Tuesday, April 28, 2015

कर्म भाग्य को बदल सकता है



स्वभाव की जिंदादिली


एक अस्वस्थ व्यक्ति ने डॉक्टर को बुलवाया। उसके घर की लिफ्ट खराब थी, इसलिए डाक्टर को सीढ़ियां चढ़कर पहुंचना पड़ा। वह काफी जोरों से हांफने लगा। जब अस्वस्थ व्यक्ति ने उनकी यह हालत देखी, तो बिस्तर से उठकर उसने डॉक्टर को बैठने के लिए कुर्सी दी और एक गोली उसे देते हुए बोला- 'यह तुम्हें फौरन आराम पहुंचाएगी। तुम गरिष्ठ भोजन फौरन बंद कर दो और साग-सब्जी व फल खाया करो। मैं तुमसे उम्र में करीबन दुगना हूं, फिर भी सौ गुना चुस्त हूं।' डॉक्टर ने मरीज की चुस्ती की तारीफ की।

उस व्यक्ति ने फिर डॉक्टर से पूछा- 'क्या तुम डांस कर सकते हो?' डॉक्टर ने इन्कार कर दिया तो उसने संगीत बजाया और नृत्य भी किया। साथ ही डॉक्टर को सलाह दी- 'रोजाना कम से कम पंद्रह मिनट तक डांस करने से तुम छरहरे और चुस्त हो जाओगे। तुम डॉक्टर मरीजों को हमेशा ऐसी सलाह देते हो, जो उनके लिए उपयोगी नहीं होतीं। तुम एक डाकिए से घूमने-फिरने को कहते हो, जबकि वह तो घूमने-फिरने में ही लगा रहता है।

मैं जानता हूं कि अब तुम मुझे लिखने के लिए मना करोगे क्योंकि उसमें मेहनत होगी। लेकिन मैं एक लेखक हूं, इसलिए लिखने से ही स्वस्थ रहता हूं। अब तुम यह अनुभवी सलाह देने के लिए मुझे पांच शिलिंग दो।' डॉक्टर ने हंसते हुए कहा- 'ठीक है, आप उन्हें काटकर मुझे दो पौंड दे दीजिए।' कारण पूछने पर डॉक्टर बोले- 'क्योंकि मैंने आपको स्वस्थ कर दिया। मुझे मरीज समझकर आप अपना कष्ट भूल गए।'

स्वभाव की जिंदादिली व्यक्ति को सदैव स्वस्थ व ऊर्जावान बनाए रखती है। डाक्टर का तो पता नहीं, लेकिन इस कहानी के मरीज का नाम है जॉर्ज बर्नार्ड शॉ।

                    भारतीय की बुद्धिमानी


सुभाष चंद्र बोस इंग्लैंड में आईसीएस का इंटरव्यू देने गए। वहां उनका इंटरव्यू लेने वाले सभी अधिकारी अंग्रेज थे। दरअसल, वे भारतीय को किसी उच्च पद पर नहीं देखना चाहते थे। इसलिए इंटरव्यू में अजीबो-गरीब प्रश्न पूछकर भारतीयों को नीचा दिखाने का प्रयास करते रहते थे। सुभाष इंटरव्यू के लिए अंग्रेज अधिकारियों के समक्ष बैठ गए। अधिकारी ने उन्हें देखकर व्यंग्य से मुस्कराते हुए पूछा,'बताओ, उस छत के पंखे में कुल कितनी पंखुड़ियां हैं।'

प्रश्न सुनकर सुभाष की नजर पंखे पर चली गई। पंखा काफी तेज गति से चल रहा था। उन्हें पंखे की ओर देखता पाकर अंग्रेज मुस्कराते हुए एक-दूसरे की ओर देखने लगे। तभी दूसरा अंग्रेज बोला,'यदि तुम पंखुड़ियों की सही संख्या नहीं बता पाए तो इस इंटरव्यू में फेल हो जाओगे।' एक और सदस्य बोला,'भारतीयों में बुद्धि होती ही कहां है?' उनकी बातें सुनकर सुभाष निर्भीकता से बोले,'अगर मैंने इसका सही जवाब दे दिया तो आप भी मुझसे दूसरा प्रश्न नहीं पूछ पाएंगे। और साथ ही मेरे सामने यह भी स्वीकार करेंगे कि भारतीय न सिर्फ बुद्धिमान होते हैं बल्कि वे निर्भीकता और धैर्य से हर प्रश्न का हल खोज लेते हैं।'

