Tuesday, March 29, 2016

आज महत्वपूर्ण है

आइजक न्यूटन का बचपन परेशानियों में बीता | जब वे 3 साल के थे,तब उनकी माँ ने बरनाब्स स्मिथ नामक एक धनवान व्यक्ति से विवाह कर लिया और आइजक को उनकी नानी के पास छोड़ दिया था | फिर वे अपने दुसरे पति के साथ नार्थ विदम चली गयी थी | उसके बाद न्यूटन की शिक्षा वुल्सथार्प ग्राथम में 7 मील दूर हुई| वहाँ उन्हें मंद-बुद्धि समझा जाता था | क्युकी वे बचपन से ही आकाशीय पिंडों की ओर आकर्षित रहते थे, और सूरज की किरणों को देखकर उन्हें आश्चर्य होता था| फिर ग्रंथम में वे ओषधविद विलियम क्लार्क के साथ रहे, जिन्होंने उन्हें रसायन विज्ञान की ओर प्रेरित किया|

    लेकिन 1658 में आइजक ने स्कूल छोड़ दिया और पुश्तैनी जमीन जायजाद की देखभाल करने लगे | परन्तु उस काम में उनका मन नहीं लगा | फिर 1661 में वे ट्रिनिटी कॉलेज में पुन पढने चले गए|

तब उन्होंने कहा था,

  “अच्छा नाविक वही होता है,जो पतवार पर भरोसा नहीं करता,बल्कि हवा के रुख को पहचानता है | मैने भी हवा के रुख को पहचाना, और कुछ नया करने में जुट गया|”

बाद में जब उन्होंने पेड़ से गिरते हुए सेब को देखा, तो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण का सिधांत ईजाद हो गया| फिर न्यूटन ने अपने कमरे में रासायनिक प्रयोगों के लिए 2 भट्टियाँ लगाई और टेलिस्कोप का निर्माण किया | 1671 में न्यूटन ने जब उस टेलिस्कोप को रॉयल सोसाइटी में प्रदर्शित किया गया,तो तहलका मच गया, और उन्हें रॉयल सोसाइटी का मेम्बर चुना गया| 
उसके बाद न्यूटन के ग्रन्थ “प्रिंसिपिया” का प्रकाशन हुआ,जो गुरुत्वाकर्षण, मैकेनिक, और द्रव्यों पर आधारित था | वह ग्रन्थ महारानी ऐनी को बहुत पसंद आया,जिसकी वजह से न्यूटन को ‘सर’ की उपाधि प्रदान की गयी, और तब से उनका एक महान व्येज्ञानिक के रूप में इतिहास के सुन्हेरे पन्नों में दर्ज हुआ| 

कल महत्वपूर्ण नहीं है,आज महत्वपूर्ण है | कल तो पिछली रात को खत्म हो चुका हैं| इसलिए अतीत में मत झाकों,वर्ना भविष्य धुंधला हो जायेंगा | क्युकी आप जहां जा रहे हैं,वह महत्वपूर्ण हैं,कितनी जल्दी पहुचेंगे यह महत्वपूर्ण नहीं है | यह वजह है की जल्दीबाज हमेशा शिखर पर देर से पहुचता हैं | वैसे भी कहावत हैं, की राते पर नज़र रखे, और खतरा टालने के लिए आईने को देखें | लोग आपको कार्यों से आंकते हैं, आपके इरादों से नहीं|

Monday, March 28, 2016

स्वर्ग का अर्थ

एक यात्री अपने घोड़े और कुत्ते के साथ सड़क पर चल रहा था. जब वे एक विशालकाय पेड़ के पास से गुज़र रहे थे तब उनपर आसमान से बिजली गिरी और वे तीनों तत्क्षण मर गए. लेकिन उन तीनों को यह प्रतीत नहीं हुआ कि वे अब जीवित नहीं है और वे चलते ही रहे. कभी-कभी मृत प्राणियों को अपना शरीरभाव छोड़ने में समय लग जाता है.
उनकी यात्रा बहुत लंबी थी. आसमान में सूरज ज़ोरों से चमक रहा था. वे पसीने से तरबतर और बेहद प्यासे थे. वे पानी की तलाश करते रहे. सड़क के मोड़ पर उन्हें एक भव्य द्वार दिखाई दिया जो पूरा संगमरमर का बना हुआ था. द्वार से होते हुए वे स्वर्ण मढ़ित एक अहाते में आ पहुंचे. अहाते के बीचोंबीच एक फव्वारे से आईने की तरह साफ़ पानी निकल रहा था.
यात्री ने द्वार की पहरेदारी करनेवाले से कहा:
“नमस्ते, यह सुन्दर जगह क्या है?
“यह स्वर्ग है”.
“कितना अच्छा हुआ कि हम चलते-चलते स्वर्ग आ पहुंचे. हमें बहुत प्यास लगी है.”
“तुम चाहे जितना पानी पी सकते हो”.
“मेरा घोड़ा और कुत्ता भी प्यासे हैं”.
“माफ़ करना लेकिन यहाँ जानवरों को पानी पिलाना मना है”
यात्री को यह सुनकर बहुत निराशा हुई. वह खुद बहुत प्यासा था लेकिन अकेला पानी नहीं पीना चाहता था. उसने पहरेदार को धन्यवाद दिया और अपनी राह चल पड़ा. आगे और बहुत दूर तक चलने के बाद वे एक बगीचे तक पहुंचे जिसका दरवाज़ा जर्जर था और भीतर जाने का रास्ता धूल से पटा हुआ था.
भीतर पहुँचने पर उसने देखा कि एक पेड़ की छाँव में एक आदमी अपने सर को टोपी से ढंककर सो रहा था.
“नमस्ते” – यात्री ने उस आदमी से कहा – “मैं, मेरा घोड़ा और कुत्ता बहुत प्यासे हैं. क्या यहाँ पानी मिलेगा?”
उस आदमी ने एक ओर इशारा करके कहा – “वहां चट्टानों के बीच पानी का एक सोता है. जाओ जाकर पानी पी लो.”
यात्री अपने घोड़े और कुत्ते के साथ वहां पहुंचा और तीनों ने जी भर के अपनी प्यास बुझाई. फिर यात्री उस आदमी को धन्यवाद कहने के लिए आ गया.
“यह कौन सी जगह है?”
“यह स्वर्ग है”.
“स्वर्ग? इसी रास्ते में पीछे हमें एक संगमरमरी अहाता मिला, उसे भी वहां का पहरेदार स्वर्ग बता रहा था!”
“नहीं-नहीं, वह स्वर्ग नहीं है. वह नर्क है”.
यात्री अब अपना आपा खो बैठा. उसने कहा – “भगवान के लिए ये सब कहना बंद करो! मुझे कुछ भी समझ में नहीं आ रहा है कि यह सब क्या है!”
आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा – “नाराज़ न हो भाई, संगमरमरी स्वर्ग वालों का तो हमपर बड़ा उपकार है. वहां वे सभी लोग रुक जाते हैं जो अपने भले के लिए अपने सबसे अच्छे दोस्तों को भी छोड़ सकते हैं.”

