Sunday, April 14, 2019

कंजक पूजन

मुहल्ले की औरतें कंजक पूजन के लिए तैयार थी,

मिली नहीं कोई लड़की, उन्होंने हार अपनी मान ली।

फिर किसी ने बताया, अपने मोहल्ले के है बाहर जी,

बारह बेटियों का बाप,  है सरदार जी।

सुन कर उसकी बात , हसकर मैंने यह कह दिया,


बेटे के चक्कर में, सरदार, बेटियां बारह कर के बैठ गया।

पड़ोसियों को साथ लेकर, जा पुहाचां उसके घर पे,

सत श्री अकाल कहा, मैंने प्रणाम उसे कर के।

कंजक पूजन के लिए आपकी बेटियां घर लेकर जानी है,

आपकी पत्नी ने कंजके बिठा ली, या बिठानी है ?

सुन के मेरी बात बोला , कोई गलतफहमी हुई है।

किसकी पत्नी जी ,  मेरी तो अभी शादी नहीं हुई है।

सुन के उसकी बात, मै तो चक्करा गया,

बातों बातों में वो मुझे क्या क्या बता गया।

मत पूछो इनके बारे में, जो बातें मैंने छुपाई है,

क्या बताओ आपको, की मैंने कहां कहां से उठाई है।

मां बाप इनके हैवानियत की हदें सब तोड़ गए,

मन्दिर मस्ज़िद कई हस्पतालों में थे छोड़ गए।

बड़े बड़े दरिंदे है, अपने इस जहान में,

यह जो दो छोटियां है, मिली थी मुझे कूड़ेदान में।

इसका बाप कितना निर्दयी होगा, जिसे दया ना आई नन्ही सी जान पे,

हम मुर्दों को लेकर जाते हैं, वो जिन्दा ही छोड़ गया इसे श्मशान में।

यह जो बड़ी प्यारी सी है, थोड़ा लंगड़ा के चल रही थी,

मैंने देखा के तलाब के पास एक गाड़ी खड़ी थी।

बैग फेक भगा ली गाड़ी, जैसे उसे जल्दी बड़ी थी।

शायद उसके पीछे कोई आफ़त पड़ी थी।

बैग था आकर्षित, मैंने लालच में  उठाया था,

देखा जब खोल के, आंसू रोक नहीं पाया था।

जबरन बैग में डालने के लिए, उसने पैर इसके मोड़ दिये,

शायद उसे पता नहीं चला, की उसने कब पैर इसके तोड़ दिये।

सात साल हो गए इस बात को, ये दिल पे लगा कर बैठी है,

बस गुम सुम सी रहती हैं, दर्द सीने में छुपा कर बैठी है।

सुन के बात सरदार जी की, सामने आया सब पाप था,

लड़की के सामने जो खड़ा था कोई और नहीं उसका बाप था।

देखा जब पडोसियों के तरफ़, उनके चेहरे के रंग बताते थे,     

वो भी किसी ना किसी लड़की के, मुझे मां बाप नजर आते थे।

दिल पे पत्थर रख कर , लड़कियों को घर लेकर आ गया,

बारी बारी सब को हमने पूजा के लिए बिठा दिया।

जिन हाथों ने अपने हाथ से , तोड़े थे जो पैर जी,

टूटे हुए पैरों को छू कर, मांग रहे थे ख़ैर जी।

क्यों लोग खुद की बेटी मार कर,

दूसरों की पूजना चाहते हैं।


कुछ लोग कंजक पूजन ऐसे ही मनाते हैं


Sunday, March 31, 2019

कान्हा जी से विरक्ति

गौरी रोटी बनाते-बनाते कान्हा नाम का जाप कर रही थी।
अलग से जाप करने का समय कहां निकाल पाती थी बेचारी,
तो बस काम करते-करते ही कान्हा का नाम जप लिया करती थी।
एकाएक धड़ाम से जोरों की आवाज हुई और साथ में एक दर्दनाक चीख।
कलेजा धक से रह गया जब आंगन में दौड़कर‌ झांका।
आठ साल का उसका बेटा चुन्नू चित्त पड़ा था खून से लथपथ। 
मन हुआ दहाड़ मारकर रोये।
परंतु घर में उसके अलावा कोई था नहीं,
तो रोकर भी किसे बुलाती।
फिर चुन्नू को संभालना भी तो था।
दौड़ कर नीचे गई तो देखा चुन्नू आधी बेहोशी में मां-मां की रट लगाए हुए है।
अंदर की ममता ने आंखों से निकलकर अपनी मौजूदगी का अहसास करवाया।
फिर दस दिन पहले करवाये अपेंडिक्स के ऑपरेशन के बावजूद ना जाने कहां से इतनी शक्ति आ गयी,
कि चुन्नू को गोद मे उठाकर पड़ोस के नर्सिंग होम की ओर दौड़ी।
रास्ते भर कान्हा जी को जी भर कर कोसती रही और बड़-बड़ करती रही- हे कान्हा जी ! क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा,
जो मेरे ही बच्चे को तकलीफ दी।
खैर! डॉक्टर साहब मिल गए और समय पर इलाज होने पर चुन्नू बिल्कुल ठीक हो गया।
चोटें गहरी नहीं थी बस ऊपरी थीं,
तो कोई खास परेशानी नहीं हुई।
रात को घर पर जब सब टीवी देख रहे थे,
तब गौरी का मन बेचैन था।
कान्हा जी से विरक्ति होने लगी थी।
एक मां की ममता कान्हा जी को चुनौती दे रही थी।
उसके दिमाग में दिन की सारी घटना चलचित्र की तरह चलने लगी।
कैसे चुन्नू आंगन में गिरा,
कि एकाएक उसकी‌ आत्मा सिहर उठी।
कल ही तो पुराने लोहे के पाइप का टुकड़ा आंगन से हटवाया था,
और वो ठीक उसी जगह था जहां चिंटू गिरा पड़ा था।
अगर कल मिस्त्री न आया होता, तो?
उसका हाथ अब अपने पेट की तरफ गया,
जहां ऑपरेशन के टांके अभी हरे ही थे।
आश्चर्य हुआ कि उसने बीस-बाइस किलो के चुन्नू को उठाया कैसे?
कैसे वो आधा किलोमीटर तक दौड़ती चली गयी?
फूल सा हल्का लग रहा था चुन्नू।
वैसे तो वो कपड़ों की बाल्टी तक छत पर नहीं ले जा पाती थी।
फिर उसे ख्याल आया कि डॉक्टर साहब तो दो बजे तक ही रहते हैं,
पर जब वो पहुंची थी तो साढ़े तीन बज रहे थे।
उसके जाते ही तुरंत इलाज हुआ,
मानो किसी ने डाॅक्टर साहब को रोक रखा था।
उसका कान्हा जी की श्रद्धा में झुक गया।
अब वो सारा खेल समझ चुकी थी।
मन ही मन कान्हा जी से अपने शब्दों के लिए क्षमा मांगी।
टीवी पर प्रवचन आ रहा था,
कान्हा जी कहते हैं-
मैं तुम्हारे आने वाले संकट को रोक नहीं सकता,
लेकिन तुम्हें इतनी शक्ति दे सकता हूँ,
कि तुम आसानी से उन्हें पार कर सको,
और तुम्हारी राह आसान कर सकता हूं।
तुम बस परमार्थ के मार्ग पर चलते रहो ,फिर
कान्हा जी का जाप करते-करते अश्रुओं की धारा रुकने का नाम नहीं ले रही थी .. उसके अंतर में पछतावा और सच्ची तड़फ थी ... उसकी रूह ऊपर चढ़ गई...
गौरी ने अंतर में झांक कर देखा,
कान्हा जी मुस्कुरा रहे थे. !!

