Wednesday, May 20, 2015

लक्ष्य- सफलता का सूत्र

क्या आप एक सफल इंसान बनना चाहते हैं? क्या आप चाहते हैं क़ि दुनिया में आपकी भी एक पहचान हो? यदि हाँ, तो ये article आपके लिए है| सबसे पहले आपसे एक सवाल क्या आपने कोई लक्ष्य बनाया है?
मित्रों, सफलता कोई एक रात का game नहीं है, उसके लिए पूरा जीवन न्योछावर करना पड़ता है|
आज से करीब 40 साल पहले, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में कुछ researchers ने स्टूडेंट्स पर एक छोटा सा रिसर्च किया|
उन्होनें सारे स्टूडेंट्स को एक जगह बुलाया और और उनसे उनके जीवन के लक्ष्य के बारे में पूछा| उन स्टूडेंट्स में एक से एक मेधावी छात्र थे ,कुछ तो काफ़ी विलक्ष्ण थे| लेकिन पूछने पर पता चला की केवल 3% छात्र ऐसे थे जिन्होने अपना एक लक्ष्य बनाया हुआ था|
करीब 20 साल बाद researchers ने फिर फिर से उसी group के स्टूडेंट्स को एक साथ बुलाया और उनसे उनके जीवन के बारे में पूछा|
जब research का रिज़ल्ट सामने आया तो पता चला की जो 3% लोग 20 साल पहले अपना लक्ष्य set कर चुके थे वो आज जीवन में बहुत आगे थे जबकि 97% बचे हुए लोग कहीं ना कहीं आज भी संघर्ष कर रहे थे|
मित्रों ये रिसर्च केवल एक research ना होकर जीवन का एक सत्य था, बिना लक्ष्य के दौड़ने वाले लोग जीवन भर संघर्ष करते रह जाते है लेकिन कुछ प्राप्त नहीं होता|
मुझे उम्मीद है की आपने कहानी को अच्छे से पढ़ा होगा और अगर आप सच में सफल बनना चाहते हैं तो आज ही लक्ष्य बनाएँ और जुट जाए उसे प्राप्त करने में, लगातार मेहनत करिए आप पाएँगे कि आप लगातार अपने लक्ष्य के पास आते जा रहे हैं

मुश्किलों पर विजय

दो व्यक्ति राम और श्याम शहर से कमाकर पैसे लेकर घर लौट रहे थे। अपनी मेहनत से राम ने खूब पैसे कमाए थे, जबकि श्याम कम ही कमा पाया था। श्याम के मन में खोट आ गया। वह सोचने लगा कि किसी तरह राम  का पैसा हड़पने को मिल जाए, तो खूब ऐश से जिंदगी गुजरेगी। रास्ते में  एक उथला  कुआं पड़ा, तो श्याम ने राम को उसमें धक्का दे दिया। राम गढ्डे से बाहर आने का प्रयत्न करने लगा। 
श्याम ने सोचा कि यह ऊपर आ गया, तो  मुश्किल
 हो जाएगी। इसलिए श्याम साथ लिए फावड़े से मिट्टी खोद-खोदकर कुएं में डालने लगा। लेकिन जब राम के ऊपर मिट्टी पड़ती, तो वह अपने पैरों से मिट्टी को नीचे दबा देता और उसके ऊपर चढ़ जाता। मिट्टी डालने के उपक्रम में श्याम इतना थक गया था कि उसके पसीने छूटने लगे। लेकिन तब तक वह कुएं में काफी मिट्टी डाल चुका था और राम उन मिट्टियों पर चढ़ कर  ऊपर आ गया।

अतः जीवन में कई ऐसे क्षण आते हैं, जब बहुत सारी मुश्किलें एक साथ हमारे जीवन में मिट्टी की तरह आ पड़ती हैं। जो व्यक्ति इन मुश्किलों पर विजय प्राप्त कर आगे बढ़ता जाता है उसी की जीत होती है और वही  जीवन में हर बुलंदियों को छूता है।

ये कहानी आपको कैसी लगी अपनी टिप्पणियों के माध्यम से हमें जरुर बताएं। आपकी प्रतिक्रिया एवं सुझाव हमारा उत्साह बढाती है, इसलिए हमें अपने कमेंट्स के माध्यम से ये जरुर बताएं की हिंदी साहित्य मार्गदर्शन पर छापे गए पोस्ट्स आपको कैसे लगते हैं ।

Tuesday, May 19, 2015

मन की शांति

चीन पहुंचे तो हर जगह उनकी चर्चा होने लगी। राजा को पता चला कि उसके राज्य में परम ज्ञानी संत आए हैं, तो वह भी दर्शन के लिए पहुंच गया। अभिवादन के बाद राजा बोला-'कृपया बताएं, मेरा मन कैसे शांत होगा?' बोधिधर्म ने कहा-'अब आप जब भी आएं, अपने मन को भी साथ लेते आएं। कोई उपाय सोचेंगे।' राजा हैरान कि कैसा अजीब संत है, मन साथ लेने को कह रहा है। मन क्या कोई अलग पुर्जा है जिसे उठाकर लाया जा सके? किंतु क्या करता, संत की आज्ञा जो थी।

वह एक दिन फिर बोधिधर्म के पास जा पहुंचा-'भगवन, मन ऐसी वस्तु नहीं है जिसे व्यक्ति अलग रखता हो।' 'तो यह तय हुआ कि मन आप में ही है,' बोधिधर्म ने कहा-'अब आप शांत चित्त होकर आंखें बंद कर बैठ जाएं। फिर खोजें कि मन कहां है। जब उसे ढूंढ लें तो मुझे बता दें कि वह कहां है। मैं उसे शांत कर दूंगा।' राजा शांत चित्त होकर बैठ गया और अपने अंदर मन को ढूंढने लगा।

ज्यों-ज्यों वह अंदर झांकता गया त्यों-त्यों उसमें डूबता गया। उसने ध्यान से देखा कि मन नाम की कोई ऐसी वस्तु नहीं है जिसे ढूंढा जा सके। उसे समझ आई कि जो वस्तु है ही नहीं, उसके बारे में कुछ किया ही नहीं जा सकता। यह मात्र एक क्रिया है। राजा ने बोधिधर्म के सामने सिर झुकाकर कहा-'अब मुझे समझ में आ गया कि मेरे विचार की शैली ही मुझे बेचैन किए थी।' बोधिधर्म ने कहा-'जब भी आपको बेचैनी हो, आप विचारों को उलटकर विचार करने की आदत बना लें। सारी ऊर्जा, एक दृष्टि, एक सोच और एक विचार बन जाएगी और मन शांत हो जाएगा।'

Monday, May 18, 2015

खुद को योग्य बनाएं

अंग्रेजी के प्रसिद्ध लेखक जार्ज बर्नार्ड शॉ का आरंभिक जीवन बेहद संघर्षपूर्ण था। लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों में भी उन्होंने हार नहीं मानी, और धीरे-धीरे सफलता की बुलंदियां छूते गए। एक दिन उन्हें एक कॉलेज के कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया। बर्नार्ड शॉ ने सहजता से आमंत्रण स्वीकार कर लिया और कार्यक्रम के दिन कॉलेज पहुंच गए। उन्हें देखकर कॉलेज के विद्यार्थियों के उत्साह का कोई ठिकाना न रहा। सभी उनकी एक झलक पाने को लालायित हो उठे।

कार्यक्रम समाप्त हुआ तो उनके ऑटोग्राफ लेने वालों की एक अच्छी-खासी भीड़ वहां जमा थी। एक नौजवान ने अपनी ऑटोग्राफ बुक उन्हें देते हुए कहा,'सर, मुझे साहित्य से बहुत लगाव है और मैंने आपकी कई पुस्तकें पढ़ी हैं। मैं अब तक अपनी कोई पहचान नहीं बना पाया हूं, लेकिन बनाना अवश्य चाहता हूं। इसके लिए आप कोई संदेश देकर अपने हस्ताक्षर कर दें तो बहुत मेहरबानी होगी।' बर्नार्ड शॉ नौजवान की इस बात पर धीमे से मुस्कराए फिर उसके हाथ से ऑटोग्राफ बुक लेकर एक संदेश लिखा और अपने हस्ताक्षर भी कर दिए।

नौजवान ने ऑटोग्राफ बुक खोलकर देखी तो संदेश पर उसकी नजर गई। लिखा था-'अपना समय दूसरों के ऑटोग्राफ इकट्ठा करने में नष्ट न करें, बल्कि खुद को इस योग्य बनाएं कि दूसरे लोग आपके ऑटोग्राफ प्राप्त करने के लिए लालायित रहें।' यह संदेश पढ़कर नौजवान ने उनका अभिवादन किया और बोला,'सर, मैं आपके इस संदेश को जीवन भर याद रखूंगा और अपनी एक अलग पहचान बनाकर दिखाऊंगा।' बर्नार्ड शॉ ने नवयुवक की पीठ थपथपाई और आगे चल पड़े।

Sunday, May 17, 2015

कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता

महान साहित्यकार शेक्सपियर की उम्र उस वक्त बहुत कम थी, जब उनके पिता का देहांत हो गया। इसके बाद अचानक उनके नाजुक कंधों पर पूरे परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी आ गई। इतना भारी काम कैसे हो सकेगा, यह सोचकर वह बहुत उदास रहने लगे। एक दिन बाइबिल पढ़ते समय उनकी नजर एक पंक्ति पर ठहर गई-'कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता। जो दायित्व मिले उसे पूरी निष्ठा व मनोयोग से करो, सफलता तुम्हारे कदम चूमेगी। कठिन परिश्रम ही सफलता का द्वार है।'

इस वाक्य से उन्हें बहुत संबल मिला। उन्होंने काम पाने के लिए खूब भागदौड़ शुरू कर दी। काफी कोशिशों के बाद उन्हें एक नाटक कंपनी में घोड़ों की देखभाल का काम मिला। काम के साथ-साथ शेक्सपियर समय मिलने पर पुस्तकें भी पढ़ते रहते थे। एक नाटककार ने जब उन्हें मनोयोग से पढ़ते हुए देखा तो वह समझ गए कि यह व्यक्ति कुछ अलग तरह का है। शेक्सपियर को नाटक देखना भी बहुत अच्छा लगता था। यह देखकर नाटक कंपनी के मालिक ने एक दिन शेक्सपियर को नाटकों के अंशों को साफ-साफ लिखने का काम सौंप दिया।

दूसरों के नाटकों के अंश लिखते-लिखते शेक्सपियर ने धीरे-धीरे खुद भी लिखने का प्रयास शुरू कर दिया। एक दिन उन्होंने अपनी एक डायरी नाटक कंपनी के मालिक को दिखाई तो उन्होंने शेक्सपियर की पीठ थपथपाते हुए कहा, 'तुम तो बहुत अच्छा लिखते हो, जरा इसे पूरा करके दिखाओ। यदि वह अच्छा लगा तो हमारी नाटक कंपनी इसे मंच पर प्रस्तुत करेगी।' शेक्सपियर का लिखा नाटक काफी पसंद किया गया। उनके लेखन की हर जगह प्रशंसा होने लगी। बस फिर क्या था, शेक्सपियर अपनी लगन और प्रतिभा के बल पर अंग्रेजी के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों में गिने जाने लगे।

