Wednesday, September 30, 2015

मोर बनने की चाहत में कौए की हुई दुर्गति

एक कौआ जब-जब मोरों को देखता, मन में कहता- भगवान ने मोरों को कितना सुंदर रूप दिया है। यदि मैं भी ऐसा रूप पाता तो कितना मजा आता। एक दिन कौए ने जंगल में मोरों की बहुत सी पूंछें बिखरी पड़ी देखीं। वह अत्यंत प्रसन्न होकर कहने लगा- वाह भगवान! बड़ी कृपा की आपने, जो मेरी पुकार सुन ली। मैं अभी इन पूंछों से अच्छा खासा मोर बन जाता हूं। इसके बाद कौए ने मोरों की पूंछें अपनी पूंछ के आसपास लगा ली। फिर वह नया रूप देखकर बोला- अब तो मैं मोरों से भी सुंदर हो गया हूं। अब उन्हीं के पास चलकर उनके साथ आनंद मनाता हूं। वह बड़े अभिमान से मोरों के सामने पहुंचा। उसे देखते ही मोरों ने ठहाका लगाया। एक मोर ने कहा- जरा देखो इस दुष्ट कौए को। यह हमारी फेंकी हुई पूंछें लगाकर मोर बनने चला है। लगाओ बदमाश को चोंचों व पंजों से कस-कसकर ठोकरें। यह सुनते ही सभी मोर कौए पर टूट पड़े और मार-मारकर उसे अधमरा कर दिया। कौआ भागा-भागा अन्य कौए के पास जाकर मोरों की शिकायत करने लगा तो एक बुजुर्ग कौआ बोला- सुनते हो इस अधम की बातें! यह हमारा उपहास करता था और मोर बनने के लिए बावला रहता था। इसे इतना भी ज्ञान नहीं कि जो प्राणी अपनी जाति से संतुष्ट नहीं रहता, वह हर जगह अपमान पाता है। आज यह मोरों से पिटने के बाद हमसे मिलने आया है। लगाओ इस धोखेबाज को कसकर मार। इतना सुनते ही सभी कौओं ने मिलकर उसकी अच्छी मरम्मत की। कथा का सार यह है कि ईश्वर ने हमें जिस स्वरूप में बनाया है, उसी में संतुष्ट रहकर अपने कर्मो पर ध्यान देना चाहिए।

Tuesday, September 29, 2015

दो नगीने

किसी शहर में एक रब्बाई (यहूदी पुजारी) अपनी गुणवती पत्नी और दो प्यारे बच्चों के साथ रहता था. एक बार उसे किसी काम से बहुत दिनों के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा. जब वह दूर था तब एक त्रासद दुर्घटना में उसके दोनों पुत्र मारे गये.

ऐसी दुःख की घड़ी में रब्बाई की पत्नी ने खुद को बड़ी मुश्किल से संभाला. वह बहुत हिम्मती थी और ईश्वर में उसकी आस्था अटूट थी. लेकिन उसे यह चिंता थी कि रब्बाई के लौटने पर वह उसे यह दुखद समाचार किस प्रकार देगी. रब्बाई स्वयं बहुत आस्थावान व्यक्ति था लेकिन वह दिल का मरीज़ था और पूर्व में अस्पताल में भी भर्ती रह चुका था. पत्नी को यह आशंका थी कि वह यह सदमा नहीं झेल पायेगा.

पति के आगमन की पूर्व संध्या को उसने दृढ़तापूर्वक प्रार्थना की और शायद उसे अपनी समस्या का कोई समाधान मिल गया.

अगली सुबह रब्बाई घर पहुँच गया. बड़े दिनों के बाद घर वापसी पर वह पत्नी से गर्मजोशी से मिला और लड़कों के बारे में पूछा.

पत्नी ने कहा, "उनकी चिंता मत कीजिये. आप नहा-धोकर आराम करिए".

कुछ समय के बाद वे भोजन करने के लिए बैठे. पत्नी ने उससे यात्रा के बारे में पूछा. रब्बाई ने उसे इस बीच घटी बातों की जानकारी दी और कहा कि ईश्वर की दया से सब ठीक हुआ. फिर उसने बच्चों के बारे में पूछा.

पत्नी कुछ असहज तो थी ही, फिर भी उसने कहा, "उनके बारे में सोचकर परेशान मत होइए. हम उनकी बात बाद में करेंगे. मैं इस वक़्त किसी और उलझन में हूँ, आप मुझे उसका उपाय बताइए".

रब्बाई समझ रहा था कि कोई-न-कोई बात ज़रूर थी. उसने पूछा, "क्या हुआ? कोई बात तो है जो तुम्हें भीतर-ही-भीतर खाए जा रही है. मुझे बेखटके सब कुछ सच-सच बता दो और हम साथ बैठकर ईश्वर की मदद से उसका हल ज़रूर निकाल लेंगे".

पत्नी ने कहा, "आप जब बाहर थे तब हमारे एक मित्र ने मुझे दो बेशकीमती नगीने अहतियात से सहेजकर रखने के लिए दिए. वे वाकई बहुत कीमती और नायाब नगीने हैं! मैंने उन जैसी अनूठी चीज़ और कहीं नहीं देखी है. अब वह उन्हें लेने के लिए आनेवाला है और मैं उन्हें लौटाना नहीं चाहती. मैं चाहती हूँ कि वे हमेशा मेरे पास ही रहें. अब आप क्या कहेंगे?"

"तुम कैसी बातें कर रही हो? ऐसी तो तुम नहीं थीं? तुममें यह संसारिकता कहाँ से आ गयी?", रब्बाई ने आश्चर्य से कहा.

"सच यही है कि मैं उन्हें अपने से दूर होते नहीं देखना चाहती. अगर मैं उन्हें अपने ही पास रख सकूं तो इसमें क्या बुरा है?", पत्नी ने कहा.

रब्बाई बोला, "जो हमारा है ही नहीं उसके खोने का दुःख कैसा? उन्हें अपने पास रख लेना तो उन्हें चुराना ही कहलायेगा न? हम उन्हें लौटा देंगे और मैं यह कोशिश करूंगा कि तुम्हें उनसे बिछुड़ने का अफ़सोस नहीं सताए. हम आज ही यह काम करेंगे, एक साथ".

"ठीक है. जैसा आप चाहें. हम वह संपदा लौटा देंगे. और सच यह है कि हमने वह लौटा ही दी है. हमारे बच्चे ही वे बेशकीमती नगीने थे. ईश्वर ने उन्हें सहेजने के लिए हमारे सुपुर्द किया था और आपकी गैरहाजिरी में उसने उन्हें हमसे वापस ले लिया. वे जा चुके हैं...".

रब्बाई ने अपनी पत्नी को भींच लिया और वे दोनों अपनी आंसुओं की धारा में भीगते रहे. रब्बाई को अपनी पत्नी की कहानी के मर्म का बोध हो गया था. उस दिन के बाद वे साथ-साथ उस दुःख से उबरने का प्रयास करने लगे.

Sunday, September 27, 2015

"अंतिम दौड़"

हुत समय पहले की बात है एक विख्यात ऋषि गुरुकुल में बालकों को शिक्षा प्रदान किया करते थे . उनके गुरुकुल में बड़े-बड़े रजा महाराजाओं के पुत्रों से लेकर साधारण परिवार के लड़के भी पढ़ा करते थे।

वर्षों से शिक्षा प्राप्त कर रहे शिष्यों की शिक्षा आज पूर्ण हो रही थी और सभी बड़े उत्साह के साथ अपने अपने घरों को लौटने की तैयारी कर रहे थे कि तभी ऋषिवर की तेज आवाज सभी के कानो में पड़ी ,

” आप सभी मैदान में एकत्रित हो जाएं। “

आदेश सुनते ही शिष्यों ने ऐसा ही किया।

ऋषिवर बोले , “ प्रिय शिष्यों , आज इस गुरुकुल में आपका अंतिम दिन है . मैं चाहता हूँ कि यहाँ से प्रस्थान करने से पहले आप सभी एक दौड़ में हिस्सा लें .

