Thursday, June 2, 2016

माँ-बाप का कर्ज

एक औरत थी, जो अंधी थी, जिसके कारण उसके बेटे को  स्कूल. में बच्चे चिढाते थे, कि अंधी का बेटा आ गया,  हर बात पर उसे ये शब्द  सुनने  को मिलता था कि "अन्धी  का बेटा" . इसलिए वो अपनी माँ से  चिडता था . उसे. कही भी अपने साथ लेकर जाने में हिचकता था उसे नापसंद करता था.. उसकी माँ ने उसे पढ़ाया.. और उसे इस लायक बना दिया की वो अपने पैरो
पर खड़ा हो सके.. लेकिन जब वो बड़ा आदमी बन गया तो अपनी माँ को  छोड़ अलग रहने लगा.. एक दिन एक बूढी औरत उसके घर आई और गार्ड से बोली.. मुझे तुम्हारे साहब से मिलना है जब गार्ड ने अपने मालिक से बोल तो मालिक ने कहा कि बोल दो मै अभी घर पर नही हूँ. गार्ड ने जब बुढिया से बोला कि वो अभी नही है.. तो वो वहा से चली गयी..!! थोड़ी देर बाद जब लड़का अपनी कार से ऑफिस के लिए जा रहा होता है.. तो देखता है कि सामने बहुत भीड़ लगी है.. और जानने के लिए कि वहाक्यों भीड़ लगी है वह वहा गया तो देखा उसकी माँ वहा मरी पड़ी थी.. उसने देखा की उसकी मुट्ठी में कुछ है उसने जब  मुट्ठी खोली तो देखा की एक लेटर जिसमे यह लिखा था कि बेटा जब तू छोटा था तो खेलते वक़्त तेरी आँख में सरिया धंस. गयी थी और तू अँधा हो गया था तो मैंने तुम्हे अपनी आँखे दे दी थी.. इतना पढ़ कर लड़का जोर- जोर से रोने लगा.. उसकी माँ उसके पास नही आ सकती थी.. दोस्तों वक़्त रहते ही लोगो की वैल्यू करना सीखो.. माँ-बाप का कर्ज हम कभी नही चूका सकत.. हमारी प्यास का अंदाज़ भी अलग है दोस्तों, कभी समंदर को ठुकरा देते है, तो कभी आंसू तक पी जाते है. बैठना भाइयों के बीच, चाहे "बैर" ही क्यों ना हो.. और खाना माँ के हाथो का, चाहे "ज़हर" ही क्यों ना हो..!!...

Tuesday, May 31, 2016

कृष्ण टेढ़े क्यों है


एक बार की बात है - वृंदावन का एक साधू अयोध्या की गलियों में राधे कृष्ण - राधे कृष्ण जप रहा था । अयोध्या का एक साधू वहां से गुजरा तो राधे कृष्ण राधे कृष्ण सुनकर उस साधू को बोला - अरे जपना ही है तो सीता राम जपो, क्या उस टेढ़े का नाम जपते हो ?

 वृन्दावन का साधू भडक कर बोला - ज़रा जुबान संभाल कर बात करो, हमारी जुबान भी पान भी खिलाती हैं तो लात भी खिलाती है । तुमने मेरे इष्ट को टेढ़ा कैसे बोला ?

 अयोध्या वाला साधू बोला इसमें गलत क्या है ? तुम्हारे कन्हैया तो हैं ही टेढ़े । कुछ भी लिख कर देख लो-
उनका नाम टेढ़ा - कृष्ण
 उनका धाम टेढ़ा - वृन्दावन

 वृन्दावन वाला साधू बोला चलो मान लिया, पर उनका काम भी टेढ़ा है और वो खुद भी टेढ़ा है, ये तुम कैसे कह रहे हो ?

 अयोध्या वाला साधू बोला - अच्छा अब ये भी बताना पडेगा ? तो सुन -
जमुना में नहाती गोपियों के कपड़े चुराना, रास रचाना, माखन चुराना - ये कौन सीधे लोगों के काम हैं ? और आज तक ये बता कभी किसी ने उसे सीधे खडे देखा है कभी ?

 वृन्दावन के साधू को बड़ी बेइज्जती महसूस हुई , और सीधे जा पहुंचा बिहारी जी के मंदिर । अपना डंडा डोरिया पटक कर बोला - इतने साल तक खूब उल्लू बनाया लाला तुमने ।
 ये लो अपनी लुकटी, ये लो अपनी कमरिया, और पटक कर बोला ये अपनी सोटी भी संभालो ।
 हम तो चले अयोध्या राम जी की शरण में ।
 और सब पटक कर साधू चल दिये ।

 अब बिहारी जी मंद मंद मुस्कुराते हुए उसके पीछे पीछे । साधू की बाँह पकड कर बोले अरे " भई तुझे किसी ने गलत भडका दिया है "

पर साधू नही माना तो बोले, अच्छा जाना है तो तेरी मरजी , पर ये तो बता राम जी सीधे और मै टेढ़ा कैसे ? कहते हुए बिहारी जी कूंए की तरफ नहाने चल दिये ।

 वृन्दवन वाला साधू गुस्से से बोला -

" नाम आपका टेढ़ा- कृष्ण,
धाम आपका टेढ़ा- वृन्दावन,
काम तो सारे टेढ़े- कभी किसी के कपडे चुरा, कभी गोपियों के वस्त्र चुरा,
और सीधे तुझे कभी किसी ने खड़े होते नहीं देखा। तेरा सीधा है किया"।
अयोध्या वाले साधू से हुई सारी झैं झैं और बइज़्जती की सारी भड़ास निकाल दी।

बिहारी जी मुस्कुराते रहे और चुप से अपनी बाल्टी कूँए में गिरा दी ।
 फिर साधू से बोले अच्छा चला जाइये, पर जरा मदद तो कर जा, तनिक एक सरिया ला दे तो मैं अपनी बाल्टी निकाल लूं ।

 साधू सरिया ला देता है और कृष्ण सरिये से बाल्टी निकालने की कोशिश करने लगते हैं ।

 साधू बोला अब समझ आइ कि तौ मैं अकल भी ना है।
 अरै सीधै सरिये से बाल्टी भला कैसे निकलेगी ?
सरिये को तनिक टेढ़ा कर, फिर देख कैसे एक बार में बाल्टी निकल आवेगी ।

बिहारी जी मुस्कुराते रहे और बोले - जब सीधापन इस छोटे से कूंए से एक छोटी सी बालटी नहीं निकाल पा रहा, तो तुम्हें इतने बडे भवसागर से कैसे पार लगा सकेगा ?
अरे आज का इंसान तो इतने गहरे पापों के भवसागर में डूब चुका है कि इस से निकाल पाना मेरे जैसे टेढ़े के ही बस की है