Friday, March 29, 2019

दान का महत्व

एक बार द्रोपदी सुबह तड़के स्नान करने यमुना घाट पर गयी। 

भोर का समय था तभी उसका ध्यान सहज ही एक साधु की ओर गया जिसके शरीर पर मात्र एक लँगोटी थी.

साधु स्नान के पश्चात अपनी दुसरी लँगोटी लेने गया तो वो लँगोटी अचानक हवा के झोके से उड़कर पानी मे चली गयी और बह गयी. 

सँयोगवस साधु ने जो लँगोटी पहनी थी वो भी फटी हुई थी. साधु सोच में पड़ गया कि अब वह अपनी लाज कैसे बचाए थोडी देर में सुर्योदय हो जाएगा और घाट पर भीड़ बढ़ जाएगी. 

साधु तेजी से पानी से बाहर आया और झाड़ी मे छिप गया. 

द्रोपदी यह सारा दृश्य देख अपनी साड़ी जो पहन रखी थी उसमे से आधी फाड़ कर उस साधु के पास गयी और उसे आधी साड़ी देते हुए बोली, 

तात मै आपकी परेशानी समझ गयी इस वस्त्र से अपनी लाज ढँक लीजिए.

साधु ने सकुचाते हुए साड़ी का टुकड़ा ले लिया और आशीष दिया क़ि जिस तरह आज तुमने मेरी लाज बचायी उसी तरह एक दिन भगवान् तुम्हारी लाज बचाएगें. 

और जब भरी सभा मे चीरहरण के समय द्रोपदी की करुण पुकार नारद जी ने भगवान् तक पहुचायी तो भगवान् ने कहा, 

कर्मो के बदले मेरी कृपा बरसती है क्या कोई पुण्य है द्रोपदी के खाते मे ? 

जाँचा परखा गया तो उस दिन साधु को दिया वस्त्र दान हिसाब में मिला जिसका ब्याज भी कई गुणा बढ गया था जिसको चुकता करने भगवान् पहुंच गये द्रोपदी की मदद करने, 

दुस्सासन चीर खीचता गया और हज़ारों गज कपड़ा बढता गया.

इन्सान जैसा कर्म करता है परमात्मा उसे वैसा ही उसे लौटा देता है.!!

Monday, March 25, 2019

हमारे परिधान

तन्वी को सब्जी मण्डी जाना था..
उसने जूट का बैग लिया और सड़क के किनारे सब्जी मण्डी की ओर चल पड़ी...
तभी पीछे से एक ऑटो वाले ने आवाज़ दी : —
'कहाँ जायेंगी माता जी...?''
तन्वी ने ''नहीं भैय्या'' कहा तो ऑटो वाला आगे निकल गया.
अगले दिन 
तन्वी अपनी बिटिया मानवी को स्कूल बस में बैठाकर घर लौट रही थी...
तभी पीछे से एक ऑटो वाले ने आवाज़ दी :—
''बहनजी चन्द्रनगर जाना है क्या...?''
तन्वी ने मना कर दिया...
पास से गुजरते उस ऑटोवाले को देखकर
तन्वी पहचान गयी कि ये कल वाला ही ऑटो वाला था.
आज तन्वी को 
अपनी सहेली के घर जाना था.
वह सड़क किनारे खड़ी होकर ऑटो की प्रतीक्षा
करने लगी.
तभी एक ऑटो आकर रुका :—
''कहाँ जाएंगी मैडम...?'' 
तन्वी ने देखा 
ये वो ही ऑटोवाला है
जो कई बार इधर से गुज़रते हुए उससे पूछता रहता है चलने के लिए..
तन्वी बोली :—
''मधुबन कॉलोनी है ना सिविल लाइन्स में, वहीँ जाना है.. चलोगे...?''
ऑटोवाला मुस्कुराते हुए बोला :— 
''चलेंगें क्यों नहीं मैडम..आ जाइये...!"
ऑटो वाले के ये कहते ही तन्वी ऑटो में बैठ गयी.
ऑटो स्टार्ट होते ही तन्वी ने जिज्ञासावश उस ऑटोवाले से पूछ ही लिया : —
''भैय्या एक बात बताइये...?
दो-तीन दिन पहले 
आप मुझे माताजी कहकर
चलने के लिए पूछ रहे थे,
कल बहनजी और आज मैडम, ऐसा क्यूँ...?''
ऑटोवाला थोड़ा झिझककर शरमाते हुए बोला :—
''जी सच बताऊँ...
आप चाहे जो भी समझेँ 
पर किसी का भी पहनावा हमारी सोच पर असर डालता है.
आप दो-तीन दिन पहले साड़ी में थीं तो एकाएक मन में आदर के भाव जागे,
क्योंकि,
मेरी माँ हमेशा साड़ी ही पहनती है.
इसीलिए मुँह से 
स्वयं ही *"माताजी'"* निकल गया.
कल आप 
सलवार-कुर्ती में थीँ, 
जो मेरी बहन भी पहनती है.
इसीलिए आपके प्रति
*स्नेह का भाव* मन में जागा और
मैंने *''बहनजी''* कहकर आपको आवाज़ दे दी.
आज आप जीन्स-टॉप में हैं, और *इस लिबास में माँ या*
*बहन के भाव तो नहीँ जागते*.
इसीलिए मैंने 
आपको *"मैडम"* कहकर पुकारा.
*कथासार*
हमारे परिधान का न केवल हमारे विचारों पर वरन दूसरे के भावों को भी बहुत प्रभावित करता है.
टीवी, फिल्मों या औरों को देखकर पहनावा ना बदलें, बल्कि विवेक और संस्कृति की ओर भी ध्यान दें.