यह एक बाधा दौड़ होगी और इसमें आपको कहीं कूदना तो कहीं पानी में दौड़ना होगा और इसके आखिरी हिस्से में आपको एक अँधेरी सुरंग से भी गुजरना पड़ेगा .”

तो क्या आप सब तैयार हैं ?”

” हाँ , हम तैयार हैं ”, शिष्य एक स्वर में बोले .

दौड़ शुरू हुई .

सभी तेजी से भागने लगे . वे तमाम बाधाओं को पार करते हुए अंत में सुरंग के पास पहुंचे . वहाँ बहुत अँधेरा था और उसमे जगह – जगह नुकीले पत्थर भी पड़े थे जिनके चुभने पर असहनीय पीड़ा का अनुभव होता था .

सभी असमंजस में पड़ गए , जहाँ अभी तक दौड़ में सभी एक सामान बर्ताव कर रहे थे वहीँ अब सभी अलग -अलग व्यवहार करने लगे ; खैर , सभी ने ऐसे-तैसे दौड़ ख़त्म की और ऋषिवर के समक्ष एकत्रित हुए।

“पुत्रों ! मैं देख रहा हूँ कि कुछ लोगों ने दौड़ बहुत जल्दी पूरी कर ली और कुछ ने बहुत अधिक समय लिया , भला ऐसा क्यों ?”, ऋषिवर ने प्रश्न किया।

यह सुनकर एक शिष्य बोला , “ गुरु जी , हम सभी लगभग साथ –साथ ही दौड़ रहे थे पर सुरंग में पहुचते ही स्थिति बदल गयी …कोई दुसरे को धक्का देकर आगे निकलने में लगा हुआ था तो कोई संभल -संभल कर आगे बढ़ रहा था …और कुछ तो ऐसे भी थे जो पैरों में चुभ रहे पत्थरों को उठा -उठा कर अपनी जेब में रख ले रहे थे ताकि बाद में आने वाले लोगों को पीड़ा ना सहनी पड़े…. इसलिए सब ने अलग-अलग समय में दौड़ पूरी की .”

“ठीक है ! जिन लोगों ने पत्थर उठाये हैं वे आगे आएं और मुझे वो पत्थर दिखाएँ “, ऋषिवर ने आदेश दिया .

आदेश सुनते ही कुछ शिष्य सामने आये और पत्थर निकालने लगे . पर ये क्या जिन्हे वे पत्थर समझ रहे थे दरअसल वे बहुमूल्य हीरे थे . सभी आश्चर्य में पड़ गए और ऋषिवर की तरफ देखने लगे .

“ मैं जानता हूँ आप लोग इन हीरों के देखकर आश्चर्य में पड़ गए हैं .” ऋषिवर बोले।

“ दरअसल इन्हे मैंने ही उस सुरंग में डाला था , और यह दूसरों के विषय में सोचने वालों शिष्यों को मेरा इनाम है।

पुत्रों यह दौड़ जीवन की भागम -भाग को दर्शाती है, जहाँ हर कोई कुछ न कुछ पाने के लिए भाग रहा है . पर अंत में वही सबसे समृद्ध होता है जो इस भागम -भाग में भी दूसरों के बारे में सोचने और उनका भला करने से नहीं चूकता है .

अतः यहाँ से जाते -जाते इस बात को गाँठ बाँध लीजिये कि आप अपने जीवन में सफलता की जो इमारत खड़ी करें उसमे परोपकार की ईंटे लगाना कभी ना भूलें , अंततः वही आपकी सबसे अनमोल जमा-पूँजी होगी । “


Saturday, September 26, 2015

निंदा करने की प्रवृत्ति

एक विदेशी को अपराधी समझ जब राजा ने फांसी का हुक्म सुनाया तो उसने अपशब्द कहते हुए राजा के विनाश की कामना की। राजा ने अपने मंत्री से, जो कई भाषाओं का जानकार था, पूछा- यह क्या कह रहा है? मंत्री ने विदेशी की गालियां सुन ली थीं, किंतु उसने कहा - महाराज! यह आपको दुआएं देते हुए कह रहा है- आप हजार साल तक जिएं। राजा यह सुनकर बहुत खुश हुआ, लेकिन एक अन्य मंत्री ने जो पहले मंत्री से ईष्र्या रखता था, आपत्ति उठाई- महाराज! यह आपको दुआ नहीं गालियां दे रहा है।
वह दूसरा मंत्री भी बहुभाषी था। उसने पहले मंत्री की निंदा करते हुए कहा- ये मंत्री जिन्हें आप अपना विश्वासपात्र समझते हैं, असत्य बोल रहे हैं। राजा ने पहले मंत्री से बात कर सत्यता जाननी चाही, तो वह बोला- हां महाराज! यह सत्य है कि इस अपराधी ने आपको गालियां दीं और मैंने आपसे असत्य कहा। पहले मंत्री की बात सुनकर राजा ने कहा- तुमने इसे बचाने की भावना से अपने राजा से झूठ बोला।
 मानव धर्म को सर्वोपरि मानकर तुमने राजधर्म को पीछे रखा। मैं तुमसे बेहद खुश हुआ। फिर राजा ने विदेशी और दूसरे मंत्री की ओर देखकर कहा- मैं तुम्हें मुक्त करता हूं। निर्दोष होने के कारण ही तुम्हें इतना क्रोध आया कि तुमने राजा को गाली दी और मंत्री महोदय तुमने सच इसलिए कहा- क्योंकि तुम पहले मंत्री से ईष्र्या रखते हो। ऐसे लोग मेरे राज्य में रहने योग्य नहीं। तुम इस राज्य से चले जाओ।

वस्तुत: दूसरों की निंदा करने की प्रवृत्ति से अन्य की हानि होने के साथ-साथ स्वयं को भी नुकसान ही होता है।


Friday, September 25, 2015

हिम्मत मत हारो

एक दिन एक किसान का बैल कुएँ में गिर गया ।वह बैल घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा और विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिऐ और क्या नहीं। अंततः उसने निर्णय लिया कि चूंकि बैल काफी बूढा हो चूका था,अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने वाला नहीं था;और इसलिए उसे कुएँमें ही दफना देना चाहिऐ।
किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया। सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी। जैसे ही बैल कि समझ में आया कि यह क्या हो रहा है ,वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़ चीख़ कर रोने लगा । और फिर ,अचानक वह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गया।
सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे। तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया। अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था। वह हिल-हिल कर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था।
जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस पर फावड़ों से मिट्टी गिराते वैसे -वैसे वह हिल-हिल कर उसमिट्टी को गिरा देता और एस सीढी ऊपर चढ़ आता । जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह बैल कुएँके किनारे पर पहुंच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया।
ध्यान रखे, आपके जीवन में भी बहुत तरह से मिट्टी फेंकी जायेगी ,बहुत तरह कि गंदगी आप पर गिरेगी। जैसे कि ,आपको आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई बेकार में ही आपकी आलोचना करेगा ,कोई आपकी सफलता से ईर्ष्या के कारण आपको बेकार में ही भला बुरा कहेगा । कोई आपसे आगे निकलने के लिएऐसे रास्ते अपनाता हुआ दिखेगा जो आपके आदर्शों के विरुद्ध होंगे। ऐसे में आपको हतोत्साहित होकरकुएँ में ही नहीं पड़े रहना है बल्कि साहस के साथ हर तरह कि गंदगी को गिरा देना है और उससे सीखलेकर,उसे सीढ़ी बनाकर,बिना अपने आदर्शों का त्याग किये अपने कदमों को आगे बढ़ाते जाना है।

