Friday, May 20, 2016

कैरियर का भूत

मियां-बीबी दोनों मिल खूब कमाते हैं  तीस लाख का पैकेज दोनों ही पाते हैंसुबह आठ बजे नौकरियों पर जाते हैं  रात ग्यारह तक ही वापिस आते है. अपने परिवारिक रिश्तों से कतराते हैं. अकेले रह कर वह  कैरियर  बनाते हैं  कोई कुछ मांग न ले वो मुंह छुपाते हैं  भीड़ में रहकर भी अकेले रह जाते हैं  मोटे वेतन की नौकरी छोड़ नहीं पाते हैं
अपने नन्हे मुन्ने को पाल  नहीं पाते हैं  फुल टाइम की मेड ऐजेंसी से लाते  हैं. उसी के जिम्मे वो बच्चा छोड़ जाते है  परिवार को उनका बच्चा नहीं जानता है केवल आया'आंटी को ही पहचानता है  दादा -दादी, नाना-नानी कौन होते  है?  अनजान है सबसे किसी को न मानता है. आया ही नहलाती है आया ही खिलाती है  टिफिन भी रोज़ रोज़ आया ही बनाती है
यूनिफार्म पहना के स्कूल कैब में बिठाती हैछुट्टी के बाद कैब से आया ही घर लाती है नींद जब आती है तो आया ही सुलाती है  जैसी भी उसको आती है लोरी सुनाती है उसे सुलाने में अक्सरवोभीसोजातीहैकभी.जब मचलता है तो टीवी दिखाती जो टीचर मैम बताती है वही वो मानता है देसी खाना छोड कर पीजा बर्गर खाता  है वीक ऐन्ड पर मौल में पिकनिक मनाता है संडे की छुट्टी मौम-डैड के  संग बिताता है  वक्त नहीं रुकता है तेजी से गुजर जाता है. वह स्कूल से निकल के कालेज में आता है  कान्वेन्ट में पढ़ने पर इंडिया कहाँ भाता है आगे पढाई करने वह विदेश चला जाता है. वहाँ नये दोस्त बनते हैं उनमें रम जाता है
मां-बाप के पैसों से ही खर्चा चलाता है  धीरे-धीरे वहीं की संस्कृति में रंग जाता है  मौम डैड से रिश्ता पैसों का रह जाता है  कुछ  दिन में उसे काम वहीं मिल जाता है  जीवन साथी शीघ्र ढूंढ वहीं बस जाता है  माँ बाप ने जो देखा ख्वाब वो टूट जाता है
बेटे के दिमाग में भी कैरियर रह जाता है  बुढ़ापे में माँ-बाप अब अकेले रह जाते हैं  जिनकी अनदेखी की उनसे आँखें चुराते हैं क्यों इतना कमाया ये सोच के पछताते हैं  घुट घुट कर जीते हैं खुद से भी शरमाते हैं  हाथ पैर ढीले हो जाते, चलने में दुख पाते हैं  दाढ़- दाँत गिर जाते, मोटे चश्मे लग जाते हैं. कमर भी झुक जाती, कान नहीं सुन पाते हैं वृद्धाश्रम में दाखिल हो, जिंदा ही मर जाते हैं  सोचना की बच्चे अपने लिए पैदा कर रहे हो या विदेश की सेवा के लिए।  बेटा एडिलेड में, बेटी है न्यूयार्क।  ब्राईट बच्चों के लिए, हुआ बुढ़ापा डार्क।  बेटा डालर में बंधा, सात समन्दर पार  चिता जलाने बाप की, गए पड़ोसी चार।
ऑन लाईन पर हो गए, सारे लाड़ दुलार।  दुनियां छोटी हो गई, रिश्ते हैं बीमार।  बूढ़ा-बूढ़ी आँख में, भरते खारा नीर।
हरिद्वार के घाट की, सिडनी में तकदीर ।

Thursday, May 19, 2016

माँ- बाप का दिल

दम्पति ने कहा "बेटा हमें फेसबुक का अकाउंट बना दो।"लड़के ने कहा- "लाइये अभी बना देता हूँ, कहिये किस नाम से बनाऊँ?" बुजुर्ग ने कहा- "लड़की के नाम से कोई भी अच्छा सा ना रख लो।"  लड़का ने अचम्भे से पूछा- "फेक अकाउंट क्यों ??" बुजुर्ग ने कहा- "बेटा, पहले बना तो दो फिर बताता हूँ क्यों ?? बड़ो का मान करना उस लड़के ने सीखा था तो उसने अकाउंट बना ही दिया।अब उसने पूछा- "अंकल जी, प्रोफाइल इमेज क्या रखूँ?" तो बुजुर्ग ने कहा- "कोई भी हीरोइन जो आजकल के बच्चों को अच्छी लगती हो।" उस लड़के ने गूगल से इमेज सर्च करके डाल दी, फेसबुक अकाउंट ओपन हो गया। फिर बुजुर्ग ने कहा- "बेटा कुछ अच्छे लोगो को ऐड कर दो।" लड़के ने कुछ अच्छे लोगो को रिक्वेस्ट सेंड कर दी। फिर बुजुर्ग ने अपने बेटे का नाम सर्च करवा के रिक्वेस्ट सेंड करवा दी। . लड़का जो वो कहते करता गया जब काम पूरा हो गया तो. उसने कहा....
"अंकल जी अब तो आप बता दीजिये आपने ये फेक अकाउंट  क्यों बनवाया?" बुजुर्ग की आँखे नम हो गयी, उनकी पत्नी की आँखों से तो  आँसू बहने लगे।  उन्होंने कहा- "मेरा एक ही बेटा है और शादी के बाद वो हमसे अलग रहने लगा। सालो बीत गए वो हमारे पास नहीं. आता। शुरू शुरू में हम उसके पास जाते थे तो वो नाराज हो जाता था। कहता आपको मेरी पत्नी पसंद नहीं करती। आप अपने घर में रहिये, हमें चैन से यहाँ रहने दीजिये। कितना अपमान. सहते इसलिए बेटे के यहाँ जाना छोड़ दिया। एक पोता है और एक प्यारी पोती है, बस उनको देखने का बड़ा मन करता है। किसी ने कहा कि फेसबुक में लोग अपने फैमिली की और फंक्शन की इमेज डालते है, तो सोचा फेसबुक में ही अपने बेटे से जुड़कर उसकी फैमिली के बारे में जान लेंगे. और अपने पोता पोती को भी देख लेंगे, मन को शांति मिल जाएगी। अब अपने नाम से तो अकाउंट बना नहीं सकते। वो हमें ऐड करेगा नहीं, इसलिए हमने ये फेक अकाउंट बनवाया।" बुजुर्ग दंपत्ति के नम आँखों को उनके पत्नी के बहते आँसुओं को देखकर उस लड़के का दिल भर आया और सोचने लगा कि माँ- बाप का दिल कितना बड़ा होता है जो औलाद के कृतघ्न होने के बाद भी उसे प्यार करते हैं और औलाद कितनी जल्दी माँ- बाप के प्यार और त्याग को भूल जाती है। 

Monday, May 16, 2016

बीतता हुए समय

एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी !

गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी क्योंकि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था।

गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ 
वैसे ही उसे याद आता,
कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा -
गिलहरी फिर काम पर लग जाती !

गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं पर उसे अखरोट याद आ जाता,
और वो फिर काम पर लग जाती !

ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था !

ऐसे ही समय बीतता रहा....

एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया !

गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के ?
पूरी जिन्दगी काम करते - करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे !

यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है !

इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है !
६० वर्ष की ऊम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है, तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है।

क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : -

कितनी इच्छायें मरी होंगी ?
कितनी तकलीफें मिली होंगी ?
कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे ?

क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके !

इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके।

इसलिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो।

Saturday, May 14, 2016

खुश होकर जियो

एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी !
गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी क्योंकि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था।  गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ   वैसे ही उसे याद आता,  कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा -  गिलहरी फिर काम पर लग जाती !
गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं पर उसे अखरोट याद आ जाता,  और वो फिर काम पर लग जाती !   ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था !   ऐसे ही समय बीतता रहा....   एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया !   गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के ?  पूरी जिन्दगी काम करते - करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे ! यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है !  इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है !  ६० वर्ष की ऊम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है, तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है। क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : -   कितनी इच्छायें मरी होंगी ?  कितनी तकलीफें मिली होंगी ?  कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे ?
क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके ! इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके।
इसलिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो।

Friday, May 13, 2016

उसकी प्रार्थनाऐं

एक गरीब आदमी राह पर चलते भिखारियों को देखकर हमेंशा दु:खी होता और भगवान से प्रार्थना करता कि:
हे भगवान! मुझे इस लायक तो बनाता कि मैं इन बेचारे भिखारियों को कम से कम 1 रूपया दे सकता।
भगवान ने उसकी सुन ली और उसे एक अच्‍छी Multi-National Company में कम्‍पनी में Job मिल गई। अब उसे जब भी कोई भिखारी दिखाई देता, वह उन्‍हें 1 रूपया अवश्‍य देता, लेकिन वह 1 रूपया देकर सन्‍तुष्‍ट नहीं था। इसलिए वह जब भी भिखारियों को 1 रूपए का दान देता, ईश्‍वर से प्रार्थना करता कि:
हे भगवान! 1 रूपए में इन बेचारों का क्‍या होगा? कम से कम मुझे ऐसा तो बनाता कि मैं इन बेचारे भिखारियों को 10 रूपया दे सकता। एक रूपए में आखिर होता भी क्‍या है।
संयोग से कुछ समय बाद उसी MNC में उसकी तरक्‍की हो गई और वह उसी कम्‍पनी में Manager बन गया, जिससे उसका Standard High होगा। उसने अच्‍छी सी महंगी Car खरीद ली, बडा घर बनवा लिया। फिर भी उसे जब भी कोई भिखारी दिखाई देता, वह अपनी अपनी कार रोककर उन्‍हें 100 रूपया दे देता, मगर फिर भी उसे खुशी नहीं थी। वह अब भी भगवान से प्रार्थना करता कि:
100 रूपए में इन बेचारों का क्‍या भला होता होगा? काश मैं ऐसा बन पाता कि जो भी भिखारी मेरे सामने से गुजरता, वो भिखारी ही न रह जाता।
संयोग से नियति ने फिर उसका साथ दिया और वो Corporate जगत का Chairman चुन लिया गया। अब उसके पास धन की कोई कमी नहीं थी। मंहगी Car, बंगला, First Class AC Rail Ticket आदि उसके लिए अब पुरानी बातें हो चुकी थीं। अब वह हमेंशा अपने स्‍वयं के Private हवाई जहाज में ही सफर करता था और एक शहर से दूसरे शहर नहीं बल्कि एक देश से दूसरे देश में घूमता था, लेकिन उसकी प्रार्थनाऐं अभी भी वैसी ही थीें, जैसी तब थीं, जब वह एक गरीब व्‍यक्ति था।

