Monday, October 12, 2015

राजा और लकड़हारा

राजा यशकीर्ति नित्य छद्म वेश में रात्रिभ्रमण को निकलते। एक बार एक गांव में भ्रमण करते हुए उन्होंने देखा कि कुछ युवक एक खेल खेल रहे हैं। एक युवक राजा बना बैठा था। शेष सभासद के रूप में थे।

युवक बोला, 'सभासदो, जिस राज्य के कर्मचारी सदैव वैभव-विलास में डूबे रहते हों, उसका राजा कितना ही नेक और प्रजावत्सल क्यों न हो, प्रजा सुखी नहीं रह सकती। यशकीर्ति के राज्याधिकारी जो भूल कर रहे हैं, वह तुम सब मत करना।'
राजा यशकीर्ति उस युवक के विचारों से इतना प्रभावित हुए कि उसे अपने साथ ले आए और अपना महामंत्री बना लिया। सुकेश नाम का वह युवक एक लकड़हारा था। वह अपने साथ एक कुल्हाड़ी, बिछौना और अंगोछा भी लाया था। राज्य के इस नए महामंत्री ने समस्त मंत्रियों, सामंतों और कर्मचारियों के लिए एक सख्त आचार-संहिता बनाई।
अब सभी को 10 घंटे काम नित्य करना पड़ता था। राजकोष का धन प्रजा की भलाई में लगने लगा। कुछ सभासद सुकेश के पीछे लग गए। उन्होंने पता लगाया कि उसे जो आवास मिला है, वहां एक कक्ष है जहां और कोई नहीं जा सकता। राजा से शिकायत की कि उसने बहुत सारा धन वहां छिपा रखा है।
राजा ने महामंत्री के आवास का दौरा किया। सुकेश ने स्वयं उस कक्ष को खोला और राजा को प्रवेश के लिए आमंत्रित किया। वहां कुल्हाड़ी, बिछौना और अंगोछा रखे हुए थे। सुकेश ने ये सारी चीजें उठाईं और चल दिया-'बस,अब मेरा यहां कोई काम नहीं।' राजा यशकीर्ति सभासदों के षड्यंत्र के चलते हाथ मलते रह गए। जो राजा दूसरों के कहे पर आंख मूंद कर यकीन करता है, वह योग्य महामंत्री से हाथ धो बैठता है।

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