन ने अपना सीना खोल दिया और भल्ल भल्ल खून बहने रगा । लेकिन वो मोटी बुद्धि भीम देह ओतना बड़ा है लेकिन बुद्धि ढ़ेला भर भी नहीं है । खून लेने के लिए बाल्टी लोटा या गिलास कुछ लेके ही नहीं आया था । चुरूआ में खून लेकर द्रौपड़ी की तरफ दौड़ पड़ा । हा हा महाराज मुझे तो हंसी आ रही है कहाँ तेरह साल ने बिना धुले केश और कहाँ चुरूआ भर खून अरे इतना दिन में तो एकदम जट्टा हो गया होगा । शैम्पू भी करेगी तो कम से कम डेढ़ किलो शैम्पू लगेगा ।
देखिए इतना पर भी कहीं पांडवो को अक्ल आ जाए और युद्ध बंद हो जाए । लेकिन एक बात है महाराज शांति के लिए दुशासन का ये प्रयास इतिहास सदैव याद रखेगा । "
 महाराज गदगद होते हुए गले से मोतीयों की माला उतारकर संजय को देते हुए बोले " वाह संजय क्या खबर सुनाई आज उन सारे लोगों का मुंह बंद हो जाएगा जो कहते थे कि युद्ध का कारण कौरव हैं । अंतिम समय तक हमने युद्ध टालने की बहुत कोशिश की युद्ध शुरू के बाद भी दुशासन ने जान देकर भी इसे रोकने की कोशिश की । जिस किसी के मन में शांति की चाह होगी वो दुशासन का ये बलिदान अवश्य याद रखेगा । "
 संजय एक हाथ में मोतियों की माला लिए दुसरे हाथ से दोपहर की चोट सहलाते हुए मुस्कुरा उठा ।

Wednesday, January 25, 2017

बाँट कर खानेवाला कभी भूखा नहीं मरता

एक डलिया में संतरे बेचती बूढ़ी औरत से एक युवा अक्सर संतरे खरीदता । अक्सर, खरीदे संतरों से एक संतरा निकाल उसकी एक फाँक चखता और कहता, "ये कम मीठा लग रहा है, देखो !" बूढ़ी औरत संतरे को चखती और प्रतिवाद करती "ना बाबू मीठा तो है!" वो उस संतरे को वही छोड़,बाकी संतरे ले गर्दन झटकते आगे बढ़ जाता। युवा अक्सर अपनी पत्नी के साथ होता था, एक दिन पत्नी नें पूछा "ये संतरे हमेशा मीठे ही होते हैं, पर यह
नौटंकी तुम हमेशा क्यों करते हो ? "युवा ने पत्नी को एक मधुर मुस्कान के साथ बताया - "वो बूढ़ी माँ संतरे बहुत मीठे बेचती है, पर खुद कभी नहीं खाती, इस तरह मै उसे संतरा खिला देता हूँ । एक दिन, बूढ़ी माँ से, उसके पड़ोस में सब्जी बेचनें वाली औरत ने सवाल किया, ये झक्की लड़का संतरे लेते इतनी चख चख करता है, पर संतरे तौलते हुए मै तेरे पलड़े को देखती हूँ, तुम हमेशा उसकी चख चख में, उसे ज्यादा संतरे तौल देती है । बूढ़ी माँ नें साथ सब्जी बेचने वाली से कहा - "उसकी चख चख संतरे के लिए नहीं, मुझे संतरा खिलानें को लेकर
होती है, वो समझता है में उसकी बात समझती नही,मै बस उसका प्रेम देखती हूँ, पलड़ो पर संतरे अपनें आप बढ़ जाते हैं । मेरी हैसीयत से ज्यादा मेरी थाली मे तूने परोसा है. तू लाख मुश्किलें भी दे दे मालिक, मुझे तुझपे भरोसा है. एक बात तो पक्की है की... छीन कर खानेवालों का कभी पेट नहीं भरता और बाँट कर खानेवाला कभी भूखा नहीं मरता...!!!

Monday, January 23, 2017

"गुरुर"

