Tuesday, April 5, 2016

मृत्यु तो जीवन का अभिन्न अंग

एक बहुत ही सिद्ध और सच्चे गुरू थे। सदैव प्रसन्न रहते थे। एक दिन एक शिष्य ने पूछा, 'महाराज आपको कभी अप्रसन्न नहीं देखा, आप कैसे हमेशा प्रश्न्न रह पाते हैं?' संत ने उत्तर दिया, 'मैं अपनी प्रसन्नता से पहले तुम्हारे बारे में कुछ बताना चाहता हूँ।' 'मेरे बारे में!' शिष्य ने आश्चर्य से पूछा। संत ने कहा, 'हाँ, तुम्हारे बारे में। दरअसल तुम आज से एक सप्ताह बाद ही मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे।' यह भविष्यवाणी सुनकर शिष्य सन्न रह गया। उसके मन पर इसका बहुत गहरा प्रभाव पड़ा और उसी दिन उसके स्वभाव में आर्श्यजनक परिवर्तन आ गया। वह छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठ गया। सभी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करने लगा, उसके मन में उदारता ने जन्म ले लिया। अचानक एक सप्ताह बाद वह संध्या कर रहा था, उसके मन में मृत्यु की कल्पना थी। तभी वह संत वहाँ आ गए और उन्होनें उससे पूछा, 'कहो, कैसा लग रहा है?' शिष्य ने शांत-भाव से उत्तर दिया, 'महाराज! इस पूरे सप्ताह मुझे किसी पर क्रोध नहीं आया। कड़वा भी नहीं बोला, बल्कि सबके साथ प्रेमपूर्वक रहा। सोचा, क्यों थोड़े से समय के लिए बुराई का टोकरा अपने सिर पर उठाऊं।' संत ने कहा, 'मैं तुम्हारी मृत्यु की भविष्यवाणी इसीलिए की थी कि तुम जान सको कि मृत्यु को याद रखने वाला क्रोध, घृणा व ईष्या आदि के बारे में सोचता भी नहीं और यही मेरे प्रसन्न रहने का कारण है। जाओ प्रसन्न रहो, अभी तुम्हारी काफी आयु शेष है।
मृत्यु तो जीवन का अभिन्न अंग है, इससे डरना क्या? इसे याद रखकर हम भय मुक्त रहना सीखते हैं और तब जीवन में कुछ अच्छाइयों को ग्रहण कर बहुत-सी बुराइयों से दूर रह सकते हैं, जैसे कि हमने इस प्रसंग में देखा है।

जब तक मन में भय रहता है, तब तक आत्मा परिपूर्ण नहीं रह सकती और आप सुखी जीवन की कल्पना नहीं कर सकते। उसकी चिंता-सोच में आप डूबे रहेंगे। आवश्यकता इस बात की है कि आप अपनी सोच में बदलाव लाएं, सकारात्मक नजरिया बनाएं। भय को सम्भलकर चलने की प्रेरणास्वरूप मानें। जो घटना होनी है, उसे टाला नहीं जा सकता- यह प्रकृति का नियम है। अतएव सकारात्मक दृष्टि से आप हर परिस्थिति को खुशी से स्वीकार कर उसी में आनंद की अनुभूती लें। इसी में आपका भयमुक्त जीवन है।
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