Sunday, March 24, 2019

दिमाग का उपयोग

गधे ने बाघ से कहा!   घास नीले रंग की होती है ! 
  बाघ ने कहा!   नहीं  घास का रंग हरा है ! 
 दोनों के बीच चर्चा तेज हो गई।  चर्चा विवाद का रूप ले ही रही थी ,  कि किसी ने सुझाया ,  क्योंना जंगल के राजा से निर्णय करवाते ! 
 दोनों ही अपने-अपने तर्को पर दृढ़ता से अड़े थे !    इस विवाद को 

  समाप्त करने के लिए, दोनों जंगल के राजा शेर के पास गए !  

 पशु साम्राज्य के बीच में, सिंहासन पर एक शेर बैठा था !  
  बाघ के कुछ कहने से पहले ही गधा चिल्लाने लगा ! ! 
   महाराज! !    
  घास नीला है ना?  
  शेर ने कहा, 
   'हाँ! 
   घास नीली है। 

गधा बोला !    ये बाघ नहीं मान रहा!    उसे ,  ठीक से इसकी  सजा दी जाए।   
  राजा ने घोषणा की !   
 " बाघ को एक साल की जेल होगी " राजा का फैसला गधे ने सुना , और वह पूरे जंगल में खुशी से झूमता फिरे , कि   
 " बाघ को एक साल की जेल की सजा सुनाई गई " ! ! 

 बाघ शेर के पास गया  और पूछा ! !    
  क्यों महाराज ?    घास हरी है ,  
  क्या यह सही नहीं है?? ?  
  शेर ने कहा !    हाँ!    घास हरी है !  मगर . .  तुम को  सज़ा !   उस मूर्ख , गधे के साथ बहस करने केलिये दी गई हैं ! ! . . .   आप जैसे बहादुर और बुद्धिमान जीव , ने , गधे से बहस की ! ! !  
  और निर्णय कराने ,  
  मेरे पास , चले आये  ! ! ! 

कहानी का सार ! ? ! 
गधों से , बहस ना ,  करें !    गधों के जोर जोर से चोर चोर चिल्लाने से चौकीदार चोर नही हो जाता अपने दिमाग का उपयोग करे 

Saturday, March 2, 2019

शब्दों का प्रयोग

18 दिन के युद्ध ने, द्रोपदी की उम्र को 
80 वर्ष जैसा कर दिया था... शारीरिक रूप से भी और मानसिक रूप से भी !

उसकी आंखे मानो किसी खड्डे में धंस गई थी, उनके नीचे के काले घेरों ने उसके रक्ताभ कपोलों को भी अपनी सीमा में ले लिया था !

श्याम वर्ण और अधिक काला हो गया था... युद्ध से पूर्व प्रतिशोध की ज्वाला ने जलाया था और, युद्ध के उपरांत पश्चाताप की आग तपा रही थी !

ना कुछ समझने की क्षमता बची थी ना सोचने की ।  कुरूक्षेत्र मेें चारों तरफ लाशों के ढेर थे ।  जिनके दाह संस्कार के लिए न लोग उपलब्ध थे न साधन । 

शहर में चारों तरफ विधवाओं का बाहुल्य था..  पुरुष इक्का-दुक्का ही दिखाई पड़ता था अनाथ बच्चे घूमते दिखाई पड़ते थे और, उन सबकी वह महारानी द्रौपदी हस्तिनापुर के महल में निश्चेष्ट बैठी हुई शून्य को ताक रही थी । 

तभी, * श्रीकृष्ण* कक्ष में दाखिल होते है !

द्रौपदी कृष्ण को देखते ही दौड़कर उनसे लिपट जाती है ... कृष्ण उसके सर को सहलाते रहते हैं और रोने देते हैं !
थोड़ी देर में, उसे खुद से अलग करके समीप के पलंग पर बिठा देते हैं । 

*द्रोपती* : यह क्या हो गया *सखा* ??
ऐसा तो मैंने नहीं सोचा था ।

*कृष्ण* : नियति बहुत क्रूर होती है पांचाली..
वह हमारे सोचने के अनुरूप नहीं चलती !
हमारे कर्मों को परिणामों में बदल देती है..
तुम प्रतिशोध लेना चाहती थी और, तुम सफल हुई, द्रौपदी ! 

तुम्हारा प्रतिशोध पूरा हुआ... सिर्फ दुर्योधन और दुशासन ही नहीं, सारे कौरव समाप्त हो गए !
तुम्हें तो प्रसन्न होना चाहिए ! 

*द्रोपती*: सखा, तुम मेरे घावों को सहलाने आए हो या, उन पर नमक छिड़कने के लिए ?

*कृष्ण* : नहीं द्रौपदी, मैं तो तुम्हें वास्तविकता से अवगत कराने के लिए आया हूं । 
हमारे कर्मों के परिणाम को हम, दूर तक नहीं देख पाते हैं और जब वे समक्ष होते हैं.. तो, हमारे हाथ मे कुछ नहीं रहता ।

*द्रोपती* : तो क्या, इस युद्ध के लिए पूर्ण रूप से मैं ही उत्तरदाई हूं कृष्ण ? 

*कृष्ण* : नहीं द्रौपदी तुम स्वयं को इतना महत्वपूर्ण मत समझो...
लेकिन, तुम अपने कर्मों में थोड़ी सी भी दूरदर्शिता रखती तो, स्वयं इतना कष्ट कभी नहीं पाती।

*द्रोपती* : मैं क्या कर सकती थी कृष्ण ?

*कृष्ण*:- 👉जब तुम्हारा स्वयंबर हुआ... 
तब तुम कर्ण को अपमानित नहीं करती 
और उसे प्रतियोगिता में भाग लेने का 
एक अवसर देती तो, शायद परिणाम 
कुछ और होते ! 