मित्रता की कसौटी

एक बार दो युवकों में परिचय हुआ। धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के घर भी आने-जाने लगे। एक मित्र के घर में शादी हुई तो उसने अपने नए दोस्त को भी आमंत्रित किया। लेकिन मेहमान मित्र की आवभगत में कमी रह गई। खाने-पीने की कमी न थी, लेकिन पूछताछ और अपेक्षित शिष्टाचार व औपचारिकता का निर्वाह नहीं हो पाया। आमंत्रित करने वाला मित्र बीमार हो गया था। मेहमान मित्र ने स्वयं को थोड़ा उपेक्षित और अपमानित महसूस किया।

घर लौटकर उसने इस मित्र को व्यंग्यात्मक लहजे में एक पत्र लिखा- 'विवाह वाले दिन आपकी तबीयत खराब थी, सो मेहमानों की ठीक से देखभाल भी नहीं कर पाए। खैर, अब आपकी तबीयत कैसी है?' कुछ दिनों बाद उत्तर आया। लिखा था- मित्र, विवाह में सैकड़ों रिश्तेदार और मित्र आए, पर किसी ने भी मेरी चिंता नहीं की। किसी ने भी मेरे स्वास्थ्य के बारे में नहीं पूछा। बस मित्र, तुम एकमात्र ऐसे व्यक्ति हो जिसने मेरा हालचाल जानने के लिए पत्र लिखा। मैं आभारी हूं और तुम जैसा मित्र पाकर धन्य भी। उस दिन तो हाल कुछ ठीक नहीं था। अस्वस्थ होने के कारण तुम्हारा अपेक्षित आदर-सत्कार भी न कर सका। पत्र मिलते ही किसी दिन आने का कार्यक्रम बनाओ। बैठकर गपशप करेंगे।

यह पत्र पढ़कर मित्र के सारे गिले-शिकवे दूर हो गए। उसे लगने लगा कि शायद स्वयं वही गलती पर था। कई बार हम किसी की विवशता को समझे बिना ही व्यर्थ के दोषारोपण करने लगते हैं। मित्रता की कसौटी एक-दूसरे से अपेक्षाएं रखना नहीं, एक दूसरे की अपेक्षाओं पर खरा उतरना है। जिस दिन आचरण में यह चीज आ जाती है, असल मित्रता उसी दिन से शुरू होती है।

Saturday, May 16, 2015

बुजुर्गों का आशीर्वाद अमर फल समान

एक बार रामानुजम ने अपने पुत्र को कुछ रुपए देकर बाजार से फल खरीदने भेजा। उन्होंने उसे समझाया कि फल बढ़िया और किसी अच्छी दुकान से ही खरीद कर लाए। बाजार में फलों की एक से एक अच्छी दुकान थी। वह निर्णय नहीं कर पा रहा था कि कहां से फल खरीदें? कुछ देर बाद जब वह घर लौटा तो उसके पिता यह देखकर हैरान रह गए कि वह खाली हाथ ही घर वापस आ गया है।
रामानुजम ने पुत्र से कहा, 'बेटे, मैंने तुम्हें फल खरीदने भेजा था लेकिन तुम तो फल लिए बिना ही वापस आ गए। ऐसा क्यों?' पुत्र बोला, 'पिताजी मैं खाली नहीं आया। मैं तो अपने साथ एक अमर फल लेकर आया हूं।' पुत्र की बात सुनकर रामानुजम बोले, 'तुम्हें क्या हो गया है? ऐसी बातें क्यों कर रहे हो? भला अमर फल भी कहीं होता है?' पुत्र बोला, 'पिताजी मैं फल खरीदने के लिए बाजार में गया। वहां अच्छी से अच्छी दुकानें सजी हुई थीं। तभी मैंने एक बुजुर्ग को भूख से छटपटाते देखा। मुझसे नहीं देखा गया। मैंने उसे उन पैसों से भोजन करा दिया। भोजन करने के बाद उस बुजुर्ग ने मुझे आशीर्वाद दिया। इससे मुझे बड़ी संतुष्टि हुई। आप ही बताइए कि उस बुजुर्ग का दिल से दिया गया आशीर्वाद क्या किसी अमर फल से कम है?'
जवाब सुनकर पिता हैरान रह गए और उन्होंने उसे गले लगाते हुए कहा, 'बेटा तेरी इस बात ने मुझे बड़ा प्रभावित किया है। एक दिन तू जरूर महान बनेगा।' पिता की बात सच साबित हुई। यही लड़का आगे चलकर दक्षिण भारत का महान संत रंगदास बना।


                           असफलता से सबक


नोबेल पुरस्कार विजेता कथाकार अर्नेस्ट हेमिंग्वे बचपन में बड़े हंसोड़ और नटखट थे। पढ़ने-लिखने में भी तेज थे और ईश्वर ने उन्हें गजब की कल्पना शक्ति भी दी थी। एक बार उनके शिक्षक ने बच्चों से कहानी लिखने को कहा। कहानी लिखने के लिए एक महीने का समय दिया। हेमिंग्वे ने सोचा, कहानी लिखने के लिए एक महीने की क्या जरूरत है। यह तो एकाध घंटे में ही लिखी जा सकती है।

दिन गुजरते जा रहे थे, पर वह खेलकूद में ही मस्त रहे। उनकी बहन ने कई बार कहानी लिखने की याद दिलाई, लेकिन हर बार वह यही कहकर टालते रहे कि कहानी तो एक घंटे में लिख देंगे। कहानी जमा करने के दिन से ठीक पहले की रात को भी हेमिंग्वे की बहन ने उन्हें कहानी की याद दिलाई, पर उन्हें नींद आ रही थी। कहानी सुबह लिख लूंगा, सोचकर वह सो गए। सुबह उठकर उन्होंने हड़बड़ाहट में लिखना शुरू किया। कहानी तो पूरी कर ली, मगर वह उससे संतुष्ट नहीं हुए।
उन्हें लग रहा था कि कहानी में भाषा और कथा सूत्रों में सुधार की जरूरत है। समय की कमी के कारण वह चाहकर भी सुधार नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्होंने बिना सुधारे ही अधूरे मन से कहानी शिक्षक को सौंप दी। बहरहाल, पुरस्कार किसी और छात्र को मिला। हेमिंग्वे बहुत निराश होकर घर लौटे तो उनकी बहन ने कहा,'हर काम अंतिम क्षणों में निपटाने की आदत के कारण ही तुम्हें पुरस्कार नहीं मिला। इस असफलता से सबक लो और हर काम नियम से समय पर करने की आदत डालो।'
हेमिंग्वे ने बहन की सलाह को अपना आदर्श बना लिया। आज पूरी दुनिया उन्हें एक श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में याद करती है।

Sunday, May 10, 2015

सफलता का सूत्र

सफलता का सूत्र
एक दिन राजा रामदत्त शिकार के लिए जंगल गए। वहां एक हिरन के पीछे उन्होंने अपना घोड़ा दौड़ाया। हिरन जंगल से निकलकर पहाड़ी की ओर भाग निकला। राजा उसके पीछे-पीछे चलते हुए अचानक एक पहाड़ी गांव में जा पहुंचे। वहां वह एक मूर्तिकार को मूर्तियां बनाते देख ठिठक गए। इतनी सुंदर मूर्तियां उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थीं। राजा ने मूर्तिकार से कहा,'मैं चाहता हूं कि तुम मेरी भी एक सुंदर मूर्ति बना दो।'
मूर्तिकार ने कहा-'ठीक है महाराज। मैं आपकी मूर्ति अवश्य बनाऊंगा।' उसने राजा की मूर्ति बनाने का काम शुरू कर दिया। कई दिन बीत गए पर मूर्ति तैयार नहीं हुई। मूर्तिकार रोज मूर्ति बनाता और उसे तोड़ देता, फिर बनाता और फिर तोड़ देता। लेकिन जैसी मूर्ति वह बनाना चाहता था, वैसी उससे बन नहीं पा रही थी। अंत में वह निराश होकर मूर्तियों के पास ही बैठ गया। अचानक उसकी नजर दीवार पर चढ़ रही एक चीटीं पर पड़ी जो बार-बार गिरी जा रही थी। वह चींटी दरअसल, एक गेहूं के दाने को दीवार के उस पार ले जाना चाहती थी।
मूर्तिकार यह दृश्य बड़े गौर से देख रहा था। चींटी बार-बार गिरने पर भी प्रयास में लगी हुई थी। आखिरकार चींटी को सफलता मिल ही गई और वह दीवार के उस पार चली गई। यह दृश्य देख मूर्तिकार ने सोचा- जब यह छोटी-सी चींटी निरंतर प्रयास से सफलता पा सकती है तो फिर मैं सफल क्यों नहीं हो सकता। मूर्तिकार को सफलता का सूत्र मिल चुका था। मूर्तिकार फिर से राजा की मूर्ति बनाने में जुट गया। इस बार मूर्ति बिलकुल उसकी कल्पना के अनुरूप बनी। राजा रामदत्त ने जब अपनी सजीव मूर्ति देखी तो बड़े खुश हुए।

सफलता का सूत्र

एक बार एक लड़का परीक्षा में फेल हो गया। साथियों ने उसके फेल होने का खूब मजाक बनाया। वह बरर्दाश्त नहीं कर पाया और घर लौटकर तनाव में डूब गया। उसके माता-पिता ने उसे बहुत समझाया- 'बेटा, फेल होना इतनी बड़ी असफलता नहीं है कि तुम इतने परेशान हो जाओ और आगे के जीवन पर प्रश्नचिन्ह लगा बैठो। जब तक इंसान अच्छे-बुरे, सफलता-असफलता के दौर से खुद नहीं गुजरता, तब तक वह बड़े काम नहीं कर सकता।' लेकिन उसे उनकी बातों से संतुष्टि नहीं हुई। अशांति और निराशा में जब उसे कुछ नहीं सूझा और रात में वह आत्महत्या करने लिए चल दिया। रास्ते में उसे एक बौद्ध मठ दिखाई दिया। वहां से कुछ आवाजें आ रही थीं। वह उत्सुकतावश बौद्ध मठ के अंदर चला गया।

वहां उसने सुना, एक भिक्षुक कह रहा था-'पानी मैला क्यों नहीं होता? क्योंकि वह बहता है। उसके मार्ग में बाधाएं क्यों नहीं आतीं? क्योंकि वह बहता रहता है। पानी का एक बिंदु झरने से नदी, नदी से महानदी और फिर समुद्र क्यों बन जाता है? क्योंकि वह बहता है। इसलिए मेरे जीवन तुम रुको मत, बहते रहो। कुछ असफलताएं आती हैं पर तुम उनसे घबराओ मत। उन्हें लांघकर मेहनत करते चलो। बहना और चलना ही जीवन है। असफलता से घबराकर रुक गए तो उसी तरह सड़ जाओगे जैसे रुका हुआ पानी सड़ जाता है।'

यह सुनकर लड़के ने मन में यह ठान लिया कि उसे भी बहते जल की तरह बनना है। इसी सोच के साथ वह घर की ओर मुड़ गया। अगले दिन वह सामान्य होकर स्कूल की ओर चल दिया। बाद में वह वियतनाम के राष्ट्रनायक हो ची मिन्ह के नाम से जाना गया।