Sunday, May 29, 2016

प्रेममयी भक्ति

बरसाने में एक संत किशोरी जी का भजन करते थे और रोज ऊपर दर्शन करने जाते राधा रानी के महल में ।
उनकी बड़ी निष्ठा ,बड़ी श्रद्धा थी किशोरी जी के चरणों में ।
एक बार उन्होंने देखा की भक्त राधा रानी को पोशाक अर्पित कर रहे थे तो उस महात्मा का भाव भी की मैंने आज तक किशोरी जी को कुछ भी नहीं चढ़ाया ।
और लोग आ रहे है तो कोई फूल चढ़ाता है , कोई भोग लगाता है , कोई पोशाक पहनाता है और मैंने कुछ भी नही दिया , अरे कैसा भगत हूँ ।
तो उस महात्मा ने उसी दिन निश्चय कर लिया की में अपने हाथो से बनाकर राधा रानी को सूंदर पोशाक पहनाउंगा।
ये सोचकर उसी दिन से वो महात्मा तैयारी में लग गए और बहुत प्यारी पोशाक बनाई , पोशाक तैयार होने में एक महीना लगा.
कपड़ा लेकर आया , अपने हाथो से गोटा लगाया और बहुत प्यारी पोशाक बनाई।
सूंदर पोशाक जब तैयार हो गई तो वो पोशाक अब लेकर वो ऊपर किशोरी जी के चरणों में अर्पित करने जा रहा थे ।
वो महात्मा मंदिर की आधी सीढियो तक ही पहुँचा होगा तभी बरसाने की एक छोटी सी लड़की उस महात्मा को बोलती है की बाबा ये क्या ले जा रहे हो आप ? आपके हाथ में ये क्या है ?
वो महात्मा बोले की लाली ये में किशोरी जी के लिए पोशाक बनाके उनको पहनाने के लिए ले जा रहा हूँ ।
वो लड़की बोली अरे बाबा राधा रानी पे तो बहोत सारी पोशाक है तो तू ये मोकू दे दे ना ।
तो महात्मा बोले की बेटी तोकू में दूसरी बाजार से दिलवा दूंगा ये तो मै अपने हाथ से बनाकर राधा रानी के लिये लेकर जा रहा हूँ तोकू ओर दिलवा दूँगो ।
लेकिन उस छोटी सी बालिका ने उस महात्मा का दुपट्टा पकड़ लिया बाबा ये मोकू देदे ।
पर सन्त भी जिद करने लगे की दूसरी दिलवाऊंगा ये नहीं दूंगा ।
लेकिन वो बच्ची भी इतनी तेज थी की संत के हाथ से छुड़ाकर पोशाक भागी ,
अब महात्मा तो दुखी हो गए बूढ़े महात्मा अब कहाँ ढूंढे उसको ।
तो वही सीढियो पर बैठकर रोने लगे ओर सन्त वहाँ से निकले तो पूछा महाराज क्यों रो रहे हो ?
तो सारी बात बताई की जैसे-तैसे तो बुढ़ापे में इतना परिश्रम करके ये पोशाक बनाकर लाया राधा रानी को पहनाता पर वासे पहले ही एक छोटी सी लाली लेकर भाग गई तो कहा करूँ में अब ?
वो बाकी संत बोले अरे अब गई तो गई कोई बात नहीं अब कब तक रोते रहोगे चलो ऊपर दर्शन करने ।
रोना बन्द हुआ लेकिन मन उनका उदास था, क्योंकि कामना पूरी नहीं हुई ।
अनमने मन से राधा रानी का दर्शन करने संत जा रहे थे और मन में ये ही सोच रहे है की मुझे लगता है की किशोरी जी की इच्छा नहीं थी ।
शायद राधा रानी मेरे हाथो से बनी पोशाक पहनना ही नहीं चाहती थी ऐसा सोचकर बड़े दुःखी होकर जा रहे है ।
और अब जाकर अंदर खड़े हुए दर्शन खुलने का समय हुआ और जैसे ही श्री राधा जी का दर्शन पट खुले तो वो महात्मा देखते है की जो पोशाक वो बालिका लेकर भागी थी वो ही पोशाक पहनकर मेरी राधा रानी बैठी हुई है ।
ये देखते ही महात्मा की आँखों से आँसू बहने लगे और महात्मा बोले की किशोरी जी में तो आपको देने ही ला रहा था लेकिन आपसे इतना भी सब्र नहीं हुआ मेरे से छीनकर भागी आप ।
तो किशोरी जी ने कहा की बाबा ये केवल वस्त्र नहीं नहीं,
ये केवल पोशाक नहीं है,
इसमें में तो तेरो प्रेम छुपो भयो है और प्रेम को पाने के लिए तो दौड़ना ही पड़ता है , भागना ही पड़ता है ।
भगवान कीमती सामान के नहीं प्रेम की और आकर्षित होते है ।
अपने इष्ट के प्रति प्रेममयी भक्ति ही श्रेष्ठ भक्ति है ।

Thursday, May 26, 2016

खुश होकर जियो

एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी !
गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी क्योंकि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था।
गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ
वैसे ही उसे याद आता,
कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा -
गिलहरी फिर काम पर लग जाती !
गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं पर उसे अखरोट याद आ जाता,
और वो फिर काम पर लग जाती !
ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था !
ऐसे ही समय बीतता रहा....
एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया !
गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के ?
पूरी जिन्दगी काम करते - करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे !
यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है !
इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है !
६० वर्ष की ऊम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है, तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है।
क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : -
कितनी इच्छायें मरी होंगी ?
कितनी तकलीफें मिली होंगी ?
कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे ?
क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके !
इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके।

इसलिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो।

Monday, May 23, 2016

अपने आपको -अर्पण कर दों

एक बार किसी देश का राजा अपनी प्रजा का हाल-चाल पूछने के लिए गाँवो में  घूम रहा था ,,, घूमते-घूमते उसके कुर्ते का बटन टूट गया,,, उसने. अपने मंत्री को कहा कि, पता करो की इस गाँव में कौन सा दर्जी हैं,जो मेरे बटन  को सिल सके,,, मंत्री ने पता किया ,, उस. गाँव में सिर्फ एक ही दर्जी था,, जो कपडे सिलने का काम करता था,,, उसको राजा के सामने ले जाया गया,, राजा ने कहा,कय़ा तुम मेरे कुर्ते का बटन सी सकते हो,,, दर्जी ने कहा,यह कोई मुश्किल काम थोड़े ही है,,, उसने मंत्री से बटन ले लिया,,, धागे से उसने राजा के कुर्ते का बटन फोरन सी दिया,,, क्योंकि बटन  भी राजा के पास था,, सिर्फ उसको. अपना धागे का प्रयोग करना था,,, .. राजा ने दर्जी से पूछा कि,, कितने पैसे दू ,,, उसने कहा, महाराज रहने दो,,, छोटा सा काम था,, उसने मन में सोचा  कि,बटन  भी राजा के पास था,, उसने तो सिर्फ धागा ही लगाया हैं,,, राजा ने फिर से दर्जी को कहा, कि,,, नहीं नहीं बोलो कितनीे माया दू,,, दर्जी ने सोचा कि,, 2 रूपये मांग लेता हूँ,,, फिर मन में सोचा कि; कहीं राजा यह ने सोचलें,कि ,,, बटन. टाँगने के मुझ से 2 रुपये ले रहा हैं,,, तो गाँववालों से कितना लेता होगा,,, क्योंकि उस जमाने में २ रुपये की कीमत बहुत होती थी,,, दर्जी ने राजा से कहा, कि,, महाराज जो  भी आपको उचित लगे ,, वह दे दो,, अब था  तो राजा ही,,उसने अपने हिसाब से देना  था,, कहीं देने में उसकी पोजीशन ख़राब न
हो जाये,,, उसने अपने मंत्री से कहा कि,, इस दर्जी को २ गाँव दे दों, यह हमारा हुकम है ,,, कहाँ वो दर्जी सिर्फ २ रुपये की मांग कर. रहा था,, और कहाँ राजा ने उसको २ गाँव दे दिए ,, जब हम प्रभु पर सब कुछ छोड़ देते हैं, तो वह अपने हिसाब से देता हैं,, सिर्फ हम. मांगने में कमी कर जाते है,,, देने वाला तो पता नही क्या देना चाहता हैं,,, इसलिए  संत-महात्मा कहते है,,, प्रभु के चरणों पर अपने आपको -अर्पण कर दों,,  देने वाला तो पता नही क्या देना चाहता हैं,, फिर देखो उनकी
लीला,,