Thursday, September 24, 2015

ये 'सफल जीवन' क्या है


एक बेटे ने पिता से पूछा - पापा ये 'सफल जीवन' क्या होता है ?
पिता, बेटे को पतंग उड़ाने ले गए। 
बेटा पिता को ध्यान से पतंग उड़ाते देख रहा था...
थोड़ी देर बाद बेटा बोला,
पापा.. ये धागे की वजह से पतंग और ऊपर नहीं जा पा रही है, क्या हम इसे तोड़ दें !!
ये और ऊपर चली जाएगी...
पिता ने धागा तोड़ दिया ..
पतंग थोड़ा सा और ऊपर गई और उसके बाद लहरा कर नीचे आइ और दूर अनजान जगह पर जा कर गिर गई...
तब पिता ने बेटे को जीवन का दर्शन समझाया .,,,,
बेटा..
'जिंदगी में हम जिस ऊंचाई पर हैं..
हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें, जिनसे हम बंधे हैं वे हमें और ऊपर जाने से रोक रही हैं
जैसे :
घर,
परिवार,
अनुशासन,
माता-पिता आदि
और हम उनसे आजाद होना चाहते हैं...
वास्तव में यही वो धागे होते हैं जो हमें उस ऊंचाई पर बना के रखते हैं..
इन धागों के बिना हम एक बार तो ऊपर जायेंगे
परन्तु
बाद में हमारा वो ही हश्र होगा जो
बिन धागे की पतंग का हुआ...'
"अतः जीवन में यदि तुम ऊंचाइयों पर बने रहना चाहते हो तो, कभी भी इन धागों से रिश्ता मत तोड़ना.."
" धागे और पतंग जैसे जुड़ाव के सफल संतुलन से मिली हुई ऊंचाई को ही 'सफल जीवन' कहते हैं बेटा " ! !

Wednesday, September 23, 2015

एक बार एक व्यक्ति था..वह किसी काम से अपने गाँव से शहर कि और जा रहा था..गाँव से शहर के रास्ते में एक जंगल पड़ता था..जब वह उस जंगल में से गुजर रहा था उसे प्यास लगी तो वह पास ही जंगल में बहने वाली नदी की तरफ गया.उसने पानी पिया और पानी पीने के बाद वापस लोटने लगा की उसने देखा....वहीं नदी के किनारे एक गीदड़ बैठा था जो शायद चल फिर सकने के काबिल नहीं था.यह देख उसे बड़ा अचरज हुआ की ये चल नहीं सकता तो फिर यह जीवित कैसे है..तभी अचानक उसे एक शेर की जोरदार दहाड़ सुनाई दी....वो व्यक्ति एक ऊँचे पेड़ पर चढ़ गया और इंतजार करने लगा,.तभी वहां शेर आया जिसने एक ताजा शिकार मुंह में दबोचा हुआ था..वह सब ध्यान से देखता रहा शेर शायद अपना पेट भर चुका था..इसलिए उसने उस शिकार को उस गीदड़ के सामने डाल दिया और चला गया..वह व्यक्ति यह सब ध्यान से देख रहा था;.उसने सोचा की परमात्मा की लीला अपरंपार है वो सब के लिए व्यवस्था करता है..तभी उसके मन में विचार आया की जब भगवान इस लाचार गीदड़ की मदद कर सकते है तो मेरी भी करेंगे ..भगवान में गहरी आस्था थी इसलिए वो वहीं नदी किनारे एक ऊँची चट्टान पर बैठ गया और भगवान की भक्ति करने लगा.....एक दिन बिता, फिर दो दिन बीते, लेकिन कोई नहीं आया..उसकी हालत अब कमजोर होने लगी फिर भी हठ पकड़ लिया कीभगवान मेरी मदद अवश्य करेंगे..समय बीता और वह व्यक्ति मर गया..मरने के बाद सीधे भगवान के पास पहुंचा और भगवान से कहने लगा..है ! भगवन मैंने देखा था अपनी आँखों के सामने.जब आप ने एक लाचार गीदड़ की सहायता की थी..मैंने आपकी जीवन भर सेवा की लेकिन आपने मेरी मदद नहीं की..तब भगवान मुस्कराए और कहने लगे.तुम्हें क्या लगता है जब तुम जंगल में से जा रहे थेतब अपनी मर्जी से नदी पर गए थे और यह सब कुछ देखा था..“नहीं तुझे प्यास भी मैंने लगाईं थी और तुझे नदी पर भी मैंने ही भेजा था;.लेकिन अफसोस इस बात का की मैंने तुझे शेर बनने के लिए जंगल में भेजा था.लेकिन तू गीदड़ बनकर आ गया”..मित्रों जीवन में ऐसे कई मौके आते है जब भगवान हमें हमारे वास्तविक रूप को पहचानने के लिए मौके देते है.लेकिन यह हमारे उपर निर्भर करता है कि हम उसे किस रूप में ग्रहण कर रहे है..हम शेर बनकर लाचार और दीन व्यक्तियों की मदद करे या फिर सब कुछ होते हुए भी गीदड़ बन जाये..वह लाचार था क्योंकि वह बेसहारा था लेकिन आप नहीं..आप में वह काबलीयत है की आप अपना जीवन अच्छा बनाकर उन लोगों को मदद कर सकते है जो हालात की वजह से बेबस जीवन जी रहे है.

Tuesday, September 22, 2015

जिन्दगी में विनम्रता जरुरी

विनम्रता ( politeness) हमारी जिन्दगी में हमारे स्वाभाव के लिए वो बेहतरीन तोहफा है जिसे अपनाकर हम सामने वाले के साथ साथ अपने मन भी एक सकारात्मक असर डालते है और विनम्रता ( politeness) के जरिये हम किसी का भी दिल जीत सकते है सो इसी से जुडी एक शिक्षाप्रद कहानी (Story) आपके सामने है –
एक संत (saint) अपनी तीर्थ यात्रा पर थे और उन्होंने वृन्दावन जाने का सोचा लेकिन पहुँचने से पहले ही जब वो कुछ मील की दूरी पर थे तो रात हो गयी तो उन्होंने अपने मन में ये ख्याल किया कि चलो कोई बात नहीं पास में एक गाँव है तो वंहा पर मैं अपनी रात बिता सकता हूँ और सवेरे जल्दी उठकर फिर से अपनी यात्रा को शुरू करूँगा |
संत (saint) का एक नियम था कि वो केवल उसी घर का जल और अन्न ग्रहण करते थे जिनके घर में लोगो का आचार विहार और विचार पवित्र हो सो उन्होंने इस बारे में पूछताछ की तो उन्हें किसी ने बताया की ब्रज के पास ये जो सीमावर्ती गाँव है वंहा लोग सभी वैष्णव है और सब के सब कृष्ण के परम भक्त है | ऐसा कहने पर संत (saint) उस गाँव मे गये और एक व्यक्ति के घर का द्वार खटखटाया और उनसे कहा कि ” भाई मैं थोडा विश्राम करना चाहता हूँ तो क्या मैं आपके घर रात बिता सकता हूँ और मैं केवल उसी के घर का भोजन और पानी ग्रहण करता हूँ जिसके घर का आचार विचार शुद्ध हो | इस पर उस व्यक्ति ने कहा महाराज माफ़ कीजिये मैं तो निरा अधम हूँ लेकिन मेरे अलावा हर कोई जो इस गाँव में रहता है सभी लोग बहुत ही धार्मिक है और बहुत ही पवित्र विचारों वाले है लेकिन फिर भी अगर आप मेरे घर में कदम रखकर मेरे घर को पवित्र करते है तो मैं अपने घर को और अपने आप को बहुत ही भाग्यशाली मानूंगा |
इस पर संत (saint) कुछ नहीं बोले और आगे बढ़ गये और आगे जाकर एक और व्यक्ति से उन्होंने रात बिताने के लिए विनती की तो उसने भी वही जवाब दिया जो पहले व्यक्ति ने दिया था और इस तरह संत (saint) जिसके भी घर गये और सबसे यही बात बोली तो सब लोगो ने एक ही जवाब दिया इस पर संत (saint) को खुद पर लज्जा महसूस हुई कि वो एक संत (saint) होकर इतनी छोटी सोच रखते है जबकि एक आम आदमी को गृहस्थ है वो अपने परिवार के जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी कितना उत्तम आचरण लिए हुए है कि खुद को सबसे छोटा बता रहा है और अपनी भूल समझकर वो एक आदमी के पास गये और उस से कहा माफ़ कीजिये अधम आप नहीं अधम तो मैं हूँ जो जिन्दगी का एक छोटा सा सार भी नहीं समझ सकता इसलिए मैं आपके घर रात बिताना चाहता हूँ मैं समझ गया हूँ कि आप सब लोग सच्चे विनम्र है और साथ ही सच्चे वैष्णव भी और मैं आपके घर का खाना और पानी ग्रहण करके खुद को पवित्र करना चाहूँगा |
तो ये है कहानी (Story) जो जीवन में विनम्रता ( politeness) की सच्ची पहचान बताती है खुद को छोटा समझना और दूसरों से अपनी तुलना नहीं करना ही आपको असल जिन्दगी में महान आचरण वाला बनाता है और अधिक

