एक छोटे गाँव में अंशुल नाम का लड़का रहता था। अंशुल हमेशा दूसरों के मुकाबले खुद को छोटा और कमजोर समझता था। वह सोचता, “मैं कुछ बड़ा नहीं कर सकता। मेरे जैसे लोग कभी सफल नहीं होते।” यही नकारात्मक सोच उसे हमेशा पीछे खींचती रही।
एक दिन उसके स्कूल में शिक्षक ने कक्षा में एक गतिविधि कराई। उन्होंने बच्चों से कहा, “सोचो कि तुम कुछ भी कर सकते हो। अगर तुम सकारात्मक सोचो और मेहनत करो, तो कोई भी मुश्किल तुम्हें रोक नहीं सकती।” अंशुल ने पहली बार महसूस किया कि उसकी सोच ही उसे सीमित कर रही थी।
उस रात अंशुल ने सोचा, “अगर मैं सकारात्मक सोचूँ और अपने आप पर विश्वास रखूँ, तो मैं भी कुछ कर सकता हूँ।” उसने तय किया कि वह अपनी सोच बदलकर खुद को और बेहतर बनाएगा।
अंशुल ने छोटे-छोटे कदम उठाना शुरू किया। उसने पढ़ाई में अधिक ध्यान दिया, नई चीज़ें सीखने की कोशिश की, और अपने डर और संकोच को पीछे छोड़ दिया। पहले थोड़ी कठिनाई हुई, लेकिन धीरे-धीरे अंशुल की मेहनत रंग लाने लगी। उसके अंक सुधरने लगे और उसके शिक्षक भी उसके बदलते नजरिए को देखकर खुश हुए।
समय बीतता गया, और अंशुल ने अपनी सकारात्मक सोच को और मजबूत किया। उसने अपने गाँव के बच्चों के लिए एक छोटी पुस्तकालय खोली और उन्हें पढ़ाई और ज्ञान के लिए प्रेरित किया। बच्चों को देखकर अंशुल को यह समझ में आया कि सकारात्मक सोच न केवल उसे बदल रही है, बल्कि दूसरों की ज़िंदगी पर भी असर डाल रही है।
अंशुल की कहानी यह सिखाती है कि हमारी सोच हमारे जीवन का सबसे बड़ा हिस्सा है। अगर हम नकारात्मक सोचें, तो हम अपने सपनों से दूर हो जाते हैं। लेकिन अगर हम सकारात्मक सोचें, तो हमारे भीतर अद्भुत शक्ति और आत्मविश्वास जागृत होता है। हमारी सोच ही हमें नए विचार, नए लक्ष्य और नई सफलताएँ देती है।
इसलिए हर व्यक्ति को अपनी सोच पर ध्यान देना चाहिए। हर सुबह खुद से कहो, “मैं कर सकता हूँ, मैं सक्षम हूँ, मैं अपने सपनों को पूरा करूँगा।” इस तरह की सोच न केवल जीवन में बदलाव लाती है, बल्कि व्यक्ति को मानसिक रूप से मजबूत और खुशहाल भी बनाती है।
अंशुल ने साबित कर दिया कि जो हम सोचते हैं, वही हम बन जाते हैं। उसकी कहानी युवाओं और छात्रों के लिए एक प्रेरणा बन गई। यह दिखाती है कि अगर हम अपने विचारों को सकारात्मक बनाए रखें और मेहनत के साथ आगे बढ़ें, तो कोई भी मुश्किल हमें रोक नहीं सकती।
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