एक छोटे से गाँव हरिपुर में सुरेश नाम का एक लड़का रहता था। सुरेश का परिवार बहुत साधारण था। उसके पिता किसान थे और माँ घर का काम संभालती थीं। सुरेश पढ़ने में तेज़ था, लेकिन उसमें एक बहुत बड़ी कमी थी—वह बहुत आलसी था।
सुरेश का मन हमेशा काम को टालने में लगा रहता था। जब भी उसकी माँ उसे पढ़ने के लिए कहतीं, वह कहता,
“माँ, अभी थोड़ा आराम कर लूँ, बाद में पढ़ लूँगा।”
स्कूल का काम भी वह अक्सर आखिरी समय तक टालता रहता था। उसके शिक्षक कई बार उसे समझाते थे—
“सुरेश, अगर तुम आलस्य छोड़ दो, तो तुम बहुत आगे जा सकते हो।”
लेकिन सुरेश उनकी बातों को ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता था।
एक दिन स्कूल में घोषणा हुई कि कुछ महीनों बाद वार्षिक परीक्षा होने वाली है। सभी बच्चे मेहनत से पढ़ाई करने लगे।
सुरेश ने भी सोचा कि वह पढ़ाई करेगा, लेकिन हर दिन वह यही सोचकर पढ़ाई टाल देता—
“अभी तो बहुत समय है, बाद में पढ़ लूँगा।”
धीरे-धीरे दिन बीतते गए।
जब परीक्षा के केवल कुछ दिन बचे, तब सुरेश को घबराहट होने लगी। उसने जल्दी-जल्दी पढ़ाई करने की कोशिश की, लेकिन इतने कम समय में सब कुछ याद करना उसके लिए बहुत मुश्किल था।
परीक्षा के दिन सुरेश कई सवालों के जवाब नहीं दे पाया।
जब परिणाम आया, तो सुरेश परीक्षा में असफल हो गया।
यह देखकर उसे बहुत दुख हुआ। उसके माता-पिता भी निराश हो गए।
सुरेश को अब अपनी गलती का एहसास होने लगा।
एक दिन वह उदास होकर गाँव के पास वाले बगीचे में बैठा था। वहाँ एक बुज़ुर्ग किसान पेड़ों की देखभाल कर रहे थे।
किसान ने सुरेश से पूछा,
“बेटा, तुम इतने उदास क्यों हो?”
सुरेश ने अपनी पूरी कहानी उन्हें बता दी।
किसान मुस्कुराए और बोले,
“मैं तुम्हें एक छोटी-सी बात समझाता हूँ।”
उन्होंने सुरेश को पास के दो खेत दिखाए।
पहले खेत में हरे-भरे पौधे लहलहा रहे थे।
दूसरे खेत में केवल सूखी घास और बंजर जमीन थी।
किसान ने कहा,
“यह पहला खेत उस किसान का है जो रोज़ मेहनत करता है। वह समय पर बीज बोता है, पानी देता है और खेत की देखभाल करता है।”
फिर उन्होंने दूसरे खेत की ओर इशारा करते हुए कहा,
“और यह खेत उस किसान का है जो हमेशा आलस्य करता है। वह काम को टालता रहता है, इसलिए उसका खेत बंजर रह जाता है।”
सुरेश किसान की बात ध्यान से सुन रहा था।
किसान ने आगे कहा,
“बेटा, जीवन भी खेत की तरह होता है। अगर हम मेहनत और समय का सही उपयोग करें, तो सफलता की फसल उगती है। लेकिन अगर हम आलस्य करें, तो केवल असफलता ही मिलती है।”
सुरेश को यह बात दिल से समझ आ गई।
उसने उसी दिन फैसला किया कि अब वह आलस्य छोड़कर मेहनत करेगा।
अगले दिन से ही उसने अपनी दिनचर्या बदल दी।
वह सुबह जल्दी उठता, समय पर स्कूल जाता और रोज़ मन लगाकर पढ़ाई करता।
धीरे-धीरे उसकी आदतें बदलने लगीं।
शिक्षक भी उसकी मेहनत देखकर खुश थे।
अगले साल जब फिर से परीक्षा हुई, तो सुरेश ने बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए।
अब वह कक्षा के सबसे अच्छे विद्यार्थियों में गिना जाने लगा।
उसके माता-पिता भी बहुत खुश थे।
सुरेश ने समझ लिया था कि आलस्य सफलता का सबसे बड़ा दुश्मन होता है।
उस दिन के बाद उसने कभी भी अपने काम को टालने की आदत नहीं अपनाई।
गाँव के लोग अब बच्चों को सुरेश की कहानी सुनाते और कहते—
“जो इंसान आलस्य को छोड़कर मेहनत करता है, वही जीवन में आगे बढ़ता है।”
और सच ही कहा गया है—
“आलस्य इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी है, जबकि मेहनत उसकी सबसे बड़ी ताकत है।”
सीख:
हमें कभी भी आलस्य नहीं करना चाहिए। समय पर मेहनत करने वाला व्यक्ति ही जीवन में सफलता प्राप्त करता है।
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