👉इसके बाद जब कुंती ने तुम्हें पांच पतियों की पत्नी बनने का आदेश दिया...
तब तुम उसे स्वीकार नहीं करती 
तो भी, परिणाम कुछ और होते । 
             और 
उसके बाद तुमने अपने महल में  दुर्योधन को अपमानित किया... वह नहीं करती तो, तुम्हारा चीर हरण नहीं होता... तब भी शायद, परिस्थितियां कुछ और होती । 

हमारे *शब्द* भी हमारे *कर्म* होते हैं द्रोपदी...

और, हमें अपने हर शब्द को बोलने से पहले तोलना बहुत जरूरी होता है... अन्यथा, उसके *दुष्परिणाम* सिर्फ स्वयं को ही नहीं.... अपने पूरे परिवेश को दुखी करते रहते हैं ।

संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है... जिसका " जहर " उसके " दांतों " में नही,
*"शब्दों " में है...

इसलिए शब्दों का प्रयोग सोच समझकर करिये। 
ऐसे शब्द का प्रयोग करिये... जिससे, किसी की भावना को ठेस ना पहुंचे।

Wednesday, February 20, 2019

नटखट श्री कृष्ण

माखन चोर नटखट श्री कृष्ण को रंगे हाथों पकड़ने के लिये एक ग्वालिन ने एक अनोखी जुगत भिड़ाई।

उसने माखन की मटकी के साथ एक घंटी बाँध दी, कि जैसे ही बाल कृष्ण माखन-मटकी को हाथ लगायेगा, घंटी बज उठेगी और मैं उसे रंगे हाथों पकड़ लूँगी।

बाल कृष्ण अपने सखाओं के साथ दबे पाँव घर में घुसे।

श्री दामा की दृष्टि तुरन्त घंटी पर पड़ गई और उन्होंने बाल कृष्ण को संकेत किया।

बाल कृष्ण ने सभी को निश्चिंत रहने का संकेत करते हुये, घंटी से फुसफसाते हुये कहा:-

"देखो घंटी, हम माखन चुरायेंगे, तुम बिल्कुल मत बजना"

घंटी बोली "जैसी आज्ञा प्रभु, नहीं बजूँगी"

बाल कृष्ण ने ख़ूब माखन चुराया अपने सखाओं को खिलाया - घंटी नहीं बजी।

ख़ूब बंदरों को खिलाया - घंटी नहीं बजी।

अंत में ज्यों हीं बाल कृष्ण ने माखन से भरा हाथ अपने मुँह से लगाया , त्यों ही घंटी बज उठी।

घंटी की आवाज़ सुन कर ग्वालिन दौड़ी आई। 
ग्वाल बालों में भगदड़ मच गई।
सारे भाग गये बस श्री कृष्ण पकड़ाई में आ गये।

बाल कृष्ण बोले - "तनिक ठहर गोपी , तुझे जो सज़ा देनी है वो दे दीजो , पर उससे पहले मैं ज़रा इस घंटी से निबट लूँ...क्यों री घंटी...तू बजी क्यो...मैंने मना किया था न...?"

घंटी क्षमा माँगती हुई बोली - "प्रभु आपके सखाओं ने माखन खाया , मैं नहीं बजी...आपने बंदरों को ख़ूब माखन खिलाया , मैं नहीं बजी , किन्तु जैसे ही आपने माखन खाया तब तो मुझे बजना ही था...मुझे आदत पड़ी हुई है प्रभु...मंदिर में जब पुजारी  भगवान को भोग लगाते हैं तब घंटियाँ बजाते हैं...इसलिये प्रभु मैं आदतन बज उठी और बजी..."

Monday, February 18, 2019

बेटी

एक पिता ने अपनी बेटी की सगाई करवाई~~!!
लड़का बड़े अच्छे घर से था!
तो पिता बहुत खुश हुए!
लड़के ओर लड़के के माता पिता का स्वभाव~~!!
बड़ा अच्छा था!
तो पिता के सिर से बड़ा बोझ उतर गया~~!!
एक दिन शादी से पहले!
लड़के वालो ने लड़की के पिता को खाने पे बुलाया~~!!

पिता की तबीयत ठीक नहीं थी~~!!
फिर भी वह ना न कह सके!
लड़के वालो ने बड़े ही आदर सत्कार से उनका स्वागत किया~~!!
फ़िर लडकी के पिता के लिए चाय आई~~!!
शुगर कि वजह से लडकी के पिता को चीनी वाली चाय से दुर रहने को कहा गया था~~!!

लेकिन लड़की के होने वाली ससुराल घर में थे तो चुप रह कर चाय हाथ में ले ली~~!!
चाय कि पहली चुस्की लेते ही वो चोक से गये!चाय में चीनी बिल्कुल ही नहीं थी~~!! 
और इलायची भी डली हुई थी!

वो सोच मे पड़ गये कि ये लोग भी हमारी जैसी ही चाय पीते हैं~~!!

दोपहर में खाना खाया वो भी बिल्कुल उनके घर जैसा दोपहर में आराम करने के लिए दो तकिये पतली चादर!उठते ही सोंफ का पानी पीने को दिया गया~~!!

वहाँ से विदा लेते समय उनसे रहा नहीं गया तो पुछ बैठे मुझे क्या खाना है~~!!
क्या पीना है!मेरी सेहत के लिए क्या अच्छा है!
ये परफेक्टली आपको कैसे पता है!
.
तो बेटी कि सास ने धीरे से कहा कि कल रात को ही आपकी बेटी का फ़ोन आ गया था~~!!

ओर उसने कहा कि मेरे पापा स्वभाव से बड़े सरल हैं!
बोलेंगे कुछ नहीं प्लीज अगर हो सके!
तो आप उनका ध्यान रखियेगा!
.
पिता की आंखों मे वहीँ पानी आ गया था~~!!
लड़की के पिता जब अपने घर पहुँचे तो घर के हाल में लगी अपनी स्वर्गवासी माँ के फोटो से हार निकाल दिया~~!!

जब पत्नी ने पूछा कि ये क्या कर रहे हो!
तो लडकी का पिता बोले-मेरा ध्यान रखने वाली मेरी माँ इस घर से कहीं नहीं गयी है~~!!
बल्कि वो तो मेरी बेटी!
के रुप में इस घर में ही रहती है!

और फिर पिता की आंखों से आंसू झलक गये ओर वो फफक कर रो पड़े

दुनिया में सब कहते हैं ना!
कि बेटी है
एक दिन इस घर को छोड़कर चली जायेगी!