 किसी राजा के पास एक बकरा था । एक बार उसने एलान किया की जो कोई इस बकरे को जंगल में चराकर तृप्त करेगा मैं उसे आधा राज्य दे दूंगा। किंतु बकरे का पेट पूरा भरा है या नहीं इसकी परीक्षा मैं खुद करूँगा।
इस एलान को सुनकर एक मनुष्य राजा के पास आकरकहने लगा कि बकरा चराना कोई बड़ी बात नहीं है।
वह बकरे को लेकर जंगल में गया और सारे दिन उसे घास चराता रहा,, शाम तक उसने बकरे को खूब घास खिलाई और फिर सोचा की सारे दिन इसने इतनी घास खाई है अब तो इसका पेट भर गया होगा तो अब इसको राजा के पास ले चलूँ,, बकरे के साथ वह राजा के पास गया,, राजा ने थोड़ी सी हरी घास बकरे के सामने रखीतो बकरा उसे खाने लगा। इस पर राजा ने उस मनुष्य से कहा की तूने उसे पेट भर खिलाया ही नहीं वर्ना वह घास क्यों खाने लगता। बहुत जनो ने बकरे का पेट भरने का प्रयत्न किया किंतु ज्यों ही दरबार में उसके सामने घास डाली जाती तो वह फिर से खाने लगता। एक विद्वान् ब्राह्मण ने सोचा इस एलान का कोई तो रहस्य है, तत्व है,, मैं युक्ति से काम लूँगा,,वह बकरे को चराने के लिए ले गया। जब भी बकरा घास खाने के लिए जाता तो वह उसे लकड़ी से मारता,, सारे दिन में ऐसा कई बार हुआ,, अंत में बकरे ने सोचा की यदि मैं घास खाने का प्रयत्न करूँगा तो मार खानी पड़ेगी। शाम को वह ब्राह्मण बकरे को लेकर राजदरबार में लौटा, बकरे को तो उसने बिलकुल घास नहीं खिलाई थी फिर भी राजा से कहा मैंने इसको भरपेट खिलाया है। अत: यह अब बिलकुल घास नहीं खायेगा,, लो कर लीजिये परीक्षा.... राजा ने घास डाली लेकिन उस बकरे ने उसे खाया तो क्या देखा और सूंघा तक नहीं.... बकरे के मन में यह बात बैठ गयी थी कि अगर घास खाऊंगा तो मार पड़ेगी.... अत: उसने घास नहीं खाई.... मित्रों " यह बकरा हमारा मन ही है " बकरे को घास चराने ले जाने वाला ब्राह्मण " आत्मा" है। राजा "परमात्मा" है। मन को मारो नहीं,,, मन पर अंकुश रखो.... मन सुधरेगा तो जीवन भी सुधरेगा। अतः मन को विवेक रूपी लकड़ी से रोज पीटो..कमाई छोटी या बड़ी हो सकती है...पर रोटी की साईज़ लगभग सब घर में
एक जैसी ही होती है...!!
 बहुत सुन्दर सन्देश
अगर आप किसी को छोटा देख रहे हो, तो आप उसे; या तो "दूर" से देख रहे हो, या अपने "गुरुर" से देख रहे हो !

Wednesday, January 18, 2017

जो होता है, अच्छे के लिए होता

एक बार भगवान से उनका सेवक कहता है, भगवान- आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे, एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बन कर खड़ा हो जाता हूं, आप मेरा रूप धारण कर घूम आओ l भगवान मान जाते हैं, लेकिन शर्त रखते हैं कि जो भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना कुछ बोलना नहीं, मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है, सेवक मान जाता है l सबसे पहले मंदिर में बिजनेस मैन आता है और
कहता है, भगवान मैंने एक नयी फैक्ट्री डाली है, उसे खूब सफल करना l वह माथा टेकता है, तो उसका पर्स नीचे
गिर जाता है l वह बिना पर्स लिये ही चला जाता है l सेवक बेचैन हो जाता है. वह सोचता है कि रोक कर उसे बताये कि पर्स गिर गया, लेकिन शर्त की वजह से वह नहीं कह पाता l इसके बाद एक गरीब आदमी आता है और
भगवान को कहता है कि घर में खाने को कुछ नहीं. भगवान मदद करो l तभी उसकी नजर पर्स पर पड़ती है. वह
भगवान का शुक्रिया अदा करता है और पर्स लेकर चला जाता है l अब तीसरा व्यक्ति आता है, वह नाविक होता
है l वह भगवान से कहता है कि मैं 15 दिनों के लिए जहाज लेकर समुद्र की यात्रा पर जा रहा हूं, यात्रा में कोई अड़चन न आये भगवान.. तभी पीछे से बिजनेस मैन पुलिस के साथ आता है और कहता है कि मेरे बाद ये नाविक आया है l इसी ने मेरा पर्स चुरा लिया है,पुलिस नाविक को ले जा रही होती है तभी सेवक बोल पड़ता
है l अब पुलिस सेवक के कहने पर उस गरीब आदमी को पकड़ कर जेल में बंद कर देती है. रात को भगवान आते हैं, तो सेवक खुशी खुशी पूरा किस्सा बताता है l भगवान कहते हैं, तुमने किसी का काम बनाया नहीं, बल्कि बिगाड़ा है l वह व्यापारी गलत धंधे करता है,अगर उसका पर्स गिर भी गया, तो उसे फर्क नहीं पड़ता था l इससे उसके पाप ही कम होते, क्योंकि वह पर्स गरीब इंसान को मिला था. पर्स  मिलने पर उसके बच्चे भूखों नहीं मरते. रही बात नाविक की, तो वह जिस यात्रा पर जा रहा था, वहां तूफान आनेवाला था, अगर वह जेल में रहता, तो जान बच जाती. उसकी पत्नी विधवा होने से बच जाती. तुमने सब गड़बड़ कर दी l कई बार हमारी लाइफ में भी ऐसी प्रॉब्लम आती है, जब हमें लगता है कि ये मेरे साथ ही क्यों हुआ l लेकिन इसके पीछे भगवान की प्लानिंग
होती है l जब भी कोई प्रॉब्लमन आये. उदास मत होना l इस कहानी को याद करना और सोचना कि जो भी
होता है, अच्छे के लिए होता है l