Monday, September 21, 2015

फूल का पौधा

बहुत ही पुराने समय की बात है । मिस्र देश का एक राजा था जिस पर देवता प्रसन्न हो गये और उसके पास आये और उसे उपहार स्वरुप एक चमत्कारी तलवार दी और उसे बोले कि जाओ और दुनिया फतह करो । इस पर राजा ने भगवान से सवाल किया कि ” भगवन आप भी कमाल करते है भला मुझे किस चीज़ की कमी है जो मैं पूरी दुनिया को फतह करूँ ।”
इस पर देवता ने फिर से कुछ सोचकर “पारसमणि देते हुए राजा से कहा ये लो पारसमणि और जितना चाहे उतना धन की प्राप्ति करो ।” इस पर राजा ने फिर से सवाल किया ” भगवान मैं इतना धन प्राप्त करकर क्या करूँगा बताओ ।” राजा ने वो लेने से भी मना कर दिया ।
इस पर देवता ने उसे एक अप्सरा देते हुए कहा ” ये लो मैं तुम्हे तुम्हारे साथ रहने को ये खूबसूरत अप्सरा देता हूँ ।” इस पर राजा ने कहा भगवान मुझे ये भी नहीं चाहिए आपके पास इन सब से कुछ बेहतर हो तो बताओ ।
देवता अब सोचा में पड़ गया और कहने लगा सभी मनुष्य तो यही सब पाने के लिए संघर्ष करते है और मैं तुम्हे सहर्ष इतना सब दे रहा हूँ फिर भी तुम मना कर रहे हो तो तुम ही बताओ मैं तुम्हारे लिए किस चीज़ की व्यवस्था करूँ जो तुम्हे पसंद हो ।
राजा ने देवता से कहा ” भगवान जरा सोचिये मैं अगर तलवार को धारण करता हूँ तो भी उसकी धार भी एक न एक दिन चली जाएगी और नहीं तो मैं कोइंसा युगों युगों तक यंहा रहने वाला हूँ और अगर अप्सरा के लिए हाँ करता हूँ तो उसका सौंदर्य भी तो कोई अतुलनीय नहीं है । जबकि अगर पारसमणि को धारण करता हूँ तो धन भी कोई मुक्ति का मार्ग नहीं है तो मैं क्योंकर इन सब की इच्छा रखूं ?
इस पर राजा ने जारी रखते हुए कहा प्राकृतिक सौन्दर्य से तो देवता भी धरती पर विचरण के लिए आते है इसलिए आप मुझे यह फूलों का पौधा ही दे दीजिये मैं इसे बड़ा होते और इसमें फूलो को खिलते हुए देखूंगा इस से रमणीय मेरे लिए कुछ अधिक नहीं हो सकता ।

Sunday, September 20, 2015

दुष्टता का फल

कंचनपुर के एक धनी व्यापारी के घर में रसोई में एक कबूतर ने घोंसला बना रखा था । किसी दिन एक लालची कौवा जो है वो उधर से आ निकला । वंहा मछली को देखकर उसके मुह में पानी आ गया ।  तब उसके मन में विचार आया कि मुझे इस रसोघर में घुसना चाहिए लेकिन कैसे घुसू ये सोचकर वो परेशान था तभी उसकी नजर वो कबूतरों के घोंसले पर पड़ी । उसने सोचा कि मैं अगर कबूतर से दोस्ती कर लूँ तो शायद मेरी बात बन जाएँ । कबूतर जब दाना चुगने के लिए बाहर निकलता है तो कौवा उसके साथ साथ निकलता है । थोड़ी देर बाद कबूतर ने पीछे मुड़कर देखता तो देखा कि कौवा उसके पीछे है इस पर कबूतर ने कौवे से कहा भाई तुम मेरे पीछे क्यों हो इस पर कौवे ने कबूतर से कहा कि तुम मुझे अच्छे लगते हो इसलिए मैं तुमसे दोस्ती करना चाहता हूँ इस पर कौवे से कबूतर ने कहा कि हम कैसे दोस्त बन सकते है हमारा और तुम्हारा भोजन भी तो अलग अलग है मैं बीज खाता हूँ और तुम कीड़े । इस पर कौवे ने चापलूसी दिखाते हुए कहा “कौनसी बड़ी बात है मेरे पास घर नहीं है इसलिए हम साथ साथ तो रह ही सकते है है न और साथ ही भोजन खोजने आया करेंगे तुम अपना और मैं अपना ।”
इस पर

घर के मालिक ने देखा कि कबूतर के साथ एक कौवा भी है तो उसने सोचा कि चलो कबूतर का मित्र होगा इसलिए उसने उस बारे में अधिक नहीं सोचा । अगले दिन कबूतर खाना खोजने के लिए साथ चलने को कहता है तो कौवे ने पेट दर्द का बहाना बना कर मना कर दिया । इस पर कबूतर अकेला ही चला गया क्योंकि कौवे ने घर के मालिक को यह कहते हुए सुना था नौकर को कि आज कुछ मेहमान आ रहे है इसलिए तुम मछली बना लेना ।
उधर कौवा नौकर के रसोई से बाहर निकलने का इन्तजार ही कर रहा था कि उसके जाते ही कौवे ने थाली और झपटा और मछली उठाकर आराम से खाने लगा । नौकर जब वापिस आया तो कौवे को मछली खाते देख गुस्से से भर गया और उसने कौवे को पकड़ कर गर्दन मरोड़ कर मार डाला ।
जब शाम में कबूतर वापिस आया तो उसने कौवे की हालत देखी तो सारी बात समझ गया । इसलिए कहा गया है दुष्ट प्रकृति के प्राणी को उसके किये की सज़ा अवश्य मिलती है ।

Friday, September 18, 2015

विद्या का सदुपयोग

एक व्यक्ति पशु पक्षियों का व्यापार किया करता था | एक दिन उसे पता लगा कि उसके गुरु को पशु पक्षियों की बोली की समझ है | उसके मन में ये ख्याल आया कि कितना अच्छा हो अगर ये विद्या उसे भी मिल जाये तो उसके लिए भी यह फायदेमंद हो |  वह पहुँच गया अपने गुरु के पास और उनकी खूब सेवा पानी की और उनसे ये विद्या सिखाने के लिए आग्रह किया |
गुरु ने उसे वो विद्या सिखा तो दी लेकिन साथ ही उसे चेतावनी भी दी कि अपने लोभ के लिए वो इसका इस्तेमाल नहीं करें अन्यथा उसे इस कुफल भोगना पड़ेगा | व्यक्ति ने हामी भर दी | वो घर आया तो उसने अपने कबूतरों के जोड़े को यह कहते हुए सुना कि मालिक का घोडा दो दिन बाद मरने वाला है इस पर उसने अगले ही दिन घोड़े को अच्छे दाम पर बेच दिया | अब उसे भरोसा होने लगा कि पशु पक्षी एक दूसरे को अच्छे से जानते है |
अगले दिन उसने अपने कुत्ते को यह कहते हुए सुना कि मालिक की मुर्गिया जल्दी ही मर जाएँगी तो उसने बाजार जाकर सारी मुर्गियों को अच्छे दामों पर बेच दिया | और कई दिनों बाद उसने सुना कि शहर की अधिकतर मुर्गियां किसी महामारी की वजह से मर चुकी है वो बड़ा खुश हुआ कि चलो मेरा नुकसान नहीं हुआ |
हद तो तब हो गयी जब उसने एक दिन अपनी बिल्ली को यह कहते हुए सुना कि हमारा मालिक अब तो कुछ ही दिनों का मेहमान है तो उसे पहले तो विश्वास ही नहीं हुआ लेकिन बाद में अपने गधे को भी उसने वही बात दोहराते हुए सुना तो वो घबरा कर अपने गुरु के पास गया और उनसे बोला कि मेरे अंतिम क्षणों में करने योग्य कोई काम है तो बता दें क्योंकि मेरी मृत्यु निकट है |
इस पर गुरु ने उसे डांटा और कहा कि मूर्ख मेने पहले ही तुझसे कहा था कि अपने हित के लिए इस विद्या का उपयोग मत करना क्योंकि सिद्धियाँ न किसी की हुई है और न किसी की होंगी | इसलिए मेने तुझसे कहा था कि अपने लाभ के लिए और किसी के नुकसान के लिए इनका प्रयोग मत करो