Sunday, March 27, 2016

परिवर्तन

  एक लड़का सुबह सुबह दौड़ने को जाया करता था | आते जाते वो एक बूढी महिला को देखता था | वो बूढी महिला तालाब के किनारे छोटे छोटे कछुवों की पीठ को साफ़ किया करती थी | एक दिन उसने इसके पीछे का कारण जानने की सोची |
वो लड़का महिला के पास गया और उनका अभिवादन कर बोला ” नमस्ते आंटी ! मैं आपको हमेशा इन कछुवों की पीठ को साफ़ करते हुए देखता हूँ आप ऐसा किस वजह से करते हो ?”  महिला ने उस मासूम से लड़के को देखा और  इस पर लड़के को जवाब दिया ” मैं हर रविवार यंहा आती हूँ और इन छोटे छोटे कछुवों की पीठ साफ़ करते हुए सुख शांति का अनुभव लेती हूँ |”  क्योंकि इनकी पीठ पर जो कवच होता है उस पर कचता जमा हो जाने की वजह से इनकी गर्मी पैदा करने की क्षमता कम हो जाती है इसलिए ये कछुवे तैरने में मुश्किल का सामना करते है | कुछ समय बाद तक अगर ऐसा ही रहे तो ये कवच भी कमजोर हो जाते है इसलिए कवच को साफ़ करती हूँ |यह सुनकर लड़का बड़ा हैरान था | उसने फिर एक जाना पहचाना सा सवाल किया और बोला “बेशक आप बहुत अच्छा काम कर रहे है लेकिन फिर भी आंटी एक बात सोचिये कि इन जैसे कितने कछुवे है जो इनसे भी बुरी हालत में है जबकि आप सभी के लिए ये नहीं कर सकते तो उनका क्या क्योंकि आपके अकेले के बदलने से तो कोई बड़ा बदलाव नहीं आयेगा न |
महिला ने बड़ा ही संक्षिप्त लेकिन असरदार जवाब दिया कि भले ही मेरे इस कर्म से दुनिया में कोई बड़ा बदलाव नहीं आयेगा लेकिन सोचो इस एक कछुवे की जिन्दगी में तो बदल्वाव आयेगा ही न | तो क्यों हम छोटे बदलाव से ही शुरुआत करें |


अच्छी फसल

एक अतिश्रेष्ठ व्यक्ति थे, एक दिन उनके पास एक निर्धन आदमी आया और बोला की मुझे अपना खेत उधार दे दीजिये, मैं उसमें खेती करूँगा और खेती करके कमाई करूँगा ....

वह अतिश्रेष्ठ व्यक्ति बहुत दयालु थे ...
उन्होंने उस निर्धन व्यक्ति को अपना खेत दे दिया और साथ में पांच किसान भी सहायता के रूप में खेती करने को दिये और कहा की इन पांच किसानों को साथ में लेकर खेती करो, खेती करने में आसानी होगी ...
इस से तुम और अच्छी फसल की खेती करके कमाई कर पाओगे।

वो निर्धन आदमी ये देख के बहुत खुश हुआ की उसको उधार में खेत भी मिल गया और साथ में काम करने के लिय पांच सहायक किसान भी मिल गये।

लेकिन वो आदमी अपनी इस ख़ुशी में बहुत खो गया और वह पांच किसान अपनी मर्ज़ी से खेती करने लगे और वह निर्धन आदमी अपनी ख़ुशी में डूबा रहा .....
और जब फसल काटने का समय आया तो देखा की फसल बहुत ही ख़राब हुई थी, उन पांच किसानो ने खेत का उपयोग अच्छे से नहीं किया था और ना ही उसमें अच्छे बीज ही डाले थे, जिससे फसल अच्छी हो सके |

जब उस अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति ने अपना खेत वापस माँगा तो वह निर्धन व्यक्ति रोता हुआ बोला की मैं बर्बाद हो गया, मैं अपनी ख़ुशी में डूबा रहा और इन पांचों किसानो को नियंत्रण में ना रख सका और ना ही इनसे अच्छी खेती करवा सका।

अब यहाँ ध्यान दीजियेगा-

वह अतिश्रेष्ठ दयालु व्यक्ति हैं - "भगवान" ....

और वह निर्धन व्यक्ति हैं -"हम"

खेत है -"हमारा शरीर"

और वह पांच किसान हैं हमारी इन्द्रियां-:
आँख, कान, नाक,जीभ और मन।

प्रभु ने हमें यह शरीर रुपी खेत अच्छी फसल (कर्म) करने को दिया है और हमें इन पांच किसानो को अर्थात इन्द्रियों को अपने नियंत्रण में रख कर अपनें कर्म करने चाहियें, जिससे जब वो दयालु प्रभु जब ये शरीर वापस मांग कर हमारा हिसाब करें तो हमें रोना ना पड़े

Friday, March 25, 2016

मन का कूड़ा

एक बार स्वामी रामदास जी भिक्षा मांगते हुए किसी घर के सामने खड़े हुए और उन्होने आवाज लगाई,
"रघुवीर समर्थ !'
घर की स्त्री बाहर आई। उसने उनकी झोली में भिक्षा डाली और कहा, महात्मा जी कोई उपदेश दीजिये।
स्वामी रामदास जी बोले,  " आज नहीं कल दूंगा ! ' दूसरे दिन स्वामी रामदास जी ने पुन: उस घर के सामने आवाज लगाई,  " रघुवीर समर्थ!'
उस घर की स्त्री ने उस दिन खीर बनाई थी। वह खीर का कटोरा लेकर बाहर आई।
स्वामी जी ने अपना कमंडल आगे कर दिया।
वह स्त्री जब खीर डालने लगी तो उसने देखा कि कमंडल में कूड़ा भरा है। उसके हाथ ठिठक गए। वह बोली, 
" महाराज कमंडल तो गदां है!'
रामदास जी बोले, " हां गंदा तो है, किंतु खीर इसमें डाल दो।'
स्त्री बोली, " नहीं महाराज तब तो खीर खराब हो जाएगी।
लावों कमंडल मै धो लाती हू।'
स्वामी जी बोले, मतलब जब कमंडल साफ होगा तभी खीर डालोगी।'
स्त्री बोली, "जी महाराज।' स्वामी जी बोले, " मेरा भी यही उपदेश है। मन में जब तक चिंताओ का कूड़ा-- करकट और बुरे संस्कार रुपी गोबर भरा है।
तब तक उपदेशामृत का कोई लाभ नहीं होगा।
मन साफ हो, तभी आनदं की अनुभूति प्राप्त होती है।