Monday, January 16, 2017

किसान की मन की बात

एक किसान की मन की बात कहते हैं.. इन्सान सपना देखता है तो वो ज़रूर पूरा होता है. मगर किसान के सपने
कभी पूरे नहीं होते। बड़े अरमान और कड़ी मेहनत से फसल तैयार करता है, और जब तैयार हुई फसल को बेचने मंडी जाता है। बड़ा खुश होते हुए जाता है... बच्चों से कहता है... आज तुम्हारे लिये नये कपड़े लाऊंगा फल और मिठाई भी लाऊंगा।। पत्नी से कहता है.. तुम्हारी साड़ी भी कितनी पुरानी हो गई है फटने भी लगी है आज एक साड़ी नई लेता आऊंगा।। पत्नी:–”अरे नही जी..!” “ये तो अभी ठीक है..!” “आप तो अपने लिये जूते ही लेते आना कितने पुराने हो गये हैं और फट भी तो गये हैं..!” जब किसान मंडी पहुँचता है। ये उसकी मजबूरी है..
वो अपने माल की कीमत खुद नहीं लगा पाता। व्यापारी उसके माल की कीमत अपने हिसाब से तय करते हैं...
एक साबुन की टिकिया पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.। एक माचिस की डिब्बी पर भी उसकी कीमत लिखी होती है.। लेकिन किसान अपने माल की कीमत खु़द नहीं कर पाता .। खैर.. माल बिक जाता है, लेकिन कीमत
उसकी सोच अनुरूप नहीं मिल पाती.। माल तौलाई के बाद जब पेमेन्ट मिलता है.. वो सोचता है.. इसमें से दवाई वाले को देना है, खाद वाले को देना है, मज़दूर को देना है , अरे हाँ, बिजली का बिल भी तो जमा करना है. सारा हिसाब लगाने के बाद कुछ बचता ही नहीं.।। वो मायूस हो घर लौट आता है।। बच्चे उसे बाहर ही इन्तज़ार करते हुए मिल जाते हैं... “पिताजी..! पिताजी..!” कहते हुये उससे लिपट जाते हैं और पूछते हैं:- “हमारे नये कपडे़ नहीं ला़ये..?” पिता:–”वो क्या है बेटा.., कि बाजार में अच्छे कपडे़ मिले ही नहीं, दुकानदार कह रहा था, इस बार दिवाली पर अच्छे कपडे़ आयेंगे तब ले लेंगे..!” पत्नी समझ जाती है, फसल कम भाव में बिकी है, वो बच्चों को समझा कर बाहर भेज देती है.। पति:–”अरे हाँ..!” “तुम्हारी साड़ी भी नहीं ला पाया..!” पत्नी:–”कोई बात नहीं जी, हम बाद में ले लेंगे लेकिन आप अपने जूते तो ले आते..!” पति:– “अरे वो तो मैं भूल ही गया..!” पत्नी भी पति के साथ सालों से है पति का मायूस चेहरा और बात करने के तरीके से ही उसकी परेशानी समझ जाती है
लेकिन फिर भी पति को दिलासा देती है .। और अपनी नम आँखों को साड़ी के पल्लू से छिपाती रसोई की ओर चली जाती है.। फिर अगले दिन.. सुबह पूरा परिवार एक नयी उम्मीद , एक नई आशा एक नये सपने के साथ नई फसल की तैयारी के लिये जुट जाता है.। ये कहानी... हर छोटे और मध्यम किसान की ज़िन्दगी में हर साल दोहराई जाती है। हम ये नहीं कहते कि हर बार फसल के सही दाम नहीं मिलते, लेकिन...
जब भी कभी दाम बढ़ें, मीडिया वाले कैमरा ले के मंडी पहुच जाते हैं और खबर को दिन में दस दस बार दिखाते हैं.  कैमरे के सामने शहरी महिलायें हाथ में बास्केट ले कर अपना मेकअप ठीक करती मुस्कराती हुई कहती हैं...
सब्जी के दाम बहुत बढ़ गये हैं हमारी रसोई का बजट ही बिगड़ गया.। कभी अपने बास्केट को कोने में रख कर किसी खेत में जा कर किसान की हालत तो देखिये.। वो किस तरह फसल को पानी देता है.।। 25 लीटर दवाई से भरी हुई टंकी पीठ पर लाद कर छिङ़काव करता है| 20 किलो खाद की तगाड़ी उठा कर खेतों में घूम-घूम कर फसल को खाद देता है अघोषित बिजली कटौती के चलते रात-रात भर बिजली चालू होने के इन्तज़ार में जागता है.||चिलचिलाती धूप में सिर का पसीना पैर तक बहाता है.| ज़हरीले जन्तुओं का डर होते भी खेतों में नंगे पैर घूमता है.  जिस दिन ये वास्तविकता आप अपनी आँखों से देख लेंगे, उस दिन आपके किचन में रखी हुई सब्ज़ी, प्याज़, गेहूँ, चावल, दाल, फल, मसाले, दूध सब सस्ते लगने लगेंगे.||