पश्चिम जर्मनी के एक नगर में जाइगर नाम का युवक नौकरी की तलाश में था। उसे एक मोटर कंपनी में सफाई का काम मिल गया। वह उसे इतनी निष्ठा और मुस्तैदी के साथ करने लगा कि मालिक के चहेतों में शामिल हो गया। उसके प्रति मालिक का यह भरोसा देख बाकी कर्मचारी उससे जलने लगे। उन्होंने चालबाजी से उसे झूठे इल्जाम में फंसा दिया। पकड़े जाने पर उसे जेल की सजा काटनी पड़ी।

जेल में उसका एक गिरोह तैयार हो गया। यह गिरोह जेल से बाहर निकलने के बाद डकैती डालने लगा। जल्द ही जाइगर दोबारा पकड़ लिया गया। उसे फिर जेल की सजा हो गई। दूसरी बार जब वह जेल पहुंचा तो उसे आत्मग्लानि और पश्चाताप होने लगा। ऐसे ही किन्हीं क्षणों में उसने साबुन के रैपर पर अपनी व्यथा एक कविता के रूप में लिख डाली। उसकी कविता एक दिन अनायास जेल के पादरी के हाथ लग गई। पादरी को लगा कि इस व्यक्ति का विकास और सुधार इसी रचनात्मक रास्ते से किया जा सकता है।

उसने जेल के अधिकारियों से आग्रह करके जाइगर के लिए लिखने के साजो सामान का इंतजाम करवा दिया। यह देखकर जाइगर का मन रम गया। उसने जेल में एक उपन्यास लिखना शुरू कर दिया। जब वह जेल से बाहर आया तो उसने मजदूरी शुरू कर दी। लेकिन मजदूरी करते हुए भी वह समय मिलने पर उपन्यास लिखता रहा। उसका वह उपन्यास 'दि फोर्टेस' के नाम से प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास ने उसे पूरे जर्मनी में मशहूर कर दिया। एक सजायाफ्ता से एक प्रसिद्ध लेखक बनना मनुष्य की असीम संभावनाओं की कहानी है। हममें से प्रत्येक में ये संभावनाएं निहित हैं। जरूरत है, बस कोशिश करके उन्हें साकार करने की।


सहनशीलता का महामंत्र


जापान के सम्राट यामातो का एक मंत्री था- ओ-चो-सान। उसका परिवार सौहार्द के लिए बड़ा मशहूर था। हालांकि उसके परिवार में लगभग एक हजार सदस्य थे, पर उनके बीच एकता का अटूट संबंध था। उसके सभी सदस्य साथ-साथ रहते और साथ ही खाना खाते थे। इस परिवार के किस्से दूर दूर तक फैल गए। ओ-चो-सान के परिवार के सौहार्द की बात यामातो के कानों तक भी पहुंच गई। सच की जांच करने के लिए एक दिन सम्राट स्वयं अपने इस बुजुर्ग मंत्री के घर तक आ पहुंचे।

स्वागत, सत्कार और शिष्टाचार की साधारण रस्में समाप्त हो जाने के बाद यामातो ने पूछा, 'ओ-चो, मैंने आपके परिवार की एकता और मिलनसारिता की ढेरों कहानियां सुनी हैं। क्या आप बताएंगे कि एक हजार से भी अधिक सदस्यों वाले आपके परिवार में यह सौहार्द और स्नेह संबंध आखिर किस तरह बना हुआ है।' ओ-चो-सान वृद्धावस्था के कारण ज्यादा देर तक बात नहीं कर सकता था। इसलिए उसने अपने पौत्र को संकेत से कलम-दवात और कागज लाने के लिए कहा। जब वह ये चीजें ले आया तो उसने अपने कांपते हाथ से करीबन सौ शब्द लिखकर वह कागज सम्राट को दे दिया।

सम्राट यामातो अपनी उत्सुकता न दबा पाया। उसने फौरन उस कागज को पढ़ना चाहा। देखते ही वह चकित रह गया। दरअसल, उस कागज पर एक ही शब्द को सौ बार लिखा गया था। और वह शब्द था- सहनशीलता। सम्राट को अवाक देख ओ-चो-सान ने कांपती हुई आवाज में कहा, 'मेरे परिवार के सौहार्द का रहस्य बस इसी एक शब्द में निहित है। सहनशीलता का यह महामंत्र ही हमारे बीच एकता का धागा अब तक पिरोए हुए है। इस महामंत्र को जितनी बार दुहराया जाए, कम है।'