मगर मैं दुनिया के सभी माँ-बाप से ये कहना चाहता हूँ
कि बेटी कभी भी अपने माँ-बाप के घर से नहीं जाती
बल्कि वो हमेशा उनके दिल में रहती है

Tuesday, February 12, 2019

पत्नि हो तो ऐैसी

बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ...इसलिए  बात-बात पर  अपनी माँ से झगड़ पड़ता था .... ये  वही माँ थी जो बेटे के  लिए पति से भी लड़ जाती थी।मगर अब फाइनेसिअली   इंडिपेंडेंट बेटा  पिता के कई बार समझाने पर भी  इग्नोर  कर देता और कहता, "यही तो उम्र है शौक की, खाने पहनने की, जब  आपकी तरह मुँह में दाँत और पेट में आंत ही नहीं रहेगी तो क्या करूँगा।"
बहू खुशबू  भी भरे पूरे परिवार से आई थी, इसलिए बेटे की गृहस्थी की खुशबू में रम गई थी। बेटे की नौकरी  अच्छी थी तो  फ्रेंड सर्किल  उसी हिसाब से मॉडर्न थी । बहू को अक्सर वह पुराने स्टाइल के कपड़े छोड़ कर मॉडर्न बनने को कहता, मगर बहू मना कर देती .....वो कहता "कमाल करती हो तुम, आजकल सारा ज़माना ऐसा करता है, मैं क्या कुछ नया कर रहा हूँ। तुम्हारे सुख के लिए सब कर रहा हूँ और तुम हो कि उन्हीं पुराने विचारों में अटकी हो। क्वालिटी लाइफ क्या होती है तुम्हें मालूम ही नहीं।"
और बहू कहती "क्वालिटी लाइफ क्या होती है, ये मुझे जानना भी नहीं है, क्योकि  लाइफ की क्वालिटी क्या हो, मैं इस बात में विश्वास रखती हूँ।"
आज अचानक पापा   आई. सी. यू. में एडमिट  हुए थे। हार्ट अटेक आया  था। डॉक्टर ने पर्चा पकड़ाया, तीन लाख और जमा करने थे। डेढ़ लाख का बिल तो पहले ही भर दिया था मगर अब ये तीन लाख भारी लग रहे थे। वह बाहर बैठा हुआ सोच रहा था कि अब क्या करे..... उसने कई दोस्तों को फ़ोन लगाया कि उसे मदद की जरुरत है, मगर किसी ने कुछ तो किसी ने कुछ बहाना कर दिया। आँखों में आँसू थे और वह उदास था।.....तभी खुशबू  खाने का टिफिन लेकर आई और बोली, "अपना ख्याल रखना भी जरुरी है। ऐसे उदास होने से क्या होगा? हिम्मत से काम लो, बाबू जी को कुछ नहीं होगा आप चिन्ता मत करो । कुछ खा लो  फिर पैसों का इंतजाम भी तो करना है आपको।.... मैं यहाँ बाबूजी के पास रूकती हूँ आप खाना खाकर पैसों का इंतजाम कीजिये। ".......पति की आँखों से टप-टप आँसू झरने लगे।
"कहा न आप चिन्ता मत कीजिये। जिन दोस्तों के साथ आप मॉडर्न पार्टियां करते हैं आप उनको फ़ोन  कीजिये , देखिए तो सही, कौन कौन मदद को आता हैं।"......पति खामोश और सूनी निगाहों से जमीन की तरफ़ देख रहा था। कि खुशबू का   का हाथ  उसकी पीठ  पर आ गया। और वह पीठ  को सहलाने लगी।
"सबने मना कर दिया। सबने कोई न कोई बहाना बना दिया खुशबू ।आज पता चला कि ऐसी दोस्ती तब तक की है जब तक जेब में पैसा है। किसी ने  भी  हाँ नहीं  कहा  जबकि उनकी पार्टियों पर मैंने लाखों उड़ा दिये।"
"इसी दिन के लिए बचाने को तो माँ-बाबा कहते थे। खैर, कोई बात नहीं, आप चिंता न करो, हो जाएगा सब ठीक। कितना जमा कराना है?"
"अभी तो तनख्वाह मिलने में भी समय है, आखिर चिन्ता कैसे न करूँ खुशबू ?"
"तुम्हारी ख्वाहिशों को मैंने सम्हाल रखा है।"
"क्या मतलब?"
"तुम जो नई नई तरह के कपड़ो और दूसरी चीजों के लिए मुझे पैसे देते थे वो सब मैंने सम्हाल रखे हैं। माँ जी ने फ़ोन पर बताया था, तीन लाख जमा करने हैं। मेरे पास दो लाख थे। बाकी मैंने अपने भैया से मंगवा लिए हैं। टिफिन में सिर्फ़ एक ही डिब्बे में खाना है बाकी में पैसे हैं।" खुशबू  ने थैला टिफिन सहित उसके हाथों में थमा दिया।

"खुशबू ! तुम सचमुच अर्धांगिनी हो, मैं तुम्हें मॉडर्न बनाना चाहता था, हवा में उड़ रहा था। मगर तुमने अपने संस्कार नहीं छोड़े.... आज वही काम आए हैं। "

सामने बैठी माँ के आँखो में आंसू थे  उसे आज  खुद के नहीं  बल्कि पराई माँ के संस्कारो पर नाज था  और वो  बहु के सर पर हाथ फेरती हुई ऊपरवाले का शुक्रिया अदा कर रही थी।

Sunday, February 10, 2019

मायने

एक   जंगल में दोपहर के वक्त एक खोह के बाहर एक खरगोश जल्दी-जल्दी अपने computer
 से कुछ टाइप कर रहा था l
तभी वहां एक लोमड़ी आई उसने खरगोश से पूछा ...
लोमड़ी - तुम क्या कर रहे हो ?
खरगोश - मैं थीसिस लिख रहा हूँ !
लोमड़ी - अच्छा ! किस बारे में लिख रहे हो ?
खरगोश - विषय है -- खरगोश किस तरह लोमड़ी को मार के खा जाता है ?

लोमड़ी - क्या बकवास है !! कोई मूर्ख भी बता देगा कि खरगोश कभी लोमड़ी को मार कर खा नहीं सकता ...

खरगोश - आओ मैं तुम्हें प्रत्यक्ष दिखाता हूँ  ...