Saturday, January 14, 2017

धागे और पतंग

एक बेटे ने पिता से पूछा - पापा ये 'सफल जीवन' क्या होता है ? पिता, बेटे को पतंग उड़ाने ले गए। बेटा पिता को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था... थोड़ी देर बाद बेटा बोला, पापा.. ये धागे की वजह से पतंग और ऊपर नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें !! ये और ऊपर चली जाएगी... पिता ने धागा तोड़ दिया .. पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आइ और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई... तब पिता ने बेटे को जीवन का दर्शन समझाया .,,,,
बेटा..
'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं.. हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं
जैसे :
            घर,
          परिवार,
        अनुशासन,
        माता-पिता,गुरू आदि
और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं... वास्तव में यही वो धागे होते हैं जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं.. इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे  परन्तु बाद में हमारा वो ही हश्र होगा जो  बिन धागे की पतंग का हुआ...'
"अतः
 जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना.."
" धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन' कहते हैं

Thursday, January 12, 2017

माँ की ममता

बेटे के जन्मदिन पर .....
रात के 1:30 बजे फोन आता है, बेटा  फोन उठाता है तो माँ बोलती है....
"जन्म दिन मुबारक लल्ला"
बेटा गुस्सा हो जाता है और माँ  से कहता है - सुबह फोन करती। इतनी रात को नींद खराब क्यों की? कह
कर फोन रख देता है। थोडी देर बाद पिता का फोन आता है। बेटा पिता पर गुस्सा नहीं करता, बल्कि कहता है ..." सुबह फोन करते " फिर पिता ने कहा - मैनें तुम्हे इसलिए फोन किया है कि तुम्हारी माँ पागल है, जो तुम्हे इतनी रात को फोन किया। वो तो आज से 25 साल पहले ही पागल हो गई थी। जब उसे डॉक्टर ने ऑपरेशन करने को कहा और उसने मना किया था। वो मरने के लिए तैयार हो गई, पर ऑपरेशन नहीं करवाया।
रात के 1:30 को तुम्हारा जन्म हुआ। शाम 6 बजे से रात 1:30 तक वो प्रसव पीड़ा से परेशान थी ।
लेकिन तुम्हारा जन्म होते ही वो सारी पीड़ा भूल गय ।उसके ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा । तुम्हारे जन्म से
पहले डॉक्टर ने दस्तखत करवाये थे, कि अगर कुछ हो जाये, तो हम जिम्मेदार नहीं होंगे।
तुम्हे साल में एक दिन फोन किया, तो तुम्हारी नींद खराब हो गई......मुझे तो रोज रात को 25 साल से, रात के 1:30 बजे उठाती है और कहती है, देखो हमारे लल्ला का जन्म इसी वक्त हुआ था। बस यही कहने के लिए तुम्हे फोन किया था। इतना कहके पिता फोन रख देते हैं। बेटा सुन्न हो जाता है। सुबह माँ के घर जा कर माँ के पैर पकड़कर माफी मांगता है....तब माँ कहती है, देखो जी मेरा लाल आ गया। फिर पिता से माफी मांगता है, तब पिता कहते हैं .....आज तक ये कहती थी, कि हमे कोई चिन्ता नहीं;हमारी चिन्ता करने वाला हमारा लाल है।
पर अब तुम चले जाओ, मैं  तुम्हारी माँ से कहूंगा कि चिन्ता मत करो। मैं तुम्हारा हमेशा की तरह आगे भी
ध्यान रखुंगा। तब माँ कहती है -माफ कर दो, बेटा है। सब जानते हैं दुनियाँ में एक माँ ही है, जिसे जैसा चाहे कहो, फिर भी वो गाल पर प्यार से हाथ फेरेगी। पिता अगर तमाचा न मारे, तो बेटा सर पर बैठ जाये। इसलिए पिता का सख्त होना भी जरुरी है।
*माता पिता को आपकी*
*दौलत नही, बल्कि*
*आपका प्यार और*
*वक्त चाहिए। उन्हें प्यार*
*दीजिए। माँ की ममता*
*तो अनमोल है।*

Tuesday, January 10, 2017

राम नाम की महिमा

महादेव जी को एक बार बिना कारण के किसी को प्रणाम करते देखकर पार्वती जी ने पूछा आप किसको प्रणाम करते रहते हैं?
शिव जी ने अपनी धर्मपत्नी पार्वती जी से कहते हैं की, हे देवी! जो व्यक्ति एक बार *राम* कहता है उसे मैं तीन बार प्रणाम करता हूँ।