Saturday, May 21, 2016

सब्र का इम्तेहान

एक अमीर ईन्सान था। उसने समुद्र मेँ अकेले  घूमने के लिए एक  नाव बनवाई।  छुट्टी के दिन वह नाव लेकर समुद्र  की सेर करने निकला।  आधे समुद्र तक पहुंचा ही था कि अचानक  एक जोरदार  तुफान आया।  उसकी नाव पुरी तरह से तहस-नहस  हो गई लेकिन वह  लाईफ जैकेट की मदद से समुद्र मेँ कूद  गया। ब तूफान शांत  हुआ तब वह  तैरता-तैरता एक टापू पर  पहुंचा  लेकिन वहाँ भी कोई नही था।  टापू के चारो और समुद्र के अलावा कुछ  भी नजर नही आ  रहा था।  उस आदमी ने सोचा कि जब मैंने  पूरी जिदंगी मेँ  किसी का कभी भी बुरा नही किया तो मेरे  साथ ऐसा क्यूँ  हुआ..?  उस ईन्सान को लगा कि खुदा ने मौत से  बचाया तो आगे  का रास्ता भी खुदा ही बताएगा।  धीरे-धीरे वह वहाँ पर उगे झाड-फल-पत्ते  खाकर दिन बिताने  लगा।  अब धीरे-धीरे उसकी आस टूटने लगी,  खुदा पर से  उसका यकीन उठने लगा।  फिर उसने सोचा कि अब  पूरी जिंदगी यही इस टापू पर  ही बितानी है तो क्यूँ ना एक  झोपडी बना लूँ ......?  फिर उसने झाड की डालियो और पत्तो से  एक  छोटी सी झोपडी बनाई।  उसने मन ही मन कहा कि आज से झोपडी मेँ  सोने  को मिलेगा आज से बाहर  नही सोना पडेगा।  रात हुई ही थी कि अचानक मौसम बदला  बिजलियाँ जोर जोर से कड़कने लगी.!  तभी अचानक एक बिजली उस झोपडी पर  आ गिरी और  झोपडी धधकते हुए जलने लगी।  यह देखकर वह ईन्सान टूट गया।
आसमान  की तरफ देखकर  बोला  या खुदा ये तेरा कैसा इंसाफ है?  तूने मुज पर अपनी रहम की नजर क्यूँ नहीं की?  फीर वह ईन्सान हताश होकर सर पर हाथ  रखकर रो रहा था।  कि अचानक एक नाव टापू के पास आई।
नाव से उतरकर  दो आदमी बाहर आये  और बोले कि हम तुम्हे बचाने आये हैं।  दूर से इस वीरान टापू मे जलता हुआ   झोपडा देखा  तो लगा कि कोई उस टापू  पर मुसीबत मेँ है।  अगर तुम अपनी झोपडी नही जलाते तो हमे
पता नही चलता कि टापू पर कोई है।  उस आदमी की आँखो से आँसू गिरने लगे।  उसने खुदा से माफी माँगी और
बोला कि "या रब मुझे  क्या पता कि तूने मुझे बचाने के लिए मेरी झोपडी जलाई  थी।यक़ीनन तू अपने बन्दों का हमेशा ख्याल रखता है। तूने मेरे सब्र का इम्तेहान लिया लेकिन मैं उसका फ़ैल हो गया। मुझे माफ़ फरमा दे।"
   
दिन चाहे सुख के हों या दुख के,
खुदा अपने बन्दों के साथ हमेशा रहता है 

Friday, May 20, 2016

कैरियर का भूत

मियां-बीबी दोनों मिल खूब कमाते हैं  तीस लाख का पैकेज दोनों ही पाते हैंसुबह आठ बजे नौकरियों पर जाते हैं  रात ग्यारह तक ही वापिस आते है. अपने परिवारिक रिश्तों से कतराते हैं. अकेले रह कर वह  कैरियर  बनाते हैं  कोई कुछ मांग न ले वो मुंह छुपाते हैं  भीड़ में रहकर भी अकेले रह जाते हैं  मोटे वेतन की नौकरी छोड़ नहीं पाते हैं
अपने नन्हे मुन्ने को पाल  नहीं पाते हैं  फुल टाइम की मेड ऐजेंसी से लाते  हैं. उसी के जिम्मे वो बच्चा छोड़ जाते है  परिवार को उनका बच्चा नहीं जानता है केवल आया'आंटी को ही पहचानता है  दादा -दादी, नाना-नानी कौन होते  है?  अनजान है सबसे किसी को न मानता है. आया ही नहलाती है आया ही खिलाती है  टिफिन भी रोज़ रोज़ आया ही बनाती है
यूनिफार्म पहना के स्कूल कैब में बिठाती हैछुट्टी के बाद कैब से आया ही घर लाती है नींद जब आती है तो आया ही सुलाती है  जैसी भी उसको आती है लोरी सुनाती है उसे सुलाने में अक्सरवोभीसोजातीहैकभी.जब मचलता है तो टीवी दिखाती जो टीचर मैम बताती है वही वो मानता है देसी खाना छोड कर पीजा बर्गर खाता  है वीक ऐन्ड पर मौल में पिकनिक मनाता है संडे की छुट्टी मौम-डैड के  संग बिताता है  वक्त नहीं रुकता है तेजी से गुजर जाता है. वह स्कूल से निकल के कालेज में आता है  कान्वेन्ट में पढ़ने पर इंडिया कहाँ भाता है आगे पढाई करने वह विदेश चला जाता है. वहाँ नये दोस्त बनते हैं उनमें रम जाता है
मां-बाप के पैसों से ही खर्चा चलाता है  धीरे-धीरे वहीं की संस्कृति में रंग जाता है  मौम डैड से रिश्ता पैसों का रह जाता है  कुछ  दिन में उसे काम वहीं मिल जाता है  जीवन साथी शीघ्र ढूंढ वहीं बस जाता है  माँ बाप ने जो देखा ख्वाब वो टूट जाता है
बेटे के दिमाग में भी कैरियर रह जाता है  बुढ़ापे में माँ-बाप अब अकेले रह जाते हैं  जिनकी अनदेखी की उनसे आँखें चुराते हैं क्यों इतना कमाया ये सोच के पछताते हैं  घुट घुट कर जीते हैं खुद से भी शरमाते हैं  हाथ पैर ढीले हो जाते, चलने में दुख पाते हैं  दाढ़- दाँत गिर जाते, मोटे चश्मे लग जाते हैं. कमर भी झुक जाती, कान नहीं सुन पाते हैं वृद्धाश्रम में दाखिल हो, जिंदा ही मर जाते हैं  सोचना की बच्चे अपने लिए पैदा कर रहे हो या विदेश की सेवा के लिए।  बेटा एडिलेड में, बेटी है न्यूयार्क।  ब्राईट बच्चों के लिए, हुआ बुढ़ापा डार्क।  बेटा डालर में बंधा, सात समन्दर पार  चिता जलाने बाप की, गए पड़ोसी चार।
ऑन लाईन पर हो गए, सारे लाड़ दुलार।  दुनियां छोटी हो गई, रिश्ते हैं बीमार।  बूढ़ा-बूढ़ी आँख में, भरते खारा नीर।
हरिद्वार के घाट की, सिडनी में तकदीर ।