Wednesday, September 16, 2015

शतरंज की एक बाजी

एक युवक ने किसी मठ के महंत से कहा मैं साधू बनना चाहता हूँ लेकिन एक समस्या ये है कि मुझे कुछ भी नहीं आता केवल एक चीज़ के और वो है शतरंज लेकिन शतरंज से मुक्ति तो नहीं मिलती और एक दूसरी बात जो मैं जानता हूँ वो ये है कि सभी प्रकार के आमोद प्रमोद के साधन जो है वो पाप है । इन दोनों बातों के अलावा मुझे कोई अधिक ज्ञान नहीं ।
इस पर महंत ने उस युवक से कहा ” हाँ वे पाप तो है लेकिन उन से मन भी बहलता है और क्या पता उस मठ को उनसे भी कोई लाभ पहुंचे ।  महंत ने शतरंज की एक बिसात बिछाई और युवक को शतरंज की एक बाजी खेलने को कहा । सब खेल शुरू होने वाला था महंत ने उस युवक को कहा कि देखो ” हम शतरंज की एक बाजी खेलेंगे और अगर मैं हार गया तो मैं इस मठ को हमेशा के लिए छोड़ दूंगा और तुम मेरा स्थान ले लोगे ।”  युवक ने देखा महंत वास्तव में गंभीर था तो युवक के लिए अब ये बाजी जिन्दगी और मौत का सवाल बन गयी थी क्योंकि वो मठ में रहना चाहता था इसलिए उसे ये था कि मैं हार न जाऊ ।
युवक के माथे से दबाव साफ़ जाहिर हो रहा था और उसके माथे से पसीना भी चू रहा था । वंहा मौजूद सही लोगो के लिए अब ये शतरंज का बोर्ड पृथ्वी की धुरी की तरह हो गया था ।  महंत ने खराब शुरुआत की । युवक ने कई कठोर चले चली लेकिन उसने क्षण भर के लिए महंत के चेहरे को देखा  । फिर जानबूझकर खराब खेलने लगा । अचानक ही महंत ने बिसात ठोकर मरकर जमीन पर गिरा दी ।  महंत ने कहा ” तुम्हे जितना सिखाया गया था तुम उस से कंही ज्यादा जानते हो । तुमने अपना पूरा ध्यान जीतने पर लगाया और अपने सपनों के लिए लड़ सकते हो । फिर तुम्हारे भीतर करूंणा जाग उठी और तुमने भले कार्य के लिए त्याग करने का निश्चय कर लिया ।”
महंत के जारी रखते हुए कहा ” तुम्हारा इस मठ में स्वागत है क्योंकि तुम जानते हो कि कैसे अनुशाशन और करुणा में सामजस्य स्थापित किया जा सकता है इसलिए तुम कर सकते हो ।”

Tuesday, September 15, 2015

जिन्दगी की सीख

यूनानी दार्शनिक अफलातून  के पास हर दिन कई विद्वानों का जमावड़ा लगा रहता था । सभी लोग उनसे कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त करके ही जाया करते थे । लेकिन स्वयं अफलातून  खुद को कभी ज्ञानी नहीं मानते थे क्योंकि उनका मानना था कि इन्सान कभी भी ज्ञानी केसे हो सकता है जबकि हमेशा वो सीखता ही रहता है ।
एक दिन उनके एक मित्र ने उनसे कहा कि ” आपके पास दुनियाभर के विद्वान आपसे ज्ञान लेने आते है और वो लोग आपसे बाते करते हुए अपना जीवन धन्य समझते है लेकिन भी आपकी एक बात मुझे आज तक समझ नहीं आई ” इस पर अफलातून बोले तुम्हे किस बात की शंका है जाहिर तो करो जो पता चले ।
मित्र ने कहा आप खुद बड़े विद्वान और ज्ञानी है लेकिन फिर भी मेने देखा है आप हर समय दूसरों से शिक्षा लेने को तत्पर रहते है । वह भी बड़े उत्साह और उमंग के साथ । इस से बड़ी बात है कि आपको साधारण व्यक्ति से भी सीखने में कोई परेशानी नहीं होती आप उस से भी सीखने को तत्पर रहते है । आपको भला सीखने को जरुरत क्या है कंही आप लोगो को खुश करने के लिए तो उनसे सीखने का दिखावा नहीं करते है ?
अफलातून  जोर जोर से हंसने लगे तो मित्र ने पूछा ऐसा क्यों तो अफलातून ने जवाब दिया कि इन्सान अपनी पूरी जिन्दगी में भी कुछ पूरा नहीं सीख सकता हमेशा कुछ न कुछ अधूरा ही रहता है और फिर हर इन्सान के पास कुछ न कुछ ऐसा जरूर है जो दूसरों के पास नहीं है । इसलिए हर किसी को हर किसी से सीखते रहना चाहिए । और फिर हर बात और अनुभव किताबों में तो नहीं मिलते क्योंकि बहुत कुछ ऐसा है जो लिखा नहीं गया है जबकि वास्तविकता में रहकर और लोगो से सीखते रहने की आदत आपको पूरा नहीं पूर्णता के करीब जरुर ले जाती है । यही जिन्दगी का सार है ।