पार्वती जी ने एक बार शिव जी से पूछा आप श्मशान में क्यूँ जाते हैं और ये चिता की भस्म शरीर पे क्यूँ लगते हैं?
उसी समय शिवजी पार्वती जी को श्मशान ले गए। वहाँ एक शव अंतिम संस्कार के लिए लाया गया। लोग *राम नाम सत्य है* कहते हुए शव को ला रहे थे।
शिव जी ने कहा की देखो पार्वती इस श्मशान की ओर जब लोग आते हैं तो *राम* नाम का स्मरण करते हुए आते हैं। और इस शव के निमित्त से कई लोगों के मुख से मेरा अतिप्रिय दिव्य *राम* नाम निकलता है उसी को सुनने मैं श्मशान में आता हूँ, और इतने लोगो के मुख से *राम* नाम का जप करवाने में निमित्त बनने वाले इस शव का मैं सम्मान करता हूँ, प्रणाम करता हूँ, और अग्नि में जलने के बाद उसकी भस्म को अपने शरीर पर लगा लेता हूँ। *राम* नाम बुलवाने वाले के प्रति मुझे इतना प्रेम है।

एक बार शिवजी कैलाश पर पहुंचे और पार्वती जी से बहुजन माँगा। पार्वती जी विष्णु सहस्रनाम का पाठ कर रहीं थी। पार्वती जी ने कहा अभी पाठ पूरा नही हुआ, कृपया थोड़ी देर प्रतीक्षा कीजिए। शिव जी ने कहा की इसमें तो समय और श्रम दोनों लगेंगे। संत लोग जिस तरह से सहस्र नाम को छोटा कर लेते हैं और नित्य जपते हैं वैसा उपाय कर लो।
पार्वती जी ने पूछा वो उपाय कैसे करते हैं? मैं सुन्ना चाहती हूँ।
शिव जी ने बताया, केवल एक बार *राम* कह लो तुम्हे सहस्र नाम, भगवान के एक हज़ार नाम लेने का फल मिल जाएगा। एक *राम* नाम हज़ार दिव्य नामों के समान है। पार्वती जी ने वैसा ही किया।

पार्वत्युवाच -
*केनोपायेन लघुना विष्णोर्नाम सहस्रकं?*
*पठ्यते पण्डितैर्नित्यम् श्रोतुमिच्छाम्यहं प्रभो।।*
ईश्वर उवाच-
*श्री राम राम रामेति, रमे रामे मनोरमे।*
*सहस्र नाम तत्तुल्यम राम नाम वरानने।।*

यह *राम* नाम सभी आपदाओं को हरने वाला, सभी सम्पदाओं को देने वाला दाता है, सारे संसार को विश्राम/शान्ति प्रदान करने वाला है। इसीलिए मैं इसे बार बार प्रणाम करता हूँ।

*आपदामपहर्तारम् दातारम् सर्वसंपदाम्।*
*लोकाभिरामम् श्रीरामम् भूयो भूयो नमयहम्।।*

 भव सागर के सभी समस्याओं और दुःख के बीजों को भूंज के रख देनेवाला/समूल नष्ट कर देने वाला, सुख संपत्तियों को अर्जित करने वाला, यम दूतों को खदेड़ने/भगाने वाला केवल *राम* नाम का गर्जन(जप) है।

*भर्जनम् भव बीजानाम्, अर्जनम् सुख सम्पदाम्।*
*तर्जनम् यम दूतानाम्, राम रामेति गर्जनम्।*

प्रयास पूर्वक स्वयम् भी *राम* नाम जपते रहना चाहिए और दूसरों को भी प्रेरित करके *राम* नाम जपवाना चाहिए। इस से अपना और दोसरों का तुरन्त कल्याण हो जाता है। यही सबसे सुलभ और अचूक उपाय है।  इसीलिए हमारे देश में प्रणाम *राम राम* कहकर किया जाता है।

