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Sunday, May 17, 2026

आलस्य का नुकसान

एक छोटे से गाँव हरिपुर में सुरेश नाम का एक लड़का रहता था। सुरेश का परिवार बहुत साधारण था। उसके पिता किसान थे और माँ घर का काम संभालती थीं। सुरेश पढ़ने में तेज़ था, लेकिन उसमें एक बहुत बड़ी कमी थीवह बहुत आलसी था।

सुरेश का मन हमेशा काम को टालने में लगा रहता था। जब भी उसकी माँ उसे पढ़ने के लिए कहतीं, वह कहता,

माँ, अभी थोड़ा आराम कर लूँ, बाद में पढ़ लूँगा।

स्कूल का काम भी वह अक्सर आखिरी समय तक टालता रहता था। उसके शिक्षक कई बार उसे समझाते थे

सुरेश, अगर तुम आलस्य छोड़ दो, तो तुम बहुत आगे जा सकते हो।

लेकिन सुरेश उनकी बातों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता था।

एक दिन स्कूल में घोषणा हुई कि कुछ महीनों बाद वार्षिक परीक्षा होने वाली है। सभी बच्चे मेहनत से पढ़ाई करने लगे।

सुरेश ने भी सोचा कि वह पढ़ाई करेगा, लेकिन हर दिन वह यही सोचकर पढ़ाई टाल देता

अभी तो बहुत समय है, बाद में पढ़ लूँगा।

धीरे-धीरे दिन बीतते गए।

जब परीक्षा के केवल कुछ दिन बचे, तब सुरेश को घबराहट होने लगी। उसने जल्दी-जल्दी पढ़ाई करने की कोशिश की, लेकिन इतने कम समय में सब कुछ याद करना उसके लिए बहुत मुश्किल था।

परीक्षा के दिन सुरेश कई सवालों के जवाब नहीं दे पाया।

जब परिणाम आया, तो सुरेश परीक्षा में असफल हो गया।

यह देखकर उसे बहुत दुख हुआ। उसके माता-पिता भी निराश हो गए।

सुरेश को अब अपनी गलती का एहसास होने लगा।

एक दिन वह उदास होकर गाँव के पास वाले बगीचे में बैठा था। वहाँ एक बुज़ुर्ग किसान पेड़ों की देखभाल कर रहे थे।

किसान ने सुरेश से पूछा,

बेटा, तुम इतने उदास क्यों हो?”

सुरेश ने अपनी पूरी कहानी उन्हें बता दी।

किसान मुस्कुराए और बोले,

मैं तुम्हें एक छोटी-सी बात समझाता हूँ।

उन्होंने सुरेश को पास के दो खेत दिखाए।

पहले खेत में हरे-भरे पौधे लहलहा रहे थे।

दूसरे खेत में केवल सूखी घास और बंजर जमीन थी।

किसान ने कहा,

यह पहला खेत उस किसान का है जो रोज़ मेहनत करता है। वह समय पर बीज बोता है, पानी देता है और खेत की देखभाल करता है।

फिर उन्होंने दूसरे खेत की ओर इशारा करते हुए कहा,

और यह खेत उस किसान का है जो हमेशा आलस्य करता है। वह काम को टालता रहता है, इसलिए उसका खेत बंजर रह जाता है।

सुरेश किसान की बात ध्यान से सुन रहा था।

किसान ने आगे कहा,

बेटा, जीवन भी खेत की तरह होता है। अगर हम मेहनत और समय का सही उपयोग करें, तो सफलता की फसल उगती है। लेकिन अगर हम आलस्य करें, तो केवल असफलता ही मिलती है।

सुरेश को यह बात दिल से समझ आ गई।

उसने उसी दिन फैसला किया कि अब वह आलस्य छोड़कर मेहनत करेगा।

अगले दिन से ही उसने अपनी दिनचर्या बदल दी।

वह सुबह जल्दी उठता, समय पर स्कूल जाता और रोज़ मन लगाकर पढ़ाई करता।

धीरे-धीरे उसकी आदतें बदलने लगीं।

शिक्षक भी उसकी मेहनत देखकर खुश थे।

अगले साल जब फिर से परीक्षा हुई, तो सुरेश ने बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए।

अब वह कक्षा के सबसे अच्छे विद्यार्थियों में गिना जाने लगा।

उसके माता-पिता भी बहुत खुश थे।

सुरेश ने समझ लिया था कि आलस्य सफलता का सबसे बड़ा दुश्मन होता है।

उस दिन के बाद उसने कभी भी अपने काम को टालने की आदत नहीं अपनाई।

गाँव के लोग अब बच्चों को सुरेश की कहानी सुनाते और कहते

जो इंसान आलस्य को छोड़कर मेहनत करता है, वही जीवन में आगे बढ़ता है।

और सच ही कहा गया है

आलस्य इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी है, जबकि मेहनत उसकी सबसे बड़ी ताकत है।

सीख:

हमें कभी भी आलस्य नहीं करना चाहिए। समय पर मेहनत करने वाला व्यक्ति ही जीवन में सफलता प्राप्त करता है।

Friday, May 8, 2026

मेहनती लकड़हारा

बहुत समय पहले एक छोटे से गाँव सुंदरपुर में रामदास नाम का एक लकड़हारा रहता था।वह बहुत गरीब थालेकिन बेहद मेहनती और ईमानदार इंसान था। उसका काम जंगल सेलकड़ी काटकर गाँव और बाजार में बेचने का था। उसी से वह अपने परिवार का गुज़ाराकरता था