Saturday, March 19, 2016

दुख और नमक

एक बार एक नव युवक गौतम बुद्ध के पास पहुंचा,और  बोला- महात्मा जी! मैं अपनी जिन्दगी से बहुत परेशान हूँ।  कृपया इस परेशानी से निकलने का उपाय बताएं?  बुद्ध बोले- पानी के गिलास में एक मुट्ठी नमक डालो,
और उसे पियो।   युवक ने ऐसा ही किया।   इसका स्वाद कैसा लगा?  बुद्ध ने पूछा।   बहुत ही खराब, एकदम खारा।  युवक थूकते हुए बोला।  बुद्ध मुस्कुराते हुए बोले- एक बार फिर अपने हाथ में एक मुट्ठी नमक ले लो,
और मेरे पीछे-पीछे आओ।  दोनों धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे, और थोड़ी दूर जाकर स्वच्छ पानी से बनी एक झील  सामने रुक गए।  चलो, अब इस नमक को इस झील में डाल दो।  बुद्ध ने निर्देश दिया।  युवक ने ऐसा ही या अब इस झील का पानी पियो।  बुद्ध बोले।  युवक पानी पीने लगा   एक बार फिर बुद्ध ने पूछा- बताओ  सका स्वाद  सा है?  क्या अभी भी तुम्हें ये खारा लग रहा है?  नहीं! ये तो मीठा है, बहुत अच्छा है  युवक बोला   बुद्ध युवक के     ल में बैठ गए,  और उसका हाथ थामते हुए बोले- जीवन के दुख बिलकुल नमक की तरह हैं,  न इससे कम, ना ।
जीवन में दुःख की मात्रा वही रहती है,  बिलकुल वही   लेकिन हम कितने दुख का स्वाद लेते हैं  ये इस पर निर्भर करता है, कि हम उसे किस पात्र में डाल रहे हैं।  इसलिए जब तुम दुखी हो,  तो सिर्फ इतना कर सकते हो,  कि खुद के मन को बड़ा कर लो।    गिलास मत बने रहो 

Friday, March 18, 2016

पथिकों का मसीहा

न्यूयॉर्क में कॉलेज का एक छात्र प्लेटफॉर्म पर उतरा। वह स्टेशन से बाहर निकल कुछ दूर ही चला था कि अचानक मूसलाधार बारिश होने लगी। बचाव का कोई साधन नजर नहीं आ रहा था। तभी एक वृद्ध छात्र के पास आया और छतरी उसके ऊपर करते हुए बोला,'चलो बेटे, मैं तुम्हें तुम्हारी मंजिल तक पहुंचा आऊं।' छात्र ऐसी तेज बारिश में एक वृद्ध को अचानक देखकर थोड़ा चौंका, फिर उसके साथ चल दिया।
वृद्ध उसे हॉस्टल के कमरे तक सकुशल पहुंचा कर जाने लगा । जब वह वृद्ध कमरे से बाहर निकलने लगा तो छात्र बोला, 'बाबा, मैं आपसे एक बात पूछना चाहता हूं । मेरा और आपका पूर्व परिचय नहीं है। ऐसे में इतनी तेज बारिश में आपने अपनी उम्र का ध्यान भी नहीं रखा और मुझे छतरी के साथ मेरे हॉस्टल तक छोड़ने आए। इसके पीछे कुछ वजह तो अवश्य है ।' छात्र की बात सुनकर वृद्ध की आंखों में आंसू आ गए।
वह बोला, 'बेटा, आज से तीस साल पहले मैं बहुत गरीब था। मेरे तीन बेटे थे। एक दिन वे तीनों बाहर गए हुए थे। अचानक तेज बारिश हो गई। उन दिनों मेरे पास एक भी छाता नहीं था । मेरे तीनों बेटे भीगते हुए घर आए और उन्हें निमोनिया हो गया। निमोनिया के कारण एक के बाद एक मेरे तीनों बेटे मौत की गोद में सो गए। मेरे बेटे तो मुझे वापिस नहीं मिल सकते। लेकिन मैं ऐसे अनगिनत बेटों को छतरी का सहारा देकर बचा अवश्य सकता हूं जिनके पास बारिश से बचने का कोई सहारा नहीं होता।'
यह सुनकर छात्र की आंखों में आंसू आ गए। वह वृद्ध का हाथ पकड़कर उन्हें गले लगाता हुआ बोला, 'सर, आज से मैं आपका बेटा हूं ।' बारिश में लोगों की मदद करने वाला यह वृद्ध व्यक्ति अमेरिका के न्यूयॉर्क का एक समाजसेवी सर जॉन फेब्रिक्र था। आज भी उस वृद्ध व्यक्ति को अमेरिका में 'पथिकों का मसीहा' के रूप में जाना जाता है

संकल्प

" क्या हुआ ? जबसे आप ऑफिस से लौटे हैं बहुत परेशान लग रहे हैं !"
" हाँ मैं परेशान हूँ शकुन, आज भी तुमने बच्चों और मेरा छोड़ा हुआ खाना
 घर के आगे जानवरों के खाने के लिए डाल रखा था।"
" जी हाँ,वो तो मैं रोज़ डालती हूँ। फिर... ?"
" जब मैं ऑफिस के लिए निकला तो देखा कि एक बदहाल बच्चे और कुत्ते में भोजन को ग्रहण करने के लिए द्वन्द चल रहा था।खुद पर झपटते कुत्ते को बच्चे ने पत्थर मारकर भगा दिया और भोजन पर टूट पड़ा। "
" अरे ?" हैरानी से उसके मुँह से निकल पड़ा।
" मुझे निकलते देखकर बच्चे ने शर्मिंदा होकर भोजन छोड़ दिया।
तभी मौका पाकर वो कुत्ता आया और बचा हुआ भोजन चट कर गया।"
" हे भगवान "
" बच्चे ने जिस बेचारगी से उस खत्म होते हुए खाने को देखा,मेरा दिल दहल गया।एक ओर हम जैसे लोग हैं जो अन्न की इतनी बर्बादी करते हैं।और दूसरी ओर इतने बेबस लोग ..जिन्हें पेट की आग इतना मजबूर करती है की वो कैसे भी इस ज्वाला को शांत कर लेना चाहते हैं।" व्याकुलता अब विश्वास के चेहरे पर नज़र आ रही थी।
" तो आप मुझसे कह देते।मैं उसे कुछ न कुछ खिला देती "
" मैंने उसे खाने के लिए पैसे तो दे दिए थे। पर बचपन से अब तक जितना अन्न मैंने बर्बाद किया है अब उसका प्रायश्चित करूँगा।"
" मतलब ?"
" आज से मैं सिर्फ एक वक़्त भोजन ग्रहण करूँगा।"

