Monday, February 8, 2016

निर्मल मन

एक युवा ब्रह्मचारी ने दुनिया के कई देशों में जाकर अनेक कलाएं सीखीं। एक देश में उसने धनुष बाण बनाने और चलाने का प्रशिक्षण प्राप्त किया। कुछ दिनों के बाद वह दूसरे देश की यात्रा पर निकल गया। वहां जहाज बनाए जाते थे, इसलिए उसने जहाज बनाने की कला सीख ली। इसके बाद वह किसी तीसरे देश में पहुंच गया। वहां वह कई ऐसे लोगों के संपर्क में आया जो घर बनाने का काम करते थे। इस प्रकार वह सोलह देशों में गया और कई कलाएं सीख कर अपने घर लौट आया।
वापस आने के बाद वह अहंकार में भरकर लोगों से पूछता-'इस संपूर्ण पृथ्वी पर मुझ जैसा कोई गुणी व्यक्ति नजर आता है?' लोग हैरत से उसे देखते। धीरे-धीरे यह बात भगवान बुद्ध तक भी पहुंची। बुद्ध उसके बारे में सब जानते थे। वह उसकी प्रतिभा से भी परिचित थे। लेकिन वे इस बात से चिंतित हो गए कि कहीं उसका अभिमान उसका नाश ही न कर दे। एक दिन वे एक भिखारी का रूप धरकर, भिक्षा पात्र लिए उसके सामने चले गए। ब्रह्मचारी ने बड़े अभिमान से पूछा-'कौन हो तुम?' बुद्ध बोले-'मैं आत्मविजय का पथिक हूं।'
ब्रह्मचारी ने उनके कहे शब्दों का अर्थ जानना चाहा तो वे बोले-'एक मामूली हथियार निर्माता भी बाण बना लेता है, जहाज का चालक उस पर नियंत्रण रख लेता है, गृह निर्माता भी घर बना लेता है। केवल ज्ञान से कुछ नहीं होने वाला। मनुष्य की वास्तविक उपलब्धि तो है उसका निर्मल मन। अगर मन पवित्र नहीं हुआ तो सारा ज्ञान व्यर्थ है। अहंकार से मुक्त व्यक्ति ही ईश्वर को पा सकता है।' ब्रह्मचारी ने बुद्ध के ये वचन सुने तो उसे अपनी भूल का अहसास हो गया।
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