Tuesday, February 2, 2016

दुनिया का समस्त ज्ञान

एक बहुत पहुंचे हुए विद्धान थे। उनका एक शिष्य बड़ा जिज्ञासु प्रवृत्ति का था। वह अधिक से अधिक ज्ञान पाने के लिए प्रयत्नशील रहता था। एक दिन उसने अपने गुरुजी से प्रश्न किया,'क्या आपको समस्त दुनिया का ज्ञान है?' गुरु बोले,'नहीं वत्स, ज्ञान की कोई सीमा नहीं है। वह तो अपार है। वैसे किसी एक व्यक्ति के लिए विश्व का समस्त ज्ञान प्राप्त करना संभव भी नहीं है।'
गुरुजी ने समझाया, लेकिन शिष्य हठ कर बैठा, 'गुरुजी, चाहे जो भी हो, मैं तो दुनिया का समस्त ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूं। आप मुझ पर कृपा कीजिए और मुझे विश्व का समस्त ज्ञान-कोष दिखला दीजिए।' गुरुजी ने उसे कई तरह से समझाने की कोशिश की, किंतु शिष्य तो अपनी बात पर ही अड़ा रहा। इस पर गुरुदेव ने कुछ देर विचार किया, फिर उसे ले संसार के ज्ञान-ग्रंथों का विशाल भंडार दिखाने चल दिए।
शिष्य गुरुजी की कृपा से कृतज्ञ हो गया। वह उन ज्ञान-ग्रंथों को पढ़ने में लग गया। बरसों बीत गए, किंतु लगातार पढ़ते रहने पर भी अनगिनत ग्रंथ शेष रह गए। उधर उसके गुरुदेव समय के साथ वृद्ध हो चले। लेकिन, शिष्य की ज्ञान-पिपासा शांत ही न होती थी। एक दिन गुरुदेव मृत्यु शैया पर जा पहुंचे। शिष्य ने उनका अंत निकट देख दुख भरे शब्दों में कहा,'गुरुदेव, आप इस प्रकार चले जाएंगे तो मुझे शेष ज्ञान-ग्रंथों का परिचय कौन देगा?'
अब गुरुदेव ने ज्ञान भंडार का रहस्य बताते हुए कहा- 'वत्स, तुमने अब तक जो ज्ञान प्राप्त किया है, वह तो कुछ विशेष नहीं है। ज्ञान-ग्रंथों से करोड़ों गुना ज्ञान तो इस संसार में यों ही बिखरा पड़ा है। लेकिन याद रखो, व्यावहारिक स्तर पर प्राप्त ज्ञान ही सर्वोपरि है। ज्ञान तो अपार है। उसे कितना भी प्राप्त करो, कम ही है। वस्तुतः ज्ञान की कोई सीमा नहीं है।'

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