Wednesday, March 16, 2016

देश की शान

एक लड़की थी  रात को office से वापस लौट रही थी  देर भी हो गई थी.
पहली बार ऐसा हुआ   और काम भी ज्यादा था  तोTime का पता ही नहीं चला  वो सीधे auto stand पहुँची.. वहाँ एक लड़का खड़ा था  वो लड़की उसे देखकर  डर गई कि कहीं उल्टा सीधा  ना हो जाए तभी वो लड़का  पास आया और कहा - बहन तू   मौका नहीं जिम्मेदारी है मेरी  और जब तक तुझे कोई गाड़ी  नहीं मिल जाती   मैं तुम्हे छोड़करकहीं नहीं जाऊँगा  don't worry...  वहाँ से एक auto वाला   गुजर रहा था  लडकी को अकेली लड़के के साथ देखा
तो तुरंत auto रोक दिया  और कहा - कहाँ जाना है  मैडम ??.--आइये  मैं आपको छोड़ देता हूँ  लड़की auto में बैठ गई।
रास्ते में वो auto वाला  बोला - तुम मेरी बेटी जैसी हो ।  इतनी रात को तुम्हें अकेला देखा  तो auto रोक दिया।  जकल जमाना खराब है ना  और अकेली लड़की मौकां nhi  जिम्मेदारी होती है।  लड़की जहाँ रहती थी  वो एरिया आ चुका था।  वो auto से उतर गई  और auto वाला चला गया।  लेकिन अब भी लड़की को  दो 2 अंधेरी गलियों से होकर गुजरना था  वहाँ से चलकर जाना था  तभी वहाँ से साईकल वाला गुजर रहा था  शायद वो भी काम से  वापस घर की ओरजा रहा था  लड़की को अकेली देखकर  कहा - आओ! मैं तुम्हें घर तक छोड़ देता हूँ   उसने एक टोर्च लेकर उस लड़की के साथ  अंधेरी गली की और निकल पड़ा  वो लड़की घर पहुँच चुकी थी।  आज किसी की  बेटी,बहन सही ✔  सलामत  घर पहुँच चुकी थी।
एे   हमारे  भारत की पहचान

Tuesday, March 15, 2016

इंतजार और प्रार्थना

एक भिखारी, एक सेठ के घर के बाहर खडा होकर भजन गा रहा था और बदले में खाने को रोटी मांग रहा था।
सेठानी काफ़ी देर से उसको कह रही थी , रुको आ रही हूं | रोटी हाथ मे थी पर फ़िर भी कह रही थी की रुको आ रही हूं
भिखारी भजन गा रहा था और रोटी मांग रहा था।
सेठ ये सब देख रहा था , पर समझ नही पा रहा था,
आखिर सेठानी से बोला - रोटी हाथ में लेकर खडी हो, वो बाहर मांग रहा हैं , उसे कह रही हो आ रही हूं तो उसे रोटी क्यो नही दे रही हो ?
सेठानी बोली हां रोटी दूंगी, पर क्या है ना की मुझे उसका भजन बहुत प्यारा लग रहा हैं, अगर उसको रोटी दूंगी तो वो आगे चला जायेगा,
मुझे उसका भजन और सुनना हैं !!
यदि प्रार्थना के बाद भी भगवान आपकी नही सुन रहा हैं तो समझना की उस सेठानी की तरह प्रभु को आपकी प्रार्थना प्यारी लग रही हैं इसलिये इंतज़ार करो और प्रार्थना करते रहो।
जीवन मे कैसा भी दुख और कष्ट आये पर भक्ति मत छोडिए।
क्या कष्ट आता है तो आप भोजन करना छोड देते है?
क्या बीमारी आती है तो आप सांस लेना छोड देते हैं? नही ना ?
फिर जरा सी तकलीफ़ आने पर आप भक्ति करना क्यों छोड़ देते हो ?
कभी भी दो चीज मत छोड़िये- - भजन और भोजन !
भोजन छोड़ दोंगे तो ज़िंदा नहीं रहोगे, भजन छोड़ दोंगे तो कहीं के नही रहोगे।
सही मायने में भजन ही भोजन है।

Monday, March 14, 2016

दुर्गुणों का ग्राहक

एक बार ईसा कहीं जा रहे थे। थोड़ी दूर पहुंचने पर उन्हें एक सौदागर मिला। उसने अपने पांच गधों पर अलग-अलग गठरियां लाद रखी थीं। ईसा ने उसे रोका और पूछा,'भाई, तुम इतना सारा वजन लादकर क्या ले जा रहे हो?' सौदागर ने जवाब दिया, 'इन गधों पर लदी गठरियों में ऐसी चीजें हैं जो इंसान मात्र को मेरा गुलाम बना देती हैं। मेरे लिए ये बड़ी उपयोगी चीजे हैं।' यह सुनकर ईसा बोले, 'अच्छा जरा बताओ तो, आखिर ऐसा क्या है तुम्हारी इन गठरियों में जो इंसान तुम्हारा गुलाम बन जाता है?'
इस पर सौदागर हौले-से मुस्कराया और फिर बोला, 'आप जानना ही चाहते हैं तो सुनें! पहले गधे पर अत्याचार लदा है। दूसरे गधे पर लदी गठरी में अहंकार है। तीसरे पर मैंने ईर्ष्या को लादा हुआ है। चौथी गठरी में बेईमानी है और पांचवीं में छल-कपट है।' ईसा ने उससे पूछा, 'भाई, तुमने अपना कारोबार तो बता दिया, लेकिन यह बताओ कि तुम हो कौन?' इस पर सौदागर ने इठला कर जवाब दिया, 'मैं शैतान हूं। देखते नहीं, आज सारी मानव जाति ईश्वर की नहीं, मेरी प्रतीक्षा में रहती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मेरे व्यापार में लाभ ही लाभ है।'
इतना कहकर वह सौदागर अपनी राह की ओर चला गया। उसके चले जाने के बाद ईसा प्रभु से प्रार्थना करने लगे। उन्होंने कहा, 'हे ईश्वर, मानव जाति को विवेक प्रदान कर, ताकि वह शैतान के चंगुल से छुटकारा पा सके। इंसानों को भी यह अहसास तो हो कि वे क्या खरीदते रहते हैं और उन्हें वास्तव में चाहिए क्या!' हमें भी ऐसी ही प्रार्थना करनी चाहिए। मानव जाति की भलाई इसी में है कि वह इन दुर्गुणों का ग्राहक न बने।