Monday, September 14, 2015

अपनों की ख़ुशी

शादी के २१ सालों के बाद,मेरी पत्नी चाहती थी कि मैं किसी अन्य महिला को रात के खाने पर और फिल्म के लिए बाहर ले जाऊँ। उसने कहा, “मैं तुमसे प्यार करती हूँ,लेकिन मुझे यह भी ज्ञात है की ये महिला भी तुमसे बेहद प्यार करती है और यदि तुम उसके साथ समय बिताओगे तो उसे अच्छा लगेगा।”
दूसरी महिला, जिसके साथ मेरी पत्नी मुझे भेजना चाहती थी वह और कोई नहीं,मेरी माँ थीं जो १९ साल से विधवा हैं पर मेरे काम के बोझ और बच्चों की ज़िम्मेदारी ने मेरे लिए यह कठिन बना दिया था कि मैं उन्हें भी समय दे सकूँ इसलिए मैं उनसे मिलने कभी कभी ही जाया करता था। उस रात मैंने उन्हें रात के खाने के लिए और फिल्म के लिए आमंत्रण दिया।”क्या तुम ठीक हो?कोई बात तो नहीं है?”-उन्होंने पूछा।
मेरी माँ उन महिलाओं की तरह हैं जो रात के समय की गई कॉल और रात के आमंत्रण को संदिग्ध और किसी बुरी खबर का अंदेशा मानती है।”मुझे लगता है कि आपके साथ कुछ समय बिताना सुखद रहेगा।”-मैंने जवाब दिया।”सिर्फ हम दोनों” । उन्होंने कुछ देर के लिए सोचा,फिर कहा-“मुझे भी यह बहुत अच्छा लगेगा।”
उस शुक्रवार,काम खत्म कर के मैं उन्हें लेने के लिए पहुँचा। मैं थोड़ा तनाव में था। जब मैं उन्हें लेने उनके घर पहुँचा तो मुझे लगा कि वे भी हमारी इस मुलाक़ात के लिए थोड़ा तनाव में थीं। वह दरवाज़े पर कोट पहने खड़ी मेरा इंतज़ार कर रहीं थीं। उन्होंने अपने बालों को कर्ल किया हुआ था और वही पोशाक पहनी हुई थी जो उन्होंने अपनी आखिरी शादी की सालगिरह के जश्न पर पहनी थी।  ”मैंने अपनी दोस्तों को बताया कि मैं अपने बेटे के साथ बाहर जा रही हूँ तो वे लोग बड़े प्रभावित हुए।” उनके चेहरे पर अलग तरह की मुस्कान और चमक थी।  ”वे हमारी इस मुलाक़ात के बारे में सुनने के लिए और इंतज़ार नहीं कर सकते।”
हम एक रेस्तरां में गए जो हालांकि बेहद सुंदर नहीं था पर बहुत अच्छा और आरामदायक था।हमारे बैठने के बाद मैंने मेनू पढ़ने के लिए हाथ में ले लिया.उनकी आँखे इस उम्र में केवल बड़े अक्षर ही पढ़ सकती थीं। आधी प्रविष्टियाँ पढ़ने के बाद जब मैंने अपनी आँखे उपर उठायीं तो पाया की मेरी माँ मुझे ही देख रहीं थीं। उनके होंठो पर एक उदासीन मुस्कान थी।”जब तुम छोटे थे तो मैं मेनू पढ़ा करती थी।”-उन्होंने कहा। “तो अब समय है कि आप आराम करें और अब ये एहसान मुझे चुकाने दें।”-मैंने जवाब दिया।
खाने के समय हमने बहुत बातें की,कुछ असाधारण नहीं पर एक दूसरे की जीवन की घटनाएँ एक दूसरे से साझा की। हम बातों में इतना मशगूल थे कि फिल्म को भूल ही गए। उसके बाद उनके घर पहुँचने के बाद उन्होंने मुझसे कहा-“मैं फिर से तुम्हारे साथ बाहर जाना चाहूँगी,पर एक शर्त पर कि तुम मुझे खुद को आमंत्रित करने का मौका दोगे।”
“कैसी रही आपकी मुलाक़ात?”घर पहुँचने पर मेरी पत्नी ने मुझसे पूछा।  “बहुत अच्छी। इतनी सुखद जिसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता।”
कुछ दिनों बाद ही,मेरी माँ का दिल के दौरे की वजह से देहांत हो गया। यह सब इतना अचानक हुआ कि मुझे उनके लिए कुछ करने का अवसर भी ना मिल सका। कुछ दिनों पश्चात् मुझे उसी रेस्तरां से एक रसीद की कॉपी प्राप्त हुई जिसके साथ एक नोट संलग्न था जिसमे लिखा था-“मैंने इसके बिल का भुगतान पहले ही कर दिया था। । मुझे नहीं पता था कि मैं वहाँ होऊँगी भी या नहीं,फिर भी मैंने दो प्लेटों के लिए भुगतान किया है-तुम और तुम्हारी पत्नी के लिए। तुम सोच भी नहीं सकते कि उस रात तुमने मुझे क्या दिया और उसके मेरे लिए क्या मायने हैं। मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ,बेटा।”
उस दिन मुझे इन शब्दों को सही समय पर कहने का अर्थ -“मैं तुमसे बेहद प्यार करती हूँ।” और अपने प्रियजनों को वो ख़ुशी देना जिसके वो हकदार हैं, का सही अर्थ समझ आया। जीवन में अपने परिवार से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ भी नहीं है।

Friday, September 11, 2015

हमारे जीवन का एक रहस्य

एक औरत बहुत महँगे कपड़े में अपने मनोचिकित्सक के पास जाती है और उसे कहती है कि उसे लगता है कि उसका पूरा जीवन बेकार है,उसका कोई अर्थ नहीं है। वे उसकी खुशियाँ ढूँढने में मदद करें।
मनोचिकित्सक ने एक बूढ़ी औरत को बुलाया जो वहाँ साफ़-सफाई का काम करती थी और उस अमीर औरत से बोला-“मैं मैरी से तुम्हें यह बताने के लिए कहूँगा कि कैसे उसने अपने जीवन में खुशियाँ ढूँढी। मैं चाहता हूँ कि आप उसे ध्यान से सुनें।”
तब उस बूढ़ी औरत ने अपना झाड़ू नीचे रखा,कुर्सी पर बैठ गई और बताने लगी-“मेरे पति की मलेरिया से मृत्यु हो गई और उसके 3 महीने बाद ही मेरे बेटे की भी सड़क हादसे में मौत हो गई। मेरे पास कोई नहीं था। मेरे जीवन में कुछ नहीं बचा था। मैं सो नहीं पाती थी,खा नहीं पाती थी,मैंने मुस्कुराना बंद कर दिया था। मैं खुद का जीवन लेने की तरकीबें सोचने लगी थी।
तब एक दिन,एक छोटा बिल्ली का बच्चा मेरे पीछे लग गया जब मैं काम से घर आ रही थी। बाहर बहुत ठंड थी इसलिए मैंने उस बच्चे को अंदर आने दिया। उस बिल्ली के बच्चे के लिए थोड़े से दूध का इंतजाम किया और वह सारी प्लेट सफाचट कर गया। फिर वह मेरे पैरों से लिपट गया और चाटने लगा। उस दिन,बहुत महीनों बाद,मैं मुस्कुराई।
तब मैंने सोचा,अगर इस बिल्ली के बच्चे की सहायता करना मुझे ख़ुशी दे सकता है,तो हो सकता है,दूसरों के लिए कुछ करके मुझे और भी ख़ुशी मिले। इसलिए अगले दिन मैं अपने पड़ोसी,जो कि बीमार था,उसके लिए कुछ बिस्किट्स बना कर ले गई।
हर दिन मैं कुछ नया और कुछ ऐसा करती थी जिससे दूसरों को ख़ुशी मिले। और उन्हें खुश देख कर मुझे ख़ुशी मिलती थी।
आज,मैं किसी को नहीं जानती जो मुझे बेहतर खाता-पीता हो और चैन से सोता हो। मैंने खुशियाँ ढूँढी हैं,दूसरों को ख़ुशी देकर।”
यह सब सुन कर वह अमीर औरत रोने लगी। उसके पास वह सब था जो वह पैसे से खरीद सकती थी पर उसने वह चीज खो दी थी जो पैसे से नहीं खरीदी जा सकती।
हमारा जीवन इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कितने खुश हैं अपितु इस बात पर निर्भर करता है कि हमारी वजह से कितने लोग खुश हैं।
ख़ुशी मंजिल नहीं,यात्रा है…..वह कल नहीं,आज है….निर्भरता नहीं,निर्णय है…..यह नहीं कि हम कौन है,अपितु हमारे पास क्या है