Wednesday, May 11, 2016

मार्गदर्शक

दोस्तों आप दुनिया के सबसे अमिर इन्सान को जानते ही होगे उनका नाम है ‘बिल गेट्स’, एक दिन बिल गेट्स् एक होटल उनके दोस्त के साथ मै खाना खाने गये, खाना खाने बाद वह काम करने वाला वेटर बिल लेकर आया तभी बिल गेट्स् ने खाये हुये खाने का बिल दिया और साथ मे अच्छी सर्विस देने के लिए वेटर 10 डॉलर टिप भी दी, और वहा से निकालने लगे लेकिन वेटर उनके तरफ देखता रहा और वो बात गेट्स के समज में आयी बिल गेट्स् ने इसके लिये वेटर को पूछा – क्यू भाई क्या हुआ तुम मुझे ऐसे घुर क्यू रहे हो…. ?
तो वेटर ने जवाब दिया – की अभी कुछ दिन पहले की ही बात है हमारे यहाँ इसी होटल में आपकी बेटी आयी थी उसने और उसके कुछ दोस्तों ने यहाँ खाना खाया था, और जाते वक्त मुझे टिप में 100 डॉलर दिये थे, और आप उनके पिता दुनिया के सबसे अमीर इन्सान होकर भी मुझे केवल 10 डॉलर टिप दी है.
तभी थोडा हसकर बिल गेट्स् जी ने जवाब दिया – हां भाई, क्योकि वो दुनिया के सबसे आमिर इन्सान कि बेटी है और मै एक गरीब इन्सान का बेटा हूं.
मुझे मेरा अतीत हमेशा याद रहता है, क्योकि वह मेरा मार्गदर्शक है और मैं उसे कभी नहीं भूलता.

Saturday, April 23, 2016

अत्यधिक लाभ का फल

एक बार पंक्षियों का राजा अपने दल के साथ भोजन की खोज में एक जंगल में गया।

'जाओ और जाकर दाने और बीज ढूंढ़ो। मिले तो बताना। सब मिलकर खाएगें।' राजा ने पंक्षियों को आदेश दिया।
सभी पक्षी दानों की तलाश में उधर निकल पड़े। उड़ते-उड़ते एक चिड़िया उस सड़क पर आ गई जहां से गाड़ियों में लदकर अनाज जाता था। उसने सड़क पर अनाज बिखरा देखा। उसने सोचा कि वह राजा को इस जगह के बारे में नहीं बताएगी। पर किसी और चिड़िया ने इधर आकर यह अनाज देख लिया तो...? ठीक है, बता भी दूंगी लेकिन यहां तक नहीं पहुंचने दूंगी।
वह वापस अपने राजा के पास पहुंच गई। उसने वहां जाकर बताया कि राजमार्ग पर अनाज के ढेरों दाने पड़े हैं। लेकिन वहां खतरा बहुत है।
तब राजा ने कहा कि कोई भी वहां न जाए।
इस तरह सब पक्षियों ने राजा की बात मान ली।
वह चिड़िया चुपचाप अकेली ही राजमार्ग की ओर उड़ चली और जाकर दाने चुगने लगी। अभी कुछ ही देर बीती कि उसने देखा एक गाड़ी तेजी से आ रही थी।
चिड़िया ने सोचा, गाड़ी तो अभी दूर है। क्यों न दो-चार दाने और चुग लूं। देखते-देखते गाड़ी चिड़िया के उपर से गुजर गई और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
उधर शाम को राजा ने देखा कि वह चिड़िया नहीं आई है तो उसने सैनिकों को उसे ढूंढ़ने का आदेश दिया।
वे सब ढूंढ़ते-ढूंढ़ते राजमार्ग पर पहुंच गए। वहां देखा तो वह चिड़िया मरी पड़ी थी।

Friday, April 22, 2016

समझ का फेर

अकबर-बीरबल की नोकझोंक चलती ही रहती थी। बादशाह को हंसी-मजाक से  बड़ा प्रेम था। इसी कारण बात-बात में उनमें और बीरबल में हंसी के प्रसंग छिड़ जाया करते थे।

हंसी-मजाक में अकबर बादशाह क्रोधित भी हो जाते थे, किंतु बीरबल कभी क्रोधित नहीं होते थे। इस बात को मन में विचारकर बादशाह ने बीरबल को क्रोधित करने की नई युक्ति निकाली और बोले- 'बीरबल गाय रांधत।'

उत्तर में बीरबल ने कहा- 'बादशाह शुकर खाए।'

बादशाह की बात से बीरबल तो क्रोधित न हुए, पर बीरबल की बात से बादशाह क्रोधित अवश्य हो गए। वह भड़कर बोले - 'तुम मुझे मजाक के बहाने शुकर खिलाते हो?'

'हुजूर आप भी तो मुझे गाय खिलाते हो।'

बादशाह अपने वाक्य का अर्थ बदलकर बोले- 'हमने तुम्हें रांधते वक्त गाने को कहा था।'

तत्काल बीरबल ने भी प्रत्युत्तर मे कहा - 'आलमपनाह! मैंने भला शूकर खाने को कब कहा?'

'तो फिर.....।'

'मैं तो कह रहा था, बादशाह शुक रखाए अर्थात आपने तोता रखा हुआ है। सिर्फ समझ का ही हेर-फेर है। आप बिना अर्थ समझे अकारण क्रोधित होते हैं।' बादशाह निरूत्तर हो गए।

Monday, April 11, 2016

लालच का फल

एक बार पंक्षियों का राजा अपने दल के साथ भोजन की खोज में एक जंगल में गया।
'जाओ और जाकर दाने और बीज ढूंढ़ो। मिले तो बताना। सब मिलकर खाएगें।' राजा ने पंक्षियों को आदेश दिया।
सभी पक्षी दानों की तलाश में उधर निकल पड़े। उड़ते-उड़ते एक चिड़िया उस सड़क पर आ गई जहां से गाड़ियों में लदकर अनाज जाता था। उसने सड़क पर अनाज बिखरा देखा। उसने सोचा कि वह राजा को इस जगह के बारे में नहीं बताएगी। पर किसी और चिड़िया ने इधर आकर यह अनाज देख लिया तो...? ठीक है, बता भी दूंगी लेकिन यहां तक नहीं पहुंचने दूंगी।
वह वापस अपने राजा के पास पहुंच गई। उसने वहां जाकर बताया कि राजमार्ग पर अनाज के ढेरों दाने पड़े हैं। लेकिन वहां खतरा बहुत है।
तब राजा ने कहा कि कोई भी वहां न जाए।
इस तरह सब पक्षियों ने राजा की बात मान ली।
वह चिड़िया चुपचाप अकेली ही राजमार्ग की ओर उड़ चली और जाकर दाने चुगने लगी। अभी कुछ ही देर बीती कि उसने देखा एक गाड़ी तेजी से आ रही थी।
चिड़िया ने सोचा, गाड़ी तो अभी दूर है। क्यों न दो-चार दाने और चुग लूं। देखते-देखते गाड़ी चिड़िया के उपर से गुजर गई और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
उधर शाम को राजा ने देखा कि वह चिड़िया नहीं आई है तो उसने सैनिकों को उसे ढूंढ़ने का आदेश दिया।
वे सब ढूंढ़ते-ढूंढ़ते राजमार्ग पर पहुंच गए। वहां देखा तो वह चिड़िया मरी पड़ी थी।
राजा ने कहा, 'इसने हम सबको तो मना किया था किंतु लालचवश वह अपने को नहीं रोक पाई और प्राणों से हाथ धो बैठी।'

Thursday, April 7, 2016

कर्त्तव्य के प्रति निष्ठा

संधि का प्रस्ताव असफल होने पर जब क्षीकृष्ण हस्तिनापुर लौट चले, तब, महारथी कर्ण उन्हें सीमा तक विदा करने आए। मार्ग में कर्ण को समझाते हुए क्षीकृष्ण ने कहा - 'कर्ण, तुम सूतपुत्र नहीं हो। तुम तो महाराजा पांडु और देवी कुंती के सबसे बड़े पुत्र हो। यदि दुर्योधन का साथ छोड़कर पांडवों के पक्ष में आ जाओं तो तत्काल तम्हारा राज्याभिषेक कर दिया जाएगा।'
यह सुनकर कर्ण ने उत्तर दिया- 'वासुदेव, मैं जानता हूँ कि मैं माता कुंती का पुत्र हूँ, किन्तु जब सभी लोग सूतपुत्र कहकर मेरा तिरस्कार कर रहे थे, तब केवल दुर्योधन ने मुझे सम्मान दिया। मेरे भरोसे ही उसने पांडवों को चुनौती दी है। क्या अब उसके उपकारों को भूलकर मैं उसके साथ विश्वघात करूं? ऐसा करके क्या मैं अधर्म का भागी नहीं बनूंगा? मैं यह जानता हूँ कि युद्ध में विजय पांडवों की होगी, लेकिन आप मुझे अपने कर्त्तव्य से क्यों विमुख करना चाहते हैं?' कर्त्तव्य के प्रति कर्ण की निष्ठा ने क्षीकृष्ण को निरूत्तर कर दिया।
इस प्रसंग में कर्त्तव्य के प्रति निष्ठा व्यक्ति के चरित्र को दृढ़ता प्रदान करती है और उस दृढ़ता को बड़े-से-बड़ा प्रलोभन भी शिथील नहीं कर पाता, यानि वह चरित्रवान व्यक्ति 'सेलेबिल'  नहीं बन पाता। इसके अतिरिक्त इसमें धर्म के प्रति आस्था और निर्भीकता तथा आत्म सम्मान का परिचय मिलता है, जो चरित्र की विशेषताएं मानी जाती हैं।

Wednesday, April 6, 2016

आरक्षण का परिणाम

एक समय की बात है एक चींटी और एक टिड्डा था .
गर्मियों के दिन थे, चींटी दिन भर मेहनत करती और अपने रहने के लिए घर को बनाती, खाने के लिए भोजन भी इकठ्ठा करती जिस से की सर्दियों में उसे खाने पीने की दिक्कत न हो और वो आराम से अपने घर में रह सके !!
जबकि  टिड्डा दिन भर मस्ती करता गाना गाता और  चींटी को बेवकूफ समझता !!
मौसम बदला और सर्दियां आ गयीं !!
 चींटी अपने बनाए मकान में आराम से रहने लगी उसे खाने पीने की कोई दिक्कत नहीं थी परन्तु
 टिड्डे के पास रहने के लिए न घर था और न खाने के लिए खाना !!
वो बहुत परेशान रहने लगा .
दिन तो उसका जैसे तैसे कट जाता परन्तु ठण्ड में रात काटे नहीं कटती !!

एक दिन टिड्डे को उपाय सूझा और उसने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई.
सभी  न्यूज़ चैनल वहां पहुँच गए !

 टिड्डे ने कहा कि ये कहाँ का इन्साफ है की एक देश में एक समाज में रहते हुए  चींटियाँ तो आराम से रहें और भर पेट खाना खाएं और और हम टिड्डे ठण्ड में भूखे पेट ठिठुरते रहें ..........?

मिडिया ने मुद्दे को जोर - शोर से उछाला, और जिस से पूरी विश्व बिरादरी के कान खड़े हो गए.... !
बेचारा  टिड्डा सिर्फ इसलिए अच्छे खाने और घर से महरूम रहे की वो गरीब है और जनसँख्या में कम है बल्कि  चीटियाँ बहुसंख्या में हैं और अमीर हैं तो क्या आराम से जीवन जीने का अधिकार उन्हें मिल गया !
बिलकुल नहीं !!
ये  टिड्डे के साथ अन्याय है !
 इस बात पर कुछ समाजसेवी,  चींटी के घर के सामने धरने पर बैठ गए तो कुछ भूख हड़ताल पर,
कुछ ने  टिड्डे के लिए घर की मांग की.
कुछ राजनीतिज्ञों ने इसे पिछड़ों के प्रति अन्याय बताया.

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने  टिड्डे के वैधानिक अधिकारों को याद दिलाते हुए भारत सरकार की निंदा की !

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर
  टिड्डे के समर्थन में बाड़ सी आ गयी, विपक्ष के नेताओं ने भारत बंद का एलान कर दिया. कमुनिस्ट पार्टियों ने समानता के अधिकार के तहत  चींटी पर "कर" लगाने और  टिड्डे को अनुदान की मांग की,

एक नया क़ानून लाया गया "पोटागा" (प्रेवेंशन ऑफ़ टेरेरिज़म अगेंस्ट ग्रासहोपर एक्ट).
  टिड्डे के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर दी गयी.

अंत में पोटागा के अंतर्गत🐜 चींटी पर फाइन लगाया गया उसका घर सरकार ने अधिग्रहीत कर टिड्डे को दे दिया ....!
इस प्रकरण को मीडिया ने पूरा कवर किया और   टिड्डे को इन्साफ दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की  !!
समाजसेवकों ने इसे समाजवाद की स्थापना कहा तो किसी ने न्याय की जीत, कुछ राजनीतिज्ञों ने उक्त शहर का नाम बदलकर  "टिड्डा नगर" कर दिया !
रेल मंत्री ने  "टिड्डा रथ" के नाम से नयी रेल चलवा दी और कुछ नेताओं ने इसे समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन की संज्ञा दी ।।
 चींटी भारत छोड़कर अमेरिका चली गयी और वहां उसने फिर से मेहनत की और एक कंपनी की स्थापना की जिसकी दिन रात
 तरक्की होने लगी तथा अमेरिका के विकास में सहायक सिद्ध हुई !!
चींटियाँ मेहनत करतीं रहीं और टिड्डे खाते रहे ........!
फलस्वरूप धीरे धीरे  चींटियाँ भारत छोड़कर जाने लगीं और  टिड्डे झगड़ते रहे ........!
 एक दिन खबर आई की अतिरिक्त आरक्षण की मांग को लेकर सैंकड़ों  टिड्डे मारे गए.........!

ये सब देखकर अमेरिका में बैठी  चींटी ने कहा " इसीलिए शायद भारत आज भी विकासशील देश है"

चिंता का विषय:

जिस देश में लोगो में "पिछड़ा" बनने की होड़ लगी हो वो "देश" आगे कैसे बढेगा...

Tuesday, April 5, 2016

मृत्यु तो जीवन का अभिन्न अंग

एक बहुत ही सिद्ध और सच्चे गुरू थे। सदैव प्रसन्न रहते थे। एक दिन एक शिष्य ने पूछा, 'महाराज आपको कभी अप्रसन्न नहीं देखा, आप कैसे हमेशा प्रश्न्न रह पाते हैं?' संत ने उत्तर दिया, 'मैं अपनी प्रसन्नता से पहले तुम्हारे बारे में कुछ बताना चाहता हूँ।' 'मेरे बारे में!' शिष्य ने आश्चर्य से पूछा। संत ने कहा, 'हाँ, तुम्हारे बारे में। दरअसल तुम आज से एक सप्ताह बाद ही मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे।' यह भविष्यवाणी सुनकर शिष्य सन्न रह गया। उसके मन पर इसका बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और उसी दिन उसके स्वभाव में आर्श्यजनक परिवर्तन आ गया। वह छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठ गया। सभी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करने लगा, उसके मन में उदारता ने जन्म ले लिया। अचानक एक सप्ताह बाद वह संध्या कर रहा था, उसके मन में मृत्यु की कल्पना थी। तभी वह संत वहाँ आ गए और उन्होनें उससे पूछा, 'कहो, कैसा लग रहा है?' शिष्य ने शांत-भाव से उत्तर दिया, 'महाराज! इस पूरे सप्ताह मुझे किसी पर क्रोध नहीं आया। कड़वा भी नहीं बोला, बल्कि सबके साथ प्रेमपूर्वक रहा। सोचा, क्यों थोड़े से समय के लिए बुराई का टोकरा अपने सिर पर उठाऊं।' संत ने कहा, 'मैं तुम्हारी मृत्यु की भविष्यवाणी इसीलिए की थी कि तुम जान सको कि मृत्यु को याद रखने वाला क्रोध, घृणा व ईष्या आदि के बारे में सोचता भी नहीं और यही मेरे प्रसन्न रहने का कारण है। जाओ प्रसन्न रहो, अभी तुम्हारी काफी आयु शेष है।
मृत्यु तो जीवन का अभिन्न अंग है, इससे डरना क्या? इसे याद रखकर हम भय मुक्त रहना सीखते हैं और तब जीवन में कुछ अच्छाइयों को ग्रहण कर बहुत-सी बुराइयों से दूर रह सकते हैं, जैसे कि हमने इस प्रसंग में देखा है।

जब तक मन में भय रहता है, तब तक आत्मा परिपूर्ण नहीं रह सकती और आप सुखी जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। उसकी चिंता-सोच में आप डूबे रहेंगे। आवश्यकता इस बात की है कि आप अपनी सोच में बदलाव लाएं, सकारात्मक नजरिया बनाएं। भय को सम्भलकर चलने की प्रेरणास्वरूप मानें। जो घटना होनी है, उसे टाला नहीं जा सकता- यह प्रकृति का नियम है। अतएव सकारात्मक दृष्टि से आप हर परिस्थिति को खुशी से स्वीकार कर उसी में आनंद की अनुभूती लें। इसी में आपका भयमुक्त जीवन है।

Monday, April 4, 2016

बेसहारा की मदद

ऑफिस से निकल कर शर्माजी ने   स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया,  पत्नी ने कहा था,१ दर्ज़न केले लेते  आना।  तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा केले बेचते हुए   एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी। .
वैसे तो वह फल हमेशा "राम आसरे फ्रूट भण्डार" से   ही लेते थे,  पर आज उन्हें लगा कि क्यों न   बुढ़िया से ही खरीद लूँ ?   उन्होंने बुढ़िया से पूछा, "माई, केले कैसे दिए"  बुढ़िया बोली, बाबूजी बीस रूपये दर्जन,   शर्माजी बोले, माई १५ रूपये दूंगा।  बुढ़िया ने कहा, अट्ठारह रूपये दे देना,   दो पैसे मै भी कमा लूंगी।  शर्मा जी बोले, १५ रूपये लेने हैं तो बोल,   बुझे चेहरे से बुढ़िया ने,"न" मे गर्दन हिला दी।  शर्माजी बिना कुछ कहे चल पड़े और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर   केले का भाव पूछा तो वह बोला २४ रूपये दर्जन हैं  बाबूजी, कितने दर्जन दूँ ?   शर्माजी बोले, ५ साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ,   ठीक भाव लगाओ।  तो उसने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया।   बोर्ड पर लिखा था- "मोल भाव करने वाले माफ़ करें"   शर्माजी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा,   उन्होंने कुछ  सोचकर स्कूटर को वापस   ऑफिस की ओर मोड़ दिया।  सोचते सोचते वह बुढ़िया के पास पहुँच गए। बुढ़िया ने उन्हें पहचान लिया और बोली,  "बाबूजी केले दे दूँ, पर भाव १८ रूपये से कम नही लगाउंगी।   शर्माजी ने मुस्कराकर कहा,   माई एक  नही दो दर्जन दे दो और भाव की चिंता मत करो।  बुढ़िया का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा।   केले देते हुए बोली। बाबूजी मेरे पास थैली नही है ।   फिर बोली, एक टाइम था जब मेरा आदमी जिन्दा था  तो मेरी भी छोटी सी दुकान थी।   सब्ज़ी, फल सब बिकता था उस पर।   आदमी की बीमारी मे दुकान चली गयी,   आदमी भी नही रहा। अब खाने के भी लाले पड़े हैं।   किसी तरह पेट पाल रही हूँ। कोई औलाद भी नही है  जिसकी ओर मदद के लिए देखूं।   इतना कहते कहते    बुढ़िया रुआंसी हो गयी,   और उसकी आंखों मे आंसू आ गए ।  शर्माजी ने ५० रूपये का नोट बुढ़िया को दिया तो वो बोली "बाबूजी मेरे पास छुट्टे नही हैं।  शर्माजी बोले "माई चिंता मत करो, रख लो,   अब मै तुमसे ही फल खरीदूंगा,
और कल मै तुम्हें ५०० रूपये दूंगा।   धीरे धीरे चुका देना और परसों से बेचने के लिए   मंडी से दूसरे फल भी ले आना।
बुढ़िया कुछ कह पाती उसके पहले ही   शर्माजी घर की ओर रवाना हो गए।   घर पहुंचकर उन्होंने पत्नी से कहा, न जाने क्यों हम हमेशा मुश्किल से   पेट पालने वाले, थड़ी लगा कर सामान बेचने वालों से   मोल भाव करते हैं किन्तु बड़ी दुकानों पर   मुंह मांगे पैसे दे आते हैं।   शायद हमारी मानसिकता ही बिगड़ गयी है।   गुणवत्ता के स्थान पर हम चकाचौंध पर   अधिक ध्यान देने लगे हैं।  अगले दिन शर्माजी ने बुढ़िया को ५०० रूपये देते हुए कहा,   "माई लौटाने की चिंता मत करना।   जो फल खरीदूंगा, उनकी कीमत से ही चुक जाएंगे।  जब शर्माजी ने ऑफिस मे ये किस्सा बताया तो   सबने बुढ़िया से ही फल खरीदना प्रारम्भ कर दिया। तीन महीने बाद ऑफिस के लोगों ने स्टाफ क्लब की ओर से बुढ़िया को एक हाथ ठेला भेंट कर दिया।   बुढ़िया अब बहुत खुश है।   उचित खान पान के कारण उसका स्वास्थ्य भी पहले से बहुत अच्छा है ।   हर दिन शर्माजी और ऑफिस के   दूसरे लोगों को दुआ देती नही थकती।   शर्माजी के मन में भी अपनी बदली सोच और एक असहाय निर्बल महिला की सहायता करने की संतुष्टि का भाव रहता है..!

जीवन मे किसी बेसहारा की मदद करके देखो यारों,

अपनी पूरी जिंदगी मे किये गए सभी कार्यों से

ज्यादा संतोष मिलेगा...!!
 

Sunday, April 3, 2016

लकड़हारे की ईमानदारी

किसी समय एक वृद्ध लकड़हारा नदी के किनारे पेड़ काट रहा था। दुर्भाग्य से उसकी कुल्हाड़ी नदी में गिर गई। बेचारे लकड़हारे ने कुल्हाड़ी की खूब तलाश की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। उसके पास एक पैसा भी न था, इसलिए वह दूसरी कुल्हाड़ी नहीं खरीद सकता था। असहाय होकर वह फूट-फूट कर रोने लगा।
जल के देवता वरूण ने उसका रूदन सुना। उन्हें लकड़हारे पर दया आ गई। वे लकड़हारे के पास आए और उससे पूछा, ‘तुम इतना फूट-फूट कर क्यों रो रहे हो? 'लकड़हारे ने कहा, ‘मेरी कुल्हाड़ी पानी में गिर, गई और न जाने कहां खो गई है।'
वरूण देवता ने पानी में डुबकी लगाई और एक साने की कुल्हाड़ी लेकर आ गए। वरूण देवता ने पूछा, 'क्या यह तुम्हारी है?' 'नहीं, श्रीमान्!' लकड़हारे ने रोते-रोते उत्तर दिया। देवता ने पानी में छलांग लगाई और अब चांदी की कुल्हाड़ी ले आए। 'क्या यह तुम्हारी है?‘ देवता ने पूछा। ‘मेरी कुल्हाड़ी इतनी सफेद नहीं थी।‘ उसने कहा, ‘वह काले रंग की थी। उसी के सहारे मेरी रोजी चलती थी। मैं अब असहाय हो गया हूं।'
जल के देवता ने तीसरी बार पानी में डुबकी लगाई और इस बार लकड़हारे की कुल्हाड़ी लेकर आए। लकड़हारे की आंखे अपनी कुल्हाड़ी को देख एकदम चमक उठी। वह प्रसन्नता से चिल्ला उठा, 'यह मेरी है, ऐ मेरे देवता।'
वरूण देवता लकड़हारे की ईमानदारी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे न केवल लोहे की कुल्हाड़ी दे दी, बल्कि साने और चांदी की कुल्हाड़ियां भी दे दी।

'हुजूर! मेरा हाजमा खराब है

एक बार बादशाह के पास शिकायत पहुंची कि उनका एक मालगुजारी अफसर बहुत गड़बड़ कर रहा है। वह रियाया (प्रजा) से कई गुना ज्यादा माल उगाहता है और ज्यादातर खुद हड़प् कर जाता है। जब अफसर को बुलाकर जांच की गई तो पाया गया कि बहीखातों में बहुत बड़ा घोटाला है। बादशाह ने न केवल उसकी सम्पत्ति जब्त कर ली बल्कि उसे विवश कर दिया कि वह बहीखाते के सारे कागज भी खाए।

प्रजा बादशाह के इस न्याय से बड़ी प्रसन्न हुई। पर बीरबल खुश नहीं हुए। हालांकि उस भ्रष्ट अफसर की जगह उन्हें मालगुजारी अफसर बना दिया गया था। उन्होंने सारा हिसाब-किताब खाखरों पर लिखना शुरू कर दिया। 

फिर एक रोज बादशाह ने सब खाते जांच के लिए मंगवाए तो बीरबल सारे खाखरे लेकर उपस्थित हुए।

बादशाह उन अजीब खाखरों को देखकर चकित हुए तो बीरबल ने स्पष्टीकरण पेश किया - 'हुजूर! मेरा हाजमा खराब है। मैंने सोचा कि क्या पता हिसाब-किताब में गड़बड़ी हो और हुजूर मुझे कागज खाने के लिए विवश करें तो जान से हाथ न धो बैठूं। इसलिए मैंने सारा हिसाब-किताब खाखरों पर लिखा है। यह कागज से जल्दी हज़म हो जाएगा।'

Friday, April 1, 2016

आदत से लाचार

एक बार एक डाकू गुरु नानक के पास गया और उनके चरणों में गिरकर बोला-'मैं अपने जीवन से परेशान हो गया हूं। जाने कितनों को मैंने लूटकर दुखी किया है। मुझे कोई रास्ता बताइए ताकि मैं इस बुराई से बच सकूं।'
गुरु नानक ने बड़े प्रेम से कहा- 'यदि तुम बुराई करना छोड़ दो तो बुराई से बच जाओगे।' गुरु नानक की बात सुनकर डाकू बोला-'अच्छी बात है, मैं कोशिश करूंगा।' यह कहकर वह वापस चला गया। कुछ दिन बीतने के बाद वह फिर उनके पास लौट आया और बोला-'मैंने बुराई छोड़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन छोड़ नहीं पाया। अपनी आदत से मैं लाचार हूं। मुझे कोई अन्य उपाय बताइए।'
गुरु जी बोले-'अच्छा, ऐसा करो कि तुम्हारे मन में जो भी बात उठे, उसे कर डालो, लेकिन रोज-रोज दूसरे लोगों से कह दो।' डाकू को बड़ी खुशी हुई कि इतने बड़े संत ने जो मन में आए, सो कर डालने की आज्ञा दे दी। अब मैं बेधड़क डाका डालूंगा और दूसरों से कह दूंगा। यह तो बहुत आसान है। वह खुशी-खुशी उनके चरण छूकर घर लौट गया। कुछ दिनों बाद डाकू फिर उनके पास जा पहुंचा। गुरु नानक ने पूछा-'अब तुम्हारा क्या हाल है?'
डाकू बोला-'गुरुजी, आपने मुझे जो उपाय बताया था, मैंने उसे बहुत आसान समझा था, लेकिन वह तो निकला बड़ा मुश्किल। बुरा काम करना जितना मुश्किल है तो उससे कहीं अधिक मुश्किल है- दूसरों के सामने उसे कह पाना। इस काम में बहुत ज्यादा कष्ट होता है।' इतना कहकर डाकू चुप हो गया और फिर बोला-' गुरुजी इसलिए अब दोनों में से मैंने आसान रास्ता चुन लिया है। मैंने डाका डालना ही छोड़ दिया है।' गुरु नानक मुस्करा दिए।

भावना की हवाएे

दो मित्र रेगिस्तान में यात्रा कर रहे थे | सफ़र में किसी मुकाम पर उनका किसी बात पर विवाद हो गया | बात इतनी बढ़ गयी की एक मित्र ने दुसरे मित्र को थप्पड़ मार दिया | थप्पड़ खाने वाले मित्र को बहुत- बुरा लगा, लेकिन बिना कुछ कहे उनसे रेट में लेख, ‘आज मेरे घनिष्ट मित्र ने मुझे थप्पड़ मारा’ वे चलते रहे और एक नखलिस्तान (मरूस्थल के बीच हरित भूमि ) में आ पहुचे,जहां उन्होंने नहाने का फैसला किया | जिस व्यक्ति ने थप्पड़ खया था,नखलिस्तान ने नहाते-नहाते अचानक उसका पैर फिसला गया | वह दलदल से जितना बाहर निकलने की कोशिश करता, उतना ही उस दलदल में समाता जाता |
इस बार थप्पड़ मारने वाले मित्र ने उसे बचा लिया |
जब वह दलदल से सुरक्षित बाहर आ गया, तो उसें इस बार, एक पत्थर पर लिखा- “आज मेरे घनिष्ठ मित्र ने मेरी जान बचाई | ” इस पर उसके मित्र ने पुछा- “जब मैने तुम्हे मारा,तो तुमने उसे रेट पर लिखा और जब बचाया तो इसे पत्थर पर लिखा,ऐसा क्यों?” दुसरे मित्र ने कहा, “जब हमे कोई दुःख देता हैं,तब हमे उसे रेत पर लिखना चाहिए, ताकि शमा भावना की हवाए आकर इस कटु याद को मिटा दें |

वही,जब कोई हमारा भला करे,तब हमे उसे पत्थर पर लिखना चाहिए,ताकि कोई हवा उसे मिटा ना पाए | वह हमेशा के लिए लिखा रहे |

Tuesday, March 29, 2016

आज महत्वपूर्ण है

आइजक न्यूटन का बचपन परेशानियों में बीता | जब वे 3 साल के थे,तब उनकी माँ ने बरनाब्स स्मिथ नामक एक धनवान व्यक्ति से विवाह कर लिया और आइजक को उनकी नानी के पास छोड़ दिया था | फिर वे अपने दुसरे पति के साथ नार्थ विदम चली गयी थी | उसके बाद न्यूटन की शिक्षा वुल्सथार्प ग्राथम में 7 मील दूर हुई| वहाँ उन्हें मंद-बुद्धि समझा जाता था | क्युकी वे बचपन से ही आकाशीय पिंडों की ओर आकर्षित रहते थे, और सूरज की किरणों को देखकर उन्हें आश्चर्य होता था| फिर ग्रंथम में वे ओषधविद विलियम क्लार्क के साथ रहे, जिन्होंने उन्हें रसायन विज्ञान की ओर प्रेरित किया|

    लेकिन 1658 में आइजक ने स्कूल छोड़ दिया और पुश्तैनी जमीन जायजाद की देखभाल करने लगे | परन्तु उस काम में उनका मन नहीं लगा | फिर 1661 में वे ट्रिनिटी कॉलेज में पुन पढने चले गए|

तब उन्होंने कहा था,

  “अच्छा नाविक वही होता है,जो पतवार पर भरोसा नहीं करता,बल्कि हवा के रुख को पहचानता है | मैने भी हवा के रुख को पहचाना, और कुछ नया करने में जुट गया|”

बाद में जब उन्होंने पेड़ से गिरते हुए सेब को देखा, तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का सिधांत ईजाद हो गया| फिर न्यूटन ने अपने कमरे में रासायनिक प्रयोगों के लिए 2 भट्टियाँ लगाई और टेलिस्कोप का निर्माण किया | 1671 में न्यूटन ने जब उस टेलिस्कोप को रॉयल सोसाइटी में प्रदर्शित किया गया,तो तहलका मच गया, और उन्हें रॉयल सोसाइटी का मेम्बर चुना गया| 
उसके बाद न्यूटन के ग्रन्थ “प्रिंसिपिया” का प्रकाशन हुआ,जो गुरुत्वाकर्षण, मैकेनिक, और द्रव्यों पर आधारित था | वह ग्रन्थ महारानी ऐनी को बहुत पसंद आया,जिसकी वजह से न्यूटन को ‘सर’ की उपाधि प्रदान की गयी, और तब से उनका एक महान व्येज्ञानिक के रूप में इतिहास के सुन्हेरे पन्नों में दर्ज हुआ| 

कल महत्वपूर्ण नहीं है,आज महत्वपूर्ण है | कल तो पिछली रात को खत्म हो चुका हैं| इसलिए अतीत में मत झाकों,वर्ना भविष्य धुंधला हो जायेंगा | क्युकी आप जहां जा रहे हैं,वह महत्वपूर्ण हैं,कितनी जल्दी पहुचेंगे यह महत्वपूर्ण नहीं है | यह वजह है की जल्दीबाज हमेशा शिखर पर देर से पहुचता हैं | वैसे भी कहावत हैं, की राते पर नज़र रखे, और खतरा टालने के लिए आईने को देखें | लोग आपको कार्यों से आंकते हैं, आपके इरादों से नहीं|

Monday, March 28, 2016

स्वर्ग का अर्थ

एक यात्री अपने घोड़े और कुत्ते के साथ सड़क पर चल रहा था. जब वे एक विशालकाय पेड़ के पास से गुज़र रहे थे तब उनपर आसमान से बिजली गिरी और वे तीनों तत्क्षण मर गए. लेकिन उन तीनों को यह प्रतीत नहीं हुआ कि वे अब जीवित नहीं है और वे चलते ही रहे. कभी-कभी मृत प्राणियों को अपना शरीरभाव छोड़ने में समय लग जाता है.
उनकी यात्रा बहुत लंबी थी. आसमान में सूरज ज़ोरों से चमक रहा था. वे पसीने से तरबतर और बेहद प्यासे थे. वे पानी की तलाश करते रहे. सड़क के मोड़ पर उन्हें एक भव्य द्वार दिखाई दिया जो पूरा संगमरमर का बना हुआ था. द्वार से होते हुए वे स्वर्ण मढ़ित एक अहाते में आ पहुंचे. अहाते के बीचोंबीच एक फव्वारे से आईने की तरह साफ़ पानी निकल रहा था.
यात्री ने द्वार की पहरेदारी करनेवाले से कहा:
“नमस्ते, यह सुन्दर जगह क्या है?
“यह स्वर्ग है”.
“कितना अच्छा हुआ कि हम चलते-चलते स्वर्ग आ पहुंचे. हमें बहुत प्यास लगी है.”
“तुम चाहे जितना पानी पी सकते हो”.
“मेरा घोड़ा और कुत्ता भी प्यासे हैं”.
“माफ़ करना लेकिन यहाँ जानवरों को पानी पिलाना मना है”
यात्री को यह सुनकर बहुत निराशा हुई. वह खुद बहुत प्यासा था लेकिन अकेला पानी नहीं पीना चाहता था. उसने पहरेदार को धन्यवाद दिया और अपनी राह चल पड़ा. आगे और बहुत दूर तक चलने के बाद वे एक बगीचे तक पहुंचे जिसका दरवाज़ा जर्जर था और भीतर जाने का रास्ता धूल से पटा हुआ था.
भीतर पहुँचने पर उसने देखा कि एक पेड़ की छाँव में एक आदमी अपने सर को टोपी से ढंककर सो रहा था.
“नमस्ते” – यात्री ने उस आदमी से कहा – “मैं, मेरा घोड़ा और कुत्ता बहुत प्यासे हैं. क्या यहाँ पानी मिलेगा?”
उस आदमी ने एक ओर इशारा करके कहा – “वहां चट्टानों के बीच पानी का एक सोता है. जाओ जाकर पानी पी लो.”
यात्री अपने घोड़े और कुत्ते के साथ वहां पहुंचा और तीनों ने जी भर के अपनी प्यास बुझाई. फिर यात्री उस आदमी को धन्यवाद कहने के लिए आ गया.
“यह कौन सी जगह है?”
“यह स्वर्ग है”.
“स्वर्ग? इसी रास्ते में पीछे हमें एक संगमरमरी अहाता मिला, उसे भी वहां का पहरेदार स्वर्ग बता रहा था!”
“नहीं-नहीं, वह स्वर्ग नहीं है. वह नर्क है”.
यात्री अब अपना आपा खो बैठा. उसने कहा – “भगवान के लिए ये सब कहना बंद करो! मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है कि यह सब क्या है!”
आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा – “नाराज़ न हो भाई, संगमरमरी स्वर्ग वालों का तो हमपर बड़ा उपकार है. वहां वे सभी लोग रुक जाते हैं जो अपने भले के लिए अपने सबसे अच्छे दोस्तों को भी छोड़ सकते हैं.”

Sunday, March 27, 2016

परिवर्तन

  एक लड़का सुबह सुबह दौड़ने को जाया करता था | आते जाते वो एक बूढी महिला को देखता था | वो बूढी महिला तालाब के किनारे छोटे छोटे कछुवों की पीठ को साफ़ किया करती थी | एक दिन उसने इसके पीछे का कारण जानने की सोची |
वो लड़का महिला के पास गया और उनका अभिवादन कर बोला ” नमस्ते आंटी ! मैं आपको हमेशा इन कछुवों की पीठ को साफ़ करते हुए देखता हूँ आप ऐसा किस वजह से करते हो ?”  महिला ने उस मासूम से लड़के को देखा और  इस पर लड़के को जवाब दिया ” मैं हर रविवार यंहा आती हूँ और इन छोटे छोटे कछुवों की पीठ साफ़ करते हुए सुख शांति का अनुभव लेती हूँ |”  क्योंकि इनकी पीठ पर जो कवच होता है उस पर कचता जमा हो जाने की वजह से इनकी गर्मी पैदा करने की क्षमता कम हो जाती है इसलिए ये कछुवे तैरने में मुश्किल का सामना करते है | कुछ समय बाद तक अगर ऐसा ही रहे तो ये कवच भी कमजोर हो जाते है इसलिए कवच को साफ़ करती हूँ |यह सुनकर लड़का बड़ा हैरान था | उसने फिर एक जाना पहचाना सा सवाल किया और बोला “बेशक आप बहुत अच्छा काम कर रहे है लेकिन फिर भी आंटी एक बात सोचिये कि इन जैसे कितने कछुवे है जो इनसे भी बुरी हालत में है जबकि आप सभी के लिए ये नहीं कर सकते तो उनका क्या क्योंकि आपके अकेले के बदलने से तो कोई बड़ा बदलाव नहीं आयेगा न |
महिला ने बड़ा ही संक्षिप्त लेकिन असरदार जवाब दिया कि भले ही मेरे इस कर्म से दुनिया में कोई बड़ा बदलाव नहीं आयेगा लेकिन सोचो इस एक कछुवे की जिन्दगी में तो बदल्वाव आयेगा ही न | तो क्यों हम छोटे बदलाव से ही शुरुआत करें |


अच्छी फसल

एक अतिश्रेष्ठ व्यक्ति थे, एक दिन उनके पास एक निर्धन आदमी आया और बोला की मुझे अपना खेत उधार दे दीजिये, मैं उसमें खेती करूँगा और खेती करके कमाई करूँगा ....

वह अतिश्रेष्ठ व्यक्ति बहुत दयालु थे ...
उन्होंने उस निर्धन व्यक्ति को अपना खेत दे दिया और साथ में पांच किसान भी सहायता के रूप में खेती करने को दिये और कहा की इन पांच किसानों को साथ में लेकर खेती करो, खेती करने में आसानी होगी ...
इस से तुम और अच्छी फसल की खेती करके कमाई कर पाओगे।

वो निर्धन आदमी ये देख के बहुत खुश हुआ की उसको उधार में खेत भी मिल गया और साथ में काम करने के लिय पांच सहायक किसान भी मिल गये।

लेकिन वो आदमी अपनी इस ख़ुशी में बहुत खो गया और वह पांच किसान अपनी मर्ज़ी से खेती करने लगे और वह निर्धन आदमी अपनी ख़ुशी में डूबा रहा .....
और जब फसल काटने का समय आया तो देखा की फसल बहुत ही ख़राब हुई थी, उन पांच किसानो ने खेत का उपयोग अच्छे से नहीं किया था और ना ही उसमें अच्छे बीज ही डाले थे, जिससे फसल अच्छी हो सके |

जब उस अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति ने अपना खेत वापस माँगा तो वह निर्धन व्यक्ति रोता हुआ बोला की मैं बर्बाद हो गया, मैं अपनी ख़ुशी में डूबा रहा और इन पांचों किसानो को नियंत्रण में ना रख सका और ना ही इनसे अच्छी खेती करवा सका।

अब यहाँ ध्यान दीजियेगा-

वह अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति हैं - "भगवान" ....

और वह निर्धन व्यक्ति हैं -"हम"

खेत है -"हमारा शरीर"

और वह पांच किसान हैं हमारी इन्द्रियां-:
आँख, कान, नाक,जीभ और मन।

प्रभु ने हमें यह शरीर रुपी खेत अच्छी फसल (कर्म) करने को दिया है और हमें इन पांच किसानो को अर्थात इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में रख कर अपनें कर्म करने चाहियें, जिससे जब वो दयालु प्रभु जब ये शरीर वापस मांग कर हमारा हिसाब करें तो हमें रोना ना पड़े

Friday, March 25, 2016

मन का कूड़ा

एक बार स्वामी रामदास जी भिक्षा मांगते हुए किसी घर के सामने खड़े हुए और उन्होने आवाज लगाई,
"रघुवीर समर्थ !'
घर की स्त्री बाहर आई। उसने उनकी झोली में भिक्षा डाली और कहा, महात्मा जी कोई उपदेश दीजिये।
स्वामी रामदास जी बोले,  " आज नहीं कल दूंगा ! ' दूसरे दिन स्वामी रामदास जी ने पुन: उस घर के सामने आवाज लगाई,  " रघुवीर समर्थ!'
उस घर की स्त्री ने उस दिन खीर बनाई थी। वह खीर का कटोरा लेकर बाहर आई।
स्वामी जी ने अपना कमंडल आगे कर दिया।
वह स्त्री जब खीर डालने लगी तो उसने देखा कि कमंडल में कूड़ा भरा है। उसके हाथ ठिठक गए। वह बोली, 
" महाराज कमंडल तो गदां है!'
रामदास जी बोले, " हां गंदा तो है, किंतु खीर इसमें डाल दो।'
स्त्री बोली, " नहीं महाराज तब तो खीर खराब हो जाएगी।
लावों कमंडल मै धो लाती हू।'
स्वामी जी बोले, मतलब जब कमंडल साफ होगा तभी खीर डालोगी।'
स्त्री बोली, "जी महाराज।' स्वामी जी बोले, " मेरा भी यही उपदेश है। मन में जब तक चिंताओ का कूड़ा-- करकट और बुरे संस्कार रुपी गोबर भरा है।
तब तक उपदेशामृत का कोई लाभ नहीं होगा।
मन साफ हो, तभी आनदं की अनुभूति प्राप्त होती है।

Saturday, March 19, 2016

दुख और नमक

एक बार एक नव युवक गौतम बुद्ध के पास पहुंचा,और  बोला- महात्मा जी! मैं अपनी जिन्दगी से बहुत परेशान हूँ।  कृपया इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं?  बुद्ध बोले- पानी के गिलास में एक मुट्ठी नमक डालो,
और उसे पियो।   युवक ने ऐसा ही किया।   इसका स्वाद कैसा लगा?  बुद्ध ने पूछा।   बहुत ही खराब, एकदम खारा।  युवक थूकते हुए बोला।  बुद्ध मुस्कुराते हुए बोले- एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक ले लो,
और मेरे पीछे-पीछे आओ।  दोनों धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे, और थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील  सामने रुक गए।  चलो, अब इस नमक को इस झील में डाल दो।  बुद्ध ने निर्देश दिया।  युवक ने ऐसा ही या अब इस झील का पानी पियो।  बुद्ध बोले।  युवक पानी पीने लगा   एक बार फिर बुद्ध ने पूछा- बताओ  सका स्वाद  सा है?  क्या अभी भी तुम्हें ये खारा लग रहा है?  नहीं! ये तो मीठा है, बहुत अच्छा है  युवक बोला   बुद्ध युवक के     ल में बैठ गए,  और उसका हाथ थामते हुए बोले- जीवन के दुख बिलकुल नमक की तरह हैं,  न इससे कम, ना ।
जीवन में दुःख की मात्रा वही रहती है,  बिलकुल वही   लेकिन हम कितने दुख का स्वाद लेते हैं  ये इस पर निर्भर करता है, कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं।  इसलिए जब तुम दुखी हो,  तो सिर्फ इतना कर सकते हो,  कि खुद के मन को बड़ा कर लो।    गिलास मत बने रहो 

Friday, March 18, 2016

पथिकों का मसीहा

न्यूयॉर्क में कॉलेज का एक छात्र प्लेटफॉर्म पर उतरा। वह स्टेशन से बाहर निकल कुछ दूर ही चला था कि अचानक मूसलाधार बारिश होने लगी। बचाव का कोई साधन नजर नहीं आ रहा था। तभी एक वृद्ध छात्र के पास आया और छतरी उसके ऊपर करते हुए बोला,'चलो बेटे, मैं तुम्हें तुम्हारी मंजिल तक पहुंचा आऊं।' छात्र ऐसी तेज बारिश में एक वृद्ध को अचानक देखकर थोड़ा चौंका, फिर उसके साथ चल दिया।
वृद्ध उसे हॉस्टल के कमरे तक सकुशल पहुंचा कर जाने लगा । जब वह वृद्ध कमरे से बाहर निकलने लगा तो छात्र बोला, 'बाबा, मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूं । मेरा और आपका पूर्व परिचय नहीं है। ऐसे में इतनी तेज बारिश में आपने अपनी उम्र का ध्यान भी नहीं रखा और मुझे छतरी के साथ मेरे हॉस्टल तक छोड़ने आए। इसके पीछे कुछ वजह तो अवश्य है ।' छात्र की बात सुनकर वृद्ध की आंखों में आंसू आ गए।
वह बोला, 'बेटा, आज से तीस साल पहले मैं बहुत गरीब था। मेरे तीन बेटे थे। एक दिन वे तीनों बाहर गए हुए थे। अचानक तेज बारिश हो गई। उन दिनों मेरे पास एक भी छाता नहीं था । मेरे तीनों बेटे भीगते हुए घर आए और उन्हें निमोनिया हो गया। निमोनिया के कारण एक के बाद एक मेरे तीनों बेटे मौत की गोद में सो गए। मेरे बेटे तो मुझे वापिस नहीं मिल सकते। लेकिन मैं ऐसे अनगिनत बेटों को छतरी का सहारा देकर बचा अवश्य सकता हूं जिनके पास बारिश से बचने का कोई सहारा नहीं होता।'
यह सुनकर छात्र की आंखों में आंसू आ गए। वह वृद्ध का हाथ पकड़कर उन्हें गले लगाता हुआ बोला, 'सर, आज से मैं आपका बेटा हूं ।' बारिश में लोगों की मदद करने वाला यह वृद्ध व्यक्ति अमेरिका के न्यूयॉर्क का एक समाजसेवी सर जॉन फेब्रिक्र था। आज भी उस वृद्ध व्यक्ति को अमेरिका में 'पथिकों का मसीहा' के रूप में जाना जाता है

संकल्प

" क्या हुआ ? जबसे आप ऑफिस से लौटे हैं बहुत परेशान लग रहे हैं !"
" हाँ मैं परेशान हूँ शकुन, आज भी तुमने बच्चों और मेरा छोड़ा हुआ खाना
 घर के आगे जानवरों के खाने के लिए डाल रखा था।"
" जी हाँ,वो तो मैं रोज़ डालती हूँ। फिर... ?"
" जब मैं ऑफिस के लिए निकला तो देखा कि एक बदहाल बच्चे और कुत्ते में भोजन को ग्रहण करने के लिए द्वन्द चल रहा था।खुद पर झपटते कुत्ते को बच्चे ने पत्थर मारकर भगा दिया और भोजन पर टूट पड़ा। "
" अरे ?" हैरानी से उसके मुँह से निकल पड़ा।
" मुझे निकलते देखकर बच्चे ने शर्मिंदा होकर भोजन छोड़ दिया।
तभी मौका पाकर वो कुत्ता आया और बचा हुआ भोजन चट कर गया।"
" हे भगवान "
" बच्चे ने जिस बेचारगी से उस खत्म होते हुए खाने को देखा,मेरा दिल दहल गया।एक ओर हम जैसे लोग हैं जो अन्न की इतनी बर्बादी करते हैं।और दूसरी ओर इतने बेबस लोग ..जिन्हें पेट की आग इतना मजबूर करती है की वो कैसे भी इस ज्वाला को शांत कर लेना चाहते हैं।" व्याकुलता अब विश्वास के चेहरे पर नज़र आ रही थी।
" तो आप मुझसे कह देते।मैं उसे कुछ न कुछ खिला देती "
" मैंने उसे खाने के लिए पैसे तो दे दिए थे। पर बचपन से अब तक जितना अन्न मैंने बर्बाद किया है अब उसका प्रायश्चित करूँगा।"
" मतलब ?"
" आज से मैं सिर्फ एक वक़्त भोजन ग्रहण करूँगा।"

Wednesday, March 16, 2016

देश की शान

एक लड़की थी  रात को office से वापस लौट रही थी  देर भी हो गई थी.
पहली बार ऐसा हुआ   और काम भी ज्यादा था  तोTime का पता ही नहीं चला  वो सीधे auto stand पहुँची.. वहाँ एक लड़का खड़ा था  वो लड़की उसे देखकर  डर गई कि कहीं उल्टा सीधा  ना हो जाए तभी वो लड़का  पास आया और कहा - बहन तू   मौका नहीं जिम्मेदारी है मेरी  और जब तक तुझे कोई गाड़ी  नहीं मिल जाती   मैं तुम्हे छोड़करकहीं नहीं जाऊँगा  don't worry...  वहाँ से एक auto वाला   गुजर रहा था  लडकी को अकेली लड़के के साथ देखा
तो तुरंत auto रोक दिया  और कहा - कहाँ जाना है  मैडम ??.--आइये  मैं आपको छोड़ देता हूँ  लड़की auto में बैठ गई।
रास्ते में वो auto वाला  बोला - तुम मेरी बेटी जैसी हो ।  इतनी रात को तुम्हें अकेला देखा  तो auto रोक दिया।  जकल जमाना खराब है ना  और अकेली लड़की मौकां nhi  जिम्मेदारी होती है।  लड़की जहाँ रहती थी  वो एरिया आ चुका था।  वो auto से उतर गई  और auto वाला चला गया।  लेकिन अब भी लड़की को  दो 2 अंधेरी गलियों से होकर गुजरना था  वहाँ से चलकर जाना था  तभी वहाँ से साईकल वाला गुजर रहा था  शायद वो भी काम से  वापस घर की ओरजा रहा था  लड़की को अकेली देखकर  कहा - आओ! मैं तुम्हें घर तक छोड़ देता हूँ   उसने एक टोर्च लेकर उस लड़की के साथ  अंधेरी गली की और निकल पड़ा  वो लड़की घर पहुँच चुकी थी।  आज किसी की  बेटी,बहन सही ✔  सलामत  घर पहुँच चुकी थी।
एे   हमारे  भारत की पहचान

Tuesday, March 15, 2016

इंतजार और प्रार्थना

एक भिखारी, एक सेठ के घर के बाहर खडा होकर भजन गा रहा था और बदले में खाने को रोटी मांग रहा था।
सेठानी काफ़ी देर से उसको कह रही थी , रुको आ रही हूं | रोटी हाथ मे थी पर फ़िर भी कह रही थी की रुको आ रही हूं
भिखारी भजन गा रहा था और रोटी मांग रहा था।
सेठ ये सब देख रहा था , पर समझ नही पा रहा था,
आखिर सेठानी से बोला - रोटी हाथ में लेकर खडी हो, वो बाहर मांग रहा हैं , उसे कह रही हो आ रही हूं तो उसे रोटी क्यो नही दे रही हो ?
सेठानी बोली हां रोटी दूंगी, पर क्या है ना की मुझे उसका भजन बहुत प्यारा लग रहा हैं, अगर उसको रोटी दूंगी तो वो आगे चला जायेगा,
मुझे उसका भजन और सुनना हैं !!
यदि प्रार्थना के बाद भी भगवान आपकी नही सुन रहा हैं तो समझना की उस सेठानी की तरह प्रभु को आपकी प्रार्थना प्यारी लग रही हैं इसलिये इंतज़ार करो और प्रार्थना करते रहो।
जीवन मे कैसा भी दुख और कष्ट आये पर भक्ति मत छोडिए।
क्या कष्ट आता है तो आप भोजन करना छोड देते है?
क्या बीमारी आती है तो आप सांस लेना छोड देते हैं? नही ना ?
फिर जरा सी तकलीफ़ आने पर आप भक्ति करना क्यों छोड़ देते हो ?
कभी भी दो चीज मत छोड़िये- - भजन और भोजन !
भोजन छोड़ दोंगे तो ज़िंदा नहीं रहोगे, भजन छोड़ दोंगे तो कहीं के नही रहोगे।
सही मायने में भजन ही भोजन है।

Monday, March 14, 2016

दुर्गुणों का ग्राहक

एक बार ईसा कहीं जा रहे थे। थोड़ी दूर पहुंचने पर उन्हें एक सौदागर मिला। उसने अपने पांच गधों पर अलग-अलग गठरियां लाद रखी थीं। ईसा ने उसे रोका और पूछा,'भाई, तुम इतना सारा वजन लादकर क्या ले जा रहे हो?' सौदागर ने जवाब दिया, 'इन गधों पर लदी गठरियों में ऐसी चीजें हैं जो इंसान मात्र को मेरा गुलाम बना देती हैं। मेरे लिए ये बड़ी उपयोगी चीजे हैं।' यह सुनकर ईसा बोले, 'अच्छा जरा बताओ तो, आखिर ऐसा क्या है तुम्हारी इन गठरियों में जो इंसान तुम्हारा गुलाम बन जाता है?'
इस पर सौदागर हौले-से मुस्कराया और फिर बोला, 'आप जानना ही चाहते हैं तो सुनें! पहले गधे पर अत्याचार लदा है। दूसरे गधे पर लदी गठरी में अहंकार है। तीसरे पर मैंने ईर्ष्या को लादा हुआ है। चौथी गठरी में बेईमानी है और पांचवीं में छल-कपट है।' ईसा ने उससे पूछा, 'भाई, तुमने अपना कारोबार तो बता दिया, लेकिन यह बताओ कि तुम हो कौन?' इस पर सौदागर ने इठला कर जवाब दिया, 'मैं शैतान हूं। देखते नहीं, आज सारी मानव जाति ईश्वर की नहीं, मेरी प्रतीक्षा में रहती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मेरे व्यापार में लाभ ही लाभ है।'
इतना कहकर वह सौदागर अपनी राह की ओर चला गया। उसके चले जाने के बाद ईसा प्रभु से प्रार्थना करने लगे। उन्होंने कहा, 'हे ईश्वर, मानव जाति को विवेक प्रदान कर, ताकि वह शैतान के चंगुल से छुटकारा पा सके। इंसानों को भी यह अहसास तो हो कि वे क्या खरीदते रहते हैं और उन्हें वास्तव में चाहिए क्या!' हमें भी ऐसी ही प्रार्थना करनी चाहिए। मानव जाति की भलाई इसी में है कि वह इन दुर्गुणों का ग्राहक न बने।

Sunday, March 13, 2016

लोगों की अपेक्षा

रात के समय एक दुकानदार अपनी दुकान बन्द ही कर रहा था कि एक कुत्ता दुकान में आया । उसके मुॅंह में एक थैली थी  जिसमें सामान की लिस्ट और पैसे थे  दुकानदार ने पैसे लेकर सामान उस थैली में भर दिया
कुत्ते ने थैली मुॅंह मे उठा ली और चला गया। दुकानदार आश्चर्यचकित होके कुत्ते के पीछे पीछे गया  ये देखने की इतने समझदार कुत्ते का मालिक कौन है   कुत्ता बस स्टाॅप पर खडा रहा थोडी देर बाद एक बस आई जिसमें चढ गया।  कंडक्टर के पास आते ही अपनी गर्दन आगे कर दी।उस के गले के बेल्ट में पैसे और उसका पता भी था। कंडक्टर ने पैसे लेकर टिकट कुत्ते के गले के बेल्ट मे रख दिया। अपना स्टाॅप आते ही कुत्ता आगे के दरवाजे पे चला गया और पूॅंछ हिलाकर कंडक्टर को इशारा कर दिया। बस के रुकते ही उतरकर चल दिया
दुकानदार भी पीछे पीछे चल रहा था कुत्ते ने घर का दरवाजा अपने पैरोंसे २-३ बार खटखटाया  अन्दर से उसका मालिक आया और लाठी से उसकी पिटाई कर दी  दुकानदार ने मालिक से इसका कारण पूछा । मालिक बोला  
"साले ने मेरी नींद खराब कर दी। चाबी साथ लेके नहीं जा सकता था गधा।" जीवन की भी यही सच्चाई है। आपसे लोगों की अपेक्षाओं का कोई अन्त नहीं है
जहाँ आप चूके
वहीं पर बुराई निकाल लेते हैं
और पिछली सारी अच्छाईयों को
भूल जाते हैं।

देख लो । यह संसार हैं ।

Saturday, March 12, 2016

सबसे बड़ी सीख

पढ़ाई पूरी करने के बाद एक छात्र किसी बड़ी कंपनी में नौकरी पाने की चाह में इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा....
छात्र ने बड़ी आसानी से पहला इंटरव्यू पास कर लिया...
अब फाइनल इंटरव्यू
कंपनी के डायरेक्टर को लेना था...
और डायरेक्टर को ही तय
करना था कि उस छात्र को नौकरी पर रखा जाए या नहीं...
डायरेक्टर ने छात्र का सीवी   देखा और पाया  कि पढ़ाई के साथ- साथ यह  छात्र ईसी (extra curricular activities)  में भी हमेशा अव्वल रहा...
डायरेक्टर- "क्या तुम्हें  पढ़ाई के दौरान
कभी छात्रवृत्ति  मिली...?"
छात्र- "जी नहीं..."
डायरेक्टर- "इसका मतलब स्कूल-कॉलेज  की फीस तुम्हारे पिता अदा करते थे.."
छात्र- "जी हाँ , श्रीमान ।"
डायरेक्टर- "तुम्हारे पिताजी  क्या काम  करते  है?"
छात्र- "जी वो लोगों के कपड़े धोते हैं..."
यह सुनकर कंपनी के डायरेक्टर ने कहा- "ज़रा अपने हाथ तो दिखाना..."
छात्र के हाथ रेशम की तरह मुलायम और नाज़ुक थे...
डायरेक्टर- "क्या तुमने कभी  कपड़े धोने में अपने  पिताजी की मदद की...?"
छात्र- "जी नहीं, मेरे  पिता हमेशा यही चाहते थे
कि मैं पढ़ाई  करूं और ज़्यादा से ज़्यादा किताबें
पढ़ूं...
हां , एक बात और, मेरे पिता बड़ी तेजी  से कपड़े धोते हैं..."
डायरेक्टर- "क्या मैं तुम्हें  एक काम कह सकता हूं...?"
छात्र- "जी, आदेश कीजिए..."
डायरेक्टर- "आज घर वापस जाने के बाद अपने पिताजी के हाथ धोना...
फिर कल सुबह मुझसे आकर मिलना..."
छात्र यह सुनकर प्रसन्न हो गया...
उसे लगा कि अब नौकरी  मिलना तो पक्का है,
तभी तो  डायरेक्टर ने कल फिर बुलाया है...
छात्र ने घर आकर खुशी-खुशी अपने पिता को ये सारी बातें बताईं और अपने हाथ दिखाने को कहा...
पिता को थोड़ी हैरानी हुई...
लेकिन फिर भी उसने बेटे
की इच्छा का मान करते हुए अपने दोनों हाथ उसके
हाथों में दे दिए...
छात्र ने पिता के हाथों को धीरे-धीरे धोना शुरू किया। कुछ देर में ही हाथ धोने के साथ ही उसकी आंखों से आंसू भी झर-झर बहने लगे...
पिता के हाथ रेगमाल  की तरह सख्त और जगह-जगह से कटे हुए थे...
यहां तक कि जब भी वह  कटे के निशानों पर  पानी डालता, चुभन का अहसास
पिता के चेहरे पर साफ़ झलक जाता था...।
छात्र को ज़िंदगी में पहली बार एहसास हुआ कि ये
वही हाथ हैं जो रोज़ लोगों के कपड़े धो-धोकर उसके
लिए अच्छे खाने, कपड़ों और स्कूल की फीस का इंतज़ाम करते थे...
पिता के हाथ का हर छाला सबूत था उसके एकेडैमिक कैरियर की एक-एक
कामयाबी का...
पिता के हाथ धोने के बाद छात्र को पता ही नहीं चला कि उसने  उस दिन के बचे हुए सारे कपड़े भी एक-एक कर धो डाले...
उसके पिता रोकते ही रह गए , लेकिन छात्र अपनी धुन में कपड़े धोता चला गया...
उस रात बाप- बेटे ने काफ़ी देर तक बातें कीं ...
अगली सुबह छात्र फिर नौकरी  के लिए कंपनी के  डायरेक्टर के ऑफिस में था...
डायरेक्टर का सामना करते हुए छात्र की आंखें गीली थीं...
डायरेक्टर- "हूं , तो फिर कैसा रहा कल घर पर ?
क्या तुम अपना अनुभव मेरे साथ शेयर करना पसंद करोगे....?"
छात्र- " जी हाँ , श्रीमान कल मैंने जिंदगी का एक वास्तविक अनुभव सीखा...
नंबर एक... मैंने सीखा कि सराहना क्या होती है...
मेरे पिता न होते तो मैं पढ़ाई में इतनी आगे नहीं आ सकता था...
नंबर दो... पिता की मदद करने से मुझे पता चला कि किसी काम को करना कितना सख्त और मुश्किल होता है...
नंबर तीन.. . मैंने रिश्तों की अहमियत पहली बार
इतनी शिद्दत के साथ महसूस की..."
डायरेक्टर- "यही सब है जो मैं अपने मैनेजर में देखना चाहता हूं...
मैं यह नौकरी केवल उसे  देना चाहता हूं जो दूसरों की मदद की कद्र करे,
ऐसा व्यक्ति जो काम किए जाने के दौरान दूसरों की तकलीफ भी महसूस करे...
ऐसा शख्स जिसने
सिर्फ पैसे को ही जीवन का ध्येय न बना रखा हो...
मुबारक हो, तुम इस नौकरी  के पूरे हक़दार हो..."
आप अपने बच्चों को बड़ा मकान दें, बढ़िया खाना दें,
बड़ा टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर सब कुछ दें...
लेकिन साथ ही  अपने बच्चों को यह अनुभव भी हासिल करने दें कि उन्हें पता चले कि घास काटते हुए कैसा लगता है उन्हें  भी अपने हाथों से ये  काम करने दें...
खाने के बाद कभी बर्तनों को धोने का अनुभव भी अपने साथ घर के सब बच्चों को मिलकर करने दें...
ऐसा इसलिए
नहीं कि आप मेड पर पैसा खर्च नहीं कर सकते,
बल्कि इसलिए कि आप अपने बच्चों से सही प्यार करते हैं...
आप उन्हें समझाते हैं कि पिता कितने भी अमीर
क्यों न हो, एक दिन उनके बाल सफेद होने ही हैं...
सबसे अहम हैं आप के बच्चे  किसी काम को करने
की कोशिश की कद्र करना सीखें...
एक दूसरे का हाथ
बंटाते हुए काम करने का जज्ब़ा अपने अंदर
लाएं...
 

 

Thursday, March 10, 2016

लक्ष्य पर विश्वास

एक बार कुछ scientists ने एक बड़ा ही interesting experiment किया..
उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से cage में बंद कर दिया और बीचों -बीच एक सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..
जैसा की expected था, जैसे ही एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..
पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..
पर experimenters यहीं नहीं रुके,
उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..
बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..
पर वे कब तक बैठे रहते,
कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..
अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..
और इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी..
एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए...
थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाक्य हुआ..
बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया,
ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..
अब experimenters ने एक और interesting चीज़ की..
अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..
नया बन्दर वहां के rules क्या जाने..
वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..
पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..
उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..
ख़ैर उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..
इसके बाद experimenters ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..
इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!
experiment के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..
पर उनका behaviour भी पुराने बंदरों की तरह ही था..
वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..
Friends, हमारी society में भी ये behaviour देखा जा सकता है..
जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है,
चाहे वो पढ़ाई , खेल , एंटरटेनमेंट, business, राजनीती, समाजसेवा या किसी और field से related हो, उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं..
उसे failure का डर दिखाया जाता है..
और interesting बात ये है कि उसे रोकने वाले maximum log वो होते हैं जिन्होंने ख़ुद उस field में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता..
इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आस पास के लोगों का opposition face करना पड़ रहा है तो थोड़ा संभल कर रहिये..
अपने logic और guts की सुनिए..ख़ुद पर और अपने लक्ष्य पर विश्वास क़ायम रखिये...और बढ़ते रहिये |

Friday, March 4, 2016

उम्मीदवार की योग्यता

एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए, उजड़े वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये!

हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ??

यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा !

 भटकते भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात बीता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे !

रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था।

 वह जोर से चिल्लाने लगा।

हंसिनी ने हंस से कहा- अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते।

 ये उल्लू चिल्ला रहा है।

हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ??

 ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही।

पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बातें सुन रहा था।

 सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई, मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ करदो।

हंस ने कहा- कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद!

यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा

पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो।

हंस चौंका- उसने कहा, आपकी पत्नी ??

 अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है,मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है!

उल्लू ने कहा- खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है।

दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग एकत्र हो गये।

कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी।

पंचलोग भी आ गये!

बोले- भाई किस बात का विवाद है ??

लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है!

 लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे।

 हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है।

इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना चाहिए!

फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों की जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है!

यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया।

उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली!

रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - ऐ मित्र हंस, रुको!

 हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ??

पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?

उल्लू ने कहा- नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी!

लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है!

मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है।

 यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं!

शायद 65 साल की आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने उम्मीदवार की योग्यता न देखते हुए, हमेशा ये हमारी जाति का है. ये हमारी पार्टी का है के आधार पर अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है, देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैँ!

Thursday, March 3, 2016

स्त्री के रूप

जब भगवान स्त्री की रचना कर रहे थे तब उन्हें काफी समय लग गया । आज छठा दिन था और स्त्री की रचना अभी भी अधूरी थी।
इसिलए देवदूत ने पूछा भगवन्, आप इसमें इतना समय क्यों ले रहे हो...?🏻

भगवान ने जवाब दिया, "क्या तूने इसके सारे गुणधर्म (specifications) देखे हैं, जो इसकी रचना के लिए जरूरी है ?

१. यह हर प्रकार की परिस्थितियों को संभाल सकती है

२. यह एक साथ अपने सभी बच्चों को संभाल सकती है एवं खुश रख सकती है ।

३. यह अपने प्यार से घुटनों की खरोंच से लेकर टूटे हुये दिल के घाव भी भर सकती है ।

४. यह सब सिर्फ अपने दो हाथों से कर सकती है

५. इस में सबसे बड़ा "गुणधर्म" यह है कि बीमार होने पर भी अपना ख्याल खुद रख सकती है एवं 18 घंटे काम भी कर सकती है।

देवदूत चकित रह गया और आश्चर्य से पूछा-

🏻"भगवान ! क्या यह सब दो हाथों से कर पाना संभव है ?"

भगवान ने कहा यह स्टैंडर्ड रचना है
(यह गुणधर्म सभी में है )

देवदूत ने नजदीक जाकर स्त्री को हाथ लगाया और कहा, "भगवान यह तो बहुत नाज़ुक है"

भगवान ने कहा हाँ यह बहुत ही नाज़ुक है, मगर इसे बहुत Strong बनाया है ।

इसमें हर परिस्थितियों को संभालने की ताकत है

देवदूत ने पूछा क्या यह सोच भी सकती है ??

भगवान ने कहा यह सोच भी सकती है और मजबूत हो कर मुकाबला भी कर सकती है।

देवदूत ने नजदीक जाकर स्त्री के गालों को हाथ लगाया और बोला, "भगवान ये तो गीले हैं। लगता है इसमें से लिकेज हो रहा है।"

भगवान बोले, "यह लीकेज नहीं है, यह इसके आँसू हैं।"

देवदूत: आँसू किस लिए ??

भगवान बोले : यह भी इसकी ताकत हैं । आँसू इसको फरीयाद करने एवं प्यार जताने एवं अपना अकेलापन दूर करने का तरीका है

देवदूत: भगवान आपकी रचना अदभुत है । आपने सब कुछ सोच कर बनाया है, आप महान है🏻

भगवान बोले-
यह स्त्री रूपी रचना अदभुत है । यही हर पुरुष की ताकत है जो उसे प्रोत्साहित करती है। वह सभी को खुश देखकर खुश रहतीँ है। हर परिस्थिति में हंसती रहती है । उसे जो चाहिए वह लड़ कर भी ले सकती है। उसके प्यार में कोइ शर्त नहीं है (Her love is unconditional) उसका दिल टूट जाता है जब अपने ही उसे धोखा दे देते है । मगर हर परिस्थितियों से समझौता करना भी जानती है।

देवदूत: भगवान आपकी रचना संपूर्ण है।

भगवान बोले ना, अभी इसमें एक त्रुटि है

"यह अपनी "महत्वत्ता" भूल जाती है"

व्यक्तित्व की गरिमा

जब सुमित से उसकी दोस्ती हुई तब आकाश उन दिनों कालेज में पढता था. आकाश ग्रामीण परिवेश से आया था. शहर का माहौल उसके लिए नया था. सुमित उसकी क्लास में सबसे ज्यादा मिलनसार और हंसमुख लड़का था, यही वजह थी कि आकाश की उससे दोस्ती बड़ी जल्दी हो गई.
      आकाश सबसे कम बात करने वाला लड़का था और सुमित सबसे बड़ी जल्दी दोस्ती कर लेता था. यही कारण था कि उसके कालेज में सबसे अधिक दोस्त थे. कहते हैं कि सबसे ज्यादा जलन अपने वाले से होती है. आकाश को भी सुमित से जलन होने लगी. सुमित की खुशहाल जिंदगी और उसके चेहरे पर हमेशा प्रसन्नता और जीत के भाव देखकर आकाश के मन को जलन होती. आकाश उससे ईर्ष्या करने लगा.
आकाश को कई बार लगता कि सुमित उससे जलता है. उसे लगता कि सुमित घर-परिवार से संपन्न और खुशहाल है, इसलिए वो उसके सामने अपना रुतबा और बड़प्पन दिखाता रहता है. वह उससे हमेशा ईर्ष्या करता. सुमित के प्रति उसकी भावनाएं उसे अन्दर ही अन्दर जलाने लगीं.
एक दिन किसी काम से आकाश का सुमित के घर जाना हुआ. जब वो सुमित के घर पहुंचा तो घर पहुंचकर वहां के हालात उसे अपनी कल्पनाओं से बिलकुल विपरीत मिले. आकाश का घर बहुत ही छोटा और मामूली था. आर्थिक स्थिति भी उसकी ठीक नहीं थी. उसके घर में एक बीमार पिता, दो छोटी बहनें जिनकी शादी की जिम्मेदारी भी आकाश की थी. सुमित के माता पिता ने आकाश को उसका दोस्त समझकर उसके संघर्ष की पूरी कहानी बताई कि किस तरह सुमित सुबह-शाम पार्ट टाइम जॉब करके घर का खर्च चला रहा है और अपनी पढाई कर रहा है. सुमित की मेहनत और संघर्ष की कहानी सुनकर आकाश कि आँखों में आंसू भर आये और सुमित का कद उसकी नज़रों में कई गुना बढ़ गया.
सुमित के पिताजी ने  बताया कि सुमित हमेशा उसकी तारीफ करता है. हमेशा सोचता है कि आकाश की मदद करता रहे, वह इस शहर में नया-नया जो है.
सुमित जब वहाँ से घर वापिस आया तो उसे अपनी भावनाओं से बहुत ग्लानि महसूस हई. उसे बहुत पश्चाताप हुआ कि सुमित ने हमेशा उसकी सहायता की उसने हमेशा सुमित से ईर्ष्या की, जब कि सुमित धन दौलत के मामले में उससे बहुत ही कमजोर है.
आज सुमित गरीब होकर भी अमीर है और वो अमीर होकर भी गरीब है.
गलत सुमित नहीं वो खुद है जब कि सुमित उससे हर तरह महान है. और उसने उसी दिन से अपने आपको बदलने का निश्चय कर लिया.