Sunday, March 13, 2016

लोगों की अपेक्षा

रात के समय एक दुकानदार अपनी दुकान बन्द ही कर रहा था कि एक कुत्ता दुकान में आया । उसके मुॅंह में एक थैली थी  जिसमें सामान की लिस्ट और पैसे थे  दुकानदार ने पैसे लेकर सामान उस थैली में भर दिया
कुत्ते ने थैली मुॅंह मे उठा ली और चला गया। दुकानदार आश्चर्यचकित होके कुत्ते के पीछे पीछे गया  ये देखने की इतने समझदार कुत्ते का मालिक कौन है   कुत्ता बस स्टाॅप पर खडा रहा थोडी देर बाद एक बस आई जिसमें चढ गया।  कंडक्टर के पास आते ही अपनी गर्दन आगे कर दी।उस के गले के बेल्ट में पैसे और उसका पता भी था। कंडक्टर ने पैसे लेकर टिकट कुत्ते के गले के बेल्ट मे रख दिया। अपना स्टाॅप आते ही कुत्ता आगे के दरवाजे पे चला गया और पूॅंछ हिलाकर कंडक्टर को इशारा कर दिया। बस के रुकते ही उतरकर चल दिया
दुकानदार भी पीछे पीछे चल रहा था कुत्ते ने घर का दरवाजा अपने पैरोंसे २-३ बार खटखटाया  अन्दर से उसका मालिक आया और लाठी से उसकी पिटाई कर दी  दुकानदार ने मालिक से इसका कारण पूछा । मालिक बोला  
"साले ने मेरी नींद खराब कर दी। चाबी साथ लेके नहीं जा सकता था गधा।" जीवन की भी यही सच्चाई है। आपसे लोगों की अपेक्षाओं का कोई अन्त नहीं है
जहाँ आप चूके
वहीं पर बुराई निकाल लेते हैं
और पिछली सारी अच्छाईयों को
भूल जाते हैं।

देख लो । यह संसार हैं ।

Saturday, March 12, 2016

सबसे बड़ी सीख

पढ़ाई पूरी करने के बाद एक छात्र किसी बड़ी कंपनी में नौकरी पाने की चाह में इंटरव्यू देने के लिए पहुंचा....
छात्र ने बड़ी आसानी से पहला इंटरव्यू पास कर लिया...
अब फाइनल इंटरव्यू
कंपनी के डायरेक्टर को लेना था...
और डायरेक्टर को ही तय
करना था कि उस छात्र को नौकरी पर रखा जाए या नहीं...
डायरेक्टर ने छात्र का सीवी   देखा और पाया  कि पढ़ाई के साथ- साथ यह  छात्र ईसी (extra curricular activities)  में भी हमेशा अव्वल रहा...
डायरेक्टर- "क्या तुम्हें  पढ़ाई के दौरान
कभी छात्रवृत्ति  मिली...?"
छात्र- "जी नहीं..."
डायरेक्टर- "इसका मतलब स्कूल-कॉलेज  की फीस तुम्हारे पिता अदा करते थे.."
छात्र- "जी हाँ , श्रीमान ।"
डायरेक्टर- "तुम्हारे पिताजी  क्या काम  करते  है?"
छात्र- "जी वो लोगों के कपड़े धोते हैं..."
यह सुनकर कंपनी के डायरेक्टर ने कहा- "ज़रा अपने हाथ तो दिखाना..."
छात्र के हाथ रेशम की तरह मुलायम और नाज़ुक थे...
डायरेक्टर- "क्या तुमने कभी  कपड़े धोने में अपने  पिताजी की मदद की...?"
छात्र- "जी नहीं, मेरे  पिता हमेशा यही चाहते थे
कि मैं पढ़ाई  करूं और ज़्यादा से ज़्यादा किताबें
पढ़ूं...
हां , एक बात और, मेरे पिता बड़ी तेजी  से कपड़े धोते हैं..."
डायरेक्टर- "क्या मैं तुम्हें  एक काम कह सकता हूं...?"
छात्र- "जी, आदेश कीजिए..."
डायरेक्टर- "आज घर वापस जाने के बाद अपने पिताजी के हाथ धोना...
फिर कल सुबह मुझसे आकर मिलना..."
छात्र यह सुनकर प्रसन्न हो गया...
उसे लगा कि अब नौकरी  मिलना तो पक्का है,
तभी तो  डायरेक्टर ने कल फिर बुलाया है...
छात्र ने घर आकर खुशी-खुशी अपने पिता को ये सारी बातें बताईं और अपने हाथ दिखाने को कहा...
पिता को थोड़ी हैरानी हुई...
लेकिन फिर भी उसने बेटे
की इच्छा का मान करते हुए अपने दोनों हाथ उसके
हाथों में दे दिए...
छात्र ने पिता के हाथों को धीरे-धीरे धोना शुरू किया। कुछ देर में ही हाथ धोने के साथ ही उसकी आंखों से आंसू भी झर-झर बहने लगे...
पिता के हाथ रेगमाल  की तरह सख्त और जगह-जगह से कटे हुए थे...
यहां तक कि जब भी वह  कटे के निशानों पर  पानी डालता, चुभन का अहसास
पिता के चेहरे पर साफ़ झलक जाता था...।
छात्र को ज़िंदगी में पहली बार एहसास हुआ कि ये
वही हाथ हैं जो रोज़ लोगों के कपड़े धो-धोकर उसके
लिए अच्छे खाने, कपड़ों और स्कूल की फीस का इंतज़ाम करते थे...
पिता के हाथ का हर छाला सबूत था उसके एकेडैमिक कैरियर की एक-एक
कामयाबी का...
पिता के हाथ धोने के बाद छात्र को पता ही नहीं चला कि उसने  उस दिन के बचे हुए सारे कपड़े भी एक-एक कर धो डाले...
उसके पिता रोकते ही रह गए , लेकिन छात्र अपनी धुन में कपड़े धोता चला गया...
उस रात बाप- बेटे ने काफ़ी देर तक बातें कीं ...
अगली सुबह छात्र फिर नौकरी  के लिए कंपनी के  डायरेक्टर के ऑफिस में था...
डायरेक्टर का सामना करते हुए छात्र की आंखें गीली थीं...
डायरेक्टर- "हूं , तो फिर कैसा रहा कल घर पर ?
क्या तुम अपना अनुभव मेरे साथ शेयर करना पसंद करोगे....?"
छात्र- " जी हाँ , श्रीमान कल मैंने जिंदगी का एक वास्तविक अनुभव सीखा...
नंबर एक... मैंने सीखा कि सराहना क्या होती है...
मेरे पिता न होते तो मैं पढ़ाई में इतनी आगे नहीं आ सकता था...
नंबर दो... पिता की मदद करने से मुझे पता चला कि किसी काम को करना कितना सख्त और मुश्किल होता है...
नंबर तीन.. . मैंने रिश्तों की अहमियत पहली बार
इतनी शिद्दत के साथ महसूस की..."
डायरेक्टर- "यही सब है जो मैं अपने मैनेजर में देखना चाहता हूं...
मैं यह नौकरी केवल उसे  देना चाहता हूं जो दूसरों की मदद की कद्र करे,
ऐसा व्यक्ति जो काम किए जाने के दौरान दूसरों की तकलीफ भी महसूस करे...
ऐसा शख्स जिसने
सिर्फ पैसे को ही जीवन का ध्येय न बना रखा हो...
मुबारक हो, तुम इस नौकरी  के पूरे हक़दार हो..."
आप अपने बच्चों को बड़ा मकान दें, बढ़िया खाना दें,
बड़ा टीवी, मोबाइल, कंप्यूटर सब कुछ दें...
लेकिन साथ ही  अपने बच्चों को यह अनुभव भी हासिल करने दें कि उन्हें पता चले कि घास काटते हुए कैसा लगता है उन्हें  भी अपने हाथों से ये  काम करने दें...
खाने के बाद कभी बर्तनों को धोने का अनुभव भी अपने साथ घर के सब बच्चों को मिलकर करने दें...
ऐसा इसलिए
नहीं कि आप मेड पर पैसा खर्च नहीं कर सकते,
बल्कि इसलिए कि आप अपने बच्चों से सही प्यार करते हैं...
आप उन्हें समझाते हैं कि पिता कितने भी अमीर
क्यों न हो, एक दिन उनके बाल सफेद होने ही हैं...
सबसे अहम हैं आप के बच्चे  किसी काम को करने
की कोशिश की कद्र करना सीखें...
एक दूसरे का हाथ
बंटाते हुए काम करने का जज्ब़ा अपने अंदर
लाएं...
 

