एक छोटे से गाँव हरितपुर के बाहर एक बड़ा-सा मैदान था। उसी मैदान के किनारे एक बहुत पुराना बरगद का पेड़ खड़ा था। वह पेड़ इतना पुराना था कि गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि उनके दादा के समय में भी वह पेड़ वहीं खड़ा था।
गाँव के बच्चे अक्सर उस पेड़ के नीचे खेलते थे। किसान दोपहर की धूप में उसी पेड़ की छाया में बैठकर आराम करते थे। पक्षी उसकी शाखाओं पर अपने घोंसले बनाते थे। उस पेड़ ने न जाने कितनी पीढ़ियों को आते-जाते देखा था।
गाँव में रोहन नाम का एक लड़का रहता था। वह बहुत चंचल था, लेकिन थोड़ा शरारती भी था। उसे पेड़ों की ज्यादा कद्र नहीं थी। वह कभी-कभी पेड़ों की टहनियाँ तोड़ देता या पत्थर मारकर पक्षियों को डराता था।
एक दिन रोहन अपने दोस्तों के साथ उसी बरगद के पेड़ के नीचे खेल रहा था। खेलते-खेलते उसने पेड़ की एक बड़ी टहनी तोड़ने की कोशिश की।
तभी अचानक तेज़ हवा चली और पेड़ की पत्तियाँ जोर-जोर से हिलने लगीं। रोहन को ऐसा लगा जैसे पेड़ उससे कुछ कह रहा हो।
रोहन थोड़ा डर गया और पेड़ के पास खड़ा हो गया।
तभी उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे पेड़ की धीमी आवाज़ उसके कानों में गूंज रही हो—
“बेटा, तुम मेरी टहनियाँ क्यों तोड़ते हो?”
रोहन हैरान रह गया। उसने चारों तरफ देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था।
वह धीरे से बोला,
“कौन बोल रहा है?”
फिर वही आवाज़ आई—
“मैं हूँ… यह बूढ़ा पेड़।”
रोहन को पहले तो विश्वास नहीं हुआ, लेकिन फिर वह ध्यान से सुनने लगा।
पेड़ ने कहा,
“मैं कई वर्षों से यहाँ खड़ा हूँ। मैंने इस गाँव को बढ़ते और बदलते देखा है। मैंने लोगों को धूप से बचाया है, पक्षियों को घर दिया है और हवा को शुद्ध किया है।”
रोहन चुपचाप सुनता रहा।
पेड़ ने आगे कहा,
“जब तुम मेरी टहनियाँ तोड़ते हो या मुझे नुकसान पहुँचाते हो, तो मुझे दुख होता है। लेकिन मैं फिर भी तुम्हें छाया देता हूँ और तुम्हारी रक्षा करता हूँ।”
रोहन को अपनी गलती का एहसास होने लगा।
उसने धीरे से पूछा,
“पेड़ बाबा, आप इतने सालों से खड़े होकर क्या सीख पाए हैं?”
पेड़ ने मुस्कुराते हुए कहा,
“मैंने जीवन की कई बातें सीखी हैं।
पहली बात—धैर्य।
मैं धीरे-धीरे बड़ा हुआ हूँ। हर साल थोड़ी-थोड़ी बढ़त हुई, तब जाकर आज इतना बड़ा बना हूँ।”
फिर पेड़ ने कहा,
“दूसरी बात—सेवा।
मैं बिना किसी स्वार्थ के लोगों को छाया, फल और हवा देता हूँ। यही प्रकृति का नियम है—दूसरों की मदद करना।”
कुछ देर रुककर पेड़ ने तीसरी बात कही—
“तीसरी बात—सहनशीलता।
मैंने आँधी, तूफान और बारिश सब सहा है। कई बार मेरी शाखाएँ टूटीं, लेकिन मैं फिर भी खड़ा रहा।”
रोहन की आँखों में अब शर्म और समझ दोनों झलक रही थीं।
पेड़ ने अंत में कहा,
“बेटा, अगर इंसान भी धैर्य, सेवा और सहनशीलता सीख ले, तो उसका जीवन भी मजबूत और सुंदर बन सकता है।”
रोहन को पेड़ की बातें दिल से छू गईं।
उसने हाथ जोड़कर कहा,
“पेड़ बाबा, मुझे माफ कर दीजिए। आज के बाद मैं कभी किसी पेड़ को नुकसान नहीं पहुँचाऊँगा।”
उस दिन के बाद रोहन पूरी तरह बदल गया।
अब वह पेड़ों की टहनियाँ तोड़ने की बजाय उन्हें पानी देता और उनकी देखभाल करता।
उसने अपने दोस्तों को भी पेड़ों का महत्व समझाया।
धीरे-धीरे गाँव के बच्चे भी पेड़ों के प्रति जागरूक होने लगे।
कुछ समय बाद रोहन और उसके दोस्तों ने मिलकर गाँव में कई नए पेड़ लगाए।
अब हरितपुर गाँव पहले से भी ज्यादा हरा-भरा हो गया।
गाँव के बुज़ुर्ग अक्सर कहते थे—
“एक बूढ़े पेड़ की सीख ने पूरे गाँव को बदल दिया।”
और सच ही कहा गया है—
“पेड़ हमें सिर्फ छाया ही नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की कई अनमोल सीख भी देते हैं।”
सीख:
हमें प्रकृति और पेड़ों का सम्मान करना चाहिए। उनसे हमें धैर्य, सेवा और सहनशीलता जैसी महान सीख मिलती है।