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Friday, May 8, 2026

मेहनती लकड़हारा

बहुत समय पहले एक छोटे से गाँव सुंदरपुर में रामदास नाम का एक लकड़हारा रहता था।वह बहुत गरीब थालेकिन बेहद मेहनती और ईमानदार इंसान था। उसका काम जंगल सेलकड़ी काटकर गाँव और बाजार में बेचने का था। उसी से वह अपने परिवार का गुज़ाराकरता था

रामदास के परिवार में उसकी पत्नी और दो छोटे बच्चे थे। घर बहु साधारण थालेकिन परिवार में प्यार और संतोष था। रामदास हमेशा अपने बच्चों से कहता था,
बेटाजीवन में अगर मेहनत और मानदारी होतो इंसान कभी भूखा नहीं रहता।

रामदास रोज़ सुबह सूरज निकलने से पहले उठ जाता था। वह अपनी कुल्हाड़ी उठाताऔर जंगल की ओर निकल पड़ता। पूरे दिन मेहनत करके लकड़ी काटता और शामको उसे बाजार में बेच देता।

गाँव के कई लोग उसकी मेहनत देखकर कहते थे,
रामदास बहुत मेहनती आदमी है।  कभी काम से पीछे नहीं हटता।

एक दिन की बात है।

रामदास हमेशा की तरह जंगल में कड़ी काटने गया हुआ था। जंगल के बीचों-बीचएक नदी बहती थी। रामदास नदी के किनारे खड़े होकर पेड़ की सूखी टहनियाँ काटरहा था।

अचानक उसका हाथ फिसल गया और उसकी कुल्हाड़ी नदी में गिर गई

रामदास बहुत घबरा गया।

उसने नदी में झाँककर अपनी कुल्हाड़ी ढूँढने की कोशिश कीलेकि नदी बहुत गहरीथी। उसे अपनी कुल्हाड़ी दिखाई नहीं दी।

रामदास दुखी होकर नदी किनारे बै गया और सोचने लगा
अगर मेरी कुल्हाड़ी नहीं मिली, तो मैं लकड़ी कैसे काटूँगाऔर अगर मैं लकड़ी नहींकाट पायातो अपने परिवार का पालन-पोषण कैसे करूँगा?”

यह सोचकर उसकी आँखों में आँसू  गए।

तभी अचानक नदी से एक देवी प्रकट हुईं।

देवी ने रामदास से पूछा,
तुम इतने दुखी क्यों होलकड़हारे?”

रामदास ने हाथ जोड़कर कहा,
माँमेरी कुल्हाड़ी नदी में गि गई है। वही मेरे काम का एकमात्र साधन थी। अब मैंक्या करूँगा?”

देवी ने मुस्कुराकर कहा,
घबराओ मत। मैं तुम्हारी मदद करती हूँ।

इतना कहकर देवी नदी में डुबकी गाकर नीचे गईं और थोड़ी देर बाद सोने कीकुल्हाड़ी लेकर बाहर आईं

उन्होंने रामदास से पूछा,
क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?”

रामदास ने तुरंत सिर हिलाते हुए कहा,
नहीं माँयह मेरी कुल्हाड़ी हीं है। मेरी कुल्हाड़ी तो लोहे की थी।

देवी फिर नदी में गईं और इस बार चाँदी की कुल्हाड़ी लेकर आईं।

उन्होंने पूछा,
क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है?”