Saturday, May 9, 2015

विनम्र और मिलनसार वीरमणि शंकर, जो कि रैलीज़ इंडिया के प्रबंध निदेशक तथा मुख्य कार्यकारी हैं, अपने छात्र जीवन के दिनों के बारे में बता रहे थे, वे उन मूल्यों की बात कर रहे थे जिन्होने उनके कैरियर को टाटा समूह के साथ स्थायित्व प्रदान किया।
वीरमणि शंकर 22 वर्ष के होने पर एक चार्टर्ड एकाउन्टेंट व कॉस्ट एकाउन्टेंट थे, कलकत्ता विश्वविद्यालय से कॉमर्स में स्नातक डिग्री को आधार बनाकर उन्होने इसे हासिल किया, जिसमें वे परीक्षा में तीसरे स्थान पर आए थे। श्री शंकर के लिए इतनी जल्दी इतना कुछ हासिल करना काफी न था जिन्होने अपने अकादमिक प्रदर्शनों की सूची में कानून की डिग्री तथा कंपनी सेक्रेटरीशिप को भी जोड़ लिया।
यह पूछे जाने पर कि क्या वे अपने स्कूल में भी इतने ही मेधावी थे, तो विनम्र श्री शंकर का जवाब था कि वे एक खराब छात्र नहीं थे। रैलीज़ इंडिया के विनम्र और मिलनसार मुखिया बताते हैं कि उनका चरित्र निर्धारण कुछ हद तक मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि की देन है। 1970 के दशक के बीच में कलकत्ता में पढ़ते हुए, जबकि छात्र आंदोलन काफी फैला हुआ था तथा कैंपस में राजनीतिक माहौल भरा हुआ था, श्री शंकर ने अपने अध्ययन पर ध्यान केन्द्रित रखा। मैं ऐसे कॉलेज में था जहाँ पर कोई छात्र समस्याएं न थीं। मेरी कक्षा 6 बजे शुरु होती थी और 9 बजे तक मैं एक एकाउन्टिंग फर्म में चार्टर्ड एकाउन्टेंसी के लिए काम करने पहुंच जाया करता था, श्री शर्मा ने न केवल कठिन चार्टर्ड एकाउन्टेंसी का पाठ्यक्रम पहली बार में ही पूरा किया, बल्कि पूरे भारत की रैंकिंग में भी स्थान हासिल किया।
श्री शंकर ने अपना कैरियर अल्कान सब्सिडियरी, इंडियन अल्यूमुनियन कंपनी से शुरु किया तथा 1986 में उन्होने हिन्दुस्तान लीवर में काम करना शुरु किया। टाटा में आने से पहले उन्होने 18 साल बाहर काम किया और फिर टाटा में पिछले लगभग एक दशक से वे वरिष्ठ लीडर की भूमिका निभा रहे हैं। निथिन रॉव के साथ दिए गए इस साक्षात्कार में, वे अपने जीवन तथा कैरियर के महत्वपूर्ण बिन्दुओं के बारे में बता रहे हैं।
एक ऐसा शख्स होते हुए जिसने कि कॉलेज की पढ़ाई के साथ तीन पेशेवर पाठ्यक्रम पूरे किये, आप आज के युवाओं को क्या संदेश देना पसंद करेंगे। 1970 के दशक में जीवन भिन्न था। विकर्षण कम थे और लोग केवल अकादमिक गतिविधियों पर केन्द्रित हुआ करते थे। मुझे नहीं लगता है कि आज की पीढ़ी में कोई उस मेहनत को करने में सक्षम होगा। दूसरी ओर हमारे पास उस तरह की सहायता नहीं उपलब्ध थी जिस तरह की आज उपलब्ध है: सामान्य परिस्थितिकी, इंटरनेट, कोचिंग आदि। मैने उन पाठ्यक्रमों को बिना उपयुक्त किताबों के 10-12 घंटे प्रतिदिन की पढ़ाई से पूरा किया।
युवाओं के लिए मेरा परामर्श है कि नियोजन तथा प्रतिबद्धता का कोई छोटा मार्ग नहीं है, विशेष रूप से चार्टर्ड एकाउन्टेंसी जैसे पाठ्यक्रमों के लिए। उनको और अधिक व्यावहारिक प्रशिक्षण लेना चाहिए तथा अपने सीनियरों के साथ मामलों पर चर्चा करनी चाहिए।
जब आपने अपना पेशेवर कैरियर शुरु किया तो आपके लक्ष्य और सपने क्या थे? क्या आपकी योजना के अनुसार ही सारी घटनाएं घटीं?मैं एक एकाउंटेंट के रूप में प्रशिक्षित था और वित्त प्रकार्य में कुछ बड़ा करना चाहता था। मेरी यात्रा मुझे विभिन्न भूमिकाओं और प्रकार्यों तक ले गयी और अब मेरे पास व्यवसाय मुखिया की बड़ी भूमिका है। मेरी यात्रा सुखद, चुनौतीपूर्ण और संतुष्ट रही है।
मैं खुशनसीब हूँ कि मुझे उन उद्यमों में काम करने का अवसर मिला जो नैतिक मानकों और अपने आचार को सर्वोपरि मानते हैं। मैं आभारी हूँ कि मुझे अपने पूरे कैरियर में ऐसी कंपनियों के जुड़ कर काम करने को मिला क्योंकि यह मेरी पृष्ठभूमि से समानता रखता था। मूल्य प्रणालियों में कोई संघर्ष नहीं है और मैं रात में शांति के साथ सोता हूँ।
पिछले तीन दशकों में भारत में हुए बदलावों को आप किस तरह से देखते हैं: अभाव और प्रतिबंधों के समय से आज की अधिक खुले समय तक?जब वित्त के साथ मैने अपना कैरियर शुरु किया तो हमारे पास एक मशीन हुआ करती थी जिसे हम "कॉम्पटोमीटर" कहा करते थे जिसे आप आज म्यूजियम में पाएंगे। ट्रायल बैलेंस का मिलान और बैलेंस शीट का निर्माण के बड़ा काम हुआ करता था। यह मशीन हमें आंकड़ों को जोड़ने व एकत्र करने में सहायक होती थी जिसे हमें हाथ से लिखे जाने वाले लेजर में भरना होता था। आज जीवन आसान है क्योंकि आपको विवरणों का मिलान और समायोजन के लिए चिंतित नहीं होना पड़ता है। हालांकि दूसरे तरीकों से अब चीज़ें अधिक जटिल हैं, क्योंकि पालन करने के लिए अब अधिक मानक व नियम हैं।
पुराने समय में विस्तार और विदेशी मुद्रा पर बहुत सारे प्रतिबंध थे। लेकिन बाज़ार में जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था वे आसान थीं, क्योंकि ग्राहक के सामने सीमित विकल्प हुआ करते थे। आज का समय अधिक उदार है लेकिन बाजार कठिन है। ग्राहक के पास खूब सारे विकल्प हैं तथा उसकी पहुंच वैश्विक ब्रांडों तक है तथा पारदर्शिता भी अधिक है। सूचीबद्ध कंपनी होने के कारण हमको हर तिमाही में निवेशकों का सामना करना पड़ता है और हम सार्वजनिक निगाहों में बने रहते हैं और ज्ञानवान लोगों द्वारा हमारे हर कदम का विश्लेषण करते रहते हैं।
आप यूनीलीवर समूह के साथ 18 वर्ष तक काम करते रहे। क्या आप उस समय के अनुभव को साझा कर सकते हैं?
यूनीलीवर समूह के साथ के मेरे समय से मुझे स्नेह है। इस अवधि के दौरान मुझे आठ बार स्थानान्तरित किया गया, लेकिन सकारात्मक पहलू यह था कि इसने मुझे विभिन्न व्यवसायों, स्थलों और लोगों के साथ अनुभव का अवसर दिया। यूनीलीवर कॉरपोरेट ऑडिट के काम को मैं काफी बड़ा ब्रेक मानता हूँ, जिसने मुझे 20 देशों के परिचालन को समझने का अवसर प्रदान किया। व्यवसाय के सभी पहलुओं के लिए यह कार्यकाल आँखें खोलने वाला साबित हुआ, इन पहलुओं में मूल्य श्रंखला, टीम संस्कृति आदि शामिल थे। इसने मुझे व्यवसाय चलाने की जिम्मेदारी लेने का आत्मविश्वास प्रदान किया।
यूनीलीवर के आपके जुड़ाव के समय से आप कृषि के व्यापार के साथ नज़दीकी से जुड़े रहे हैं। यह व्यापार उस समय से आज कितना भिन्न है? मुझे दिखने वाला मुख्य अंतर यह है कि भोजन, चारे, फाइबर तथा ईंधन के लिए जमीन की घटती उपलब्धता के चलते कृषि ने मुख्य स्थान हासिल कर लिया है। भारत में यह क्षेत्र अब लाभाकारी होने लगा है और किसान अब निवेश तथा नई टेक्नोलॉजी को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। बहुत सारी अन्य व्यापक प्रवृत्तियां हैं जैसे कि मजदूरों की कमी, कठोर होते नियम तथा बायोटेक्नोलॉजी के विकास। नवीनतम खाद्य सुरक्षा प्रावधानों के लिए उत्पादकता सुधार तथा खेती के अच्छे अभ्यासों व बुनियादी ढ़ांचे की जरूरत होगी। सारांश में, मुझे लगता है कि इस व्यापार का सर्वश्रेष्ठ समय अभी आना बाकी है।
शहरी क्षेत्रों में प्रवास के कारण मजदूरी लागतों में काफी वृद्धि हो रही है। इसको महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम जैसी योजनाओं से बल मिल रहा है। लेकिन यह weedicides और फार्म मिकेनिज़्म में नए समाधानों के अवसर भी खोलता है। इसी तरह से, हमको हमारी नियामक प्रणाली में परिवर्तन की जरूरत है जिससे कि जमीन की चकबंदी हो सके जिससे कि आधुनिक तकनीकों को लागू करना आसान हो सके।
खाद्य की बढ़ती माँग को देखते हुए, हम स्थिर कृषि उत्पादन के साथ प्रगति नहीं कर सकते हैं। कृषि उत्पादों के मूल्य तेजी से बढ़ रहे हैं, जिका कारण माँग व आपूर्ति का तंत्र है। उदाहरण के लिए दालों को ही ले लीजिए। मुझे याद है कि सिर्फ कुछ वर्षों पहले एक किलो दाल का मूल्य 20-30 रुपये हुआ करता था। लेकिन अब यह 80-100 रुपये तक पहुंच गया है। यह, भारत में स्थिर हो गए दाल के उत्पादन का जीवंत उदाहरण है, जिसके परिणाम स्वरूप हमें इसको कनाडा और ऑस्ट्रेलिया से आयात करना पड़ता है। अगले 10-15 वर्षों में भारत में दाल की माँग दुगनी हो जाएगी, लेकिन इसे पूरा करने के लिए उत्पादन को बढ़ाने हेतु कोई चिह्न नहीं दिख रहे हैं। टाटा समूह में हमारे अपने अध्ययन ने प्रदर्शित किया है कि फसलों में कुछ प्रतिस्थापन करके किसान और अधिक दालें पैदा कर सकते हैं। हमारी अपनी "अधिक दाल उपजाएं" पहल द्वारा हमने यह दर्शाया है कि किसान उत्पादकता को दुगना, तिगुना तक बढ़ा सकते हैं।
आप अपनी जैसी कंपनी का भविष्य क्या देखते हैं, जो कि कृषि व्यापार पर ध्यान केन्द्रित कर रही है? रैलीस के लिए आने वाला समय अच्छा है। ग्रामीण भारत में इसका अच्छा प्रभाव है और एक शताब्दी की अवधि के दौरान इसने किसानों के साथ गहरे रिश्ते कायम किए हैं। हमने प्रवृत्तियों तथा अवसरों की पहचान की है और कंपनी को एक पूर्ण कृषि समाधान प्रदाता के रूप में रूपांतरित करने की यात्रा शुरु की है।
फसल सुरक्षा क्षेत्र में अग्रणी स्थिति होने के अलावा हम तेजी से अपने दूसरे खंभे का निर्माण कर रहे हैं: एक कीटनाशक शून्य पोर्टफोलियो जिसमें बीज, पौध वृद्धि पोषण, मिट्टी का स्वास्थ्य, कृषि सेवाएं और अनुबंधित विनिर्माण जैसे व्यावसायिक खंड शामिल हैं। इस विशिष्ट व्यापार मॉडल ने MoPu (अधिक दालें) पहल के माध्यम से एक बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो कि पूरी मूल्य श्रंखला को आधार प्रदान करता है। रैलीस, पीछे से किसानों को गाइड करती है व दालों का उत्पादन करती है तथा टाटा केमिकल्स, खुदरा उपभोक्ताओं को आई-शक्ति ब्रांड की दालों को बेचती है। इस अब सभी स्टॉकधारकों द्वारा काफी पसंद किया जा रहा है, जिसमें सरकार भी शामिल है।
संवर्धित जीन्स (GM) खाद्य भारत में बदनाम हैं। आपके नज़रिए से, इस मामले में वह कौन सी सर्वश्रेष्ठ नीति है जो इस मामले से निपट सकती है? GM खाद्य, कई विकसित देशों में काफी समय से उपलब्ध हैं। बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए, हमें आधुनिक तकनीक की जरूरत है। साथ ही, विनियामक तथा सुरक्षा मंजूरी से संबंधित प्रक्रियाओं को भी तेज़ होना चाहिए। मेरे विचार से, आगे बढ़ने के मार्ग पर बाधाएं नहीं बनानी चाहिए या GM तकनीक को शामिल करने में विलंब ठीक नहीं है, लेकिन प्रभावी तथा वैज्ञानिक प्रक्रियाओं में निवेश किया जाना चाहिए जिससे कि ऐसी तकनीकें पेश की जा सकें जो असामान्य व सुरक्षित हों।
आप दिसंबर 2005 से रैलीस की अध्यक्षता कर रहे हैं। एक लीडर के रूप में आपने कौन सी सबसे महत्वपूर्ण चुनौती का सामना किया है? मैने रैलीस को बदलाव, मजबूती और अब प्रगति के चरणों से गुजरते हुए देखा है। इनमें से हर एक चरण में एक भिन्न मनस्थिति तथा बदलाव के लिए खुलापन, यथास्थिति के प्रति चुनौती तथा लगातार बेहतरी और बार-बार सुधार की जरूरत थी। इन सब को हासिल करने के लिए मैं अपने लोगों में इसके लिए क्षमतावान होने को क्रेडिट देता हूँ।
मुझे लगता है कि एक स्थिति में, जब 2003 में हमें सबसे बुरा घाटा 1.07 बिलियन रुपये का हुआ था तब हमारी कंपनी में निराशा की भावना भर गयी थी। समूह के समर्थन से उस समय से आज तक की यात्रा को हितधारकों का हममें जताया गया विश्वास काफी लाभदायी रहा है। जबकि हमारे समाधानों तथा संबंध बनाने संबंधी प्रयासों से किसानों ने, हमारे साथियों ने बाजारगत अभ्यासों तथा उपस्थिति के बारे में संतुष्टि जाहिर की है, वहीं निवेशकों से अभिस्वीकृति हासिल करना भी संतुष्टिदायक रहा है। एक दशक में हमारा बाज़ार पूंजीकरण जो कि रु.300 मिलियन के निम्न स्तर पर पहुंच गया था, अब तेजी से बढ़ कर रु.30 बिलियन तक पहुंच गया है। कंपनी लगातार सुदृढ़ होती गयी है और 2011 में व्यावसायिक उत्कृष्टता के लिए जेआरडी क्यूवी पुरस्कार (टाटा व्यावसायिक उत्कृष्टता मॉडल प्लेटफॉर्म) जीतना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। हमारे लिए इसके काफी मायने थे क्योंकि यह एक कमजोर प्रक्रिया व नियंत्रण था जिसने हमको पहले काफी नीचे लाकर खड़ा कर दिया था। इस सबसे ऊपर हमारे कर्मचारियों के वचनबद्धता अंकों से प्रमाणित हमारे कर्मचारियों का आत्मविश्वास, और "काम करने के लिए बेहतरीन स्थल" के रूप में हमारी रैंकिंग, संतोषजनक रही है।
कंपनी के दीर्घकालीन लक्ष्य क्या हैं? अगले पाँच वर्षों में रैलीस के सामने क्या चुनौतियाँ हैं। हमारे द्वारा प्रदत्त कृषि समाधानों द्वारा अपने ग्राहकों के लिए मूल्यवर्धन का लक्ष्य हमने तय किया है। हमारे एकीकृत कार्यक्रम, रैलीस किसान कुटुंब (RKK) के अंतर्गत कई सारी नवाचारी पहल प्रगति पर हैं। हमारे पास RKK से जुड़े दस लाख किसान हैं और इस संख्या को दोगुना करना है तथा अंततः प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 10 मिलियन किसानों से जुड़ना हमारा लक्ष्य है। किसानों को हमारे द्वारा प्रस्तावित उच्च प्रभाव वाली बहुत सारी सेवाओं के साथ लगातार संपर्क की आवश्यकता है।
कार्यबल तथा साथ ही सूचना व संचार तकनीक-प्रेरित समाधानों के लिहाज से आवश्यक कौशल निर्माण को संबोधित करने की जरूरत, एक चुनौती है।
आपकी राय में एक अच्छे व्यवसायिक लीडर की विशेषताएं क्या हैं? मेरा विश्वास है कि किसी व्यक्ति में ईमानदारी का होना तथा उसकी क्रियाओं में उसका दिखना मूल बात है। कंपनी के लिए एक विज़न के प्रति अपनी टीम को प्रोत्साहित करने की क्षमता, उच्च महत्व की है जिसे मजबूत संचार कौशल द्वारा पूरित किया जा सकता है। अच्छी रणनीति बनाना और सफलता के साथ उसको निष्पादित करने की दृढ़ता ही उद्यम की सफलता को निर्धारित करती है।
एक व्यक्ति तथा एक पेशेवर के रूप में आप अपने को किस तरह से परिभाषित करेंगे? स्वभाव से मैं एक गहन व्यक्ति हूँ तथा निम्न प्रोफाइल रखता हूँ। मुझे बोलने से अधिक सुनना पसंद है। जानना महत्वपूर्ण है और मैने लिखित व मौखिक संचार में कुछ अच्छे अभ्यासों को आत्मसात किया है और मैं अभी भी सीख रहा हूँ। आम तौर पर मैं विश्लेषणात्मक रहता हूँ तथा चीजों को करने के लिए नियोजित दृष्टिकोण रखता हूँ। आवेगी व्यवहार मुझमें नहीं है। मैं जो कुछ भी करता हूँ उसमें ध्यान लगाता हूँ, हालांकि यह विशेषता कई बार बाधा भी बनती है। अधिकांश मामलों पर मैं आम राय रखना चाहता हूँ लेकिन कभी कभार मैं अपने निर्णय पर ही निर्भर करता हूँ।
जीवन में आपके रोल मॉडल तथा समर्थन प्रणालियां कौन व क्या हैं?व्यवसाय में मैं स्टीव जॉब्स को पसंद करता हूँ जो कि ग्राहक की आवाज़ से अधिक सुनने में सक्षम थे। ग्राहकों को खुशी देने के लिए उद्योग को बदलने के साथ-साथ उनके पास नए मानदंड के निर्माण का दृढ़ विश्वास था, ऐसा उन्होने बार-बार किया।
मेरे निजी जीवन में मेरे माता-पिता और मेरी पत्नी, पद्मिनी ने मुझे उन मूल्यों को सिखाया जिनके साथ में रहता हूँ। एक समर्पित गृहणी और योग्य शिक्षक जो कर्नाटक संगीत और भरत नाट्यम सिखाती हैं। पद्मिनी मेरी वास्तविक मजबूती हैं, जो कि मुझे मेरे कैरियर में जोखिम व चुनौतियों का सामना करने में सक्षम करती हैं। मेरे दो बच्चों में अजितेश चार्टर्ड एकाउंटेंट है तथा राधिका अपनी प्रबंधन की पढ़ाई कर रही है (वह भी एक नर्तकी है)।
मैं खुशनसीब हूँ कि मुझे उन उद्यमों में काम करने का अवसर मिला जो नैतिक मानकों और अपने आचार को सर्वोपरि मानते हैं।

Tuesday, May 5, 2015

if you want to know more particular field mail us vaibhav@aapkavichar.in we are with you

                             हम चिल्लाते क्यों हैं गुस्से में?
एक बार एक संत अपने शिष्यों के साथ बैठे थे। अचानक उन्होंने सभी शिष्यों से एक सवाल पूछा; “बताओ जब दो लोग एक दूसरे पर गुस्सा करते हैं तो जोर-जोर से चिल्लाते क्यों हैं?”

शिष्यों ने कुछ देर सोचा और एक ने उत्तर दिया : “हमअपनी शांति खो चुके होते हैं इसलिए चिल्लाने लगते हैं।”

संत ने मुस्कुराते हुए कहा : दोनों लोग एक दूसरे के काफी करीब होते हैं तो फिर धीरे-धीरे भी तो बात कर सकते हैं। आखिर वह चिल्लाते क्यों हैं?” कुछ और शिष्यों ने भी जवाब दिया लेकिन संत संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने खुद उत्तर देना शुरू किया।

वह बोले : “जब दो लोग एक दूसरे से नाराज होते हैं तो उनके दिलों में दूरियां बहुत बढ़ जाती हैं। जब दूरियां बढ़ जाएं तो आवाज को पहुंचाने के लिए उसका तेज होना जरूरी है। दूरियां जितनी ज्यादा होंगी उतनी तेज चिल्लाना पड़ेगा। दिलों की यह दूरियां ही दो गुस्साए लोगों को चिल्लाने पर मजबूर कर देती हैं।

जब दो लोगों में प्रेम होता है तो वह एक दूसरे से बड़े आराम से और धीरे-धीरे बात करते हैं। प्रेम दिलों को करीब लाता है और करीब तक आवाज पहुंचाने के लिए चिल्लाने की जरूरत नहीं।

जब दो लोगों में प्रेम और भी प्रगाढ़ हो जाता है तो वह खुसफुसा कर भी एक दूसरे तक अपनी बात पहुंचा लेते हैं। इसके बाद प्रेम की एक अवस्था यह भी आती है कि खुसफुसाने की जरूरत भी नहीं पड़ती।

एक दूसरे की आंख में देख कर ही समझ आ जाता है कि क्या कहा जा रहा है।

शिष्यों की तरफ देखते हुए संत बोले : “अब जब भी कभी बहस करें तो दिलों की दूरियों को न बढ़ने दें। शांत चित्त और धीमी आवाज में बात करें। ध्यान रखें कि कहीं दूरियां इतनी न बढ़े जाएं कि वापस आना ही मुमकिन न हो।”


                              खुशी की तलाश

अंजन मुनि अपने आश्रम में अनेक शिष्यों को शिक्षा देते थे। एक दिन वह अपने शिष्यों से बोले,'आज मैं तुम्हें बताऊंगा कि खुशी आसानी से किस तरह मिल सकती है?' सभी शिष्य बोले,'गुरुजी, जल्दी बताइए।' मुनि शिष्यों को एक कमरे में ले गए। वहां ढेर सारी एक जैसी पतंगें रखी हुई थीं। मुनि शिष्यों से बोले,'इन पतंगों में से एक-एक उठाकर सभी अपना नाम लिखकर वापस वहीं रख दो।' सभी शिष्यों ने एक-एक पतंग पर अपना नाम लिखा और वापस वहीं रख दिया।

कुछ देर बाद मुनि बोले,'अब सभी अपने नाम की पतंग लेकर मेरे पास आओ।' यह सुनकर शिष्यों में भगदड़ मच गई और अपने नाम की पतंग लेने के चक्कर में सारी पतंगें फट गईं। इसके बाद मुनि उन्हें दूसरे कमरे में ले गए। वहां भी ढेरों पतंगें थीं। उन्होंने सब शिष्यों को एक-एक पतंग पर अपना नाम लिखने के लिए कहा। इसके बाद वह बोले,'अब, तुम सभी इनमें से कोई भी पतंग उठा लो।' सभी शिष्यों ने बिना कोई जल्दबाजी किए आराम से एक-एक पतंग उठा ली।

गुरुजी बोले,'अब तुम एक-दूसरे से अपने नाम वाली पतंग प्राप्त कर लो।' सभी शिष्यों ने बगैर खींचतान किए और बगैर पतंगें फाड़े अपने-अपने नाम की पतंग प्राप्त कर ली। गुरुजी बोले,'हम खुशी की तलाश इधर-उधर करते हैं, जबकि हमारी खुशी दूसरों की खुशी में छिपी है।' जब तुमने केवल अपने नाम की पतंग तलाशनी चाही तो आपाधापी में सारी पतंगें फट गईं। दूसरी बार तुमने आराम से पतंग उठाकर दूसरे के नाम की पतंग उसे सौंप दी। इस तरह उसे भी खुशी मिल गई और तुम्हें भी अपने नाम की पतंग मिल गई। असल खुशी दूसरों की मदद कर उन्हें खुशी देने में है।

                          कलाकार की प्रशंसा


एक प्रसिद्ध चित्रकार ने अपने पुत्र को चित्रकला सिखाई। उसका पुत्र इस कला में जल्द ही पारंगत हो गया। शीघ्र ही वह सुंदर चित्र बनाने लगा। लेकिन चित्रकार पिता अपने पुत्र द्वारा बनाए गए चित्रों में कोई न कोई त्रुटि जरूर निकाल देता। वह कभी खुले हृदय से अपने पुत्र की प्रशंसा न करता। लेकिन, दूसरे लोग चित्रकार के बेटे के चित्रों की खूब सराहना करते थे। उसके बनाए हुए चित्रों की मांग बढ़ने लगी। फिर भी उसके पिता के व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आया।

एक दिन उसके पुत्र को एक युक्ति सूझी। उसने एक आकर्षक चित्र बनाया और अपने एक मित्र द्वारा उसे अपने पिता के पास भिजवाया। उसके पिता ने सोचा कि यह चित्र उसी मित्र का बनाया हुआ है। उसने उसकी खूब प्रशंसा की। तभी एक कोने में छिपा उसका पुत्र निकल आया और बोला,'पिताजी, यह चित्र मैंने बनाया है। अंतत: मैंने वह चित्र बना ही दिया जिसमें आप कोई कमी न निकाल सके।'

पिता ने कहा,' बेटा, एक बात गांठ बांध लो। अभिमान उन्नति के सभी मार्ग बंद कर देता है। आज तक मैंने तुम्हारी प्रशंसा नहीं की। सदा तुम्हारे चित्रों में कमियां निकालता रहा, इसीलिए तुम आज तक अच्छे चित्र बनाते रहे। अगर मैं तुम्हें एक बार भी कह देता कि तुमने बहुत अच्छा चित्र बनाया है, तो शायद तुम चित्र बनाने से पहले जागरूक नहीं रहते। तुम्हें लगता कि तुम पूर्णता प्राप्त कर चुके हो, जबकि कला के क्षेत्र में पूर्णता की कोई सीमा ही नहीं होती। मैं तो इस उम्र में भी अपने को पूर्ण नहीं मानता। इसलिए भविष्य में सावधान रहना।' यह सुनकर पुत्र लज्जित हो ग


                           

Monday, May 4, 2015

                सबसे हट कर सबसे बड़ी बात

एक दिन सुबह के समय परमहंस देव अपने शिष्यों के साथ टहल रहे थे। तभी उन्होंने देखा कि पास ही कुछ मछुआरे जाल फेंक कर मछलियां पकड़ रहे हैं। वह अचानक एक मछुआरे के पास पहुंचकर खड़े हो गए और अपने शिष्यों से बोले, 'तुम लोग इस जाल में फंसी मछलियों की गतिविधियां गौर से देखो।' शिष्यों ने देखा कि कुछ मछलियां ऐसी हैं जो जाल में निश्चल पड़ी हैं। वे निकलने की कोई कोशिश भी नहीं कर रही हैं, जबकि कुछ मछलियां जाल से निकलने की कोशिश करती रहीं। हालांकि, उनमें कुछ को सफलता नहीं मिली, लेकिन कुछ जाल से मुक्त होकर फिर से जल में खेलने में मगन हैं।

जब परमहंस ने देखा कि शिष्य मछलियों को देखने में मगन होकर दूर निकल गए हैं, तो फिर उन्हें अपने पास बुला लिया। शिष्य आ गए तो कहा, 'जिस प्रकार मछलियां मुख्यत: तीन प्रकार की होती हैं, वैसे ही अधिकतर मनुष्य भी तीन प्रकार के होते हैं। एक श्रेणी उन मनुष्यों की होती है, जिनकी आत्मा ने बंधन स्वीकार कर लिया है। अब वे इस भव-जाल से निकलने की बात ही नहीं सोचते। दूसरी श्रेणी ऐसे व्यक्तियों की है, जो वीरों की तरह प्रयत्न तो करते हैं पर मुक्ति से वंचित रहते हैं। तीसरी श्रेणी उन लोगों की है जो प्रयत्न द्वारा अंततः मुक्ति पा ही लेते हैं। लेकिन दोनों में एक श्रेणी और होती है जो खुद को बचाए रहती है।

