Sunday, May 3, 2015


                      'अच्छे काम में देर कैसी'

मान लो आप एक ऐसे भिखारी को देखते हो जिसके पास कपड़ा-लत्ता कुछ नहीं है। जाड़े की रात है, उसे बहुत कष्ट हो रहा है। मन चाहा कि उसको एक कपड़ा दे दें। लेकिन देने के पहले अगर घर में किसी से पूछते हो तो हो सकता है कि वह कह दे, "अरे कितने आदमी ऐसे आते हैं, तुम कितनों को दोगे?" फिर आप सोचते हैं- हां, बात तो ठीक है। नहीं दूंगा। और आपका मन बदल जाता है। इसलिए अच्छा कर्म करने के पहले किसी से मत पूछो। क्योंकि "शुभस्य शीघ्रम"। शुभकर्म जल्दी से जल्दी करो। किसी से मत पूछो। अच्छा कर्म है तो उसमें परमात्मा का आशीर्वाद है। तुम्हारी हार नहीं होगी। 
मान लो कुछ गलत करने की इच्छा हुई, तो उसमें देर करो। आज नहीं कल, कल नहीं परसों, ऐसा करते रहो। इससे पूछो, उससे पूछो। लोग मना कर देंगे। मन भी साफ हो जाएगा और गलत काम तुम नहीं करोगे। तो यह रावण का उपदेश है- "शुभस्य शीघ्रम, अशुभस्य कालहरणम्।" 
मायासुर एक दानव था। उसे विष्णु से वरदान मिला और मायासुर स्वर्ग, मृत्यु, पाताल हर जगह लड़ाई करने लगा और अपना राज्य बनाने लगा। करते-करते आखिर एक दिन विष्णुजी के साथ भी उसकी लड़ाई हो गई। लोग विष्णु के पास गए और बोले- 'देखिए, आपके वरदान से वह शक्तिशाली हुआ है। अब आप ही इसको संभालें।' तो विष्णु जी ने लड़ाई की और उनकी भी हार हो गई। चूंकि विष्णु के वरदान से ही वह शक्तिशाली बना था। भक्त और भगवान में किसकी बुद्धि ज्यादा है। भक्त से जब पूछा जाएगा कि बुद्धि अधिक किसकी है, तो भक्त कहेगा 'मेरी'। 
मगर यह बुद्धि मिली है परमात्मा से। तो ठीक वैसे ही मायासुर को परमात्मा से वरदान मिला था, इसलिए बहुत मजबूत बन गया। लड़ाई हो गई और विष्णुजी की हार हो गई। मायासुर ने पेड़ में विष्णु को अच्छी तरह से बांध दिया। भक्त भगवान को बांध सकता है। बंध जाने के बाद विष्णु ने कहा, 'देखो मायासुर। हमने तो आपको वरदान दिया था। अब तुम हमको वरदान दो।' मायासुर ने कहा, 'मैं तुम्हारा हूं, तुम जो चाहोगे, मैं दे दूंगा।' तब विष्णु बोले, 'देख मायासुर मैं चाहता हूं, तू पत्थर बन जा।' तब मायासुर गिर पड़ा और पैर की तरफ से पत्थर बनने लगा। मायासुर बोला, 'हां आपका वरदान मुझे मंजूर है, मगर तीन शर्ते हैं।' 
पहली शर्त है कि मेरी छाती पर आपको अपने चरण रखने होंगें। भगवान ने कहा, 'तथास्तु'। इसका मतलब है कि मेरे हृदय में आप रहेंगे और कोई नहीं। दूसरी शर्त है, जो आपकी उपासना करेगा उसे अवश्य मोक्ष मिलना चाहिए। भगवान ने कहा, 'तथास्तु'। और तीसरी शर्त है कि अगर आपकी उपासना करने पर किसी को मोक्ष नहीं मिला तो यह पत्थर का मायासुर दोबारा जग जाएगा। भगवान ने कहा 'तथास्तु'। 
कितनी खूबसूरती से यहां मायासुर का चरित्र चित्रित किया गया है। अगर पापी, दुराचारी, इंसान जिस तरह से भगवान की उपासना करे तो मोक्ष मिल जाएगा। 'उपासना' शब्द का अर्थ क्या है। अपने को परमात्मा के निकट ले जाना। 'उप' मतलब निकट। अपने आसन को परमात्मा के पास ले जाना अर्थात साधना करना। 

                         'दूसरों पर निर्भर ना रहें'