रामदास के परिवार में उसकी पत्नी और दो छोटे बच्चे थे। घर बहु साधारण थालेकिन परिवार में प्यार और संतोष था। रामदास हमेशा अपने बच्चों से कहता था,
बेटाजीवन में अगर मेहनत और मानदारी होतो इंसान कभी भूखा नहीं रहता।

रामदास रोज़ सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाता था। वह अपनी कुल्हाड़ी उठाताऔर जंगल की ओर निकल पड़ता। पूरे दिन मेहनत करके लकड़ी काटता और शामको उसे बाजार में बेच देता।

गाँव के कई लोग उसकी मेहनत देखकर कहते थे,
रामदास बहुत मेहनती आदमी है।  कभी काम से पीछे नहीं हटता।

एक दिन की बात है।

रामदास हमेशा की तरह जंगल में कड़ी काटने गया हुआ था। जंगल के बीचों-बीचएक नदी बहती थी। रामदास नदी के किनारे खड़े होकर पेड़ की सूखी टहनियाँ काटरहा था।

अचानक उसका हाथ फिसल गया और उसकी कुल्हाड़ी नदी में गिर गई

रामदास बहुत घबरा गया।

उसने नदी में झाँककर अपनी कुल्हाड़ी ढूँढने की कोशिश कीलेकि नदी बहुत गहरीथी। उसे अपनी कुल्हाड़ी दिखाई नहीं दी।

रामदास दुखी होकर नदी किनारे बै गया और सोचने लगा
अगर मेरी कुल्हाड़ी नहीं मिली, तो मैं लकड़ी कैसे काटूँगाऔर अगर मैं लकड़ी नहींकाट पायातो अपने परिवार का पालन-पोषण कैसे करूँगा?”

यह सोचकर उसकी आँखों में आँसू  गए।

तभी अचानक नदी से एक देवी प्रकट हुईं।

देवी ने रामदास से पूछा,
तुम इतने दुखी क्यों होलकड़हारे?”

रामदास ने हाथ जोड़कर कहा,
माँमेरी कुल्हाड़ी नदी में गि गई है। वही मेरे काम का एकमात्र साधन थी। अब मैंक्या करूँगा?”

देवी ने मुस्कुराकर कहा,
घबराओ मत। मैं तुम्हारी मदद करती हूँ।

इतना कहकर देवी नदी में डुबकी गाकर नीचे गईं और थोड़ी देर बाद सोने कीकुल्हाड़ी लेकर बाहर आईं

उन्होंने रामदास से पूछा,
क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?”

रामदास ने तुरंत सिर हिलाते हुए कहा,
नहीं माँयह मेरी कुल्हाड़ी हीं है। मेरी कुल्हाड़ी तो लोहे की थी।

देवी फिर नदी में गईं और इस बार चाँदी की कुल्हाड़ी लेकर आईं।

उन्होंने पूछा,
क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?”

रामदास ने फिर विनम्रता से कहा,
नहीं माँयह भी मेरी कुल्हाड़ी नहीं है।

देवी तीसरी बार नदी में गईं और इस बार लोहे की पुरानी कुल्हाड़ी लेकर बाहर आईं।

रामदास खुशी से बोला,
हाँ माँयही मेरी कुल्हाड़ी है

देवी रामदास की ईमानदारी और सच्चाई देखकर बहुत खुश हुईं।

उन्होंने कहा,
रामदासतुम बहुत ईमानदार और मेहनती इंसान हो। इसलिए मैं तुम्हें इन तीनोंकुल्हाड़ियों को उपहार में देती हूँ।

रामदास यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गया।

उसने हाथ जोड़कर देवी को धन्यवा दिया और खुशी-खुशी अपने घर लौ आया।

गाँव के लोगों ने जब यह कहानी सुनीतो वे बहुत हैरान हुए।

गाँव में एक और लकड़हारा था जिसका नाम धनराज था। वह लालची और चालाकथा।

जब उसने रामदास की कहानी सुनीतो उसने सोचा
अगर मैं भी अपनी कुल्हाड़ी नदी में गिरा दूँतो शायद मुझे भी सोने-चाँदी कीकुल्हाड़ी मिल जाए।

अगले दिन वह भी जंगल गया और जानबूझकर अपनी कुल्हाड़ी नदी में फेंक दी।

फिर वह जोर-जोर से रोने लगा।

कुछ देर बाद वही देवी प्रकट हुईं और उन्होंने उससे पूछा,
तुम क्यों रो रहे हो?”

धनराज ने झूठ बोलते हुए कहा,
माँमेरी कुल्हाड़ी नदी में गि गई है।

देवी नदी में गईं और सोने की कुल्हाड़ी लेकर बाहर आईं।

धनराज लालच में तुरंत बोला,
हाँ माँयही मेरी कुल्हाड़ी है

देवी को उसकी चालाकी समझ में  गई।

वे नाराज़ होकर बोलीं,
तुम झूठ बोल रहे हो और लालच कर रहे हो। इसलिए तुम्हें कुछ भी नहीं मिलेगा।

इतना कहकर देवी गायब हो गईं।

धनराज को अपनी असली कुल्हाड़ी भी नहीं मिली और उसे खाली हाथ घर लौटनापड़ा।

उधर रामदास अपनी मेहनत और ईमानदारी से खुशहाल जीवन जीने लगा।

गाँव के लोग अक्सर बच्चों को उसकी कहानी सुनाते और कहते
मेहनत और ईमानदारी का फल हमेशा मीठा होता है।

और सच ही कहा गया है
मेहनत और सच्चाई इंसान को जीवन में सच्ची सफलता दिलाती हैं।

सीख:
हमें हमेशा मेहनत और ईमानदारी का रास्ता अपनाना चाहिए। लालच और झूठ अंत मेंहमेशा नुकसान ही पहुँचाते हैं।