' एक शिष्य ने पूछा, 'गुरुदेव, वह श्रेणी कैसी है?' परमहंस देव बोले, 'हां, वह बड़ी महत्वपूर्ण है। इस श्रेणी के मनुष्य उन मछलियों के समान हैं जो जाल के निकट कभी नहीं आतीं। और जब वे निकट ही नहीं आतीं, तो उनके फंसने का प्रश्न ही नहीं उठता।'

                        सबसे बड़ा काम

एक बार बेंजामिन फ्रैंकलिन ने एक धनी व्यक्ति की मेज पर बीस डॉलर की सोने की गिन्नी रखते हुए कहा, 'सर, आपने बुरे वक्त में मेरी सहायता की थी। उसके लिए मैं बहुत आभारी हूं। लेकिन अब मैं अपनी मेहनत के बल पर इतना सक्षम हो गया हूं कि आपका वह कर्ज लौटा सकूं।' यह सुनकर वह व्यक्ति उन्हें गौर से घूरते हुए बोला, 'क्षमा कीजिए, पर मैंने आपको पहचाना नहीं। न ही मुझे याद है कि मैंने किसी को बीस डॉलर उधार दिए थे।'
बेंजामिन बोले, 'मैं उन दिनों एक प्रेस में अखबार छापने का काम करता था। एक दिन अचानक मेरी तबीयत खराब हो गई। तभी मैंने आपसे बीस डॉलर लिए थे।' उस व्यक्ति ने अपने बीते दिनों के बारे में सोचा तो उसे याद हो आया कि काफी पहले एक लड़का प्रेस में काम किया करता था और एक दिन उसने उसकी मदद भी की थी। इस पर वह बोला, 'हां मुझे याद आ गया। लेकिन दोस्त, यह तो मनुष्य का सहज धर्म है कि वह मुसीबत में सहायता करे। इन गिन्नियों को अब अपने पास ही रखें। कभी कोई जरूरतमंद आए तो उसे दे दें।'
उसकी यह बात सुनकर बेंजामिन फ्रैंकलिन बहुत प्रभावित हुए और उन्हें अभिवादन कर वे गिन्नियां अपने साथ लौटा लाए। इसके बाद एक दिन उन्होंने एक जरूरतमंद व्यक्ति को वह गिन्नियां दे दीं। उस व्यक्ति ने बेंजामिन से गिन्नियां लौटाने की बात कही तो वह उससे बोले, 'दोस्त, जब तुम सक्षम हो जाओगे तो अपने जैसे किसी जरूरतमंद को ये गिन्नियां दे देना। मैं समझूंगा कि मेरी गिन्नियां मुझे मिल गईं। किसी जरूरतमंद की वक्त पर मदद करना ही सबसे बड़ा काम है।'

                  काम करने का तरीका

क युवक अपने काम के लिए कहीं जा रहा था। रास्ते में उसने देखा कि एक मजदूर दीवार पर सफेदी कर रहा है। वह सड़क पार करने के लिए वहां कुछ देर रुका रहा और इस बीच मजदूर का काम करने का तरीका देखता रहा। कुछ देर में सड़क खाली हो गई तो उसने पाया कि मजदूर जिस ढंग से दीवार पर सफेदी कर रहा था, उससे सामान और समय दोनों की बर्बादी हो रही थी।
कुछ सोचकर वह उस मजदूर के पास गया और उससे बोला, 'दोस्त, इससे बहुत कम समय में और कम सामान में अच्छी तरह से सफेदी हो सकती है। क्या तुम वह तरकीब मुझसे सीखना चाहोगे?' मजदूर यह सुनकर हैरानी से युवक को देखते हुए बोला,'तुम अगर ऐसा कर सकते हो तो बहुत अच्छी बात है। मैं उस तरकीब को अवश्य सीखना चाहूंगा।' बस, इसके बाद वह युवक अपनी कमीज की बांहें ऊपर चढ़ाकर ब्रश और सफेदी लेकर काम में जुट गया।
कुछ ही समय में उसने अपनी बात सही साबित करके दिखा दी। उसके सफेदी करने के तरीके से काफी समय व सामान बच गया और सफेदी भी बहुत बढ़िया हो गई। मजदूर खुश होकर युवक से बोला,'अब मैं भविष्य में ऐसे ही काम करूंगा जैसा आपने सिखाया है। उस जगह का मालिक चुपचाप वहां खड़ा यह सब देख रहा था। युवक नीचे उतर कर आया तो उसने उसके हाथ में इनाम थमाना चाहा।
युवक बोला,'सर, इनाम व मेहनताने पर मेरा नहीं, मजदूर का हक है। काम तो इसी ने किया है, मैंने तो बस इसे काम को सही ढंग से करने का तरीका समझाया है।'आगे चलकर यही युवक महान दार्शनिक बना और कार्ल मार्क्स के नाम से मशहूर हुआ।

                               महात्मा की सीख
एक दिन एक महात्मा भिक्षा मांगने कहीं जा रहे थे। एक जगह उन्हें एक सिक्का पड़ा नजर आया। उसे उठाकर उन्होंने अपनी झोली में रख लिया। उनके साथ जा रहे दोनों शिष्य यह देखकर मायूस रह गए। असल में मन ही मन वे सोच रहे थे कि काश वह सिक्का उन्हें मिल जाता तो वे बाजार से अपने लिए कुछ खरीद लाते। उनके ऐसा सोचते ही महात्मा जी समझ गए। वह बोले- 'यह कोई साधारण सिक्का नहीं है। मैं इसे किसी योग्य व्यक्ति को ही दूंगा।'
देखते-देखते कई दिन बीत गए, लेकिन महात्मा ने वो सिक्का किसी को नहीं दिया। एक दिन महात्मा को समाचार मिला कि सिंहगढ़ के महाराज अपनी विशाल सेना के साथ पास से गुजर रहे हैं। महात्मा ने तुरंत अपने शिष्यों से कहा- यह जगह छोड़ने की घड़ी आ गई है। बस फिर क्या था, शिष्यों के साथ महात्मा जी चल पड़े। तभी उस रास्ते से राजा की सवारी भी आ गई। मंत्री ने राजा को बताया कि ये महात्मा बड़े ज्ञानी हैं।
यह सुन राजा ने हाथी से उतरकर महात्मा को सादर प्रणाम किया और कहा- 'महात्मा जी, आप मुझे विजय का आशीर्वाद दें।' महात्मा ने झोले से सिक्का निकाला और राजा की हथेली पर उसे रखते हुए कहा, 'राजा, तुम्हारा राज्य धन-धान्य से संपन्न है। फिर भी तुम्हारे लालच का अंत नहीं है। तुम और अधिक पाने की लालसा में युद्ध करने के लिए जा रहे हो। मेरे विचार में तुम वास्तव में सबसे बड़े दरिद्र इंसान हो। इसलिए मैंने तुम्हें यह सिक्का दिया है।'
राजा महात्मा की बात का मतलब समझ गया। उसने सेना को तुरंत वापस लौट चलने का आदेश दिया।

Sunday, May 3, 2015


                      'अच्छे काम में देर कैसी'

मान लो आप एक ऐसे भिखारी को देखते हो जिसके पास कपड़ा-लत्ता कुछ नहीं है। जाड़े की रात है, उसे बहुत कष्ट हो रहा है। मन चाहा कि उसको एक कपड़ा दे दें। लेकिन देने के पहले अगर घर में किसी से पूछते हो तो हो सकता है कि वह कह दे, "अरे कितने आदमी ऐसे आते हैं, तुम कितनों को दोगे?" फिर आप सोचते हैं- हां, बात तो ठीक है। नहीं दूंगा। और आपका मन बदल जाता है। इसलिए अच्छा कर्म करने के पहले किसी से मत पूछो। क्योंकि "शुभस्य शीघ्रम"। शुभकर्म जल्दी से जल्दी करो। किसी से मत पूछो। अच्छा कर्म है तो उसमें परमात्मा का आशीर्वाद है। तुम्हारी हार नहीं होगी। 
मान लो कुछ गलत करने की इच्छा हुई, तो उसमें देर करो। आज नहीं कल, कल नहीं परसों, ऐसा करते रहो। इससे पूछो, उससे पूछो। लोग मना कर देंगे। मन भी साफ हो जाएगा और गलत काम तुम नहीं करोगे। तो यह रावण का उपदेश है- "शुभस्य शीघ्रम, अशुभस्य कालहरणम्।" 
मायासुर एक दानव था। उसे विष्णु से वरदान मिला और मायासुर स्वर्ग, मृत्यु, पाताल हर जगह लड़ाई करने लगा और अपना राज्य बनाने लगा। करते-करते आखिर एक दिन विष्णुजी के साथ भी उसकी लड़ाई हो गई। लोग विष्णु के पास गए और बोले- 'देखिए, आपके वरदान से वह शक्तिशाली हुआ है। अब आप ही इसको संभालें।' तो विष्णु जी ने लड़ाई की और उनकी भी हार हो गई। चूंकि विष्णु के वरदान से ही वह शक्तिशाली बना था। भक्त और भगवान में किसकी बुद्धि ज्यादा है। भक्त से जब पूछा जाएगा कि बुद्धि अधिक किसकी है, तो भक्त कहेगा 'मेरी'। 
मगर यह बुद्धि मिली है परमात्मा से। तो ठीक वैसे ही मायासुर को परमात्मा से वरदान मिला था, इसलिए बहुत मजबूत बन गया। लड़ाई हो गई और विष्णुजी की हार हो गई। मायासुर ने पेड़ में विष्णु को अच्छी तरह से बांध दिया। भक्त भगवान को बांध सकता है। बंध जाने के बाद विष्णु ने कहा, 'देखो मायासुर। हमने तो आपको वरदान दिया था। अब तुम हमको वरदान दो।' मायासुर ने कहा, 'मैं तुम्हारा हूं, तुम जो चाहोगे, मैं दे दूंगा।' तब विष्णु बोले, 'देख मायासुर मैं चाहता हूं, तू पत्थर बन जा।' तब मायासुर गिर पड़ा और पैर की तरफ से पत्थर बनने लगा। मायासुर बोला, 'हां आपका वरदान मुझे मंजूर है, मगर तीन शर्ते हैं।' 
पहली शर्त है कि मेरी छाती पर आपको अपने चरण रखने होंगें। भगवान ने कहा, 'तथास्तु'। इसका मतलब है कि मेरे हृदय में आप रहेंगे और कोई नहीं। दूसरी शर्त है, जो आपकी उपासना करेगा उसे अवश्य मोक्ष मिलना चाहिए। भगवान ने कहा, 'तथास्तु'। और तीसरी शर्त है कि अगर आपकी उपासना करने पर किसी को मोक्ष नहीं मिला तो यह पत्थर का मायासुर दोबारा जग जाएगा। भगवान ने कहा 'तथास्तु'। 
कितनी खूबसूरती से यहां मायासुर का चरित्र चित्रित किया गया है। अगर पापी, दुराचारी, इंसान जिस तरह से भगवान की उपासना करे तो मोक्ष मिल जाएगा। 'उपासना' शब्द का अर्थ क्या है। अपने को परमात्मा के निकट ले जाना। 'उप' मतलब निकट। अपने आसन को परमात्मा के पास ले जाना अर्थात साधना करना। 