एक चिड़िया ने एक खेत में खड़ी फसल के बीच घोंसला बना कर अंडे दिए। उनसे समय आने पर दो बच्चे निकले। चिड़िया दाना चुगने के लिए रोज जंगल जाती। इस बीच उसके बच्चे अकेले रहते थे। चिड़िया लौटती तो बच्चे बहुत खुश होते और उसका लाया चुग्गा खाते। एक दिन चिड़िया ने देखा बच्चे बहुत डरे हुए हैं। उन्होंने बताया- 'आज खेत का मालिक आया था। वह कह रहा था कि फसल पक चुकी है। कल बेटों से खेत की कटाई के लिए कहेगा। इस तरह तो हमारा घोंसला टूट जाएगा फिर हम कहां रहेंगे?' चिड़िया बोली- 'फिक्र मत करो, अभी खेत नहीं कटेगा।'

अगले दिन सच में कुछ नहीं हुआ और बच्चे बेफिक्र हो गए। एक हफ्ते बाद चिड़िया को बच्चे फिर डरे हुए मिले। बोले- 'किसान आज भी आया था। कह रहा था कि कल नौकर को खेत काटने को कहेगा।' इस बार भी चिड़िया ने बच्चों से कहा- 'कुछ नहीं होगा, डरो मत।' अगले हफ्ते बच्चों ने बताया कि किसान आज फिर आया था और कह रहा था कि फसल की कटाई में बहुत देर हो गई है। कल वह खुद ही काटेगा। यह सुनकर चिड़िया बच्चों से बोली- 'कल खेत कट जाएगा।' वह बच्चों को तुरंत एक सुरक्षित घोंसले में ले गई।
हैरान बच्चों ने पूछा- 'मां तुमने कैसे जाना कि इस बार खेत सचमुच कटेगा?' चिड़िया बोली- 'जब तक इंसान किसी काम के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है, उसके संपन्न होने में संदेह रहता है। लेकिन जब वह काम को खुद करने की ठान लेता है तो जरूर पूरा होता है।' किसान ने जब खुद खेत काटने की सोची, तभी तय हुआ कि अब खेत जरूर कट जाएगा।

            राजगुरु की तीन बातें

हरि सिंह एक न्यायप्रिय राजा था। वह प्रजा के सुख-दुख की चिंता अपने परिवार की तरह करता था। लेकिन कुछ दिनों से उसे अपने काम-काज से संतुष्टि नहीं हो पा रही थी। उसने बहुत प्रयत्न किया कि वह अभिमान से दूर रहे, पर वह इस समस्या का हल नहीं निकाल पा रहा था। एक दिन राजा राजगुरु प्रखरबुद्धि के पास जा पहुंचा। राजा का चेहरा देखते ही राजगुरु उसकी परेशानी समझ गए।
उन्होंने कहा, 'राजन, यदि तुम मेरी तीन बातें याद रखोगे तो जिंदगी में कभी असफल नहीं हो सकते।' राजा बोला- 'आप बताइए गुरुदेव, मैं हमेशा याद रखूंगा।' प्रखरबुद्धि ने कहा, 'पहली बात, रात को मजबूत किले में रहना। दूसरी बात, स्वादिष्ट भोजन ग्रहण करना और तीसरी, सदा मुलायम बिस्तर पर सोना।' गुरु की ये अजीब बातें सुनकर राजा बोला, 'गुरु जी, आपकी इन बातों को अपनाया तो मेरे अंदर अभिमान और भी अधिक बढ़ जाएगा।'
इस पर प्रखरबुद्धि मुस्कराते हुए कहने लगे, 'तुम मेरी बातों का अर्थ नहीं समझे। मैं समझाता हूं। पहली बात- सदा अपने गुरु के साथ रहकर चरित्रवान बने रहना। कभी बुरी आदत के आदि मत होना। दूसरी बात, कभी पेट भरकर मत खाना। जो भी मिले उसे प्रेमपूर्वक खाना। खूब स्वादिष्ट लगेगा। और तीसरी बात, कम से कम सोना। अधिक समय तक जागकर प्रजा की रक्षा करना। जब नींद आने लगे तो राजसी बिस्तर का ध्यान छोड़कर घास, पत्थर, मिट्टी जहां भी जगह मिले, वहीं गहरी नींद सो जाना।
ऐसे में तुम्हें हर जगह लगेगा कि मुलायम बिस्तर पर हो। राजन, यदि तुम शासक की जगह त्यागी बनकर अपनी प्रजा का ख्याल रखोगे तो कभी भी अभिमान, धन और राजपाट का मोह तुम्हें नहीं छू पाएगा।

No comments: