एक छोटे से शहर में निखिल नाम का बारह साल का लड़का रहता था। वह शांत स्वभाव का था और पढ़ाई में औसत था।
उसकी कक्षा में उसका दोस्त आर्यन हमेशा प्रथम आता था।
जब भी स्कूल में परिणाम आता, निखिल के पिता उससे कहते—
“देखो आर्यन को! वह हमेशा अच्छे नंबर लाता है। तुम उससे कुछ क्यों नहीं सीखते?”
निखिल चुप हो जाता।
घर में भी यही बात होती।
“शर्मा जी का बेटा गणित में बहुत अच्छा है।”
“वर्मा जी की बेटी अंग्रेजी में सबसे आगे है।”
“तुम आखिर कब समझोगे?”
धीरे-धीरे निखिल को लगने लगा कि शायद उसमें कोई खासियत ही नहीं है।
वह पढ़ाई से डरने लगा।
कॉपी खोलता तो उसे अपने कम नंबर दिखाई देते।
एक दिन स्कूल में विज्ञान की प्रदर्शनी होने वाली थी। शिक्षक ने बच्चों से कहा—
“हर बच्चा अपनी पसंद की कोई चीज बनाकर लाए।”
आर्यन ने रोबोट बनाया।
किसी ने ज्वालामुखी का मॉडल बनाया।
किसी ने सौरमंडल बनाया।
निखिल ने पुराने डिब्बों, तारों, छोटी मोटर और कुछ बेकार इलेक्ट्रॉनिक सामान से एक छोटा पानी बचाने वाला स्वचालित पौधा-सिंचाई मॉडल बना दिया।
उसके शिक्षक ने मॉडल देखा तो हैरान रह गए।
उन्होंने पूछा—
“निखिल, यह तुमने बनाया है?”
निखिल ने धीरे से कहा—
“जी सर।”
“कहाँ से सीखा?”
“किसी से नहीं सर। मुझे चीजें खोलकर देखना और फिर उन्हें जोड़ना अच्छा लगता है।”
शिक्षक मुस्कुराए।
“तुम्हारे अंदर बहुत अच्छी कल्पना है।”
प्रदर्शनी के दिन निखिल का मॉडल सबसे ज्यादा लोगों का ध्यान खींच रहा था।
उस मॉडल में मिट्टी सूखने पर पौधे में अपने आप थोड़ा पानी पहुँचता था और पानी बेकार नहीं बहता था।
स्कूल के प्रधानाचार्य ने निखिल को पुरस्कार दिया।
लेकिन निखिल के पिता को अभी भी विश्वास नहीं था।
उन्होंने कहा—
“अच्छा है, लेकिन असली जिंदगी में नंबर ही काम आते हैं।”
निखिल फिर चुप हो गया।
उसके विज्ञान शिक्षक ने उसके पिता से कहा—
“आपका बेटा हर विषय में समान नहीं है, लेकिन उसकी सोच अलग है। अगर आप हर समय उसकी तुलना दूसरे बच्चों से करेंगे, तो उसकी प्रतिभा दब जाएगी।”
पिता ने बात सुनी, लेकिन पूरी तरह समझ नहीं पाए।
कुछ महीनों बाद स्कूल में एक और प्रतियोगिता हुई।
इस बार बच्चों को अपने शहर की किसी समस्या का समाधान तैयार करना था।
निखिल ने अपने दोस्तों के साथ मिलकर एक ऐसा मॉडल बनाया जिसमें घरों से निकलने वाले गंदे पानी को छानकर बगीचे में इस्तेमाल करने का तरीका दिखाया गया।
उनका मॉडल राज्य स्तर की प्रतियोगिता के लिए चुन लिया गया।
निखिल के पिता पहली बार उसके साथ प्रतियोगिता में गए।
जब उन्होंने देखा कि दूसरे स्कूलों के शिक्षक निखिल के मॉडल की तारीफ कर रहे हैं, तो उन्हें अपने पुराने शब्द याद आए—
“देखो आर्यन को…”
उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने अपने बेटे को कभी निखिल की नजर से देखा ही नहीं था।
वे हमेशा उसे किसी और के पैमाने से मापते रहे।
वापसी के रास्ते में पिता ने कहा—
“बेटा, मुझे माफ कर दो।”
निखिल ने आश्चर्य से पूछा—
“क्यों पापा?”
पिता बोले—
“मैं हमेशा चाहता था कि तुम किसी और जैसे बनो। मुझे समझना चाहिए था कि तुम्हें किसी और जैसा बनने की जरूरत नहीं है।”
निखिल की आँखें भर आईं।
उसने कहा—
“पापा, मुझे बस इतना चाहिए था कि आप मुझ पर विश्वास करें।”
उस दिन के बाद घर का माहौल बदल गया।
निखिल को पढ़ाई से भागने के बजाय समझकर पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा।
उसके पिता ने उसके लिए एक छोटी-सी मेज खरीदी, जहाँ वह अपने मॉडल और प्रयोग कर सके।
समय बीतता गया।
निखिल ने इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और आगे चलकर पानी बचाने वाली कम लागत की तकनीक विकसित करने लगा।
एक दिन उसे अपने शहर के एक बड़े समारोह में सम्मानित किया गया।
मंच पर खड़े होकर उसने कहा—
“मेरी सफलता की शुरुआत उस दिन हुई थी, जब मेरे पिता ने मेरी तुलना करना बंद करके मुझे समझना शुरू किया।”
पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा।
पहली पंक्ति में बैठे उसके पिता की आँखों में गर्व के आँसू थे।
उन्होंने धीरे से कहा—
“मेरा बेटा किसी और जैसा नहीं बना… और यही उसकी सबसे बड़ी खूबी थी।”
समाज के लिए संदेश
हर बच्चा एक जैसा नहीं होता।
कोई गणित में अच्छा होता है, कोई खेल में, कोई कला में, कोई संगीत में, कोई विज्ञान में और कोई ऐसी समस्या का समाधान सोच सकता है जिसे दूसरे देख भी नहीं पाते।
बच्चों की तुलना करना उन्हें बेहतर नहीं बनाता, बल्कि कई बार उनके आत्मविश्वास को कमजोर कर देता है।
माता-पिता और शिक्षक का काम सिर्फ नंबर बढ़ाना नहीं, बल्कि बच्चे की प्रतिभा पहचानना भी है।
बच्चे से यह मत पूछिए—
“तुम दूसरे बच्चे जैसे क्यों नहीं हो?”
उससे पूछिए—
“तुम्हें किस काम में सबसे ज्यादा खुशी मिलती है?”
क्योंकि हर बच्चे के अंदर कोई न कोई विशेष क्षमता होती है।
जरूरत सिर्फ उसे पहचानने की है।
अंतिम संदेश
“बच्चों को अपनी अधूरी इच्छाओं का बोझ मत बनाइए। उन्हें अपनी पहचान बनाने का अवसर दीजिए।”
तुलना से बच्चे दब सकते हैं,
लेकिन विश्वास से बच्चे उड़ सकते हैं।
याद रखिए—
हर बच्चा प्रथम नहीं आ सकता, लेकिन हर बच्चे को अपनी जिंदगी में कुछ न कुछ उत्कृष्ट करने का अवसर जरूर मिलना चाहिए।
बच्चे को बदलने से पहले उसकी क्षमता को समझिए—क्योंकि जिस पौधे को सही मिट्टी और सही वातावरण मिल जाए, वही एक दिन सबसे मजबूत पेड़ बनता है।
No comments:
Post a Comment