Thursday, May 19, 2016

माँ- बाप का दिल

दम्पति ने कहा "बेटा हमें फेसबुक का अकाउंट बना दो।"लड़के ने कहा- "लाइये अभी बना देता हूँ, कहिये किस नाम से बनाऊँ?" बुजुर्ग ने कहा- "लड़की के नाम से कोई भी अच्छा सा ना रख लो।"  लड़का ने अचम्भे से पूछा- "फेक अकाउंट क्यों ??" बुजुर्ग ने कहा- "बेटा, पहले बना तो दो फिर बताता हूँ क्यों ?? बड़ो का मान करना उस लड़के ने सीखा था तो उसने अकाउंट बना ही दिया।अब उसने पूछा- "अंकल जी, प्रोफाइल इमेज क्या रखूँ?" तो बुजुर्ग ने कहा- "कोई भी हीरोइन जो आजकल के बच्चों को अच्छी लगती हो।" उस लड़के ने गूगल से इमेज सर्च करके डाल दी, फेसबुक अकाउंट ओपन हो गया। फिर बुजुर्ग ने कहा- "बेटा कुछ अच्छे लोगो को ऐड कर दो।" लड़के ने कुछ अच्छे लोगो को रिक्वेस्ट सेंड कर दी। फिर बुजुर्ग ने अपने बेटे का नाम सर्च करवा के रिक्वेस्ट सेंड करवा दी। . लड़का जो वो कहते करता गया जब काम पूरा हो गया तो. उसने कहा....
"अंकल जी अब तो आप बता दीजिये आपने ये फेक अकाउंट  क्यों बनवाया?" बुजुर्ग की आँखे नम हो गयी, उनकी पत्नी की आँखों से तो  आँसू बहने लगे।  उन्होंने कहा- "मेरा एक ही बेटा है और शादी के बाद वो हमसे अलग रहने लगा। सालो बीत गए वो हमारे पास नहीं. आता। शुरू शुरू में हम उसके पास जाते थे तो वो नाराज हो जाता था। कहता आपको मेरी पत्नी पसंद नहीं करती। आप अपने घर में रहिये, हमें चैन से यहाँ रहने दीजिये। कितना अपमान. सहते इसलिए बेटे के यहाँ जाना छोड़ दिया। एक पोता है और एक प्यारी पोती है, बस उनको देखने का बड़ा मन करता है। किसी ने कहा कि फेसबुक में लोग अपने फैमिली की और फंक्शन की इमेज डालते है, तो सोचा फेसबुक में ही अपने बेटे से जुड़कर उसकी फैमिली के बारे में जान लेंगे. और अपने पोता पोती को भी देख लेंगे, मन को शांति मिल जाएगी। अब अपने नाम से तो अकाउंट बना नहीं सकते। वो हमें ऐड करेगा नहीं, इसलिए हमने ये फेक अकाउंट बनवाया।" बुजुर्ग दंपत्ति के नम आँखों को उनके पत्नी के बहते आँसुओं को देखकर उस लड़के का दिल भर आया और सोचने लगा कि माँ- बाप का दिल कितना बड़ा होता है जो औलाद के कृतघ्न होने के बाद भी उसे प्यार करते हैं और औलाद कितनी जल्दी माँ- बाप के प्यार और त्याग को भूल जाती है। 

Monday, May 16, 2016

बीतता हुए समय

एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी !

गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी क्योंकि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था।

गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ 
वैसे ही उसे याद आता,
कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा -
गिलहरी फिर काम पर लग जाती !

गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं पर उसे अखरोट याद आ जाता,
और वो फिर काम पर लग जाती !

ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था !

ऐसे ही समय बीतता रहा....

एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया !

गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के ?
पूरी जिन्दगी काम करते - करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे !

यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है !

इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है !
६० वर्ष की ऊम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है, तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है।

क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : -

कितनी इच्छायें मरी होंगी ?
कितनी तकलीफें मिली होंगी ?
कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे ?

क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके !

इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके।

इसलिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो।

Saturday, May 14, 2016

खुश होकर जियो

एक गिलहरी रोज अपने काम पर समय से आती थी और अपना काम पूरी मेहनत और ईमानदारी से करती थी !
गिलहरी जरुरत से ज्यादा काम कर के भी खूब खुश थी क्योंकि उसके मालिक, जंगल के राजा शेर ने उसे दस बोरी अखरोट देने का वादा कर रखा था।  गिलहरी काम करते करते थक जाती थी तो सोचती थी कि थोडी आराम कर लूँ   वैसे ही उसे याद आता,  कि शेर उसे दस बोरी अखरोट देगा -  गिलहरी फिर काम पर लग जाती !
गिलहरी जब दूसरे गिलहरीयों को खेलते देखती थी तो उसकी भी इच्छा होती थी कि मैं भी खेलूं पर उसे अखरोट याद आ जाता,  और वो फिर काम पर लग जाती !   ऐसा नहीं कि शेर उसे अखरोट नहीं देना चाहता था, शेर बहुत ईमानदार था !   ऐसे ही समय बीतता रहा....   एक दिन ऐसा भी आया जब जंगल के राजा शेर ने गिलहरी को दस बोरी अखरोट दे कर आज़ाद कर दिया !   गिलहरी अखरोट के पास बैठ कर सोचने लगी कि अब अखरोट मेरे किस काम के ?  पूरी जिन्दगी काम करते - करते दाँत तो घिस गये, इन्हें खाऊँगी कैसे ! यह कहानी आज जीवन की हकीकत बन चुकी है !  इन्सान अपनी इच्छाओं का त्याग करता है, पूरी ज़िन्दगी नौकरी, व्योपार, और धन कमाने में बिता देता है !  ६० वर्ष की ऊम्र में जब वो सेवा निवृत्त होता है, तो उसे उसका जो फन्ड मिलता है, या बैंक बैलेंस होता है, तो उसे भोगने की क्षमता खो चुका होता है, तब तक जनरेशन बदल चुकी होती है, परिवार को चलाने वाले बच्चे आ जाते है। क्या इन बच्चों को इस बात का अन्दाजा लग पायेगा की इस फन्ड, इस बैंक बैलेंस के लिये : -   कितनी इच्छायें मरी होंगी ?  कितनी तकलीफें मिली होंगी ?  कितनें सपनें अधूरे रहे होंगे ?
क्या फायदा ऐसे फन्ड का, बैंक बैलेंस का, जिसे पाने के लिये पूरी ज़िन्दगी लग जाये और मानव उसका भोग खुद न कर सके ! इस धरती पर कोई ऐसा अमीर अभी तक पैदा नहीं हुआ जो बीते हुए समय को खरीद सके।
इसलिए हर पल को खुश होकर जियो व्यस्त रहो, पर साथ में मस्त रहो सदा स्वस्थ रहो।

Friday, May 13, 2016

उसकी प्रार्थनाऐं

एक गरीब आदमी राह पर चलते भिखारियों को देखकर हमेंशा दु:खी होता और भगवान से प्रार्थना करता कि:
हे भगवान! मुझे इस लायक तो बनाता कि मैं इन बेचारे भिखारियों को कम से कम 1 रूपया दे सकता।
भगवान ने उसकी सुन ली और उसे एक अच्‍छी Multi-National Company में कम्‍पनी में Job मिल गई। अब उसे जब भी कोई भिखारी दिखाई देता, वह उन्‍हें 1 रूपया अवश्‍य देता, लेकिन वह 1 रूपया देकर सन्‍तुष्‍ट नहीं था। इसलिए वह जब भी भिखारियों को 1 रूपए का दान देता, ईश्‍वर से प्रार्थना करता कि:
हे भगवान! 1 रूपए में इन बेचारों का क्‍या होगा? कम से कम मुझे ऐसा तो बनाता कि मैं इन बेचारे भिखारियों को 10 रूपया दे सकता। एक रूपए में आखिर होता भी क्‍या है।
संयोग से कुछ समय बाद उसी MNC में उसकी तरक्‍की हो गई और वह उसी कम्‍पनी में Manager बन गया, जिससे उसका Standard High होगा। उसने अच्‍छी सी महंगी Car खरीद ली, बडा घर बनवा लिया। फिर भी उसे जब भी कोई भिखारी दिखाई देता, वह अपनी अपनी कार रोककर उन्‍हें 100 रूपया दे देता, मगर फिर भी उसे खुशी नहीं थी। वह अब भी भगवान से प्रार्थना करता कि:
100 रूपए में इन बेचारों का क्‍या भला होता होगा? काश मैं ऐसा बन पाता कि जो भी भिखारी मेरे सामने से गुजरता, वो भिखारी ही न रह जाता।
संयोग से नियति ने फिर उसका साथ दिया और वो Corporate जगत का Chairman चुन लिया गया। अब उसके पास धन की कोई कमी नहीं थी। मंहगी Car, बंगला, First Class AC Rail Ticket आदि उसके लिए अब पुरानी बातें हो चुकी थीं। अब वह हमेंशा अपने स्‍वयं के Private हवाई जहाज में ही सफर करता था और एक शहर से दूसरे शहर नहीं बल्कि एक देश से दूसरे देश में घूमता था, लेकिन उसकी प्रार्थनाऐं अभी भी वैसी ही थीें, जैसी तब थीं, जब वह एक गरीब व्‍यक्ति था।