 

Thursday, March 10, 2016

लक्ष्य पर विश्वास

एक बार कुछ scientists ने एक बड़ा ही interesting experiment किया..
उन्होंने 5 बंदरों को एक बड़े से cage में बंद कर दिया और बीचों -बीच एक सीढ़ी लगा दी जिसके ऊपर केले लटक रहे थे..
जैसा की expected था, जैसे ही एक बन्दर की नज़र केलों पर पड़ी वो उन्हें खाने के लिए दौड़ा..
पर जैसे ही उसने कुछ सीढ़ियां चढ़ीं उस पर ठण्डे पानी की तेज धार डाल दी गयी और उसे उतर कर भागना पड़ा..
पर experimenters यहीं नहीं रुके,
उन्होंने एक बन्दर के किये गए की सजा बाकी बंदरों को भी दे डाली और सभी को ठन्डे पानी से भिगो दिया..
बेचारे बन्दर हक्के-बक्के एक कोने में दुबक कर बैठ गए..
पर वे कब तक बैठे रहते,
कुछ समय बाद एक दूसरे बन्दर को केले खाने का मन किया..
और वो उछलता कूदता सीढ़ी की तरफ दौड़ा..
अभी उसने चढ़ना शुरू ही किया था कि पानी की तेज धार से उसे नीचे गिरा दिया गया..
और इस बार भी इस बन्दर के गुस्ताखी की सज़ा बाकी बंदरों को भी दी गयी..
एक बार फिर बेचारे बन्दर सहमे हुए एक जगह बैठ गए...
थोड़ी देर बाद जब तीसरा बन्दर केलों के लिए लपका तो एक अजीब वाक्य हुआ..
बाकी के बन्दर उस पर टूट पड़े और उसे केले खाने से रोक दिया,
ताकि एक बार फिर उन्हें ठन्डे पानी की सज़ा ना भुगतनी पड़े..
अब experimenters ने एक और interesting चीज़ की..
अंदर बंद बंदरों में से एक को बाहर निकाल दिया और एक नया बन्दर अंदर डाल दिया..
नया बन्दर वहां के rules क्या जाने..
वो तुरंत ही केलों की तरफ लपका..
पर बाकी बंदरों ने झट से उसकी पिटाई कर दी..
उसे समझ नहीं आया कि आख़िर क्यों ये बन्दर ख़ुद भी केले नहीं खा रहे और उसे भी नहीं खाने दे रहे..
ख़ैर उसे भी समझ आ गया कि केले सिर्फ देखने के लिए हैं खाने के लिए नहीं..
इसके बाद experimenters ने एक और पुराने बन्दर को निकाला और नया अंदर कर दिया..
इस बार भी वही हुआ नया बन्दर केलों की तरफ लपका पर बाकी के बंदरों ने उसकी धुनाई कर दी और मज़ेदार बात ये है कि पिछली बार आया नया बन्दर भी धुनाई करने में शामिल था..
जबकि उसके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था!
experiment के अंत में सभी पुराने बन्दर बाहर जा चुके थे और नए बन्दर अंदर थे जिनके ऊपर एक बार भी ठंडा पानी नहीं डाला गया था..
पर उनका behaviour भी पुराने बंदरों की तरह ही था..
वे भी किसी नए बन्दर को केलों को नहीं छूने देते..
Friends, हमारी society में भी ये behaviour देखा जा सकता है..
जब भी कोई नया काम शुरू करने की कोशिश करता है,
चाहे वो पढ़ाई , खेल , एंटरटेनमेंट, business, राजनीती, समाजसेवा या किसी और field से related हो, उसके आस पास के लोग उसे ऐसा करने से रोकते हैं..
उसे failure का डर दिखाया जाता है..
और interesting बात ये है कि उसे रोकने वाले maximum log वो होते हैं जिन्होंने ख़ुद उस field में कभी हाथ भी नहीं आज़माया होता..
इसलिए यदि आप भी कुछ नया करने की सोच रहे हैं और आपको भी समाज या आस पास के लोगों का opposition face करना पड़ रहा है तो थोड़ा संभल कर रहिये..
अपने logic और guts की सुनिए..ख़ुद पर और अपने लक्ष्य पर विश्वास क़ायम रखिये...और बढ़ते रहिये |

Friday, March 4, 2016

उम्मीदवार की योग्यता

एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए, उजड़े वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये!

हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ??

यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा !

 भटकते भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात बीता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे !

रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था।

 वह जोर से चिल्लाने लगा।

हंसिनी ने हंस से कहा- अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते।

 ये उल्लू चिल्ला रहा है।

हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ??

 ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही।

पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बातें सुन रहा था।

 सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई, मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ करदो।

हंस ने कहा- कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद!

यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा

पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो।

हंस चौंका- उसने कहा, आपकी पत्नी ??

 अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है,मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है!

उल्लू ने कहा- खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है।

दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग एकत्र हो गये।

कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी।

पंचलोग भी आ गये!

बोले- भाई किस बात का विवाद है ??

लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है!

 लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे।

 हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है।

इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना चाहिए!

फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों की जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है!

यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया।

उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली!

रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - ऐ मित्र हंस, रुको!

 हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ??

पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?

उल्लू ने कहा- नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी!

लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है!

मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है।

 यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं!

शायद 65 साल की आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने उम्मीदवार की योग्यता न देखते हुए, हमेशा ये हमारी जाति का है. ये हमारी पार्टी का है के आधार पर अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है, देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैँ!

Thursday, March 3, 2016

स्त्री के रूप

जब भगवान स्त्री की रचना कर रहे थे तब उन्हें काफी समय लग गया । आज छठा दिन था और स्त्री की रचना अभी भी अधूरी थी।
इसिलए देवदूत ने पूछा भगवन्, आप इसमें इतना समय क्यों ले रहे हो...?🏻

भगवान ने जवाब दिया, "क्या तूने इसके सारे गुणधर्म (specifications) देखे हैं, जो इसकी रचना के लिए जरूरी है ?

१. यह हर प्रकार की परिस्थितियों को संभाल सकती है

२. यह एक साथ अपने सभी बच्चों को संभाल सकती है एवं खुश रख सकती है ।

३. यह अपने प्यार से घुटनों की खरोंच से लेकर टूटे हुये दिल के घाव भी भर सकती है ।

४. यह सब सिर्फ अपने दो हाथों से कर सकती है

५. इस में सबसे बड़ा "गुणधर्म" यह है कि बीमार होने पर भी अपना ख्याल खुद रख सकती है एवं 18 घंटे काम भी कर सकती है।

देवदूत चकित रह गया और आश्चर्य से पूछा-

🏻"भगवान ! क्या यह सब दो हाथों से कर पाना संभव है ?"

भगवान ने कहा यह स्टैंडर्ड रचना है
(यह गुणधर्म सभी में है )

देवदूत ने नजदीक जाकर स्त्री को हाथ लगाया और कहा, "भगवान यह तो बहुत नाज़ुक है"

भगवान ने कहा हाँ यह बहुत ही नाज़ुक है, मगर इसे बहुत Strong बनाया है ।

इसमें हर परिस्थितियों को संभालने की ताकत है

देवदूत ने पूछा क्या यह सोच भी सकती है ??

भगवान ने कहा यह सोच भी सकती है और मजबूत हो कर मुकाबला भी कर सकती है।

देवदूत ने नजदीक जाकर स्त्री के गालों को हाथ लगाया और बोला, "भगवान ये तो गीले हैं। लगता है इसमें से लिकेज हो रहा है।"

भगवान बोले, "यह लीकेज नहीं है, यह इसके आँसू हैं।"

देवदूत: आँसू किस लिए ??

भगवान बोले : यह भी इसकी ताकत हैं । आँसू इसको फरीयाद करने एवं प्यार जताने एवं अपना अकेलापन दूर करने का तरीका है

देवदूत: भगवान आपकी रचना अदभुत है । आपने सब कुछ सोच कर बनाया है, आप महान है🏻

भगवान बोले-
यह स्त्री रूपी रचना अदभुत है । यही हर पुरुष की ताकत है जो उसे प्रोत्साहित करती है। वह सभी को खुश देखकर खुश रहतीँ है। हर परिस्थिति में हंसती रहती है । उसे जो चाहिए वह लड़ कर भी ले सकती है। उसके प्यार में कोइ शर्त नहीं है (Her love is unconditional) उसका दिल टूट जाता है जब अपने ही उसे धोखा दे देते है । मगर हर परिस्थितियों से समझौता करना भी जानती है।

देवदूत: भगवान आपकी रचना संपूर्ण है।

भगवान बोले ना, अभी इसमें एक त्रुटि है

"यह अपनी "महत्वत्ता" भूल जाती है"