रामदास ने फिर विनम्रता से कहा,
नहीं माँयह भी मेरी कुल्हाड़ी नहीं है।

देवी तीसरी बार नदी में गईं और इस बार लोहे की पुरानी कुल्हाड़ी लेकर बाहर आईं।

रामदास खुशी से बोला,
हाँ माँयही मेरी कुल्हाड़ी है

देवी रामदास की ईमानदारी और सच्चाई देखकर बहुत खुश हुईं।

उन्होंने कहा,
रामदासतुम बहुत ईमानदार और मेहनती इंसान हो। इसलिए मैं तुम्हें इन तीनोंकुल्हाड़ियों को उपहार में देती हूँ।

रामदास यह सुनकर आश्चर्यचकित रह गया।

उसने हाथ जोड़कर देवी को धन्यवा दिया और खुशी-खुशी अपने घर लौ आया।

गाँव के लोगों ने जब यह कहानी सुनीतो वे बहुत हैरान हुए।

गाँव में एक और लकड़हारा था जिसका नाम धनराज था। वह लालची और चालाकथा।

जब उसने रामदास की कहानी सुनीतो उसने सोचा
अगर मैं भी अपनी कुल्हाड़ी नदी में गिरा दूँतो शायद मुझे भी सोने-चाँदी कीकुल्हाड़ी मिल जाए।

अगले दिन वह भी जंगल गया और जानबूझकर अपनी कुल्हाड़ी नदी में फेंक दी।

फिर वह जोर-जोर से रोने लगा।

कुछ देर बाद वही देवी प्रकट हुईं और उन्होंने उससे पूछा,
तुम क्यों रो रहे हो?”

धनराज ने झूठ बोलते हुए कहा,
माँमेरी कुल्हाड़ी नदी में गि गई है।

देवी नदी में गईं और सोने की कुल्हाड़ी लेकर बाहर आईं।

धनराज लालच में तुरंत बोला,
हाँ माँयही मेरी कुल्हाड़ी है

देवी को उसकी चालाकी समझ में  गई।

वे नाराज़ होकर बोलीं,
तुम झूठ बोल रहे हो और लालच कर रहे हो। इसलिए तुम्हें कुछ भी नहीं मिलेगा।

इतना कहकर देवी गायब हो गईं।

धनराज को अपनी असली कुल्हाड़ी भी नहीं मिली और उसे खाली हाथ घर लौटनापड़ा।

उधर रामदास अपनी मेहनत और ईमानदारी से खुशहाल जीवन जीने लगा।

गाँव के लोग अक्सर बच्चों को उसकी कहानी सुनाते और कहते
मेहनत और ईमानदारी का फल हमेशा मीठा होता है।

और सच ही कहा गया है
मेहनत और सच्चाई इंसान को जीवन में सच्ची सफलता दिलाती हैं।

सीख:
हमें हमेशा मेहनत और ईमानदारी का रास्ता अपनाना चाहिए। लालच और झूठ अंत मेंहमेशा नुकसान ही पहुँचाते हैं।

Monday, May 4, 2026

लालच बुरी बला

बहुत समय पहले एक छोटे से गाँव रामनगर में श्यामलाल नाम का एक व्यापारी रहता था। वह काफी अमीर था और उसके पास धन-दौलत की कोई कमी नहीं थी। फिर भी उसके मन में हमेशा और ज्यादा पैसे कमाने की इच्छा रहती थी। उसकी यही आदत धीरे-धीरे लालच में बदल गई थी।

श्यामलाल का एक बड़ा किराने का दुकान था। गाँव के लोग रोज़ उसके पास सामान लेने आते थे। लेकिन श्यामलाल हमेशा ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए लोगों को कम तौलकर सामान देता था। वह सोचता था कि अगर वह थोड़ा-थोड़ा कम तौलेगा, तो उसे ज्यादा फायदा होगा।

गाँव के कुछ लोगों को उसकी इस आदत पर शक होने लगा था, लेकिन कोई पक्के सबूत के बिना कुछ कह नहीं पाता था।

श्यामलाल का एक पड़ोसी था जिसका नाम रघु था। रघु बहुत गरीब था, लेकिन बहुत मेहनती और ईमानदार आदमी था। वह खेतों में काम करता था और मेहनत से अपने परिवार का पालन-पोषण करता था।

एक दिन रघु श्यामलाल की दुकान पर गेहूँ खरीदने गया। जब वह घर पहुँचा और गेहूँ को तौला, तो उसे पता चला कि वजन कम है।