Wednesday, May 11, 2016

मार्गदर्शक

दोस्तों आप दुनिया के सबसे अमिर इन्सान को जानते ही होगे उनका नाम है ‘बिल गेट्स’, एक दिन बिल गेट्स् एक होटल उनके दोस्त के साथ मै खाना खाने गये, खाना खाने बाद वह काम करने वाला वेटर बिल लेकर आया तभी बिल गेट्स् ने खाये हुये खाने का बिल दिया और साथ मे अच्छी सर्विस देने के लिए वेटर 10 डॉलर टिप भी दी, और वहा से निकालने लगे लेकिन वेटर उनके तरफ देखता रहा और वो बात गेट्स के समज में आयी बिल गेट्स् ने इसके लिये वेटर को पूछा – क्यू भाई क्या हुआ तुम मुझे ऐसे घुर क्यू रहे हो…. ?
तो वेटर ने जवाब दिया – की अभी कुछ दिन पहले की ही बात है हमारे यहाँ इसी होटल में आपकी बेटी आयी थी उसने और उसके कुछ दोस्तों ने यहाँ खाना खाया था, और जाते वक्त मुझे टिप में 100 डॉलर दिये थे, और आप उनके पिता दुनिया के सबसे अमीर इन्सान होकर भी मुझे केवल 10 डॉलर टिप दी है.
तभी थोडा हसकर बिल गेट्स् जी ने जवाब दिया – हां भाई, क्योकि वो दुनिया के सबसे आमिर इन्सान कि बेटी है और मै एक गरीब इन्सान का बेटा हूं.
मुझे मेरा अतीत हमेशा याद रहता है, क्योकि वह मेरा मार्गदर्शक है और मैं उसे कभी नहीं भूलता.

Saturday, April 23, 2016

अत्यधिक लाभ का फल

एक बार पंक्षियों का राजा अपने दल के साथ भोजन की खोज में एक जंगल में गया।

'जाओ और जाकर दाने और बीज ढूंढ़ो। मिले तो बताना। सब मिलकर खाएगें।' राजा ने पंक्षियों को आदेश दिया।
सभी पक्षी दानों की तलाश में उधर निकल पड़े। उड़ते-उड़ते एक चिड़िया उस सड़क पर आ गई जहां से गाड़ियों में लदकर अनाज जाता था। उसने सड़क पर अनाज बिखरा देखा। उसने सोचा कि वह राजा को इस जगह के बारे में नहीं बताएगी। पर किसी और चिड़िया ने इधर आकर यह अनाज देख लिया तो...? ठीक है, बता भी दूंगी लेकिन यहां तक नहीं पहुंचने दूंगी।
वह वापस अपने राजा के पास पहुंच गई। उसने वहां जाकर बताया कि राजमार्ग पर अनाज के ढेरों दाने पड़े हैं। लेकिन वहां खतरा बहुत है।
तब राजा ने कहा कि कोई भी वहां न जाए।
इस तरह सब पक्षियों ने राजा की बात मान ली।
वह चिड़िया चुपचाप अकेली ही राजमार्ग की ओर उड़ चली और जाकर दाने चुगने लगी। अभी कुछ ही देर बीती कि उसने देखा एक गाड़ी तेजी से आ रही थी।
चिड़िया ने सोचा, गाड़ी तो अभी दूर है। क्यों न दो-चार दाने और चुग लूं। देखते-देखते गाड़ी चिड़िया के उपर से गुजर गई और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
उधर शाम को राजा ने देखा कि वह चिड़िया नहीं आई है तो उसने सैनिकों को उसे ढूंढ़ने का आदेश दिया।
वे सब ढूंढ़ते-ढूंढ़ते राजमार्ग पर पहुंच गए। वहां देखा तो वह चिड़िया मरी पड़ी थी।

Friday, April 22, 2016

समझ का फेर

अकबर-बीरबल की नोकझोंक चलती ही रहती थी। बादशाह को हंसी-मजाक से  बड़ा प्रेम था। इसी कारण बात-बात में उनमें और बीरबल में हंसी के प्रसंग छिड़ जाया करते थे।

हंसी-मजाक में अकबर बादशाह क्रोधित भी हो जाते थे, किंतु बीरबल कभी क्रोधित नहीं होते थे। इस बात को मन में विचारकर बादशाह ने बीरबल को क्रोधित करने की नई युक्ति निकाली और बोले- 'बीरबल गाय रांधत।'

उत्तर में बीरबल ने कहा- 'बादशाह शुकर खाए।'

बादशाह की बात से बीरबल तो क्रोधित न हुए, पर बीरबल की बात से बादशाह क्रोधित अवश्य हो गए। वह भड़कर बोले - 'तुम मुझे मजाक के बहाने शुकर खिलाते हो?'

'हुजूर आप भी तो मुझे गाय खिलाते हो।'

बादशाह अपने वाक्य का अर्थ बदलकर बोले- 'हमने तुम्हें रांधते वक्त गाने को कहा था।'

तत्काल बीरबल ने भी प्रत्युत्तर मे कहा - 'आलमपनाह! मैंने भला शूकर खाने को कब कहा?'

'तो फिर.....।'

'मैं तो कह रहा था, बादशाह शुक रखाए अर्थात आपने तोता रखा हुआ है। सिर्फ समझ का ही हेर-फेर है। आप बिना अर्थ समझे अकारण क्रोधित होते हैं।' बादशाह निरूत्तर हो गए।

Monday, April 11, 2016

लालच का फल

एक बार पंक्षियों का राजा अपने दल के साथ भोजन की खोज में एक जंगल में गया।
'जाओ और जाकर दाने और बीज ढूंढ़ो। मिले तो बताना। सब मिलकर खाएगें।' राजा ने पंक्षियों को आदेश दिया।
सभी पक्षी दानों की तलाश में उधर निकल पड़े। उड़ते-उड़ते एक चिड़िया उस सड़क पर आ गई जहां से गाड़ियों में लदकर अनाज जाता था। उसने सड़क पर अनाज बिखरा देखा। उसने सोचा कि वह राजा को इस जगह के बारे में नहीं बताएगी। पर किसी और चिड़िया ने इधर आकर यह अनाज देख लिया तो...? ठीक है, बता भी दूंगी लेकिन यहां तक नहीं पहुंचने दूंगी।
वह वापस अपने राजा के पास पहुंच गई। उसने वहां जाकर बताया कि राजमार्ग पर अनाज के ढेरों दाने पड़े हैं। लेकिन वहां खतरा बहुत है।
तब राजा ने कहा कि कोई भी वहां न जाए।
इस तरह सब पक्षियों ने राजा की बात मान ली।
वह चिड़िया चुपचाप अकेली ही राजमार्ग की ओर उड़ चली और जाकर दाने चुगने लगी। अभी कुछ ही देर बीती कि उसने देखा एक गाड़ी तेजी से आ रही थी।
चिड़िया ने सोचा, गाड़ी तो अभी दूर है। क्यों न दो-चार दाने और चुग लूं। देखते-देखते गाड़ी चिड़िया के उपर से गुजर गई और उसके प्राण पखेरू उड़ गए।
उधर शाम को राजा ने देखा कि वह चिड़िया नहीं आई है तो उसने सैनिकों को उसे ढूंढ़ने का आदेश दिया।
वे सब ढूंढ़ते-ढूंढ़ते राजमार्ग पर पहुंच गए। वहां देखा तो वह चिड़िया मरी पड़ी थी।
राजा ने कहा, 'इसने हम सबको तो मना किया था किंतु लालचवश वह अपने को नहीं रोक पाई और प्राणों से हाथ धो बैठी।'