माँ की प्रेरणा

एक अत्यंत ही परेशान महिला अपनी माँ के पास गयी और उसने अपने कठिन जीवन के बारे में उन्हें बताया कि वह संघर्ष से हार चुकी है और अब जीवन की परिस्थितियों से लड़ पाने में असमर्थ है। वह जब भी किसी समस्या का हल ढूंढ लेती,अन्य नयी समस्याएँ उठ कर खड़ी हो जाती।
यह सब सुन कर उसकी माँ उसे रसोईघर में ले गयी जहां उसने तीन बर्तनों में पानी भरकर आग पर रख दिया। पानी में उबाल आने पर उसने तीनों बर्तनों में अलग-अलग गाजर,अंडा और कॉफ़ी फलियाँ डाल दी और उन्हें उबलने के लिए छोड़ दिया। कुछ देर बाद,उन्होंने बर्नर बंद कर के गाजर,अंडा ओर कॉफ़ी अलग-अलग बर्तनों में निकल के रख दिया। इसके बाद उन्होंने अपनी पुत्री को देखा और पूछा-“तुम क्या देखती हो?”
“गाजर,अंडा और कॉफ़ी”-पुत्री ने जवाब दिया।
उसकी माँ ने उसे पास आकर गाजर को महसूस करने के लिए कहा। ऐसा करने पर पुत्री ने पाया कि वे अत्यंत नरम हो गए थे। उसके बाद माँ ने उसे अंडा तोड़ने के लिए कहा परन्तु वह ऐसा कर पाने में असमर्थ रही क्योंकि उबलने के कारण अंडा अंदर से सख्त हो चुका था। अंततः,माँ ने उसे कॉफ़ी पीने को कहा। कॉफ़ी की सुगंध से पुत्री के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने माँ से इन सभी चीजों का तात्पर्य पूछा।
माँ ने समझाया-“प्रत्येक वस्तु ने एक जैसी विपरीत परिस्थितियों का सामना किया परन्तु प्रत्येक ने अलग तरीके से अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की। गाजर मजबूत एवं कठोर था पर उबलने के पश्चात् नरम और कमज़ोर हो गया। अंडा कमज़ोर था। इसका बाहरी कवच इसके आतंरिक तरल की रक्षा कर रहा था। लेकिन उबलते पानी में जाने के बाद यह ऊपर से नरम ही रहा पर अंदर से कठोर हो गया। कॉफ़ी फलियाँ अद्वितीय थीं। उबलते पानी में जाने के बाद उन्होंने स्वयं को ना बदल कर पानी को ही बदल दिया।
“तुम इनमें से क्या हो?”माँ ने पुत्री से पूछा।”जब विपरीत परिस्थितियाँ तुम्हारे सामने आती हैं तो तुम्हारी प्रतिक्रिया कैसी रहती है?सोचो कि तुम इनमें से किसकी तरह व्यवहार करती हो?गाजर की भांति कठोर हो और प्रतिकूल परिस्थितियाँ आने पर अपनी ताकत खो कर उनसे डर जाती हो,अथवा अंडे की तरह अंदर से कमज़ोर हो परन्तु समस्या आने पर कठोर हो जाती हो। कठिनाइयों के उपरान्त तुम ऊपर से नरम रह कर अंदर से कड़ी एवं कठोर दिल वाली बन जाती हो या कॉफ़ी की उन फलियों की तरह हो जो उबलते पानी को ही बदल देती हैं जो की उसके दर्द का प्रमुख कारण है। जैसे-जैसे पानी उबलता है,यह उसे सुगंध और स्वाद दोनों प्रदान करती जाती हैं। फली की तरह प्रतिक्रिया देने वाला व्यक्ति कठिन समय आने पर स्वयं को और भी बेहतर बना कर परिस्थिति को ही बदल देता है।”
जब जीवन अंधेरों से घिर जाए और सभी कठिनाइयाँ परीक्षाएँ लेने लगे तो आप उनका सामना कैसे करते हैं?गाजर बन कर,अंडा बन कर अथवा फलियों की तरह।

Wednesday, September 9, 2015

चींटी फालतू यात्रा

एक सुबह,एक समृद्ध व्यक्ति अपनी बालकनी में बैठा सूर्य की धूप के साथ कॉफ़ी का आनंद ले रहा था। तभी उसकी नज़र एक छोटी सी चींटी पर पड़ी जो अपने भार से कई गुना अधिक भार के पत्ते को ढो कर बालकनी के एक ओर से दूसरी ओर जा रही थी। आदमी करीब एक घंटे तक उसे देखता रहा। उसने देखा की चींटी ने अपनी यात्रा में कई रुकावटों का सामना किया,रुक कर अपना रास्ता बदला और फिर अपनी मंजिल की ओर बढ़ चली। एक मोड़ पर वह चींटी फर्श में एक दरार के पास फंस गई। वह रुकी,स्थिति का अवलोकन करने के बाद उसने दरार पर पत्ता रखा और दरार उसपर से चल कर पार कर गई। आदमी भगवान के उस छोटे से जीव की चतुराई पर स्तब्ध रह गया। यह घटना उस व्यक्ति को अवाक् कर गई और वह ईश्वर के इस चमत्कार को सोचने पर मजबूर हो गया। उसकी आँखों के सामने,यह छोटा सा जीव था,जो अपने आकार में बहुत ही लघु थी पर उसके दिमाग की सोचने की शक्ति,अन्वेषण करने की क्षमता,और परिस्थिति से उबरने की ताकत अत्यंत अद्भुत थी और यह इंसानों के समान ही एक दोष से जूझ रही थी। एक घंटे बाद,आदमी ने देखा कि वह चींटी अपने बिल के पास पहुँच गई थी। अपने बिल के मुख्यद्वार पर आकर यह रुक गई। और इंसानों वाला दोष इस मोड़ पर आकर प्रकट हो गया था। यह चींटी जो इतनी मेहनत से उस बड़े से पत्ते को अपनी मंजिल तक लाई,अपने बिल में ले जाने में असमर्थ थी। यह छोटा जीव,इतनी कठिनाइयों का सामना करने के बाद,अपनी क्षमताओं के अद्भुत प्रदर्शन के बाद वह पत्ता अपने बिल के बाहर छोड़ गई और अपने बिल में खाली हाथ लौट गई। उस चींटी ने अपनी चुनौती भरी यात्रा शुरू करने से पहले इसके दुखद अंत के बारे में नहीं सोचा था और यह पत्ता अंत में आकर उसके लिए एक भार से कम नहीं था.उसके पास उसे बाहर छोड़ने के अलावा और कोई चारा भी नहीं था। उस दिन उस व्यक्ति ने जीवन का एक बहुत बड़ा सबक सीखा।
हमारे जीवन का भी यही कड़वा सत्य है। हम अपने परिवार की चिंता करते हैं,अपनी नौकरी की चिंता करते हैं,अधिक से अधिक पैसे कैसे कमाएँ,इसकी चिंता करते हैं,हमे कहाँ रहना चाहिए,कैसे कपड़े पहनने चाहिए,कैसी गाड़ी लेनी चाहिए आदि और अंत में हम एक ही मंजिल पर पहुँचते हैं-कब्र। हम इस बात का अंदाज़ा नहीं लगा पाते कि जिन चीजों से हमें इतना मोह है, और जिन्हें खोने से हम इतना डरते हैं,अंत में वे निरर्थक साबित होती हैं और उनमें से कुछ भी हम अपने साथ नहीं ले जाते। हमारे जीवन में संतुष्टि होनी चाहिए। अंत में हमारे साथ केवल ईश्वर का नाम जाता है और कुछ भी नहीं।