रघु को बहुत दुख हुआ, लेकिन उसने सोचा कि शायद गलती से ऐसा हो गया होगा।

कुछ दिनों बाद गाँव में एक साधु आए। गाँव के लोग उनका बहुत सम्मान करते थे। साधु बहुत बुद्धिमान थे और लोगों को अच्छे विचार देते थे।

श्यामलाल भी साधु के पास गया और उनसे आशीर्वाद लेने लगा।

साधु ने उसकी आँखों में देखकर कहा,

“बेटा, जीवन में लालच से दूर रहना। लालच इंसान को धीरे-धीरे बर्बादी की ओर ले जाता है।”

लेकिन श्यामलाल ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया।

वह मन ही मन सोचने लगा,

“अगर मैं लालच नहीं करूँगा, तो ज्यादा पैसा कैसे कमाऊँगा?”

कुछ दिनों बाद श्यामलाल को शहर से एक व्यापारी मिलने आया। उसने श्यामलाल को बताया कि पास के जंगल में एक पुराना खजाना छिपा हुआ है।

यह बात सुनकर श्यामलाल के मन में लालच जाग गया।

उसने सोचा—

“अगर मुझे वह खजाना मिल गया, तो मैं बहुत अमीर बन जाऊँगा।”

अगले ही दिन वह खजाने की तलाश में जंगल की ओर निकल पड़ा।

जंगल बहुत घना और डरावना था। फिर भी श्यामलाल लालच में आगे बढ़ता गया।

काफी देर तक भटकने के बाद उसे एक पुराना गुफा दिखाई दिया।

वह धीरे-धीरे गुफा के अंदर गया। अंदर उसे सच में एक पुराना संदूक दिखाई दिया।

संदूक खोलते ही उसकी आँखें चमक उठीं, क्योंकि उसमें सोने के सिक्के और कीमती गहने थे।

श्यामलाल बहुत खुश हो गया।

लेकिन उसका लालच यहीं खत्म नहीं हुआ।

उसने सोचा—

“अगर मैं थोड़ा और अंदर जाऊँ, तो शायद मुझे और ज्यादा खजाना मिल जाए।”

वह लालच में गुफा के और अंदर जाने लगा।

अचानक गुफा के अंदर की जमीन फिसलन भरी थी। उसका पैर फिसल गया और वह नीचे गिर पड़ा।

उसके हाथ से खजाने का संदूक भी गिर गया और सारे सिक्के चारों तरफ बिखर गए।

श्यामलाल घायल हो गया और उसे बहुत मुश्किल से गुफा से बाहर निकलना पड़ा।

जब वह गाँव वापस पहुँचा, तो उसकी हालत बहुत खराब थी।

गाँव के लोगों ने उसकी मदद की और उसे घर पहुँचाया।

अब श्यामलाल को अपनी गलती का एहसास होने लगा था।

उसे साधु की बात याद आई—

“लालच इंसान को बर्बादी की ओर ले जाता है।”

उस दिन के बाद श्यामलाल ने अपने जीवन को बदलने का फैसला किया।

उसने अपनी दुकान में ईमानदारी से सामान बेचने का काम शुरू कर दिया।

अब वह लोगों को सही वजन देता था और किसी को धोखा नहीं देता था।

धीरे-धीरे गाँव के लोगों का उस पर फिर से विश्वास बनने लगा।

श्यामलाल ने समझ लिया था कि सच्ची खुशी धन के लालच में नहीं, बल्कि ईमानदारी और संतोष में होती है।

और सच ही कहा गया है—

“लालच बुरी बला है, जो इंसान को गलत रास्ते पर ले जाती है।”

सीख:

हमें कभी भी लालच नहीं करना चाहिए। संतोष और ईमानदारी ही जीवन को सुखी और सफल बनाते हैं।

असफलता से सीख