Wednesday, June 29, 2016

प्रेममयी भक्ति

बरसाने में एक संत किशोरी जी का भजन करते थे और रोज ऊपर दर्शन करने जाते राधा रानी के महल में ।

उनकी बड़ी निष्ठा ,बड़ी श्रद्धा थी किशोरी जी के चरणों में ।

एक बार उन्होंने देखा की भक्त राधा रानी को पोशाक अर्पित कर रहे थे तो उस महात्मा का भाव भी की मैंने आज तक किशोरी जी को कुछ भी नहीं चढ़ाया ।
और लोग आ रहे है तो कोई फूल चढ़ाता है , कोई भोग लगाता है , कोई पोशाक पहनाता है और मैंने कुछ भी नही दिया , अरे कैसा भगत हूँ ।

तो उस महात्मा ने उसी दिन निश्चय कर लिया की में अपने हाथो से बनाकर राधा रानी को सूंदर पोशाक पहनाउंगा।

ये सोचकर उसी दिन से वो महात्मा तैयारी में लग गए और बहुत प्यारी पोशाक बनाई , पोशाक तैयार होने में एक महीना लगा। कपड़ा लेकर आया , अपने हाथो से गोटा लगाया और बहुत प्यारी पोशाक बनाई।

सूंदर पोशाक जब तैयार हो गई तो वो पोशाक अब लेकर वो ऊपर किशोरी जी के चरणों में अर्पित करने जा रहा थे ।

वो महात्मा मंदिर की आधी सीढियो तक ही पहुँचा होगा तभी बरसाने की एक छोटी सी लड़की उस महात्मा को बोलती है की बाबा ये क्या ले जा रहे हो आप ? आपके हाथ में ये क्या है ?

वो महात्मा बोले की लाली ये में किशोरी जी के लिए पोशाक बनाके उनको पहनाने के लिए ले जा रहा हूँ ।

वो लड़की बोली अरे बाबा राधा रानी पे तो बहोत सारी पोशाक है तो तू ये मोकू दे दे ना ।

तो महात्मा बोले की बेटी तोकू में दूसरी बाजार से दिलवा दूंगा ये तो मै अपने हाथ से बनाकर राधा रानी के लिये लेकर जा रहा हूँ तोकू ओर दिलवा दूँगो ।

लेकिन उस छोटी सी बालिका ने उस महात्मा का दुपट्टा पकड़ लिया बाबा ये मोकू देदे ।

पर सन्त भी जिद करने लगे की दूसरी दिलवाऊंगा ये नहीं दूंगा ।

लेकिन वो बच्ची भी इतनी तेज थी की संत के हाथ से छुड़ाकर पोशाक भागी ,

अब महात्मा तो दुखी हो गए बूढ़े महात्मा अब कहाँ ढूंढे उसको ।

तो वही सीढियो पर बैठकर रोने लगे ओर सन्त वहाँ से निकले तो पूछा महाराज क्यों रो रहे हो ?

तो सारी बात बताई की जैसे-तैसे तो बुढ़ापे में इतना परिश्रम करके ये पोशाक बनाकर लाया राधा रानी को पहनाता पर वासे पहले ही एक छोटी सी लाली लेकर भाग गई तो कहा करूँ में अब ?

वो बाकी संत बोले अरे अब गई तो गई कोई बात नहीं अब कब तक रोते रहोगे चलो ऊपर दर्शन करने ।

रोना बन्द हुआ लेकिन मन उनका उदास था, क्योंकि कामना पूरी नहीं हुई ।

अनमने मन से राधा रानी का दर्शन करने संत जा रहे थे और मन में ये ही सोच रहे है की मुझे लगता है की किशोरी जी की इच्छा नहीं थी ।

शायद राधा रानी मेरे हाथो से बनी पोशाक पहनना ही नहीं चाहती थी ऐसा सोचकर बड़े दुःखी होकर जा रहे है ।

और अब जाकर अंदर खड़े हुए दर्शन खुलने का समय हुआ और जैसे ही श्री राधा जी का दर्शन पट खुले तो वो महात्मा देखते है की जो पोशाक वो बालिका लेकर भागी थी वो ही पोशाक पहनकर मेरी राधा रानी बैठी हुई है ।

ये देखते ही महात्मा की आँखों से आँसू बहने लगे और महात्मा बोले की किशोरी जी में तो आपको देने ही ला रहा था लेकिन आपसे इतना भी सब्र नहीं हुआ मेरे से छीनकर भागी आप ।

तो किशोरी जी ने कहा की बाबा ये केवल वस्त्र नहीं नहीं,
ये केवल पोशाक नहीं है,
इसमें में तो तेरो प्रेम छुपो भयो है और प्रेम को पाने के लिए तो दौड़ना ही पड़ता है , भागना ही पड़ता है ।

भगवान कीमती सामान के नहीं प्रेम की और आकर्षित होते है ।
अपने इष्ट के प्रति प्रेममयी भक्ति ही श्रेष्ठ भक्ति है ।
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