Monday, December 21, 2015

आज्ञाकारी पुत्र

महात्मा गाँधी जी बचपन से ही सत्य और अहिंसा का पालन करते थे। कभी झूठ नहीं बोलते थे, कभी गलत काम नहीं करते थे। ये बातें उन्होंने अपनी माँ से सीखी थीं। जानते हो उन्होंने एक बार माँ को भी सच का पाठ पढ़ाया था।
2 अक्टूबर, 1869 को करमचंद गाँधी के घर पुत्र का जन्म हुआ। शिशु का नाम मोहनदास रखा गया। उसकी माँ पुतलीबाई प्यार से मोहन को मोनिया कहकर पुकारतीं। मोहन भी अपनी माँ को बहुत चाहता था। माँ की हर बात ध्यान से सुनता और उसे पूरा करने की कोशिश करता। बचपन से मोहन की बुद्धि बहुत तेज थी। वह सवाल पूछ-पूछ कर माँ को परेशान कर डालता। मोहन के घर में एक कुआँ था। कुएँ के चारों ओर पेड़-पौधे लगे हुए थे। कुएँ के कारण बच्चों को पेड़ पर चढ़ना मना था। मोहन सबकी आँख बचा, जब-तब पेड़ पर चढ़ जाता। एक दिन उसके बड़े भाई ने मोहन को कुएँ के पास वाले पेड़ पर चढे़ देखा। उन्होंने मोहन से कहा-
 ”मोहन, तुझे पेड़ पर चढ़ने को मना किया था। पेड़ पर क्यों चढ़ा है, चल नीचे उतर।“
 ”नहीं, हम नहीं उतरेंगे। हमें पेड़ पर मजा आ रहा है।“
क्रोधित भाई ने मोहन को चाँटा मार दिया रोता हुआ मोहन माँ के पास पहुं.चा और बड़े भाई की शिकायत करने लगा।

”माँ, बड़े भइया ने हमें चाँटा मारा। तुम भइया को डाँटो।“

माँ काम में उलझी हुई थी। मोहन माँ से बार-बार भाई को डाँटने की बात कहता गया। तंग आकर माँ कह बैठी-

”उसने तुझे मारा है न? जा, तू भी उसे मार दे। मेरा पीछा छोड़, मोनिया। तंग मत कर।“

आँसू पोंछ मोहन ने कहा-

”यह तुम क्या कह रही हो, माँ? तुम तो कहती हो अपने से बड़ों का आदर करना चाहिए। भइया मुझसे बड़े हैं। मैं बड़े भइया पर हाथ कैसे उठा सकता हूँ? हाँ तुम भइया से बड़ी हो। तुम उन्हें समझा सकती हो कि वह मुझे न मारें।“

मोहन की बात सुन, माँ को अपनी भूल समझ में आ गई। हाथ का काम छोड़, माँ ने मोहन को सीने से चिपटा लिया। उनकी आँखों से खुशी के आँसू बह चले-

”तू मेरा राजा बेटा है, मोनिया। आज तूने अपनी माँ की भूल बता दी। हमेशा सच्चाई और ईमानदारी की राह पर चलना, मेरे लाल।“

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