ये कह कर खरगोश लोमड़ी के साथ खोह में घुस जाता है और कुछ मिनट बाद लोमड़ी की हड्डियाँ लेकर वापस आता है....

और दोबारा से टाइपिंग में व्यस्त हो जाता है..
थोड़ी देर बाद वहां एक भेड़िया घूमता-घामता आता है वो खरगोश से पूछता है ...
भेड़िया- क्या कर रहे हो इतने ध्यान से ....

खरगोश - थीसिस लिख रहा हूँ
भेड़िया - हा हा ह l!  किस बारे में जरा बताओ तो ?

खरगोश - विषय है - एक खरगोश किस तरह एक भेड़िये को खा गया ...

भेड़िया - गुस्से में .. मूर्ख ये कभी हो नहीं सकता ...

खरगोश - अच्छा !! आओ सबूत देता हूँ ..
और कह कर भेड़िये को उस खोह में ले गया ...

 थोड़ी देर बाद खरगोश भेड़िये की हड्डी लेकर बाहर आ गया....

और फिर टाइपिंग ...

उसी वक्त एक भालू वहां से गुजरा उसने पूछा ये हड्डियाँ कैसी पड़ी हैं ...

खरगोश ने कहा एक खरगोश ने इन्हें मार दिया ....

भालू हंसा ... और बोला मजाक अच्छा करते हो .. अब बताओ ये क्या लिख रहे हो .... ?

खरगोश - थीसिस लिख रहा हूँ ...एक खरगोश ने एक भालू को मार के कैसे खा लिया .....

भालू -- क्या कह रहे हो ?? ये कभी नहीं हो सकता !

खरगोश - चलो दिखाता हूँ ...

और खरगोश भालू को खोह में ले गया .....

जहां एक शेर बैठा था ......

इसी लिए ये मायने नहीं रखता कि आपकी थीसिस कितनी बकवास है या बेबुनियाद है

मायने रखता है ...
आपका गाइड कितना ताकतवर है 

Sunday, January 20, 2019

तकलीफ का स्वाद

एक बादशाह अपने कुत्ते के साथ नाव में यात्रा कर रहा था।

उस नाव में अन्य यात्रियों के साथ एक दार्शनिक भी था।*

कुत्ते ने कभी नौका में सफर नहीं किया था, इसलिए वह अपने को सहज महसूस नहीं कर पा रहा था।

वह उछल-कूद कर रहा था और किसी को चैन से नहीं बैठने दे रहा था।

मल्लाह उसकी उछल-कूद से परेशान था कि ऐसी स्थिति में यात्रियों की हड़बड़ाहट से नाव डूब जाएगी।

वह भी डूबेगा और दूसरों को भी ले डूबेगा।

परन्तु कुत्ता अपने स्वभाव के कारण उछल-कूद में लगा था।

ऐसी स्थिति देखकर बादशाह भी गुस्से में था, पर कुत्ते को सुधारने का कोई उपाय उन्हें समझ में नहीं आ रहा था।

नाव में बैठे दार्शनिक से रहा नहीं गया।

वह बादशाह के पास गया और बोला : "सरकार। अगर आप इजाजत दें तो मैं इस कुत्ते को भीगी बिल्ली बना सकता हूँ।"

 बादशाह ने तत्काल अनुमति दे दी।

दार्शनिक ने दो यात्रियों का सहारा लिया और उस कुत्ते को नाव से उठाकर नदी में फेंक दिया।

 कुत्ता तैरता हुआ नाव के खूंटे को पकड़ने लगा।

उसको अब अपनी जान के लाले पड़ रहे थे।

कुछ देर बाद दार्शनिक ने उसे खींचकर नाव में चढ़ा लिया।

वह कुत्ता चुपके से जाकर एक कोने में बैठ गया।

नाव के यात्रियों के साथ बादशाह को भी उस कुत्ते के बदले व्यवहार पर बड़ा आश्चर्य हुआ।

 बादशाह ने दार्शनिक से पूछा : "यह पहले तो उछल-कूद और हरकतें कर रहा था। अब देखो, कैसे यह पालतू बकरी की तरह बैठा है ?"

दार्शनिक बोला : "खुद तकलीफ का स्वाद चखे बिना किसी को दूसरे की विपत्ति का अहसास नहीं होता है। इस कुत्ते को जब मैंने पानी में फेंक दिया तो इसे पानी की ताकत और नाव की उपयोगिता समझ में आ गयी।"

Wednesday, January 9, 2019

बुद्धिमान व्यक्ति

एक गाँव में एक बुद्धिमान व्यक्ति रहता था। उसके पास 19 ऊंट थे। एक दिन उसकी मृत्यु हो गयी। मृत्यु के पश्चात वसीयत पढ़ी गयी। जिसमें लिखा था कि:

मेरे 19 ऊंटों में से आधे मेरे बेटे को, उसका एक चौथाई मेरी बेटी को, और उसका पांचवाँ हिस्सा मेरे नौकर को दे दिए जाएँ।

सब लोग चक्कर में पड़ गए कि ये बँटवारा कैसे हो ?

19 ऊंटों का आधा अर्थात एक ऊँट काटना पड़ेगा, फिर तो ऊँट ही मर जायेगा। चलो एक को काट दिया तो बचे 18 उनका एक चौथाई साढ़े चार- साढ़े चार फिर??

सब बड़ी उलझन में थे। फिर पड़ोस के गांव से एक बुद्धिमान व्यक्ति को बुलाया गया

वह बुद्धिमान व्यक्ति अपने ऊँट पर चढ़ कर आया, समस्या सुनी, थोडा दिमाग लगाया, फिर बोला इन 19 ऊंटों में मेरा भी ऊँट मिलाकर बाँट दो।

सबने पहले तो सोचा कि एक वो पागल था, जो ऐसी वसीयत कर के चला गया, और अब ये दूसरा पागल आ गया जो बोलता है कि उनमें मेरा भी ऊँट मिलाकर बाँट दो। फिर भी सब ने सोचा बात मान लेने में क्या हर्ज है।

19+1=20 हुए।

20 का आधा 10 बेटे को दे दिए।

20 का चौथाई 5 बेटी को दे दिए।

20 का पांचवाँ हिस्सा 4 नौकर को दे दिए।

10+5+4=19 बच गया एक ऊँट जो बुद्धिमान व्यक्ति का था वो उसे लेकर अपने गॉंव लौट गया।

