Monday, November 2, 2015

झगड़े की जड़

मुंबई में दो भाई अपने पिता के साथ रहते थे। एक दिन पिता का निधन हो गया। भाइयों ने आपस में बंटवारा किया। करोड़ों की संपत्ति दोनों के हिस्से में आई। दोनों के अलग-अलग मकान थे। एक भाई के हिस्से में सुपारी का पेड़ लगा था। दूसरे भाई के बंगले में उसकी शाखाएं झुकी हुई थीं। वह पेड़ झगड़े का कारण बन गया। दूसरे भाई ने कहा, 'उसके फल मेरे घर की सीमा में हैं, इसलिए मैं लूंगा।' इस बात को लेकर तनातनी बढ़ गई।
मामला कोर्ट में जा पहुंचा। जज अनुभवी था। उसने कहा, 'मैं स्वयं सारी स्थिति को देखूंगा, उसके बाद ही फैसला सुनाऊंगा।' उसने वहां जाकर निरीक्षण किया और कुछ मजदूरों को बुलाकर सुपारी का पेड़ कटवाकर उसे समुद्र में फिंकवा दिया। इस पर दोनों भाई बोले, 'जज साहब, यह आपने क्या किया?' जज बोला,'मैंने झगड़े की जड़ को ही मिटा दिया है।
जब हम इस घटना के बारे में सोचते हैं, तब लगता है कि इतनी-सी बात के लिए झगड़ा क्यों होता है। आकर्षण और राग का धागा इसका कारण बनता है। पेड़ अलग था, मालिक अलग था, पर पेड़ में अभिन्नता का इतना आरोपण कर दिया कि पेड़ को अलग मानना संभव नहीं रह गया।' दोनों भाई समझ गए कि पेड़ को अपने आप में समाहित किया और संघर्ष हो गया।
बात कोई छोटी या बड़ी नहीं होती। जिस बात को आदमी अपने में आरोपित कर लेता है, जिसके साथ तादात्म्य और अभेद स्थापित कर लेता है, उसके लिए संघर्ष का बीज बो देता है। यदि मनुष्य अपने में थोड़ी संत प्रवृत्ति ले आए और राग से खुद को बचाए तो उसका भला हो सकता है।

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