Monday, June 1, 2015

नर हो, न निराश करो मन को


एक स्कूल में ऊंची कूद प्रतियोगिता के लिए बच्चों को तैयार किया जा रहा था। अध्यापिका पूरी निष्ठा के साथ तैयारियां करवाने में व्यस्त थी। वह उनके चुनाव को लेकर परेशान भी थी। बहुत दिनों तक जब बच्चों की क्षमता और प्रदर्शन में अपेक्षित वृद्धि नहीं दिखाई दी तो प्रधानाध्यापिका ने दूसरी खेल अध्यापिका को प्रशिक्षण का दायित्व सौंपा।

नई शिक्षिका ने सबसे पहले एक बाड़ बनवाई और बच्चों को उसके ऊपर से कूदने को कहा। जब सब उस पर से कूद गए तो उसने उस बाड़ को थोड़ा ऊंचा कर दिया। कुछ बच्चे उस बाड़ से टकराकर गिरकर चोट खा गए। तब बाड़ को और ऊंचा कर दिया गया। इतना कि सब बच्चे टकराकर गिर गए। अब चुनाव को लेकर असमंजस दूर हो गया। जो बच्चे गिरकर, चोट खाकर तुरंत दोबारा प्रयत्न करने के लिए तैयार हो जाते उन्हें सर्वसम्मति से चुन लिया जाता। इसके बाद अध्यापिका उन सबको अवसर देती रही, चाहे वे कूद जाएं या गिर जाएं। वह कुछ-कुछ दिनों में बाड़ ऊंची करती रही। साथ ही बच्चों को इस बात के लिए मानसिक रूप से तैयार करती रही कि किसी भी दिन बाड़ ऊंची हो जाएगी, इसलिए यदि ऊंचा न कूद पाए तो टकराकर गिरने के लिए तैयार रहो। जल्द ही बच्चों की क्षमता में भी अपेक्षित परिवर्तन दिखाई पड़ने लगा।


ईश्वर भी उस दूसरी शिक्षिका की तरह है। यदि हम समाज में अपनी अलग पहचान बनाना या किसी बड़े उद्देश्य की पूर्ति हेतु निमित्त बनना चाहते हैं तो एक प्रतियोगी के रूप में हमारा चुनाव करने के लिए वो हमारे समक्ष बाधाएं उपस्थित करता है। चुपचाप देखता रहता है कि हम उन बाधाओं का सामना हंसते हुए करते हैं या नहीं। यदि हम उनसे लगी चोट की उपेक्षा करके अपना नैतिक संबल न खोकर उन्हें पार करने की अपनी इच्छाशक्ति बनाए रखते हैं तो वह हमें अधिक स्तरीय कार्य के लिए चुन लेता है। तब हमारे सामने अधिक बड़ी बाधा उपस्थित होती है। ताकि हम अपनी क्षमता का और अधिक विकास कर सकें इसलिए जीवन में आने वाली असफलताओं को व्यक्तित्व-विकास का साधन समझकर उनका स्वागत करना चाहिए।

प्रसिद्ध लेखक बर्नाड शॉ ने पूरे नौ वर्ष लगाकर पांच उपन्यास लिखे। उन्होंने उन्हें साठ अलग-अलग प्रकाशकों के पास भेजा। किंतु सब ने सखेद वापस कर दिए। शॉ इन अस्वीकृतियों से घबराए नहीं। बिना निराश हुए वह लेखन को निखारते गए। एक दिन वह विश्व प्रसिद्ध लेखक के रूप में जाने गए। हर नवागंतुक को अपने क्षेत्र में अपनी प्रतिभा सिद्ध करने के लिए संघर्ष करना ही पड़ता है। नूतन प्रयोगों का स्वीकार्य किसी के लिए सहज नहीं होता। पर जो लोग स्वयं को तराशना नहीं छोड़ते वे अंततः सफल हो जाते हैं।



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