इसके बाद सुभाष तेजी से अपने स्थान से उठे। उन्होंने चलता पंखा बंद कर दिया और पंखा रुकते ही पंखुड़ियों की संख्या गिन ली। इसके बाद पंखुड़ियों की सही संख्या उन्होंने अधिकारियों को बता दी। सुभाष की विलक्ष्ण बुद्धि, सामयिक सूझबूझ और साहस को देखकर इंटरव्यू बोर्ड के सदस्यों के सिर शर्म से झुक गए। वे फिर उनसे आगे कोई प्रश्न नहीं पूछ पाए। उन्हें इस बात को भी स्वीकार करना पड़ा कि भारतीय साहस, बुद्धिमानी और आत्मविश्वास से हर मुसीबत का हल खोज लेते हैं।

                             हार और जीत
किसी शहर में बहुत दूर से एक विद्वान पहुंचा। उसने कहा कि वह स्थानीय विद्वानों से शास्त्रार्थ करना चाहता है। कुछ लोग उसे शहर के प्रमुख विद्वानों के पास ले गए जिन्होंने कहा,'हमारे यहां तो सनातन गोस्वामी और उनके भतीजे जीव गोस्वामी ही श्रेष्ठ ज्ञानी हैं। वे आपको विजेता स्वीकार कर मान्यता पत्र पर हस्ताक्षर कर देंगे तो हम भी आपको विजेता मान लेंगे।' यह सुनकर वह विद्वान सनातन गोस्वामी के पास पहुंचा,'स्वामी जी, या तो आप शास्त्रार्थ कीजिए या मुझे मान्यता पत्र प्रदान कीजिए।'

सनातन गोस्वामी बोले,'भाई! अभी हमने शास्त्रों का मर्म ही कहां समझा है। हम तो विद्वानों के सेवक हैं।' उन्होंने मान्यता पत्र पर हस्ताक्षर कर दे दिया। विद्वान मान्यता पत्र लेकर प्रसन्नतापूर्वक चला जा रहा था कि जीव गोस्वामी मिल गए। उसने उनसे भी कहा,'आप इस मान्यता पत्र पर हस्ताक्षर करेंगे या मुझसे शास्त्रार्थ करेंगे?' जीव बोले,'मैं शास्त्रार्थ के लिए तैयार हूं।' शास्त्रार्थ शुरू हो गया। शहर के लोग उत्सुकतापूर्वक यह देख रहे थे। लंबे शास्त्रार्थ में जीव गोस्वामी ने उस विद्वान को पराजित कर दिया।

वह दुखी होकर नगर से चला गया। जीव ने सनातन गोस्वामी को अपनी विजय के बारे में बताया पर वह प्रसन्न नहीं हुए। उन्होंने कहा,'एक विद्वान को अपमानित करके तुम्हें थोड़ा यश अवश्य मिल गया, लेकिन उसे लेकर क्या करोगे? यह तुम्हारे अहंकार को ही बढ़ाएगा। फिर एक अहंकारी ज्ञान की साधना कैसे कर पाएगा। आखिर उस विद्वान को विजयी मान लेने में तुम्हारा क्या बिगड़ता था। हमारे लिए यश-अपयश, जीवन-मरण, सुख-दुख, मित्र-शत्रु सभी एक समान होते हैं। हमें हार और जीत के फेर में पड़ना ही नहीं चाहिए।' जीव गोस्वामी को अपनी भूल का अहसास हो गया। उन्होंने तुरंत क्षमा मांग ली।


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