Thursday, April 7, 2016

कर्त्तव्य के प्रति निष्ठा

संधि का प्रस्ताव असफल होने पर जब क्षीकृष्ण हस्तिनापुर लौट चले, तब, महारथी कर्ण उन्हें सीमा तक विदा करने आए। मार्ग में कर्ण को समझाते हुए क्षीकृष्ण ने कहा - 'कर्ण, तुम सूतपुत्र नहीं हो। तुम तो महाराजा पांडु और देवी कुंती के सबसे बड़े पुत्र हो। यदि दुर्योधन का साथ छोड़कर पांडवों के पक्ष में आ जाओं तो तत्काल तम्हारा राज्याभिषेक कर दिया जाएगा।'
यह सुनकर कर्ण ने उत्तर दिया- 'वासुदेव, मैं जानता हूँ कि मैं माता कुंती का पुत्र हूँ, किन्तु जब सभी लोग सूतपुत्र कहकर मेरा तिरस्कार कर रहे थे, तब केवल दुर्योधन ने मुझे सम्मान दिया। मेरे भरोसे ही उसने पांडवों को चुनौती दी है। क्या अब उसके उपकारों को भूलकर मैं उसके साथ विश्वघात करूं? ऐसा करके क्या मैं अधर्म का भागी नहीं बनूंगा? मैं यह जानता हूँ कि युद्ध में विजय पांडवों की होगी, लेकिन आप मुझे अपने कर्त्तव्य से क्यों विमुख करना चाहते हैं?' कर्त्तव्य के प्रति कर्ण की निष्ठा ने क्षीकृष्ण को निरूत्तर कर दिया।
इस प्रसंग में कर्त्तव्य के प्रति निष्ठा व्यक्ति के चरित्र को दृढ़ता प्रदान करती है और उस दृढ़ता को बड़े-से-बड़ा प्रलोभन भी शिथील नहीं कर पाता, यानि वह चरित्रवान व्यक्ति 'सेलेबिल'  नहीं बन पाता। इसके अतिरिक्त इसमें धर्म के प्रति आस्था और निर्भीकता तथा आत्म सम्मान का परिचय मिलता है, जो चरित्र की विशेषताएं मानी जाती हैं।

Wednesday, April 6, 2016

आरक्षण का परिणाम

एक समय की बात है एक चींटी और एक टिड्डा था .
गर्मियों के दिन थे, चींटी दिन भर मेहनत करती और अपने रहने के लिए घर को बनाती, खाने के लिए भोजन भी इकठ्ठा करती जिस से की सर्दियों में उसे खाने पीने की दिक्कत न हो और वो आराम से अपने घर में रह सके !!
जबकि  टिड्डा दिन भर मस्ती करता गाना गाता और  चींटी को बेवकूफ समझता !!
मौसम बदला और सर्दियां आ गयीं !!
 चींटी अपने बनाए मकान में आराम से रहने लगी उसे खाने पीने की कोई दिक्कत नहीं थी परन्तु
 टिड्डे के पास रहने के लिए न घर था और न खाने के लिए खाना !!
वो बहुत परेशान रहने लगा .
दिन तो उसका जैसे तैसे कट जाता परन्तु ठण्ड में रात काटे नहीं कटती !!

एक दिन टिड्डे को उपाय सूझा और उसने एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई.
सभी  न्यूज़ चैनल वहां पहुँच गए !

 टिड्डे ने कहा कि ये कहाँ का इन्साफ है की एक देश में एक समाज में रहते हुए  चींटियाँ तो आराम से रहें और भर पेट खाना खाएं और और हम टिड्डे ठण्ड में भूखे पेट ठिठुरते रहें ..........?

मिडिया ने मुद्दे को जोर - शोर से उछाला, और जिस से पूरी विश्व बिरादरी के कान खड़े हो गए.... !
बेचारा  टिड्डा सिर्फ इसलिए अच्छे खाने और घर से महरूम रहे की वो गरीब है और जनसँख्या में कम है बल्कि  चीटियाँ बहुसंख्या में हैं और अमीर हैं तो क्या आराम से जीवन जीने का अधिकार उन्हें मिल गया !
बिलकुल नहीं !!
ये  टिड्डे के साथ अन्याय है !
 इस बात पर कुछ समाजसेवी,  चींटी के घर के सामने धरने पर बैठ गए तो कुछ भूख हड़ताल पर,
कुछ ने  टिड्डे के लिए घर की मांग की.
कुछ राजनीतिज्ञों ने इसे पिछड़ों के प्रति अन्याय बताया.

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने  टिड्डे के वैधानिक अधिकारों को याद दिलाते हुए भारत सरकार की निंदा की !

सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर
  टिड्डे के समर्थन में बाड़ सी आ गयी, विपक्ष के नेताओं ने भारत बंद का एलान कर दिया. कमुनिस्ट पार्टियों ने समानता के अधिकार के तहत  चींटी पर "कर" लगाने और  टिड्डे को अनुदान की मांग की,

एक नया क़ानून लाया गया "पोटागा" (प्रेवेंशन ऑफ़ टेरेरिज़म अगेंस्ट ग्रासहोपर एक्ट).
  टिड्डे के लिए आरक्षण की व्यवस्था कर दी गयी.

अंत में पोटागा के अंतर्गत🐜 चींटी पर फाइन लगाया गया उसका घर सरकार ने अधिग्रहीत कर टिड्डे को दे दिया ....!
इस प्रकरण को मीडिया ने पूरा कवर किया और   टिड्डे को इन्साफ दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की  !!
समाजसेवकों ने इसे समाजवाद की स्थापना कहा तो किसी ने न्याय की जीत, कुछ राजनीतिज्ञों ने उक्त शहर का नाम बदलकर  "टिड्डा नगर" कर दिया !
रेल मंत्री ने  "टिड्डा रथ" के नाम से नयी रेल चलवा दी और कुछ नेताओं ने इसे समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन की संज्ञा दी ।।
 चींटी भारत छोड़कर अमेरिका चली गयी और वहां उसने फिर से मेहनत की और एक कंपनी की स्थापना की जिसकी दिन रात
 तरक्की होने लगी तथा अमेरिका के विकास में सहायक सिद्ध हुई !!
चींटियाँ मेहनत करतीं रहीं और टिड्डे खाते रहे ........!
फलस्वरूप धीरे धीरे  चींटियाँ भारत छोड़कर जाने लगीं और  टिड्डे झगड़ते रहे ........!
 एक दिन खबर आई की अतिरिक्त आरक्षण की मांग को लेकर सैंकड़ों  टिड्डे मारे गए.........!

ये सब देखकर अमेरिका में बैठी  चींटी ने कहा " इसीलिए शायद भारत आज भी विकासशील देश है"

चिंता का विषय:

जिस देश में लोगो में "पिछड़ा" बनने की होड़ लगी हो वो "देश" आगे कैसे बढेगा...

Tuesday, April 5, 2016

मृत्यु तो जीवन का अभिन्न अंग

एक बहुत ही सिद्ध और सच्चे गुरू थे। सदैव प्रसन्न रहते थे। एक दिन एक शिष्य ने पूछा, 'महाराज आपको कभी अप्रसन्न नहीं देखा, आप कैसे हमेशा प्रश्न्न रह पाते हैं?' संत ने उत्तर दिया, 'मैं अपनी प्रसन्नता से पहले तुम्हारे बारे में कुछ बताना चाहता हूँ।' 'मेरे बारे में!' शिष्य ने आश्चर्य से पूछा। संत ने कहा, 'हाँ, तुम्हारे बारे में। दरअसल तुम आज से एक सप्ताह बाद ही मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे।' यह भविष्यवाणी सुनकर शिष्य सन्न रह गया। उसके मन पर इसका बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और उसी दिन उसके स्वभाव में आर्श्यजनक परिवर्तन आ गया। वह छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठ गया। सभी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करने लगा, उसके मन में उदारता ने जन्म ले लिया। अचानक एक सप्ताह बाद वह संध्या कर रहा था, उसके मन में मृत्यु की कल्पना थी। तभी वह संत वहाँ आ गए और उन्होनें उससे पूछा, 'कहो, कैसा लग रहा है?' शिष्य ने शांत-भाव से उत्तर दिया, 'महाराज! इस पूरे सप्ताह मुझे किसी पर क्रोध नहीं आया। कड़वा भी नहीं बोला, बल्कि सबके साथ प्रेमपूर्वक रहा। सोचा, क्यों थोड़े से समय के लिए बुराई का टोकरा अपने सिर पर उठाऊं।' संत ने कहा, 'मैं तुम्हारी मृत्यु की भविष्यवाणी इसीलिए की थी कि तुम जान सको कि मृत्यु को याद रखने वाला क्रोध, घृणा व ईष्या आदि के बारे में सोचता भी नहीं और यही मेरे प्रसन्न रहने का कारण है। जाओ प्रसन्न रहो, अभी तुम्हारी काफी आयु शेष है।
मृत्यु तो जीवन का अभिन्न अंग है, इससे डरना क्या? इसे याद रखकर हम भय मुक्त रहना सीखते हैं और तब जीवन में कुछ अच्छाइयों को ग्रहण कर बहुत-सी बुराइयों से दूर रह सकते हैं, जैसे कि हमने इस प्रसंग में देखा है।

जब तक मन में भय रहता है, तब तक आत्मा परिपूर्ण नहीं रह सकती और आप सुखी जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। उसकी चिंता-सोच में आप डूबे रहेंगे। आवश्यकता इस बात की है कि आप अपनी सोच में बदलाव लाएं, सकारात्मक नजरिया बनाएं। भय को सम्भलकर चलने की प्रेरणास्वरूप मानें। जो घटना होनी है, उसे टाला नहीं जा सकता- यह प्रकृति का नियम है। अतएव सकारात्मक दृष्टि से आप हर परिस्थिति को खुशी से स्वीकार कर उसी में आनंद की अनुभूती लें। इसी में आपका भयमुक्त जीवन है।

Monday, April 4, 2016

बेसहारा की मदद

ऑफिस से निकल कर शर्माजी ने   स्कूटर स्टार्ट किया ही था कि उन्हें याद आया,  पत्नी ने कहा था,१ दर्ज़न केले लेते  आना।  तभी उन्हें सड़क किनारे बड़े और ताज़ा केले बेचते हुए   एक बीमार सी दिखने वाली बुढ़िया दिख गयी। .
वैसे तो वह फल हमेशा "राम आसरे फ्रूट भण्डार" से   ही लेते थे,  पर आज उन्हें लगा कि क्यों न   बुढ़िया से ही खरीद लूँ ?   उन्होंने बुढ़िया से पूछा, "माई, केले कैसे दिए"  बुढ़िया बोली, बाबूजी बीस रूपये दर्जन,   शर्माजी बोले, माई १५ रूपये दूंगा।  बुढ़िया ने कहा, अट्ठारह रूपये दे देना,   दो पैसे मै भी कमा लूंगी।  शर्मा जी बोले, १५ रूपये लेने हैं तो बोल,   बुझे चेहरे से बुढ़िया ने,"न" मे गर्दन हिला दी।  शर्माजी बिना कुछ कहे चल पड़े और राम आसरे फ्रूट भण्डार पर आकर   केले का भाव पूछा तो वह बोला २४ रूपये दर्जन हैं  बाबूजी, कितने दर्जन दूँ ?   शर्माजी बोले, ५ साल से फल तुमसे ही ले रहा हूँ,   ठीक भाव लगाओ।  तो उसने सामने लगे बोर्ड की ओर इशारा कर दिया।   बोर्ड पर लिखा था- "मोल भाव करने वाले माफ़ करें"   शर्माजी को उसका यह व्यवहार बहुत बुरा लगा,   उन्होंने कुछ  सोचकर स्कूटर को वापस   ऑफिस की ओर मोड़ दिया।  सोचते सोचते वह बुढ़िया के पास पहुँच गए। बुढ़िया ने उन्हें पहचान लिया और बोली,  "बाबूजी केले दे दूँ, पर भाव १८ रूपये से कम नही लगाउंगी।   शर्माजी ने मुस्कराकर कहा,   माई एक  नही दो दर्जन दे दो और भाव की चिंता मत करो।  बुढ़िया का चेहरा ख़ुशी से दमकने लगा।   केले देते हुए बोली। बाबूजी मेरे पास थैली नही है ।   फिर बोली, एक टाइम था जब मेरा आदमी जिन्दा था  तो मेरी भी छोटी सी दुकान थी।   सब्ज़ी, फल सब बिकता था उस पर।   आदमी की बीमारी मे दुकान चली गयी,   आदमी भी नही रहा। अब खाने के भी लाले पड़े हैं।   किसी तरह पेट पाल रही हूँ। कोई औलाद भी नही है  जिसकी ओर मदद के लिए देखूं।   इतना कहते कहते    बुढ़िया रुआंसी हो गयी,   और उसकी आंखों मे आंसू आ गए ।  शर्माजी ने ५० रूपये का नोट बुढ़िया को दिया तो वो बोली "बाबूजी मेरे पास छुट्टे नही हैं।  शर्माजी बोले "माई चिंता मत करो, रख लो,   अब मै तुमसे ही फल खरीदूंगा,
और कल मै तुम्हें ५०० रूपये दूंगा।   धीरे धीरे चुका देना और परसों से बेचने के लिए   मंडी से दूसरे फल भी ले आना।
बुढ़िया कुछ कह पाती उसके पहले ही   शर्माजी घर की ओर रवाना हो गए।   घर पहुंचकर उन्होंने पत्नी से कहा, न जाने क्यों हम हमेशा मुश्किल से   पेट पालने वाले, थड़ी लगा कर सामान बेचने वालों से   मोल भाव करते हैं किन्तु बड़ी दुकानों पर   मुंह मांगे पैसे दे आते हैं।   शायद हमारी मानसिकता ही बिगड़ गयी है।   गुणवत्ता के स्थान पर हम चकाचौंध पर   अधिक ध्यान देने लगे हैं।  अगले दिन शर्माजी ने बुढ़िया को ५०० रूपये देते हुए कहा,   "माई लौटाने की चिंता मत करना।   जो फल खरीदूंगा, उनकी कीमत से ही चुक जाएंगे।  जब शर्माजी ने ऑफिस मे ये किस्सा बताया तो   सबने बुढ़िया से ही फल खरीदना प्रारम्भ कर दिया। तीन महीने बाद ऑफिस के लोगों ने स्टाफ क्लब की ओर से बुढ़िया को एक हाथ ठेला भेंट कर दिया।   बुढ़िया अब बहुत खुश है।   उचित खान पान के कारण उसका स्वास्थ्य भी पहले से बहुत अच्छा है ।   हर दिन शर्माजी और ऑफिस के   दूसरे लोगों को दुआ देती नही थकती।   शर्माजी के मन में भी अपनी बदली सोच और एक असहाय निर्बल महिला की सहायता करने की संतुष्टि का भाव रहता है..!

जीवन मे किसी बेसहारा की मदद करके देखो यारों,

अपनी पूरी जिंदगी मे किये गए सभी कार्यों से

ज्यादा संतोष मिलेगा...!!
 

Sunday, April 3, 2016

लकड़हारे की ईमानदारी

किसी समय एक वृद्ध लकड़हारा नदी के किनारे पेड़ काट रहा था। दुर्भाग्य से उसकी कुल्हाड़ी नदी में गिर गई। बेचारे लकड़हारे ने कुल्हाड़ी की खूब तलाश की, लेकिन कोई सफलता नहीं मिली। उसके पास एक पैसा भी न था, इसलिए वह दूसरी कुल्हाड़ी नहीं खरीद सकता था। असहाय होकर वह फूट-फूट कर रोने लगा।
जल के देवता वरूण ने उसका रूदन सुना। उन्हें लकड़हारे पर दया आ गई। वे लकड़हारे के पास आए और उससे पूछा, ‘तुम इतना फूट-फूट कर क्यों रो रहे हो? 'लकड़हारे ने कहा, ‘मेरी कुल्हाड़ी पानी में गिर, गई और न जाने कहां खो गई है।'
वरूण देवता ने पानी में डुबकी लगाई और एक साने की कुल्हाड़ी लेकर आ गए। वरूण देवता ने पूछा, 'क्या यह तुम्हारी है?' 'नहीं, श्रीमान्!' लकड़हारे ने रोते-रोते उत्तर दिया। देवता ने पानी में छलांग लगाई और अब चांदी की कुल्हाड़ी ले आए। 'क्या यह तुम्हारी है?‘ देवता ने पूछा। ‘मेरी कुल्हाड़ी इतनी सफेद नहीं थी।‘ उसने कहा, ‘वह काले रंग की थी। उसी के सहारे मेरी रोजी चलती थी। मैं अब असहाय हो गया हूं।'
जल के देवता ने तीसरी बार पानी में डुबकी लगाई और इस बार लकड़हारे की कुल्हाड़ी लेकर आए। लकड़हारे की आंखे अपनी कुल्हाड़ी को देख एकदम चमक उठी। वह प्रसन्नता से चिल्ला उठा, 'यह मेरी है, ऐ मेरे देवता।'
वरूण देवता लकड़हारे की ईमानदारी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने उसे न केवल लोहे की कुल्हाड़ी दे दी, बल्कि साने और चांदी की कुल्हाड़ियां भी दे दी।

'हुजूर! मेरा हाजमा खराब है

एक बार बादशाह के पास शिकायत पहुंची कि उनका एक मालगुजारी अफसर बहुत गड़बड़ कर रहा है। वह रियाया (प्रजा) से कई गुना ज्यादा माल उगाहता है और ज्यादातर खुद हड़प् कर जाता है। जब अफसर को बुलाकर जांच की गई तो पाया गया कि बहीखातों में बहुत बड़ा घोटाला है। बादशाह ने न केवल उसकी सम्पत्ति जब्त कर ली बल्कि उसे विवश कर दिया कि वह बहीखाते के सारे कागज भी खाए।

प्रजा बादशाह के इस न्याय से बड़ी प्रसन्न हुई। पर बीरबल खुश नहीं हुए। हालांकि उस भ्रष्ट अफसर की जगह उन्हें मालगुजारी अफसर बना दिया गया था। उन्होंने सारा हिसाब-किताब खाखरों पर लिखना शुरू कर दिया। 

फिर एक रोज बादशाह ने सब खाते जांच के लिए मंगवाए तो बीरबल सारे खाखरे लेकर उपस्थित हुए।

बादशाह उन अजीब खाखरों को देखकर चकित हुए तो बीरबल ने स्पष्टीकरण पेश किया - 'हुजूर! मेरा हाजमा खराब है। मैंने सोचा कि क्या पता हिसाब-किताब में गड़बड़ी हो और हुजूर मुझे कागज खाने के लिए विवश करें तो जान से हाथ न धो बैठूं। इसलिए मैंने सारा हिसाब-किताब खाखरों पर लिखा है। यह कागज से जल्दी हज़म हो जाएगा।'

Friday, April 1, 2016

आदत से लाचार

एक बार एक डाकू गुरु नानक के पास गया और उनके चरणों में गिरकर बोला-'मैं अपने जीवन से परेशान हो गया हूं। जाने कितनों को मैंने लूटकर दुखी किया है। मुझे कोई रास्ता बताइए ताकि मैं इस बुराई से बच सकूं।'
गुरु नानक ने बड़े प्रेम से कहा- 'यदि तुम बुराई करना छोड़ दो तो बुराई से बच जाओगे।' गुरु नानक की बात सुनकर डाकू बोला-'अच्छी बात है, मैं कोशिश करूंगा।' यह कहकर वह वापस चला गया। कुछ दिन बीतने के बाद वह फिर उनके पास लौट आया और बोला-'मैंने बुराई छोड़ने की बहुत कोशिश की, लेकिन छोड़ नहीं पाया। अपनी आदत से मैं लाचार हूं। मुझे कोई अन्य उपाय बताइए।'
गुरु जी बोले-'अच्छा, ऐसा करो कि तुम्हारे मन में जो भी बात उठे, उसे कर डालो, लेकिन रोज-रोज दूसरे लोगों से कह दो।' डाकू को बड़ी खुशी हुई कि इतने बड़े संत ने जो मन में आए, सो कर डालने की आज्ञा दे दी। अब मैं बेधड़क डाका डालूंगा और दूसरों से कह दूंगा। यह तो बहुत आसान है। वह खुशी-खुशी उनके चरण छूकर घर लौट गया। कुछ दिनों बाद डाकू फिर उनके पास जा पहुंचा। गुरु नानक ने पूछा-'अब तुम्हारा क्या हाल है?'
डाकू बोला-'गुरुजी, आपने मुझे जो उपाय बताया था, मैंने उसे बहुत आसान समझा था, लेकिन वह तो निकला बड़ा मुश्किल। बुरा काम करना जितना मुश्किल है तो उससे कहीं अधिक मुश्किल है- दूसरों के सामने उसे कह पाना। इस काम में बहुत ज्यादा कष्ट होता है।' इतना कहकर डाकू चुप हो गया और फिर बोला-' गुरुजी इसलिए अब दोनों में से मैंने आसान रास्ता चुन लिया है। मैंने डाका डालना ही छोड़ दिया है।' गुरु नानक मुस्करा दिए।

भावना की हवाएे

दो मित्र रेगिस्तान में यात्रा कर रहे थे | सफ़र में किसी मुकाम पर उनका किसी बात पर विवाद हो गया | बात इतनी बढ़ गयी की एक मित्र ने दुसरे मित्र को थप्पड़ मार दिया | थप्पड़ खाने वाले मित्र को बहुत- बुरा लगा, लेकिन बिना कुछ कहे उनसे रेट में लेख, ‘आज मेरे घनिष्ट मित्र ने मुझे थप्पड़ मारा’ वे चलते रहे और एक नखलिस्तान (मरूस्थल के बीच हरित भूमि ) में आ पहुचे,जहां उन्होंने नहाने का फैसला किया | जिस व्यक्ति ने थप्पड़ खया था,नखलिस्तान ने नहाते-नहाते अचानक उसका पैर फिसला गया | वह दलदल से जितना बाहर निकलने की कोशिश करता, उतना ही उस दलदल में समाता जाता |
इस बार थप्पड़ मारने वाले मित्र ने उसे बचा लिया |
जब वह दलदल से सुरक्षित बाहर आ गया, तो उसें इस बार, एक पत्थर पर लिखा- “आज मेरे घनिष्ठ मित्र ने मेरी जान बचाई | ” इस पर उसके मित्र ने पुछा- “जब मैने तुम्हे मारा,तो तुमने उसे रेट पर लिखा और जब बचाया तो इसे पत्थर पर लिखा,ऐसा क्यों?” दुसरे मित्र ने कहा, “जब हमे कोई दुःख देता हैं,तब हमे उसे रेत पर लिखना चाहिए, ताकि शमा भावना की हवाए आकर इस कटु याद को मिटा दें |

वही,जब कोई हमारा भला करे,तब हमे उसे पत्थर पर लिखना चाहिए,ताकि कोई हवा उसे मिटा ना पाए | वह हमेशा के लिए लिखा रहे |