विजय एक छात्र था जो हमेशा बड़े सपने देखता था। उसका लक्ष्य था कि वह एक एथलीट बने और स्कूल का नाम रोशन करे। लेकिन शुरुआत में जब वह दौड़ प्रतियोगिताओं में भाग लेता, तो कई बार हार जाता। दोस्त हँसते, शिक्षक भी कहते – “तुम्हें और मेहनत करनी होगी।”
विजय निराश तो हुआ, पर हार नहीं मानी। हर हार के बाद वह और ज़्यादा अभ्यास करता। कभी चोट लगती, कभी थकान तोड़ देती, पर वह उठ खड़ा होता और फिर से दौड़ना शुरू कर देता।
आख़िरकार, एक दिन उसने ज़िले की प्रतियोगिता में पहला स्थान हासिल किया। मंच पर खड़े होकर विजय ने महसूस किया कि असली उपलब्धि पदक जीतना नहीं, बल्कि हर गिरावट के बाद उठकर आगे बढ़ना था।
तभी उसने अपने दोस्तों से कहा –
"जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि हम कितनी ऊँचाई पर पहुँचे, बल्कि यह है कि कितनी बार गिरकर भी हम उठ खड़े हुए।"
उसकी कहानी ने स्कूल के हर बच्चे को सिखाया कि सच्ची सफलता लगातार प्रयास और धैर्य में छिपी होती है
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