सो हम सब के जीवन में 5 ज्ञानेंद्रियाँ, 5 कर्मेन्द्रियाँ, 5 प्राण, और 4 अंतःकरण चतुष्टय( मन,बुद्धि, चित्त, अहंकार) कुल 19 ऊँट होते हैं। सारा जीवन मनुष्य इन्हीं के बँटवारे में उलझा रहता है और जब तक उसमें आत्मा रूपी ऊँट नहीं मिलाया जाता यानी के आध्यात्मिक जीवन (आध्यात्मिक बुद्धिमत्ता) नहीं जिया जाता, तब तक सुख, शांति, संतोष व आनंद की प्राप्ति नहीं हो सकती।

Friday, January 4, 2019

कामयाबी आपके ख़ुशी में छुपी है

एक बार एक अमीर आदमी कहीं जा रहा होता है तो उसकी कार ख़राब हो जाती है। उसका कहीं पहुँचना बहुत जरुरी होता है। उसको दूर एक पेड़ के नीचे एक रिक्शा दिखाई देता है। वो उस रिक्शा वाले पास जाता है। वहा जाकर देखता है कि रिक्शा वाले ने अपने पैर हैंडल के ऊपर रखे होते है। पीठ उसकी अपनी सीट पर होती है और सिर जहा सवारी बैठती है उस सीट पर होती है ।

 और वो मज़े से लेट कर गाना गुन-गुना रहा होता है। वो अमीर व्यक्ति रिक्शा वाले को ऐसे बैठे हुए देख कर बहुत हैरान होता है कि एक व्यक्ति ऐसे बेआराम जगह में कैसे रह सकता है, कैसे खुश रह सकता है। कैसे गुन-गुना सकता है।

 वो उसको चलने के लिए बोलता है। रिक्शा वाला झट से उठता है और उसे 20 रूपए देने के लिए बोलता है।

  रास्ते में वो रिक्शा वाला वही गाना गुन-गुनाते हुए मज़े से रिक्शा खींचता है। वो अमीर व्यक्ति एक बार फिर हैरान कि एक व्यक्ति 20 रूपए लेकर इतना खुश कैसे हो सकता है। इतने मज़े से कैसे गुन-गुना सकता है। वो थोडा इर्ष्यापूर्ण  हो जाता है और रिक्शा वाले को समझने के लिए उसको अपने बंगले में रात को खाने के लिए बुला लेता है। रिक्शा वाला उसके बुलावे को स्वीकार कर देता है।

 वो अपने हर नौकर को बोल देता है कि इस रिक्शा वाले को सबसे अच्छे खाने की सुविधा दी जाए। अलग अलग तरह के खाने की सेवा हो जाती है। सूप्स, आइस क्रीम, गुलाब जामुन सब्जियां यानि हर चीज वहाँ मौजूद थी।

  वो रिक्शा वाला खाना शुरू कर देता है, कोई प्रतिक्रिया, कोई घबराहट बयान नहीं करता। बस वही गाना गुन-गुनाते हुए मजे से वो खाना खाता है। सभी लोगो को ऐसे लगता है जैसे रिक्शा वाला ऐसा खाना पहली बार नहीं खा रहा है। पहले भी कई बार खा चुका है। वो अमीर आदमी एक बार फिर हैरान एक बार फिर इर्ष्यापूर्ण कि कोई आम आदमी इतने ज्यादा तरह के व्यंजन देख के भी कोई हैरानी वाली प्रतिक्रिया क्यों नहीं देता और वैसे कैसे गुन-गुना रहा है जैसे रिक्शे में गुन-गुना रहा था।

 यह सब कुछ देखकर अमीर आदमी की इर्ष्या और बढती है।
अब वह रिक्शे वाले को अपने बंगले में कुछ दिन रुकने के लिए बोलता है। रिक्शा वाला हाँ कर देता है।

  उसको बहुत ज्यादा इज्जत दी जाती है। कोई उसको जूते पहना रहा होता है, तो कोई कोट। एक बेल बजाने से तीन-तीन नौकर सामने आ जाते है। एक बड़ी साइज़ की टेलीविज़न स्क्रीन पर उसको प्रोग्राम दिखाए जाते है। और एयर-कंडीशन कमरे में सोने के लिए बोला जाता है।

 अमीर आदमी नोट करता है कि वो रिक्शा वाला इतना कुछ देख कर भी कुछ प्रतिक्रिया नहीं दे रहा। वो वैसे ही साधारण चल रहा है। जैसे वो रिक्शा में था वैसे ही है। वैसे ही गाना गुन-गुना रहा है जैसे वो रिक्शा में गुन-गुना रहा था।

  अमीर आदमी के इर्ष्या बढ़ती चली जाती है और वह सोचता है कि अब तो हद ही हो गई। इसको तो कोई हैरानी नहीं हो रही, इसको कोई फरक ही नहीं पढ़ रहा। ये वैसे ही खुश है, कोई प्रतिक्रिया ही नहीं दे रहा।

 अब अमीर आदमी पूछता है: आप खुश हैं ना?
वो रिक्शा वाला कहते है: जी साहेब बिलकुल खुश हूँ।

  अमीर आदमी फिर पूछता है: आप आराम में  हैं ना ?
रिक्शा वाला कहता है: जी बिलकुल आरामदायक हूँ।

 अब अमीर आदमी तय करता है कि इसको उसी रिक्शा पर वापस छोड़ दिया जाये। वहाँ जाकर ही इसको इन बेहतरीन चीजो का एहसास होगा। क्योंकि वहाँ जाकर ये इन सब बेहतरीन चीजो को याद करेगा।

  अमीर आदमी अपने सेक्रेटरी को बोलता है की इसको कह दो कि आपने दिखावे के लिए कह दिया कि आप खुश हो, आप आरामदायक हो। लेकिन साहब समझ गये है कि आप खुश नहीं हो आराम में नहीं हो। इसलिए आपको उसी रिक्शा के पास छोड़ दिया जाएगा।”

 सेक्रेटरी के ऐसा कहने पर रिक्शा वाला कहता है: ठीक है सर, जैसे आप चाहे, जब आप चाहे।

  उसे वापस उसी जगह पर छोड़ दिया जाता है जहाँ पर उसका रिक्शा था।

 अब वो अमीर आदमी अपने गाड़ी के काले शीशे ऊँचे करके उसे देखता है।

  रिक्शे वाले ने अपनी सीट उठाई बैग में से काला सा, गन्दा सा, मेला सा कपड़ा निकाला, रिक्शा को साफ़ किया, मज़े में बैठ गया और वही गाना गुन-गुनाने लगा।