                         'दूसरों पर निर्भर ना रहें'

एक चिड़िया ने एक खेत में खड़ी फसल के बीच घोंसला बना कर अंडे दिए। उनसे समय आने पर दो बच्चे निकले। चिड़िया दाना चुगने के लिए रोज जंगल जाती। इस बीच उसके बच्चे अकेले रहते थे। चिड़िया लौटती तो बच्चे बहुत खुश होते और उसका लाया चुग्गा खाते। एक दिन चिड़िया ने देखा बच्चे बहुत डरे हुए हैं। उन्होंने बताया- 'आज खेत का मालिक आया था। वह कह रहा था कि फसल पक चुकी है। कल बेटों से खेत की कटाई के लिए कहेगा। इस तरह तो हमारा घोंसला टूट जाएगा फिर हम कहां रहेंगे?' चिड़िया बोली- 'फिक्र मत करो, अभी खेत नहीं कटेगा।'

अगले दिन सच में कुछ नहीं हुआ और बच्चे बेफिक्र हो गए। एक हफ्ते बाद चिड़िया को बच्चे फिर डरे हुए मिले। बोले- 'किसान आज भी आया था। कह रहा था कि कल नौकर को खेत काटने को कहेगा।' इस बार भी चिड़िया ने बच्चों से कहा- 'कुछ नहीं होगा, डरो मत।' अगले हफ्ते बच्चों ने बताया कि किसान आज फिर आया था और कह रहा था कि फसल की कटाई में बहुत देर हो गई है। कल वह खुद ही काटेगा। यह सुनकर चिड़िया बच्चों से बोली- 'कल खेत कट जाएगा।' वह बच्चों को तुरंत एक सुरक्षित घोंसले में ले गई।
हैरान बच्चों ने पूछा- 'मां तुमने कैसे जाना कि इस बार खेत सचमुच कटेगा?' चिड़िया बोली- 'जब तक इंसान किसी काम के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है, उसके संपन्न होने में संदेह रहता है। लेकिन जब वह काम को खुद करने की ठान लेता है तो जरूर पूरा होता है।' किसान ने जब खुद खेत काटने की सोची, तभी तय हुआ कि अब खेत जरूर कट जाएगा।

            राजगुरु की तीन बातें

हरि सिंह एक न्यायप्रिय राजा था। वह प्रजा के सुख-दुख की चिंता अपने परिवार की तरह करता था। लेकिन कुछ दिनों से उसे अपने काम-काज से संतुष्टि नहीं हो पा रही थी। उसने बहुत प्रयत्न किया कि वह अभिमान से दूर रहे, पर वह इस समस्या का हल नहीं निकाल पा रहा था। एक दिन राजा राजगुरु प्रखरबुद्धि के पास जा पहुंचा। राजा का चेहरा देखते ही राजगुरु उसकी परेशानी समझ गए।
उन्होंने कहा, 'राजन, यदि तुम मेरी तीन बातें याद रखोगे तो जिंदगी में कभी असफल नहीं हो सकते।' राजा बोला- 'आप बताइए गुरुदेव, मैं हमेशा याद रखूंगा।' प्रखरबुद्धि ने कहा, 'पहली बात, रात को मजबूत किले में रहना। दूसरी बात, स्वादिष्ट भोजन ग्रहण करना और तीसरी, सदा मुलायम बिस्तर पर सोना।' गुरु की ये अजीब बातें सुनकर राजा बोला, 'गुरु जी, आपकी इन बातों को अपनाया तो मेरे अंदर अभिमान और भी अधिक बढ़ जाएगा।'
इस पर प्रखरबुद्धि मुस्कराते हुए कहने लगे, 'तुम मेरी बातों का अर्थ नहीं समझे। मैं समझाता हूं। पहली बात- सदा अपने गुरु के साथ रहकर चरित्रवान बने रहना। कभी बुरी आदत के आदि मत होना। दूसरी बात, कभी पेट भरकर मत खाना। जो भी मिले उसे प्रेमपूर्वक खाना। खूब स्वादिष्ट लगेगा। और तीसरी बात, कम से कम सोना। अधिक समय तक जागकर प्रजा की रक्षा करना। जब नींद आने लगे तो राजसी बिस्तर का ध्यान छोड़कर घास, पत्थर, मिट्टी जहां भी जगह मिले, वहीं गहरी नींद सो जाना।
ऐसे में तुम्हें हर जगह लगेगा कि मुलायम बिस्तर पर हो। राजन, यदि तुम शासक की जगह त्यागी बनकर अपनी प्रजा का ख्याल रखोगे तो कभी भी अभिमान, धन और राजपाट का मोह तुम्हें नहीं छू पाएगा।

Friday, May 1, 2015

कर्म भाग्य को बदल सकता है

                          परमात्मा की मर्जी
रामदास ने कड़े परिश्रम से अपने खेत को एक खूबसूरत बाग में बदल दिया था। एक दिन जब वह बाग में पहुंचा तो देखा कि एक बाबा पेड़ पर चढ़कर फल खा रहा है। रामदास ने उससे कहा-'बाबा, आप इस तरह फल तोड़कर क्यों खा रहे हैं? यदि आपको फल चाहिए ही थे तो मुझसे पूछकर लेते।' यह सुनकर बाबा बोला-'मुझे किसी से पूछने की जरूरत नहीं बच्चा। ये सारा संसार परमात्मा ने बनाया है। यह बगीचा और इसमें लगे पेड़-पौधे व फल भी उसी के हैं। मैं परमात्मा का सेवक हूं। इस नाते इन फलों पर मेरा भी हक है।'

रामदास ने कहा-'परमात्मा का सेवक तो मैं भी हूं। पर इस तरह गलत काम नहीं करता। आप तो चोरी कर रहे हैं। आप मेरे फल चुराकर खा रहे हैं।' यह सुनकर बाबा गुस्से में बोला-'चुप कर अधर्मी। मुझे चोर कहता है। अरे पापी, क्यों मुझ पर यूं लांछन लगा रहा है?' रामदास समझ गया कि वह बाबा के वेश में कोई ढोंगी है। उसने उसे सबक सिखाने की ठान ली। फल खाने के बाद जैसे ही बाबा पेड़ से नीचे उतरा, रामदास ने एक रस्सी लेकर उसे तने से बांध दिया और फिर एक डंडा उठाकर उसकी पिटाई शुरू कर दी।

ढोंगी बाबा चीखने-चिल्लाने लगा-'मुझे इतनी बेदर्दी से पीटते हुए तुझे लज्जा नहीं आती? क्या तुझे परमात्मा का तनिक भी खौफ नहीं?' रामदास बोला-'मैं क्यों डरूं? यह बगीचा, यह लाठी और मेरे हाथ सब कुछ परमात्मा की ही तो मिल्कियत है। समझ लो कि मैं जो कर रहा हूं, वह परमात्मा की इच्छा है।' यह सुनकर उस ढोंगी बाबा ने रामदास से अपने बर्ताव के लिए क्षमा मांगी और फिर कभी ऐसा न कर

                      गीता का प्रभाव


ब्रिटेन के वैज्ञानिक डॉ. जॉन बर्डन सेंटरसन हाल्डेन ने 1922 में कैंब्रिज विश्वविद्यालय में शरीर के अंदर होने वाली रासायनिक क्रियाओं पर अनुसंधान कर पूरे संसार में ख्याति प्राप्त की। इस अनुसंधान के बाद उनकी दिलचस्पी आध्यात्मिक विषयों की ओर बढ़ने लगी। उन्होंने सोचा कि अब धर्म और आध्यात्मिक रहस्यों का अध्ययन कर लें। बस फिर क्या था, उन्होंने कुछ ही समय में लग कर अनेक हिंदू धर्म ग्रंथों का अध्ययन कर डाला। सबसे अंत में वह गीता पढ़ने लगे।

जैसे-जैसे वह गीता का एकाग्रता से मनन करते गए, वैसे-वैसे उनका मोह भौतिक वस्तुओं से हटता गया। उन्हें यह अहसास होता गया कि भौतिकवादी साधनों से कभी भी मानव को सच्चा सुख प्राप्त नहीं हो सकता। 1951 में वह अपनी पत्नी के साथ भारत आए। यहां घूमते हुए वह भुवनेश्वर पहुंचे। वहां अनेक धर्म प्रचारक भी मौजूद थे। अचानक ब्रिटेन के एक धर्म प्रचारक ने उनसे पूछा, 'आप एक अंग्रेज होते हुए भी गीता को सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ क्यों मानते हैं? क्या आपकी नजरों में गीता से बेहतर और कोई ग्रंथ नहीं है?'

उस धर्म प्रचारक की बात सुनकर हाल्डेन शांत भाव से बोले, 'गीता निरंतर निष्काम कर्म करते रहने की प्रेरणा देकर आलसी लोगों को भी कर्म से जोड़ती है। वह भक्ति और कर्म दोनों को एक-दूसरे का पूरक बताती है। वह किसी संप्रदाय या धर्म का नहीं, मानव मात्र के कल्याण का संदेश देती है। इसलिए मुझे गीता ने बहुत ज्यादा प्रभावित किया है। मैं वैज्ञानिक होकर भी इसे अपने काम के लिए उपयोगी मानता हूं। दूसरे क्षेत्रों के लोगों के लिए भी यह उपयोगी है।' ब्रिटेन के धर्म प्रचारक हाल्डेन की यह बात सुनकर बहुत प्रभावित हुए।
                                            सच्चा उत्तराधिकारी
संत एकनाथ को अपने उत्तराधिकारी की तलाश थी। वह किसी योग्य शिष्य को यह दायित्व सौंपना चाहते थे। उन्होंने शिष्यों की परीक्षा लेनी चाही। एक दिन उन्होंने सभी शिष्यों को बुलाया और एक दीवार बनाने का निर्देश दिया। शिष्य इस काम में जुट गए। दीवार बनकर तैयार भी हो गई, लेकिन तभी एकनाथ ने उसे तोड़ने का आदेश दे दिया। दीवार टूटते ही फिर से उसे बनाने को कहा। दीवार फिर बनी तो एकनाथ ने उसे फिर तुड़वा दिया।

दीवार ज्यों ही तैयार होती, एकनाथ उसे तोड़ने को कहते। यह सिलसिला चलता रहा। धीरे-धीरे उनके अनेक शिष्य उकता गए और इस काम से किनारा करने लगे। लेकिन चित्रभानू पूरी लगन के साथ अपने काम में जुटा रहा। बार-बार तोड़े जाने के बावजूद दीवार बनाने के काम से वह नहीं हटा और न ही जरा भी झुंझलाया। एक दिन एकनाथ उसके पास गए और बोले, 'तुम्हारे सभी मित्र काम छोड़कर भाग गए, पर तुम अब तक डटे क्यों हो?'