व्यक्तित्व की गरिमा

जब सुमित से उसकी दोस्ती हुई तब आकाश उन दिनों कालेज में पढता था. आकाश ग्रामीण परिवेश से आया था. शहर का माहौल उसके लिए नया था. सुमित उसकी क्लास में सबसे ज्यादा मिलनसार और हंसमुख लड़का था, यही वजह थी कि आकाश की उससे दोस्ती बड़ी जल्दी हो गई.
      आकाश सबसे कम बात करने वाला लड़का था और सुमित सबसे बड़ी जल्दी दोस्ती कर लेता था. यही कारण था कि उसके कालेज में सबसे अधिक दोस्त थे. कहते हैं कि सबसे ज्यादा जलन अपने वाले से होती है. आकाश को भी सुमित से जलन होने लगी. सुमित की खुशहाल जिंदगी और उसके चेहरे पर हमेशा प्रसन्नता और जीत के भाव देखकर आकाश के मन को जलन होती. आकाश उससे ईर्ष्या करने लगा.
आकाश को कई बार लगता कि सुमित उससे जलता है. उसे लगता कि सुमित घर-परिवार से संपन्न और खुशहाल है, इसलिए वो उसके सामने अपना रुतबा और बड़प्पन दिखाता रहता है. वह उससे हमेशा ईर्ष्या करता. सुमित के प्रति उसकी भावनाएं उसे अन्दर ही अन्दर जलाने लगीं.
एक दिन किसी काम से आकाश का सुमित के घर जाना हुआ. जब वो सुमित के घर पहुंचा तो घर पहुंचकर वहां के हालात उसे अपनी कल्पनाओं से बिलकुल विपरीत मिले. आकाश का घर बहुत ही छोटा और मामूली था. आर्थिक स्थिति भी उसकी ठीक नहीं थी. उसके घर में एक बीमार पिता, दो छोटी बहनें जिनकी शादी की जिम्मेदारी भी आकाश की थी. सुमित के माता पिता ने आकाश को उसका दोस्त समझकर उसके संघर्ष की पूरी कहानी बताई कि किस तरह सुमित सुबह-शाम पार्ट टाइम जॉब करके घर का खर्च चला रहा है और अपनी पढाई कर रहा है. सुमित की मेहनत और संघर्ष की कहानी सुनकर आकाश कि आँखों में आंसू भर आये और सुमित का कद उसकी नज़रों में कई गुना बढ़ गया.
सुमित के पिताजी ने  बताया कि सुमित हमेशा उसकी तारीफ करता है. हमेशा सोचता है कि आकाश की मदद करता रहे, वह इस शहर में नया-नया जो है.
सुमित जब वहाँ से घर वापिस आया तो उसे अपनी भावनाओं से बहुत ग्लानि महसूस हई. उसे बहुत पश्चाताप हुआ कि सुमित ने हमेशा उसकी सहायता की उसने हमेशा सुमित से ईर्ष्या की, जब कि सुमित धन दौलत के मामले में उससे बहुत ही कमजोर है.
आज सुमित गरीब होकर भी अमीर है और वो अमीर होकर भी गरीब है.
गलत सुमित नहीं वो खुद है जब कि सुमित उससे हर तरह महान है. और उसने उसी दिन से अपने आपको बदलने का निश्चय कर लिया.



Friday, February 26, 2016

अहंकार का पतन

Thursday, February 25, 2016

हमारी दृढ़ इच्छाशक्ति का बल

एक नौजवान व्यापारी अपनी लगन और कठोर परिश्रम के चलते शहर का सबसे धनी और सम्मानित व्यक्ति बन गया। लेकिन धीरे-धीरे वह घमंडी और लापरवाह हो गया। उसे व्यापार में घाटा हुआ और वह कर्जदार हो गया। एक दिन हताश और निराश एक पार्क में बैठा था। वहां एक बुजुर्ग ने उसकी चिंता का कारण पूछा। उसने अपनी पूरी स्थिति बयान कर दी।
यह सुनकर बुजुर्ग बोले,'मुझे तुम सच्चे और ईमानदार व्यक्ति लगते हो। यदि मैं तुम्हें 10 लाख रुपये का ब्याज रहित कर्ज दे दूं तो क्या तुम्हारी समस्या हल हो जाएगी?' युवक बोला,'ऐसा हो जाए तो मैं आजीवन आपका कृतज्ञ रहूंगा।' बुजुर्ग ने युवक को तुरंत 10 लाख रुपये का एक चेक दिया और कहा कि ठीक एक साल बाद हम यहीं मिलेंगे। तुम मुझे मेरी रकम लौटा देना।
युवक ने कृतज्ञ आंखों से उस दयालु व्यक्ति को जाते हुए देखा। उसने घर आकर सोचा कि उस भले व्यक्ति ने उस पर विश्वास करके चेक दिया है। लेकिन इसे वह भुनाएगा नहीं और अपने धन से ही काम चलाएगा। उसका विश्वास किसी भी हालत में टूटने नहीं देगा। वह पूरे आत्मविश्वास से अपने काम में जुट गया। उसकी दृढ़ इच्छा शक्ति और लगन के चलते उसका काम पहले से भी अच्छा चलने लगा।
निश्चित दिन युवक उसी पार्क में बुजुर्ग के दिए चेक के साथ पहुंच गया। वह व्यक्ति भी आ पहुंचा। परंतु पार्क में पहुंचने पर एक नर्स के साथ आए लोगों ने उसे बताया कि वह बुजुर्ग तो मानसिक रोगी है जो खुद को अमीर बताकर फर्जी चेक बांटता रहता है। युवक समझ गया कि उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति और लगन लौटाने में फर्जी चेक का नहीं, आत्मविश्वास का महत्व है।

Monday, February 22, 2016

जीवन की सीख

एक बार गोपाल राव अपने बड़े भाई गोविंद राव के साथ कबड्डी खेल रहे थे। गोविंद राव विरोधी टीम में थे। गोविंद राव कबड्डी खेलते हुए गोपाल राव के खेमे की तरफ आए और उन्होंने गोपाल राव को इशारा कर के कहा कि वे उन्हें न पकड़ें और नंबर लेने दें, परंतु गोपाल राव को यह बात ठीक नहीं लगी। उन्होंने खेल को पूरी न्याय भावना के साथ खेलना उचित समझा और अपने बड़े भाई गोविंद राव को पकड़ने के लिए पूरी ताकत लगा दी। आखिरकार उन्होंने उसे पकड़ ही लिया। इस तरह गोविंद राव आउट हो गए।
यह बात गोविंद राव को अच्छी नहीं लगी और उन्होंने घर लौटने पर गोपाल राव से कहा,'गोपाल, जब मैंने तुझे मना किया था कि मुझे मत पकड़ना, तब भी तूने मुझे पकड़ ही लिया। तू मेरा कैसा भाई है रे, जो अपने बड़े भाई की इतनी सी बात भी न मान सका।' गोविंद राव की बात सुनकर गोपाल राव अपने भाई के आगे आकर बोले,'भैया, आपके प्रति मेरे मन में पूरी श्रद्धा है। आप जो भी कहेंगे, वह मैं अवश्य करके दिखाऊंगा, चाहे इसके लिए मुझे अपनी जान की बाजी ही क्यों न लगानी पड़ जाए? किंतु मैं बेईमानी नहीं कर सकता।
खेल भी हमें पूरी ईमानदारी व निष्ठा से खेलना चाहिए क्योंकि खेल-खेल में अपनायी गई भावना ही आगे हमारे विचारों व भावों को पुष्ट करती है। मैं नहीं चाहता कि बड़े होने पर मेरे अंदर झूठ बोलने या गलत कार्य करने की आदत पड़ जाए।' अपने से पांच साल छोटे भाई की बात सुनकर गोविंद राव ने उसी समय अपने को सुधारने का प्रण कर लिया।