Sunday, January 8, 2017

अहंकार युक्त जीवन

एक पति-पत्नी में तकरार हो गयी ---
पति कह रहा था :
"मैं नवाब हूँ इस शहर का लोग इसलिए मेरी इज्जत करते
है और तुम्हारी इज्जत मेरी वजह से है।"
पत्नी कह रही थी :
"आपकी इज्जत मेरी वजह से है। मैं चाहूँ तो आपकी
इज्जत एक मिनट में बिगाड़ भी सकती हूँ और बना भी सकती हूँ।"
नवाब को तैश आ गया।
नवाब बोला :" ठीक है दिखाओ मेरी इज्जत खराब
करके।"
बात आई गई हो गयी।
नवाब के घर शाम को महफ़िल जमी थी दोस्तों की हंसी मजाक हो रहा था कि
अचानक नवाब को अपने बेटे के रोने की आवाज आई ।
वो जोर जोर से रो रहा था और नवाब की पत्नी बुरी तरह उसे डांट रही थी।
नवाब ने जोर से आवाज देकर पूछा कि क्या हुआ बेगम क्यों डाँट रही हो?
तो बेगम ने अंदर से कहा कि देखिये न---आपका बेटा खिचड़ी मांग रहा है और जब भर पेट खा चुका है।
नवाब ने कहा कि दे दो थोड़ी सी और बेगम ने कहा घर में और भी तो लोग है सारी इसी को कैसे दे दूँ?
पूरी महफ़िल शांत हो गयी ।
लोग कानाफूसी करने लगे कि कैसा नवाब है ?
जरा सी खिचड़ी के लिए इसके घर में झगड़ा होता है।
नवाब की पगड़ी उछल गई।
सभी लोग चुपचाप उठ कर चले
गए घर में अशांति हो रही है देख कर।
नवाब उठ कर अपनी बेगम के पास आया और बोला कि मैं मान गया तुमने आज मेरी इज्जत तो उतार दी लोग भी कैसी-कैसी बातें कर रहे थे।
अब तुम यही इज्जत वापस लाकर दिखाओ।
बेगम बोली :"इसमे कौन सी बड़ी बात है आज जो लोगमहफ़िल में थे उन्हें आप फिर किसी बहाने से निमंत्रण दीजिये।"
ऐसे ही नवाब ने सबको बुलाया बैठक और मौज मस्ती के बहाने।
सभी मित्रगण बैठे थे । हंसी मजाक चल रहा था
कि फिर वही नवाब के बेटे की रोने की आवाज आई ---
नवाब ने आवाज देकर पूछा :
बेगम क्या हुआ क्यों रो रहा है हमारा बेटा ?" बेगम ने कहा फिर वही खिचड़ी खाने की जिद्द कर रहा है।"
लोग फिर एक दूसरे का मुंह देखने लगे कि यार एक मामूली खिचड़ी के लिए इस नवाब के घर पर रोज झगड़ा होता है।
नवाब मुस्कुराते हुए बोला "अच्छा बेगम तुम एक काम करो तुम खिचड़ी यहाँ लेकर आओ .. हम खुद अपने हाथों से अपने बेटे को देंगे ।
वो मान जाएगा और सभी मेहमानो को भी खिचड़ी खिलाओ। "
बेगम ने आवाज दी '' जी नवाब साहब''
बेगम बैठक खाने में आ गई पीछे नौकर खाने का सामान सर पर रख आ रहा था। हंडिया नीचे रखी और मेहमानो को भी देना शुरू किया अपने बेटे के साथ।
सारे नवाब के दोस्त हैरान -जो परोसा जा रहा था वो चावल की खिचड़ी तो कत्तई नहीं थी।
उसमे खजूर-पिस्ता-काजू बादाम-किशमिश -गरी इत्यादि से मिला कर बनाया हुआ सुस्वादिष्ट व्यंजन था।
अब लोग मन ही मन सोच रहे थे कि ये खिचड़ी है?
नवाब के घर इसे खिचड़ी बोलते हैं तो -मावा-मिठाई किसे बोलते होंगे ?
नवाब की इज्जत को चार-चाँद लग गए ।
लोग नवाब की रईसी की बातें करने लगे।
नवाब ने बेगम के सामने हाथ
जोड़े और कहा "मान गया मैं कि घर की औरत इज्जत बना
भी सकती है बिगाड़ भी सकती है---
और जिस व्यक्ति को
घर में इज्जत हासिल नहीं उसे दुनियाँ मे कहीं इज्जत नहीं
मिलती।"
सृष्टि मे यह सिद्धांत हर जगह लागू हो जाएगा ।
अहंकार युक्त जीवन में सृष्टि जब चाहे हमारे अहंकार की
इज्जत उतार सकती है और नम्रता युक्त जीवन मे इज्ज़त
बना सकती है ...!!

Saturday, January 7, 2017

दूध का कर्ज

कसाई गाय काट रहा था और गाय हँस रही थी ये सब देख के कसाई बोला"मै तुम्हे मार रहा हू और तुम मुझपर हँस क्यो रही हो...?" गाय बोलीः जिन्दगी भर मैने घास के सिवा कुछ नही खाया फिर भी मेरी मौत इतनी दर्दनाक है. तो हे इंसान जरा सोच तु मुझे मार के खायेगा तो तेरा अंत कैसा होगा...?. दूध पिला कर   मैंने तुमको बड़ा किया...  अपने बच्चे से भी छीना   पर मैंने तुमको दूध दिया  रूखी सूखी खाती थी मैं, कभी न किसी को सताती थी मैं...  कोने में पड़ जाती थी मैं, दूध नहीं दे सकती मैं, अब तो गोबर से काम तो आती थी मैं,मेरे उपलों की आग से तूने,  भोजन अपना पकाया था.  गोबर गैस से रोशन कर के,  तेरा घर उजलाया था.  क्यों मुझको बेच रहा रे  उस कसाई के हाथों में...??  पड़ी रहूंगी इक कोने में,  मत कर लालच माँ हूँ मैं..  मैं हूँ तेरे कृष्ण की प्यारी, 
वह कहता था जग से न्यारी...  उसकी बंसी की धुन पर मैं,   भूली थी यह दुनिया सारी.. . मत कर बेटा तू  यह पाप,  अपनी माँ को न बेच आप...  रूखी सूखी खा लूँगी मैं  किसी को नहीं सताऊँगी मैं   तेरे काम ही आई थी मैं  तेरे काम ही आउंगी मैं..

Friday, January 6, 2017

बीते हुए दिन

हमारे बचपन में कपड़े तीन टाइप के ही होते थे ••• स्कूल का ••• घर का ••• और किसी खास मौके का ••• अब तो ••• कैज़ुअल, फॉर्मल, नॉर्मल, स्लीप वियर, स्पोर्ट वियर, पार्टी वियर, स्विमिंग, जोगिंग, संगीत ड्रेस, फलाना - ढिमका ••• जिंदगी आसान बनाने चले थे ••• पर वह कपड़ों की तरह कॉम्प्लिकेटेड हो गयी है •••  बचपन में पैसा जरूर कम था पर साला उस बचपन में दम था" "पास में महंगे से मंहगा मोबाइल है पर बचपन वाली गायब वो स्माईल है" "न गैलेक्सी, न वाडीलाल, न नैचुरल था, पर घर पर जमीं आइसक्रीम का मजा ही कुछ ओर था" अपनी अपनी बाईक और  कारों में घूम रहें हैं हम पर किराये की उस साईकिल का मजा ही कुछ और था "बचपन में पैसा जरूर कम था पर यारो उस बचपन में दम था *कभी हम भी.. बहुत अमीर हुआ करते थे* *हमारे भी जहाज.. चला करते थे।* *हवा में.. भी।* *पानी में.. भी।* *दो दुर्घटनाएं हुई।* *सब कुछ.. ख़त्म हो गया।* *पहली दुर्घटना जब क्लास में.. हवाई जहाज उड़ाया। टीचर के सिर से.. टकराया। स्कूल से.. निकलने की नौबत आ गई। बहुत फजीहत हुई। कसम दिलाई गई।  औऱ जहाज बनाना और.. उडाना सब छूट गया।
*दूसरी दुर्घटना*
बारिश के मौसम में, मां ने.. अठन्नी दी। चाय के लिए.. दूध लाना था।कोई मेहमान आया था। हमने अठन्नी.. गली की नाली में तैरते.. अपने जहाज में.. बिठा दी। तैरते जहाज के साथ.. हम शान से.. चल रहे थे। ठसक के साथ खुशी खुशी। अचानक.. तेज बहाब आया। और.. जहाज.. डूब गया। साथ में.. अठन्नी भी डूब गई। ढूंढे से ना मिली। मेहमान बिना चाय पीये चले गये। फिर.. जमकर.. ठुकाई हुई। घंटे भर.. मुर्गा बनाया गया। औऱ हमारा.. पानी में जहाज तैराना भी.. बंद हो गया। आज जब.. प्लेन औऱ क्रूज के सफर की बातें चलती हैं , तो.. उन दिनों की याद दिलाती हैं। वो भी क्या जमाना था ! और.. आज के जमाने में.. मेरे बेटी ने... पंद्रह हजार का मोबाइल गुमाया तो.. मां बोली ~ कोई बात नहीं ! पापा.. दूसरा दिला देंगे। हमें अठन्नी पर.. मिली सजा याद आ गई। फिर भी आलम यह है कि.. आज भी.. हमारे सर.. मां-बाप के चरणों में.. श्रद्धा से झुकते हैं। औऱ हमारे बच्चे.. 'यार पापा ! यार मम्मी ! कहकर.. बात करते हैं। हम प्रगतिशील से.. प्रगतिवान.. हो गये हैं। कोई लौटा दे.. मेरे बीते हुए दिन।।
 
माँ बाप की लाइफ गुजर जाती है *बेटे
की लाइफ बनाने में......*
और बेटा status_ रखता है---
" *My wife is my Life*"

Thursday, January 5, 2017

भगवान पर विश्वास

यह कहानी एक ऐसे पर्वतारोही की है जो सबसे ऊँचे पर्वत पर विजय पाना चाहता था।
कई सालों की कड़ी मेहनत के बाद उसने अपना साहसिक अभियान शुरु किया। पर वह यह उपलब्धि किसी के साथ साझा नहीं करना चाहता था, अत: उसने अकेले ही चढ़ाई करने का निश्चय किया। उसने पर्वत पर चढ़ना आरंभ किया, जल्दी ही शाम ढलने लगी। पर वह विश्राम के लिए तम्बू में ठहरने की जगह अंधेरा होने तक चढ़ाई करता रहा। घने अंधकार के कारण वह कुछ भी देख नहीं पा रहा था। हाथ को हाथ भी सुझाई नहीं दे रहा था। चंद्रमा और तारे सब बादलों की चादर से ढके हुए थे। वह निरंतर चढ़ता हुआ पर्वत की चोटी से कुछ ही फुट के फासले पर था कि तभी अचानक उसका पैर फिसला और वह तेजी से नीचे की तरफ गिरने लगा। गिरते हुए उसे अपने जीवन के सभी अच्छे और बुरे दौर चलचित्र की तरह दिखाई देने लगे। उसे अपनी मृत्यु बहुत नजदीक लग रही थी, तभी उसकी कमर से बंधी रस्सी ने झटके से उसे रोक दिया। उसका शरीर केवल उस रस्सी के सहारे हवा में झूल रहा था। उसी क्षण वह जोर से चिल्लाया: ‘भगवान मेरी मदद करो!’ तभी अचानक एक गहरी आवाज आकाश में गूँजी:- तुम मुझ से क्या चाहते हो ?
पर्वतारोही बोला - भगवन् मेरी रक्षा कीजिए!
- क्या तुम्हें सच में विश्वास है कि मैं तुम्हारी रक्षा कर सकता हूँ ?
वह बोला - हाँ, भगवन् मुझे आप पर पूरा विश्वास है ।
- ठीक है, अगर तुम्हें मुझ पर विश्वास है तो अपनी कमर से बंधी रस्सी काट दो.....
कुछ क्षण के लिए वहाँ एक चुप्पी सी छा गई और उस पर्वतारोही ने अपनी पूरी शक्ति से रस्सी को पकड़े रहने का निश्चय कर लिया।
अगले दिन बचाव दल को एक रस्सी के सहारे लटका हुआ एक पर्वतारोही का ठंड से जमा हुआ शव मिला । उसके हाथ रस्सी को मजबूती से थामे थे... और वह धरती से केवल 5 फुट की ऊँचाई पर था।
और आप? आप अपनी रस्सी से कितने जुड़े हुए हैं । क्या आप अपनी रस्सी को छोड़ेंगे?
भगवान पर विश्वास रखिए। कभी भी यह नहीं सोचिए कि वह आपको भूल गया है या उसने आपका साथ छोड़ दिया है ।
याद रखिए कि वह हमेशा आपको अपने हाथों में थामे हुए है।

Monday, January 2, 2017

नुकसान की पहचान

एक बनिए से लक्ष्मी जी रूठ गई ।जाते वक्त बोली मैं जा रही हूँ और मेरी जगह टोटा (नुकसान) आ रहा है, तैयार हो जाओ, लेकिन मै तुम्हे अंतिम भेंट जरूर देना चाहती हूँ। मांगो जो भी इच्छा हो।
बनिया बहुत समझदार था। उसने 🙏 विनती की कि,टोटा आए तो आने दो। लेकिन उससे कहना कि मेरे परिवार  में आपसी प्रेम बना रहे। बस मेरी यही इच्छा है।
लक्ष्मी जी ने तथास्तु कहा और चली गयी।
कुछ दिन के बाद :-
बनिए की सबसे छोटी बहू खिचड़ी बना रही थी। उसने नमक आदि डाला और अन्य काम करने लगी। तब दूसरे  लड़के की बहू आई और उसने भी बिना चखे नमक डाला और चली गई।इसी प्रकार तीसरी, चौथी बहुएं आई और नमक डालकर चली गई। उनकी सास ने भी ऐसा किया ।
सबसे पहले बनिया आया। पहला निवाला मुहँ में लिया। तो देखा बहुत ज्यादा नमक है। लेकिन वह समझ गया टोटा (हानि) आ चुका है। चुपचाप खिचड़ी खाई और चला गया। इसके बाद बङे बेटे का नम्बर आया। पहला निवाला मुहँ में लिया और पूछा पिताजी ने खाना खा लिया। क्या कहा उन्होंने ?
सभी ने उत्तर दिया-" हाँ खा लिया, कुछ नही बोले।"
अब लड़के ने सोचा जब पिताजी ही कुछ नही बोले तो मै भी चुपचाप खा लेता हूँ।
इस प्रकार घर के अन्य सदस्य एक -एक आए और पहले वालो के बारे में पूछते और चुपचाप खाना खा कर चले गए ।
रात को टोटा (हानि) हाथ जोड़कर  बनिए से कहने लगा -"मै जा रहा हूँ।"
बनिए ने पूछा- क्यों ?
तब टोटा (हानि ) कहता है, "आप लोग इतना सारा नमक खा गए लेकिन बिलकुल भी झगड़ा नही हुआ। मेरा यहाँ कोई काम नहीं।"
⭐झगड़ा, कमजोरी ,टोटा ,नुकसान की पहचान है।
जहाँ प्रेम है ,वहाँ लक्ष्मी का वास है। सदा प्यार -प्रेम बांटते रहे। छोटे बङे की कदर करे।
जो बङे हैं,वो बङे ही रहेंगे। चाहे आपकी कमाई उसकी कमाई से बङी हो।