Tuesday, September 8, 2015

आपका हीरा आपके दिमाग में है

एक किसान था जो बहुत खुश और संतुष्ट था। वह खुश था क्योंकि वह संतुष्ट था। वह संतुष्ट था क्योंकि वह खुश था। एक बार एक समझदार आदमी उसके पास आया और उसे हीरे का महत्त्व समझाने लगा कि हीरे के साथ शानों-शोहरत साथ आती है। उस आदमी ने कहा-“यदि तुम्हारे पास अपने अँगूठे के आकार का हीरा है तो तुम खुद का शहर बना सकते हो। यदि तुम्हारे पास अपनी मुट्ठी जितना बड़ा हीरा है तो आप अपना खुद का देश बना सकते हो।”
उस रात वह किसान सो नहीं पाया। वह दुखी और असंतुष्ट था। वह दुखी था क्योंकि वह असंतुष्ट था। वह असंतुष्ट था क्योंकि वह दुखी था। अगली सुबह,उसने अपने परिवार का ख्याल कर के अपना खेत बेचने का इंतजाम किया, और हीरे की खोज में निकल गया।
उसने अपना पूरा देश ढूँढ लिया,पर उसे हीरा नहीं मिला। उसने बाकी देशों में भी बहुत ढूँढा,पर वहाँ भी उसे हीरा ना मिला। अंत में,वह शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तौर पर हार गया। इस बात से वह इतना पीड़ित हुआ कि उसने नदी में कूद कर आत्महत्या कर ली।
इधर,जिस व्यक्ति ने उस किसान का खेत ख़रीदा था,वह खेतों में से बहती पानी की धारा से अपने ऊँटों को पानी पिला रहा था। उस धारा के उस पार,सूर्य की किरणें एक छोटे से पत्थर पर पड़ीं और वह पत्थर इन्द्रधनुष की भांति चमक उठा। उस व्यक्ति ने उसे उठाया और यह सोच कर कि वह उसके घर की शोभा बढ़ाएगा,अपने कक्ष में रख दिया। उसी दिन वह समझदार व्यक्ति आया और वह पत्थर देख कर उसने उससे पूछा-“क्या हाफ़िज़ वापिस आ गया है?”
उस नए मालिक ने उत्तर दिया-“नहीं,आप क्यों पूछ रहे हैं?”
समझदार व्यक्ति बोला-“यह पत्थर हीरा है,जिसे मैं देखते ही पहचान गया था।”
उस आदमी ने कहा-“नहीं,यह केवल एक चमकदार पत्थर है,जिसे मैंने धारा के पास से उठाया है और वहाँऐसे ही ढेरों पत्थर हैं।”वे वहाँ गए और उस स्थान का निरीक्षण किया। वहाँ पड़े पत्थर वास्तव में हीरे थे। अंततः,उन्होंनें पाया कि उस खेत की भूमि ऐसे ही अनेक हीरों से लबालब थी।
दूर के ढोल सदैव सुहावने ही लगते हैं। जब हमारा दृष्टिकोण सही होता है,तब हम उन सभी हीरों को पहचान पाते हैं जिन पर हम चल रहे होते हैं। अवसर सदैव हमारे आस पास ही होता है,आवश्यकता होती है बस उन्हें पहचानने की। और एक ही अवसर कभी भी आपके जीवन में दुबारा दस्तक नहीं देता।

प्रेम की महिमा

पुराने समय की बात है एक शहर के आस पास के जंगलो में एक भेडिये का इतना आतंक छाया हुआ था कि वंहा कोई रास्ता चलने का साहस भी नहीं करता था । वह अनेक मनुष्यों और जानवरों को मार चुका था । अंत में उस शहर के एक महान संत फ्रास्वा ने उस भयानक जानवर का सामना करने की ठानी । वे शहर के से बाहर निकले तो उनके पीछे स्त्री और पुरुषों की बहुत भीड़ थी ।
जैसे ही संत जंगल के समीप पहुंचे वैसे ही भेडिये ने उनकी तरफ रुख किया और उनकी और लपका । तभी संत ने उसकी और एक शांतिपूर्वक ऐसा संकेत किया कि भेड़िया ठंडा होकर संत के पैरो के पास ऐसे लोट गया जैसे कोई भेड़ का बच्चा हो । तभी संत ने उसे संबोधित किया ” कि देख भाई तूने इस शहर को बहुत हानि पहुंचाई है और बहुत उत्पात किया है इस वजह से तू बाकी अपराधियों की तरह दंड का अधिकारी है और इस शहर के लोग तुमसे बहुत घृणा करते है । परन्तु यदि तेरे और इस शहर में रहने वाले मेरे मित्रो के बीच मैत्री स्थापित हो जाये तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी । भेडिये ने अपना सिर झुका लिया और पूँछ हिलाने लगा ।”
इस पर संत ने फिर से कहा ”  देख भाई मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि अगर तू इन लोगो के साथ शांतिपूर्वक रहना स्वीकार करता है तो ये लोग भी तेरे साथ बेहद अच्छा बर्ताव करेंगे और साथ ही तेरे लिए खाने की भी व्यवस्था कर देंगे । ” क्या तू ये प्रतिज्ञा करता है ? इस पर भेडिये ने अपना सिर पूरी तरह झुका लिया और संत के हाथ पर अपना पंजा रख दिया ।
संत उसे शहर के बीचो बीच ले गये और सबके सामने एक बार फिर भेडिये से ये बात कही तो भेडिये ने पहले की तरह संत के हाथ पर हाथ रख दिया और उसके बाद वो भेड़िया दो साल तक उस शहर में रहा और उसने किसी को कोई हानी नहीं पहुंचाई इस पर उसके मरने पर भी लोगों को बहुत दुःख हुआ लेकिन फिर भी वो लोग हेरान थे कि ऐसा खूंखार जानवर ने अपनी प्रवृति किस तरह बदल ली ।
उसे  जिसने बदल दिया उसके अंदर एक चीज़ थी ये किसी ने नहीं जाना । ये संत फ्रांस्वा का प्रेम पूर्ण बर्ताव था जिसने उसे बदल दिया और प्रेम की महिमा इसी को तो कहते है ।
कहानी से हमे सीख मिलती है कि किसी भी तरह के बुरे इन्सान जो अपने स्वभावत: बुरा होता है उसे हम अपने अच्छे बर्ताव से बदल सकते है अगर हम ऐसा करना चाहें तो क्योंकि वो लोग जो समाज के विरोध में सोचते है उन्हें समाज से बाहर तिरस्कृत करने से कोई समस्या हल नहीं हो जाती है जरुरत है तो बस उनसे और अधिक प्रेमपूर्वक बर्ताव की जिस से हम उनकी जिन्दगी बदल सकते है ।

Sunday, September 6, 2015

सारस और कछुवा

एक तालाब में एक सारसों का जोड़ा रहता था तो उसी तालाब में रहने वाले कछुवे से उनकी अच्छी दोस्ती हो गयी |सारस सुबह होने के बाद आसमान में उड़ जाते और फिर देर रात को वापिस आते उन्हें जाते देख कछुवे का भी बड़ा मन होता था आसमान देखने का इसलिए तो मन में बहुत बार ये विचार करता कि काश मैं किसी तरह उड़ पाता तो मैं भी आसमान को देखता |
एक दिन उसने अपने मन की बात अपने सारस मित्रो से कह दी तो सारसों ने कहा मित्र तुम कैसे उड़ सकते हो क्योंकि तुम्हारे तो पंख नहीं है इसलिए उड़ पाना बेहद मुश्किल है तुम नहीं उड़ पाओगे | तो कछुवा उदास हो गया और थोड़ी देर सोचकर फिर बोला कि यार कुछ तो रास्ता होगा तुम मेरे लिए निकालो कि  मैं भी आसमान देख सकू|
अपने मित्र की इतनी तीव्र इच्छा देखकर सारसों ने भी कुछ युक्ति के बारे में सोचा तो कुछ दिनों बाद वो अचानक आये और बोले मित्र हमने तुम्हारे लिए एक उपाय सोच लिया है अब तुम्हे भी आज हम आसमान की सैर कराते है कहकर उन्होंने एक लम्बी मजबूत छड़ी को दिखाकर कहा हम इसे अपने मुह में पकड़ लेंगे और तुम भी कसकर इसे अपने मुह से पकड़ लेना फिर हम उड़ान भरेंगे और तुम भी हमारे साथ उड़ जाओगे कहकर उन्होंने उड़ने की तैयारी की कछुवे ने उनके बताये अनुसार छड़ी को पकड़ा और वो दोनों सारस उड़ चले |
कछुवा अपने बाकि के साथ के कछुवो के सामने उड़ते हुए घमंड से भर गया और सारस उड़ते गये और वो हरे भरे मैदानों और जगलों आदि को पार करके बहुत देर तक उड़ते रहे | कछुवे ने ये सब पहली बात देखा था तो मंत्रमुग्ध हो गया और ये विचार भूल गया कि वो उड़ नहीं सकता है इसलिए भ्रम में आकर उसने उड़ने की कोशिश करने के लिए जैसे ही अपना मुह खोला और हाथ पैर चलाये तो छड़ी की पकड़ उस से छूट गयी और वो बहुत ऊंचे से नीचे आ गिरा और गिरते ही उसके प्राण पखेरू उड़ गये |
सच ही कहा गया है अपनी शक्तियों और सीमायों को नहीं पहचानने का परिणाम बहुत बुरा होता है |