बिहार के एक छोटे-से गाँव रामपुर में मिट्टी का एक छोटा-सा घर था। उसी घर में रहती थीं सावित्री देवी और उनका दस साल का बेटा रोहन। सावित्री देवी कभी स्कूल नहीं गई थीं। वे अपना नाम तक ठीक से लिख नहीं पाती थीं, लेकिन उन्हें एक बात अच्छी तरह पता थी—
"शिक्षा ही इंसान की सबसे बड़ी ताकत है।"
उनके पति का कई वर्ष पहले एक दुर्घटना में निधन हो गया था। अब पूरे घर की जिम्मेदारी उन्हीं पर थी। वे सुबह लोगों के घरों में बर्तन साफ करतीं, दोपहर में खेतों में मजदूरी करतीं और रात को दूसरों के कपड़े सिलतीं। दिनभर की कड़ी मेहनत के बाद भी घर का खर्च मुश्किल से चलता था।
लेकिन उन्होंने अपने बेटे की पढ़ाई कभी नहीं रुकने दी।
हर सुबह वे रोहन को प्यार से जगातीं और कहतीं,
"बेटा, मैं पढ़-लिख नहीं पाई, लेकिन तू इतना पढ़ कि दुनिया तुझे तेरे नाम से पहचाने।"
रोहन अपनी माँ की मेहनत रोज़ अपनी आँखों से देखता था। वह जानता था कि उसकी हर किताब, हर कॉपी और हर स्कूल की फीस उसकी माँ के पसीने से खरीदी जाती है।
स्कूल में कुछ बच्चे उसका मज़ाक उड़ाते।
"तेरी माँ तो अपना नाम भी नहीं लिख सकती।"
"तू क्या बड़ा आदमी बनेगा?"
रोहन चुप रहता। उसे बुरा लगता, लेकिन वह अपनी माँ की आँखों में छिपे सपनों को याद कर लेता।
एक दिन स्कूल से लौटते समय उसने देखा कि उसकी माँ धूप में खेत में काम कर रही थीं। उनके हाथों में छाले थे, लेकिन चेहरे पर मुस्कान थी।
रोहन दौड़कर उनके पास गया और बोला,
"माँ, आप इतना काम क्यों करती हो?"
सावित्री देवी मुस्कुराईं और बोलीं,
"ताकि तुझे मेरी तरह मेहनत-मजदूरी न करनी पड़े। मेरी तकदीर भले किताबों से दूर रही, लेकिन तेरी तकदीर किताबों से ही लिखी जाएगी।"
उस दिन रोहन ने मन ही मन एक वादा किया—
"मैं माँ की हर कुर्बानी का सम्मान करूँगा।"
उसने पढ़ाई को अपना सबसे बड़ा लक्ष्य बना लिया।
सुबह जल्दी उठकर पढ़ाई, स्कूल, शाम को गाँव के छोटे बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना और रात को देर तक पढ़ाई—यही उसकी दिनचर्या बन गई।
बारहवीं की परीक्षा में उसने पूरे जिले में पहला स्थान प्राप्त किया।
गाँव में पहली बार किसी बच्चे का नाम अखबार के पहले पन्ने पर छपा था।
इसके बाद उसे छात्रवृत्ति मिली और शहर के एक बड़े कॉलेज में दाखिला मिला।
कॉलेज का खर्च चलाने के लिए वह पुस्तकालय में पार्ट-टाइम काम करता। कई बार पैसों की कमी होती, लेकिन उसने कभी हार नहीं मानी।
उसका सपना था कि वह एक प्रतिष्ठित प्रशासनिक अधिकारी बने।
उसने प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी शुरू की।
पहले प्रयास में वह असफल रहा।
दूसरे प्रयास में इंटरव्यू तक पहुँचा, लेकिन चयन नहीं हुआ।
लोग कहने लगे,
"इतनी मेहनत का क्या फायदा?"
लेकिन उसकी माँ ने हमेशा की तरह मुस्कुराकर कहा,
"बेटा, सूरज भी हर सुबह नई उम्मीद लेकर निकलता है। तू भी कोशिश करता रह। मेहनत कभी खाली नहीं जाती।"
माँ की बात सुनकर रोहन फिर से जुट गया।
तीसरे प्रयास में उसने पूरे आत्मविश्वास के साथ परीक्षा दी।
कुछ महीनों बाद परिणाम आया।
रोहन का चयन भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) में हो गया।
यह खबर सुनते ही सावित्री देवी की आँखों से आँसू बह निकले। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वे हँसें या रोएँ।
जब रोहन अधिकारी बनकर पहली बार गाँव लौटा, तो पूरा गाँव उसका स्वागत करने के लिए उमड़ पड़ा।
मंच पर रोहन ने सबसे पहले अपनी माँ को बुलाया।
उन्होंने झिझकते हुए मंच पर कदम रखा।
रोहन ने सबके सामने उनकी मेहनत से खुरदरे हो चुके हाथ अपने हाथों में लिए और कहा,
"आज लोग मुझे IAS अधिकारी कह रहे हैं, लेकिन मेरी पहली और सबसे बड़ी शिक्षक मेरी माँ हैं। वे पढ़ी-लिखी नहीं हैं, लेकिन उन्होंने मुझे मेहनत, ईमानदारी, अनुशासन और इंसानियत की शिक्षा दी। अगर मेरी माँ ने अपने सपनों की कुर्बानी न दी होती, तो मैं आज यहाँ खड़ा नहीं होता।"
पूरा मैदान तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।
उस दिन पहली बार सावित्री देवी ने अपने बेटे से कहा,
"बेटा, आज मुझे पढ़ा-लिखा होने की कमी नहीं लग रही। क्योंकि मेरी सबसे बड़ी किताब मेरी परवरिश थी, और उसका सबसे सुंदर परिणाम तू है।"
रोहन ने अपने गाँव में एक आधुनिक विद्यालय और एक पुस्तकालय बनवाया। विद्यालय के प्रवेश द्वार पर एक पंक्ति लिखवाई—
"हर माँ शिक्षित हो या अनपढ़, उसके सपने हमेशा अपने बच्चों के भविष्य को रोशन करते हैं।"
धीरे-धीरे गाँव में शिक्षा का महत्व बढ़ने लगा। कई माता-पिता ने अपने बच्चों, खासकर बेटियों, को भी नियमित रूप से स्कूल भेजना शुरू किया।
रोहन जब भी किसी समारोह में जाता, अपनी सफलता का श्रेय अपनी माँ को ही देता। वह कहता,
"मेरी माँ किताबें नहीं पढ़ सकीं, लेकिन उन्होंने मुझे जीवन पढ़ना सिखाया।"
कहानी से सीख (Moral)