चित्रभानु बोला,'गुरु की आज्ञा से पीछे कैसे हट सकता हूं। तब तक यह कार्य करता रहूंगा, जब तक आप मना न कर दें।' एकनाथ बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने चित्रभानु को अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए सभी शिष्यों से कहा,'संसार में अधिकतर लोग ऊंची आकांक्षाएं रखते हैं और सर्वोच्च पद पर पहुंचना भी चाहते हैं। मगर वह नहीं जानते कि इसके लिए पात्रता भी जरूरी है।

वे पात्रता पाने का प्रयास नहीं करते या थोड़ा प्रयास करके पीछे हट जाते हैं। कोई भी लक्ष्य हासिल करने के लिए मात्र इच्छा और परिश्रम ही नहीं, दृढ़ता भी आवश्यक है। चित्रभानू में इच्छा, परिश्रम, दृढ़ता के साथ धैर्य भी है। ऐसा व्यक्ति जीवन में अपना लक्ष्य अवश्य पा लेता है।'

भारतीय की बुद्धिमानी


सुभाष चंद्र बोस इंग्लैंड में आईसीएस का इंटरव्यू देने गए। वहां उनका इंटरव्यू लेने वाले सभी अधिकारी अंग्रेज थे। दरअसल, वे भारतीय को किसी उच्च पद पर नहीं देखना चाहते थे। इसलिए इंटरव्यू में अजीबो-गरीब प्रश्न पूछकर भारतीयों को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहते थे। सुभाष इंटरव्यू के लिए अंग्रेज अधिकारियों के समक्ष बैठ गए। अधिकारी ने उन्हें देखकर व्यंग्य से मुस्कराते हुए पूछा,'बताओ, उस छत के पंखे में कुल कितनी पंखुड़ियां हैं।'

प्रश्न सुनकर सुभाष की नजर पंखे पर चली गई। पंखा काफी तेज गति से चल रहा था। उन्हें पंखे की ओर देखता पाकर अंग्रेज मुस्कराते हुए एक-दूसरे की ओर देखने लगे। तभी दूसरा अंग्रेज बोला,'यदि तुम पंखुड़ियों की सही संख्या नहीं बता पाए तो इस इंटरव्यू में फेल हो जाओगे।' एक और सदस्य बोला,'भारतीयों में बुद्धि होती ही कहां है?' उनकी बातें सुनकर सुभाष निर्भीकता से बोले,'अगर मैंने इसका सही जवाब दे दिया तो आप भी मुझसे दूसरा प्रश्न नहीं पूछ पाएंगे। और साथ ही मेरे सामने यह भी स्वीकार करेंगे कि भारतीय न सिर्फ बुद्धिमान होते हैं बल्कि वे निर्भीकता और धैर्य से हर प्रश्न का हल खोज लेते हैं।'

इसके बाद सुभाष तेजी से अपने स्थान से उठे। उन्होंने चलता पंखा बंद कर दिया और पंखा रुकते ही पंखुड़ियों की संख्या गिन ली। इसके बाद पंखुड़ियों की सही संख्या उन्होंने अधिकारियों को बता दी। सुभाष की विलक्ष्ण बुद्धि, सामयिक सूझबूझ और साहस को देखकर इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों के सिर शर्म से झुक गए। वे फिर उनसे आगे कोई प्रश्न नहीं पूछ पाए। उन्हें इस बात को भी स्वीकार करना पड़ा कि भारतीय साहस, बुद्धिमानी और आत्मविश्वास से हर मुसीबत का हल खोज लेते हैं।

Tuesday, April 28, 2015

कर्म भाग्य को बदल सकता है



स्वभाव की जिंदादिली


एक अस्वस्थ व्यक्ति ने डॉक्टर को बुलवाया। उसके घर की लिफ्ट खराब थी, इसलिए डाक्टर को सीढ़ियां चढ़कर पहुंचना पड़ा। वह काफी जोरों से हांफने लगा। जब अस्वस्थ व्यक्ति ने उनकी यह हालत देखी, तो बिस्तर से उठकर उसने डॉक्टर को बैठने के लिए कुर्सी दी और एक गोली उसे देते हुए बोला- 'यह तुम्हें फौरन आराम पहुंचाएगी। तुम गरिष्ठ भोजन फौरन बंद कर दो और साग-सब्जी व फल खाया करो। मैं तुमसे उम्र में करीबन दुगना हूं, फिर भी सौ गुना चुस्त हूं।' डॉक्टर ने मरीज की चुस्ती की तारीफ की।

उस व्यक्ति ने फिर डॉक्टर से पूछा- 'क्या तुम डांस कर सकते हो?' डॉक्टर ने इन्कार कर दिया तो उसने संगीत बजाया और नृत्य भी किया। साथ ही डॉक्टर को सलाह दी- 'रोजाना कम से कम पंद्रह मिनट तक डांस करने से तुम छरहरे और चुस्त हो जाओगे। तुम डॉक्टर मरीजों को हमेशा ऐसी सलाह देते हो, जो उनके लिए उपयोगी नहीं होतीं। तुम एक डाकिए से घूमने-फिरने को कहते हो, जबकि वह तो घूमने-फिरने में ही लगा रहता है।

मैं जानता हूं कि अब तुम मुझे लिखने के लिए मना करोगे क्योंकि उसमें मेहनत होगी। लेकिन मैं एक लेखक हूं, इसलिए लिखने से ही स्वस्थ रहता हूं। अब तुम यह अनुभवी सलाह देने के लिए मुझे पांच शिलिंग दो।' डॉक्टर ने हंसते हुए कहा- 'ठीक है, आप उन्हें काटकर मुझे दो पौंड दे दीजिए।' कारण पूछने पर डॉक्टर बोले- 'क्योंकि मैंने आपको स्वस्थ कर दिया। मुझे मरीज समझकर आप अपना कष्ट भूल गए।'

स्वभाव की जिंदादिली व्यक्ति को सदैव स्वस्थ व ऊर्जावान बनाए रखती है। डाक्टर का तो पता नहीं, लेकिन इस कहानी के मरीज का नाम है जॉर्ज बर्नार्ड शॉ।

                    भारतीय की बुद्धिमानी


सुभाष चंद्र बोस इंग्लैंड में आईसीएस का इंटरव्यू देने गए। वहां उनका इंटरव्यू लेने वाले सभी अधिकारी अंग्रेज थे। दरअसल, वे भारतीय को किसी उच्च पद पर नहीं देखना चाहते थे। इसलिए इंटरव्यू में अजीबो-गरीब प्रश्न पूछकर भारतीयों को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहते थे। सुभाष इंटरव्यू के लिए अंग्रेज अधिकारियों के समक्ष बैठ गए। अधिकारी ने उन्हें देखकर व्यंग्य से मुस्कराते हुए पूछा,'बताओ, उस छत के पंखे में कुल कितनी पंखुड़ियां हैं।'

प्रश्न सुनकर सुभाष की नजर पंखे पर चली गई। पंखा काफी तेज गति से चल रहा था। उन्हें पंखे की ओर देखता पाकर अंग्रेज मुस्कराते हुए एक-दूसरे की ओर देखने लगे। तभी दूसरा अंग्रेज बोला,'यदि तुम पंखुड़ियों की सही संख्या नहीं बता पाए तो इस इंटरव्यू में फेल हो जाओगे।' एक और सदस्य बोला,'भारतीयों में बुद्धि होती ही कहां है?' उनकी बातें सुनकर सुभाष निर्भीकता से बोले,'अगर मैंने इसका सही जवाब दे दिया तो आप भी मुझसे दूसरा प्रश्न नहीं पूछ पाएंगे। और साथ ही मेरे सामने यह भी स्वीकार करेंगे कि भारतीय न सिर्फ बुद्धिमान होते हैं बल्कि वे निर्भीकता और धैर्य से हर प्रश्न का हल खोज लेते हैं।'

इसके बाद सुभाष तेजी से अपने स्थान से उठे। उन्होंने चलता पंखा बंद कर दिया और पंखा रुकते ही पंखुड़ियों की संख्या गिन ली। इसके बाद पंखुड़ियों की सही संख्या उन्होंने अधिकारियों को बता दी। सुभाष की विलक्ष्ण बुद्धि, सामयिक सूझबूझ और साहस को देखकर इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों के सिर शर्म से झुक गए। वे फिर उनसे आगे कोई प्रश्न नहीं पूछ पाए। उन्हें इस बात को भी स्वीकार करना पड़ा कि भारतीय साहस, बुद्धिमानी और आत्मविश्वास से हर मुसीबत का हल खोज लेते हैं।

                             हार और जीत
किसी शहर में बहुत दूर से एक विद्वान पहुंचा। उसने कहा कि वह स्थानीय विद्वानों से शास्त्रार्थ करना चाहता है। कुछ लोग उसे शहर के प्रमुख विद्वानों के पास ले गए जिन्होंने कहा,'हमारे यहां तो सनातन गोस्वामी और उनके भतीजे जीव गोस्वामी ही श्रेष्ठ ज्ञानी हैं। वे आपको विजेता स्वीकार कर मान्यता पत्र पर हस्ताक्षर कर देंगे तो हम भी आपको विजेता मान लेंगे।' यह सुनकर वह विद्वान सनातन गोस्वामी के पास पहुंचा,'स्वामी जी, या तो आप शास्त्रार्थ कीजिए या मुझे मान्यता पत्र प्रदान कीजिए।'

सनातन गोस्वामी बोले,'भाई! अभी हमने शास्त्रों का मर्म ही कहां समझा है। हम तो विद्वानों के सेवक हैं।' उन्होंने मान्यता पत्र पर हस्ताक्षर कर दे दिया। विद्वान मान्यता पत्र लेकर प्रसन्नतापूर्वक चला जा रहा था कि जीव गोस्वामी मिल गए। उसने उनसे भी कहा,'आप इस मान्यता पत्र पर हस्ताक्षर करेंगे या मुझसे शास्त्रार्थ करेंगे?' जीव बोले,'मैं शास्त्रार्थ के लिए तैयार हूं।' शास्त्रार्थ शुरू हो गया। शहर के लोग उत्सुकतापूर्वक यह देख रहे थे। लंबे शास्त्रार्थ में जीव गोस्वामी ने उस विद्वान को पराजित कर दिया।

वह दुखी होकर नगर से चला गया। जीव ने सनातन गोस्वामी को अपनी विजय के बारे में बताया पर वह प्रसन्न नहीं हुए। उन्होंने कहा,'एक विद्वान को अपमानित करके तुम्हें थोड़ा यश अवश्य मिल गया, लेकिन उसे लेकर क्या करोगे? यह तुम्हारे अहंकार को ही बढ़ाएगा। फिर एक अहंकारी ज्ञान की साधना कैसे कर पाएगा। आखिर उस विद्वान को विजयी मान लेने में तुम्हारा क्या बिगड़ता था। हमारे लिए यश-अपयश, जीवन-मरण, सुख-दुख, मित्र-शत्रु सभी एक समान होते हैं। हमें हार और जीत के फेर में पड़ना ही नहीं चाहिए।' जीव गोस्वामी को अपनी भूल का अहसास हो गया। उन्होंने तुरंत क्षमा मांग ली।