 अमीर आदमी अपने सेक्रेटरी से पूछता है: “कि चक्कर क्या है। इसको कोई फरक ही नहीं पड रहा इतनी आरामदायक वाली, इतनी बेहतरीन जिंदगी को ठुकरा के वापस इस कठिन जिंदगी में आना और फिर वैसे ही खुश होना, वैसे ही गुन-गुनाना।”

  फिर वो सेक्रेटरी उस अमीर आदमी को कहता है: “सर यह एक कामियाब इन्सान की पहचान है। एक कामियाब इन्सान वर्तमान में जीता है, उसको मनोरंजन (enjoy) करता है और बढ़िया जिंदगी की उम्मीद में अपना वर्तमान खराब नहीं करता।

 अगर उससे भी बढ़िया जिंदगी मिल गई तो उसे भी वेलकम करता है उसको भी मनोरंजन (enjoy) करता है उसे भी भोगता है और उस वर्तमान को भी ख़राब नहीं करता। और अगर जिंदगी में दुबारा कोई बुरा दिन देखना पड़े तो वो भी उस वर्तमान को उतने ही ख़ुशी से, उतने ही आनंद से, उतने ही मज़े से, भोगता है मनोरंजन करता है और उसी में आनंद लेता है।”

कामयाबी आपके ख़ुशी में छुपी है, और अच्छे दिनों की उम्मीद में अपने वर्तमान को ख़राब नहीं करें। और न ही कम अच्छे दिनों में ज्यादा अच्छे दिनों को याद करके अपने वर्तमान को ख़राब करना है।

Monday, December 31, 2018

कौशल भूल जाउंगा


एक बार इंद्र भगवान ने गुस्से मे आकर सभी को श्राप दे दिया कि 12 साल वो बरसात नही करेंगे जिससे लोग पानी को तरसेंगे... 

लोगो मे हाहाकार मच गया
बडे बडे देवो ने समझाया पर इंद्र भगवान नही माने....

बारिश का महीना आया , इंद्रदेव ने बारिश नही की
पर एक किसान अपने बच्चो के साथ खेत मे गया और खेती के वो सभी काम करने लगा जो बरसात से पहले किये जाते है साथ मे वो अपने बच्चो को भी समझा रहा था के काम कैसे किया जाये... 

इंद्रदेव को देख कर बहुत आश्चर्य हुआ कि 12 साल तक पानी नही बरसेगा फिर भी ये काम क्यूं कर रहा है ????

इंद्रदेव ब्राह्मण का रूप धर के उसके पास गये और कहा , हे किसान क्या तूमने श्रापित आकाशवाणी नही सुनी कि12 साल बरसात नही होगी??? फिर क्यू खेत जोत रहे हो??? 

किसान ने कहा सुनी थी ब्राह्मणदेवता

पर अगर मै और मेंरे बेटे 12 साल काम नही करेंगे तो हम भूल जायेगे कि खेती कैसे करते है फिर बारिश होगी तो भूखो मर जायेंगे इसलिये हम खेती कर रहे है....

इंद्रदेव की आंखे खुल गई
वो सोचने लगे 12 साल मे तो शायद मैं भी बारिश गिराने का कौशल भूल जाउंगा...... 

उन्होने तुरंत श्राप वापस लिया और बारिश करवा दी...

मोरल:- इस कहानी से हमे ये सीख मिलती है कि ...

हमें कितनी भी कडकी लगी हो या पैसे की तंगी हो ..

31 दिसंबर तो मनाना ही चाहिये.. नही तो जिस दिन पैसे आयेंगे हम पार्टी करना भूल गये होंगे.....

इतनी देर सब्र से पढने के लिये धन्यवाद

Thursday, December 27, 2018

लिफाफे

एक नव नियुक्त मैनेजर को पुराने मैनेजर ने जाते जाते तीन बन्द
लिफाफे दिये।
जिन पर क्रमशः १ २ ३ की गिनती लिखी थी 
और कहा कि जब कभी भी तुम्हें इस कार्यालय में कोई बड़ी समस्या आ जाए तो ये
१ नंबर का लिफाफा खोलना
और जब कभी दूसरी बड़ी समस्या आ जाए तो ये
२ नंबर का लिफाफा खोलना
और जब कभी तुम्हें तीसरी बड़ी समस्या आ जाए तो ये
३नंबर का लिफाफा खोलना

नव नियुक्त मैनेजर ने खुश होकर हामी भरी, और तीनों लिफाफों को संभाल कर रख लिया

काफी समय के बाद हेड अॉफिस ने बिजनेस नहीं बढ़ने पर काफी कड़ा पत्र लिखा 

मैनेजर साहब को कुछ सूझा नहीं कि मैनेजमेंट को क्या
जवाब दें। तभी उन्हें याद आया और उन्होंने लिफाफा नंबर १ खोला अंदर जो लेटर निकला उस पर लिखा था

*अपना सारा दोष पुराने मैनेजर के माथे डाल दो कि उसने कुछ किया नहीं अतः वह सब नये सिरे से ठीक कर रहा है!*

मैनेजर साहब ने वैसा ही कियाऔर समस्या टल गई

कुछ महीनों बाद  फिर वैसा ही पत्र आया कि टारगेट पूरे नहीं हो रहे हैं क्यों न उसके विरूद्घ कोई कार्यवाही की जाये? 

घबराकर मैनेजर साहब ने लिफाफा नंबर २ खोला

उसमें लिखा था कि जवाब दो कि 

*स्टाफ बराबर काम नहीं करता वह कुछ को हटा रहा है व कुछ को ट्रान्सफर कर रहा है,कार्यालय में भारी परिवर्तन कर रहा है* 

ऐसा लिख दो ""

मैनेजर साहब ने वैसा ही किया और मुसीबत फिर टल गई

कुछ समय पश्चात फिर प्रधान कार्यालय द्वारा बिजनेस नहीं बढ़ने पर भारी चिन्ता व्यक्त की गयी कि चेयरमैन साहब भी बहुत नाराज हैं

मैनेजर को तीसरे लिफाफे की याद आई

 उन्होंने लिफाफा नंबर ३ खोला उसमें
लिखा था
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. *अब तुम भी तीन लिफाफे बना लो.